- सूरदास के जीवन-परिचय और रचनाओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
कवि सूरदास का जीवन-परिचय एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर
जीवन-परिचय- सूरदास हिन्दी साहित्य के महान भक्त कवि तथा भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा के प्रमुख कृष्णभक्त कवि हैं। उन्होंने अपनी मधुर वाणी और काव्य-कला द्वारा श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, प्रेम-लीलाओं तथा भक्ति-भावना का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है। हिन्दी साहित्य में उनका स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण है।
सूरदास जी का जन्म सन् 1478 ई. (संवत् 1535 वि.) में माना जाता है। इनके जन्म-स्थान के विषय में मतभेद है। अधिकांश विद्वान आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता ग्राम को तथा कुछ विद्वान सीही ग्राम (हरियाणा) को इनका जन्म-स्थान मानते हैं। इनके जन्मान्ध होने के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है।
बाल्यावस्था से ही सूरदास जी की रुचि भक्ति और संगीत में थी। एक बार उनके भक्ति-गीत सुनकर महाप्रभु वल्लभाचार्य अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें अपना शिष्य बना लिया। वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछाप के आठ कवियों में सूरदास सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन गऊघाट तथा वृन्दावन क्षेत्र में श्रीकृष्ण की भक्ति और कीर्तन में व्यतीत किया।
सूरदास जी का देहावसान लगभग 1583 ई. में गोवर्धन के निकट पारसोली ग्राम में हुआ।
कृतियाँ (रचनाएँ)
सूरदास की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
(1) सूरसागर
यह सूरदास की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसमें श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपी-प्रेम, गोपी-विरह तथा उद्धव-गोपी संवाद का अत्यन्त सरस एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है।
(2) सूर-सारावली
यह ग्रन्थ ‘सूरसागर’ का सार रूप माना जाता है। इसमें लगभग 1107 पद संग्रहीत हैं।
(3) साहित्य-लहरी
इस ग्रन्थ में दृष्टकूट पदों का संग्रह है। इसमें अलंकारों, नायिका-भेद तथा काव्य-सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।
साहित्य में स्थान-
सूरदास हिन्दी साहित्य के अमर कवि हैं। उन्होंने वात्सल्य एवं श्रृंगार रस को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की। कृष्ण की बाल-लीलाओं और गोपियों के प्रेम का जितना स्वाभाविक तथा हृदयस्पर्शी चित्रण सूरदास ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसी कारण उन्हें “वात्सल्य रस का सम्राट” तथा “हिन्दी साहित्य का सूर्य” कहा जाता है।
प्रसिद्ध उक्ति—
सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकाश॥
पद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या
प्रश्न 1.
चरन-कमल बंद हरि राई ।।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौ सब कुछ दरसाई॥
बहिरौ सुनै, गूँगा पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंद तिहिं पाई ॥
उत्तर
शब्दार्थ- हरि राई = भगवान श्रीकृष्ण, पंगु = लँगड़ा, गिरि = पर्वत, लंघै = लाँघ जाता है, दरसाई = दिखा देता है, बहिरौ = बहरा, गूँगा = जो बोल न सके, रंक = निर्धन, छत्र = राजचिह्न, पाई = चरण।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में कवि ने भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा और महिमा का वर्णन करते हुए उनके चरण-कमलों की वन्दना की है।
व्याख्या- भक्त शिरोमणि सूरदास भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की स्तुति करते हुए कहते हैं कि उनकी कृपा अत्यन्त महान और चमत्कारिक है। उनकी कृपा प्राप्त होने पर लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वतों को लाँघ जाता है तथा अन्धे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है। भगवान की कृपा से बहरा सुनने लगता है और गूँगा बोलने लगता है। इतना ही नहीं, यदि किसी निर्धन व्यक्ति पर भी भगवान की कृपा हो जाए तो वह राजा के समान सम्मान प्राप्त कर सिर पर राजछत्र धारण कर सकता है।
कवि अंत में कहते हैं कि ऐसे दयालु, कृपालु और करुणामय प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ।
काव्यगत सौन्दर्य-
(1) भाव पक्ष
- भगवान श्रीकृष्ण की कृपा की महिमा का प्रभावशाली वर्णन किया गया है।
- कवि की गहन भक्ति एवं श्रद्धा का सुंदर चित्रण हुआ है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – भक्ति रस।
- गुण – प्रसाद गुण।
- शब्दशक्ति – लक्षणा।
- अलंकार –
- ‘चरन-कमल’ में रूपक अलंकार।
- ‘बार-बार’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
- ‘पंगु गिरि लंघै’, ‘बहिरौ सुनै’ आदि में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 2.
अबिगत-गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौं गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै ॥
परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जानैं जो पावै ॥
रूप-रेख-गुन जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै ॥
उत्तर
शब्दार्थ- अबिगत = निर्गुण/निराकार ब्रह्म, गति = दशा या स्वरूप, अंतरगत = हृदय में, भावै = अच्छा लगता है, अमित = असीम, तोष = सन्तोष, अगम = जिसकी प्राप्ति कठिन हो, अगोचर = इन्द्रियों से परे, रेख = आकृति, जुगति = युक्ति, निरालंब = बिना किसी आधार के, धावै = दौड़े, तातें = इसलिए, सगुन = साकार एवं गुणयुक्त ईश्वर।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में कवि सूरदास ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना की कठिनता का वर्णन करते हुए सगुण भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को अधिक सरल और श्रेष्ठ बताया है।
व्याख्या- सूरदास जी कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसकी वास्तविक स्थिति के विषय में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति उसी प्रकार होती है जैसे कोई गूँगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद चखकर उसका आनन्द तो अनुभव करता है, किन्तु उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता।
उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का आनन्द केवल अनुभव किया जा सकता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यद्यपि उसकी प्राप्ति से उपासक को निरन्तर परम आनन्द और असीम सन्तोष प्राप्त होता है, फिर भी वह सामान्य लोगों की पहुँच से बाहर है। वह मन और वाणी दोनों के लिए अगम तथा अगोचर है। उसे इन्द्रियों द्वारा जाना नहीं जा सकता।
निर्गुण ब्रह्म का न कोई रूप है, न आकृति, न गुण, न जाति और न ही उसे किसी विशेष उपाय से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में भक्त का मन बिना किसी आधार के कहाँ टिकेगा? इसलिए सभी प्रकार से विचार करने के बाद सूरदास जी ने सगुण श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं का गान करना ही अधिक उचित समझा है।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- कवि ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना को कठिन तथा सगुण भक्ति को सरल और सहज बताया है।
- भगवान श्रीकृष्ण के प्रति कवि की अटूट श्रद्धा एवं भक्ति का सुन्दर चित्रण हुआ है।
- निर्गुण और सगुण भक्ति का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – भक्ति रस तथा शान्त रस।
- गुण – प्रसाद गुण।
- शब्दशक्ति – लक्षणा।
- अलंकार –
- ‘अगम-अगोचर’ तथा ‘जाति-जुगति’ में अनुप्रास अलंकार।
- ‘ज्यौं गूंगे मीठे फल को रस’ में दृष्टान्त अलंकार।
- ‘सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै’ में हेतु अलंकार।
प्रश्न 3.
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत ॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ॥
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति ।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति ॥
उत्तर
सन्दर्भ- मनिमय = मणियों से युक्त, कनक = सोना, बिम्ब = प्रतिबिम्ब, पकरिबैं = पकड़ने के लिए, धावत = दौड़ते हैं, निरखि = देखकर, द्वै दतियाँ = दो छोटे-छोटे दाँत, तिहिं = उन्हें, अवगाहत = पकड़ने का प्रयास करते हैं, कर-पग = हाथ और पैर, बसुधा = पृथ्वी, बैठकी = आसन, साजति = सजाती है, अँचरा तर = आँचल के नीचे।
सन्दर्भ— प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग— इस पद में कवि ने मणियों से जड़े हुए नन्द बाबा के आँगन में घुटनों के बल चलते हुए बालक श्रीकृष्ण की मनोहर बाल-लीलाओं का चित्रण किया है।
व्याख्या— सूरदास जी श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बालक कृष्ण घुटनों के बल चल रहे हैं और किलकारियाँ भरते हुए नन्द बाबा के सोने तथा मणियों से जड़े आँगन में इधर-उधर घूम रहे हैं। वे आँगन में दिखाई देने वाले अपने प्रतिबिम्ब को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। कभी अपनी छाया को देखकर उसे पकड़ने का प्रयास करते हैं।
जब श्रीकृष्ण किलकारी मारकर हँसते हैं, तब उनके मुख में चमकते हुए दो छोटे-छोटे दाँत अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होते हैं। वे उन दाँतों के प्रतिबिम्ब को भी बार-बार पकड़ने का प्रयत्न करते हैं। सोने की भूमि पर उनके हाथों और पैरों की छाया इतनी सुन्दर दिखाई देती है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो पृथ्वी ने प्रत्येक मणि पर उनके बैठने के लिए कमल का आसन सजा दिया हो।
बालक कृष्ण की इन मनोहारी बाल-लीलाओं को देखकर माता यशोदा अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और बार-बार नन्द बाबा को बुलाकर यह दृश्य दिखाती हैं। अंत में वे बालक कृष्ण को अपने आँचल के नीचे ढककर प्रेमपूर्वक दूध पिलाने लगती हैं।
काव्यगत सौन्दर्य-
- प्रस्तुत पद में बालक श्रीकृष्ण की सहज, स्वाभाविक एवं मनोहर बाल-लीलाओं का अत्यन्त सजीव चित्रण हुआ है।
- वात्सल्य भाव का अत्यन्त सुंदर और हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया है।
- भाषा – सरस, मधुर एवं साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वात्सल्य रस।
- गुण – प्रसाद एवं माधुर्य।
- शब्दशक्ति – ‘करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति’ में लक्षणा शब्दशक्ति।
- अलंकार –
- ‘किलकत कान्ह’, ‘द्वै दतियाँ’, ‘प्रतिपद प्रतिमनि’ में अनुप्रास अलंकार।
- ‘कमल बैठकी’ में रूपक अलंकार।
- ‘करि-करि’, ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
प्रश्न 4.
मैं अपनी सब गाई चरैहौं।
प्रात होत बल कैं संग जैहौं, तेरे कहैं न रैहौं ॥
ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैकहुँ डर नहिं लागत ।
आजु न सोव नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत ॥
और ग्वाल सब गाई चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौं ।
सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं ॥
उत्तर
शब्दार्थ- चरैहौं = चराऊँगा, प्रात = प्रातःकाल, बल कैं संग = बलराम के साथ, जैहौं = जाऊँगा, रैहौं = रहूँगा, गाइनि = गायों के, नैकहुँ = तनिक भी, लागत = लगता है, नंद-दुहाई = नन्द बाबा की सौगन्ध, रैनि = रात्रि, जागत = जागता हुआ, स्याम = श्रीकृष्ण, सोइ रहौ = सो जाओ, जान मैं दैहौं = जाने दूँगी।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में बालक श्रीकृष्ण द्वारा माता यशोदा से गायें चराने जाने के लिए किए गए स्वाभाविक बाल-हठ का वर्णन किया गया है।
व्याख्या- बालक श्रीकृष्ण अपनी माता यशोदा से हठपूर्वक कहते हैं कि हे माता! मैं अपनी सभी गायों को चराने के लिए वन में अवश्य जाऊँगा। प्रातःकाल होते ही मैं अपने बड़े भाई बलराम के साथ गायें चराने निकल जाऊँगा और तुम्हारे रोकने पर भी नहीं रुकूँगा। मुझे ग्वाल-बालों और गायों के बीच रहने में तनिक भी भय नहीं लगता।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि मैं नन्द बाबा की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि आज रात को सोऊँगा भी नहीं, बल्कि पूरी रात जागता रहूँगा। कहीं ऐसा न हो कि प्रातःकाल देर तक सोता रह जाऊँ और गायें चराने जाने से वंचित रह जाऊँ। मैं यह कैसे सहन कर सकता हूँ कि अन्य सभी ग्वाल-बाल गायें चराने चले जाएँ और मैं अकेला घर पर बैठा रहूँ।
सूरदास जी कहते हैं कि बालक कृष्ण का यह हठ देखकर माता यशोदा उन्हें समझाते हुए कहती हैं कि हे मेरे लाल! अब तुम निश्चिन्त होकर सो जाओ। मैं तुम्हें प्रातःकाल गायें चराने जाने की अनुमति अवश्य दे दूँगी।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में गायें चराने जाने के लिए बालक श्रीकृष्ण के स्वाभाविक बाल-हठ का अत्यन्त मनोहारी चित्रण किया गया है।
- बालक कृष्ण की सरलता, उत्साह तथा आत्मविश्वास का सुन्दर वर्णन हुआ है।
- माता और पुत्र के मधुर वात्सल्य सम्बन्ध का सजीव चित्रण हुआ है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरस, सरल एवं सुबोध ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वात्सल्य रस।
- गुण – माधुर्य।
- शब्दशक्ति – लक्षणा।
- अलंकार – अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 5.
मैया हौं न चरैहौं गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाईं पिराइ ॥
जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहँ दिवाइ ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ॥
मैं पठेवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ॥
उत्तर
शब्दार्थ- मैया = माता, हौं = मैं, चरैहौं = चराऊँगा, सिगरे = सभी, घिरावत = घेरने के लिए कहते हैं, मोसों = मुझसे, पाईं = पैरों में, पिराइ = पीड़ा, पत्याहि = विश्वास हो, बलदाउहिं = बलराम से, सौंहँ = शपथ, दिवाइ = दिलाकर, रिसाइ = क्रोधित होकर, पठेवति = भेजती हूँ, लरिका = लड़का (पुत्र), बहराइ = बहलाने के लिए, रिंगाइ = दौड़ाकर।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में बालक श्रीकृष्ण माता यशोदा से ग्वाल-बालों की शिकायत करते हुए कहते हैं कि वे अब गाय चराने के लिए नहीं जाएँगे।
व्याख्या- बाल-स्वभाव के अनुरूप श्रीकृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हुए कहते हैं कि हे मैया! अब मैं गाय चराने नहीं जाऊँगा। सभी ग्वाल-बाल अपनी गायों को घेरने तथा सँभालने का कार्य मुझसे ही कराते हैं। इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते मेरे पैरों में दर्द होने लगा है। यदि आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो बड़े भाई बलराम को बुलाकर उनसे पूछ लीजिए तथा उन्हें अपनी शपथ दिलाकर सच्चाई जान लीजिए। यह सुनकर माता यशोदा ग्वाल-बालों पर क्रोधित हो जाती हैं और उन्हें डाँटने लगती हैं।
सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा प्रेमपूर्वक कहती हैं कि मैं तो अपने पुत्र को केवल उसका मन बहलाने के लिए गाय चराने भेजती हूँ, किन्तु ये ग्वाल-बाल उसे इधर-उधर दौड़ाकर परेशान करते रहते हैं। मेरा कृष्ण तो अभी बहुत छोटा बालक है।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में बालक कृष्ण की दुःखभरी शिकायत तथा माता यशोदा के ममता-पूर्ण वात्सल्य का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण हुआ है।
- कवि ने बाल-मनोविज्ञान का अत्यन्त सजीव एवं मार्मिक चित्रण किया है।
- माता-पुत्र के प्रेमपूर्ण सम्बन्ध का हृदयस्पर्शी वर्णन किया गया है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं स्वाभाविक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वात्सल्य रस।
- शब्दशक्ति – अभिधा।
- गुण – माधुर्य।
- अलंकार –
- ‘पाईं पिराइ’ तथा ‘सूर स्याम’ में अनुप्रास अलंकार है।
प्रश्न 6.
सखी री, मुरली लीजै चोरि ।
जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि ॥
छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरतन कबहूँ छोरि।
कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोंसत जोरि ॥
ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि ।
सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि ॥
उत्तर
शब्दार्थ- सखी री = हे सखी!, चोरि = चुराकर, जिनि = जिसने, गुपाल = श्रीकृष्ण, सबनि = सभी की, छिन इक = एक क्षण, निसि-बासर = रात-दिन, धरतन = रखते हुए, कर = हाथ, अधरनि = होंठों पर, कटि = कमर, खोंसत = खोंस लेते हैं, मोहिनी = मोह लेने वाला जादू, भोरि = भुलावा देकर, राग = प्रेम, डोरि = डोरी।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में कवि सूरदास ने श्रीकृष्ण की मुरली के प्रति गोपियों के ईर्ष्या-भाव का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक एवं स्वाभाविक चित्रण किया है।
व्याख्या- गोपियाँ श्रीकृष्ण की मुरली को अपनी प्रतिद्वन्द्वी और सौतन के समान मानती हैं। एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी! हमें श्रीकृष्ण की इस मुरली को चुरा लेना चाहिए, क्योंकि इसने श्रीकृष्ण को अपने वश में कर लिया है और हमारी ओर से उनका सारा प्रेम तोड़ दिया है।
गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण इस मुरली को एक क्षण के लिए भी अपने से अलग नहीं करते। वे दिन-रात इसे अपने साथ रखते हैं। कभी इसे हाथ में रखते हैं, कभी अपने अधरों पर लगाकर बजाते हैं और कभी कमर में खोंस लेते हैं। इस प्रकार वे इसे हर समय अपने साथ रखते हैं।
गोपियों को आश्चर्य होता है कि न जाने इस मुरली ने कौन-सा जादू कर दिया है कि श्रीकृष्ण इसके मोह में पूरी तरह बँध गए हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपी अपनी सखी से कहती है कि इस मुरली ने प्रेम की डोरी से बाँधकर श्रीकृष्ण के मन को अपने वश में कर लिया है।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में प्रेमिका के मन में उत्पन्न स्वाभाविक ईर्ष्या-भाव का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है।
- गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम तथा मुरली के प्रति ईर्ष्या स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है।
- प्रेम की गहनता एवं भावुकता का सुन्दर चित्रण हुआ है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सहज, सरल एवं साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक तथा गीतात्मक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – श्रृंगार रस।
- शब्दशक्ति – ‘बँध्यौ राग की डोरि’ में लक्षणा शब्दशक्ति।
- गुण – माधुर्य।
- अलंकार –
- ‘राग की डोरि’ में रूपक अलंकार है।
- सम्पूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की छटा दृष्टिगोचर होती है।
प्रश्न 7.
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।।
बृन्दावन गोकुल बने उपबन, सघन कुंज की छाँहीं ॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत ।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ॥
गोपी ग्वाले बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनस हित जदु-तात ॥
उत्तर
शब्दार्थ- ऊधौ = उद्धव, मोहिं = मुझे, बिसरत = भूलता, बने उपबन = वन और उपवन, सघन = घने, कुंज = लताओं एवं वृक्षों के समूह, छाँहीं = छाया, जसुमति = यशोदा, दह्यौ = दही, सजायौ = सुसज्जित करके रखा हुआ, हित = प्रेम, सिरात = बीत जाते थे, धनि-धनि = धन्य-धन्य, जदु-तात = यदुवंश के स्वामी श्रीकृष्ण।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- प्रस्तुत पद में उद्धव द्वारा ब्रजवासियों की दशा सुनाने पर श्रीकृष्ण अपने प्रिय ब्रज की स्मृतियों में खो जाते हैं और उद्धव से अपने हृदय की भावनाएँ व्यक्त करते हैं।
व्याख्या- श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव! मुझे ब्रज की याद कभी नहीं भूलती। वृन्दावन और गोकुल के वन-उपवन, वहाँ के घने-घने कुंजों की शीतल छाया आज भी मेरे मन में बसी हुई है। उन रमणीय स्थलों की स्मृतियाँ मुझे बार-बार भावुक बना देती हैं। कि प्रातःकाल माता यशोदा और नन्द बाबा को देखकर मुझे जो आनन्द प्राप्त होता था, उसे मैं आज भी नहीं भूल पाया हूँ। माता यशोदा बड़े प्रेम से मुझे मक्खन, रोटी और दही खिलाती थीं। उनका वात्सल्य और स्नेह मेरे हृदय में आज भी ताजा है।
वे कहते हैं कि गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ खेलते-कूदते मेरे दिन हँसी-खुशी में बीत जाया करते थे। ब्रज का वह सरल, प्रेमपूर्ण और आनन्दमय जीवन मुझे निरन्तर स्मरण आता रहता है। सूरदास जी कहते हैं कि ऐसे ब्रजवासी वास्तव में धन्य हैं, जिनसे श्रीकृष्ण इतना प्रेम करते हैं और जिन्हें वे आज भी नहीं भूल पाए हैं।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- इस पद में श्रीकृष्ण के ब्रज-प्रेम तथा ब्रजवासियों के प्रति उनके गहरे स्नेह का मार्मिक चित्रण हुआ है।
- अलौकिक भगवान श्रीकृष्ण का मानवीय एवं भावुक रूप प्रस्तुत किया गया है।
- ब्रज की स्मृतियाँ श्रीकृष्ण को अत्यन्त भाव-विह्वल कर देती हैं।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वियोग-श्रृंगार रस।
- शब्दशक्ति – अभिधा तथा व्यंजना।
- गुण – माधुर्य।
- अलंकार –
- ‘ब्रज बिसरत’ तथा ‘बृन्दावन गोकुल बने उपबन’ में अनुप्रास अलंकार है।
- उद्धव को योग का संदेश भेजने और स्वयं ब्रज को न भूल पाने के कथन में विरोधाभास अलंकार का आभास होता है।
भाव-साम्य
रत्नाकर जी ने भी इसी भाव को व्यक्त करते हुए लिखा है—
सुधि ब्रजवासिनी की, दिवैया सुखरासिनी की,
उधौ नित हमकौं बुलावन कौं आवती।
प्रश्न 8.
ऊधौ मन न भये दस बीस।।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, कौ अवराधै ईस ॥
इंद्री सिंथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ॥
तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूर हमारें नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥
उत्तर
शब्दार्थ- ऊधौ = उद्धव, भये = हुए, हुतौ = हुआ करता था, स्याम = श्रीकृष्ण, अवराधै = आराधना करे, ईस = निर्गुण ब्रह्म, इंद्री = इन्द्रियाँ, सिंथिल = शिथिल, निष्क्रिय, केसव = श्रीकृष्ण, देही = शरीरधारी प्राणी, सीस = सिर, आसा = आशा, स्वासा = श्वासें, कोटि = करोड़, बरीस = वर्ष, सखा = मित्र, जोग के ईस = योग के ज्ञाता, मिलन कराने में निपुण, जगदीस = जगत के स्वामी।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- प्रस्तुत पद भ्रमरगीत प्रसंग का एक मार्मिक अंश है। श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियाँ विरह-वेदना से अत्यन्त व्याकुल हैं। उद्धव उन्हें योग और निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश देने आए हैं, परन्तु गोपियाँ अपनी मनःस्थिति व्यक्त करते हुए उस उपदेश को स्वीकार करने में असमर्थता प्रकट करती हैं।
व्याख्या-
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! हमारे मन दस-बीस नहीं हैं कि एक मन श्रीकृष्ण को दे दें और दूसरे मन से निर्गुण ब्रह्म की उपासना करें। हमारे पास तो केवल एक ही मन था और वह भी श्रीकृष्ण के साथ चला गया है। ऐसी स्थिति में हम किसी अन्य देवता अथवा निर्गुण ब्रह्म की आराधना कैसे कर सकती हैं?
वे आगे कहती हैं कि श्रीकृष्ण के वियोग में हमारी सभी इन्द्रियाँ शिथिल और निष्क्रिय हो गई हैं। हमारी दशा उस शरीर के समान हो गई है जिसके पास सिर न हो। हम जीवित तो हैं, परन्तु हमारा जीवन केवल नाममात्र का रह गया है। हमारे शरीर में श्वासें केवल इस आशा के सहारे चल रही हैं कि किसी दिन श्रीकृष्ण वापस आएँगे और हमें उनके दर्शन प्राप्त होंगे। इसी आशा के बल पर हम करोड़ों वर्षों तक भी जीवित रह सकती हैं।
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम तो श्रीकृष्ण के परम मित्र हो तथा योग और मिलन के सभी उपायों को जानते हो। यदि तुम चाहो तो हमारा मिलन श्रीकृष्ण से करा सकते हो। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ स्पष्ट शब्दों में कहती हैं कि नन्दनन्दन श्रीकृष्ण के अतिरिक्त हमारा कोई दूसरा आराध्य नहीं है। वे ही हमारे सर्वस्व और एकमात्र भगवान हैं।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में गोपियों की विरह-वेदना तथा श्रीकृष्ण के प्रति उनके एकनिष्ठ प्रेम का अत्यन्त मार्मिक चित्रण हुआ है।
- गोपियों की अनन्य भक्ति एवं पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त हुई है।
- वियोग की तीव्रता तथा प्रेम की गहराई का अत्यन्त प्रभावशाली वर्णन किया गया है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं मधुर ब्रजभाषा।
- शैली – उक्ति-वैचित्र्यपूर्ण मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – श्रृंगार रस (वियोग पक्ष)।
- गुण – माधुर्य।
- शब्दशक्ति – व्यंजना।
- अलंकार –
- ‘सखा स्याम सुन्दर के’ में अनुप्रास अलंकार।
- ‘जोग’ शब्द में श्लेष अलंकार।
- ‘ज्यौं देही बिनु सीस’ में उपमा अलंकार।
भाव-साम्य
तुलसीदास जी ने भी एकनिष्ठ प्रेम और अटूट विश्वास की भावना को इन शब्दों में व्यक्त किया है—
एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास॥
प्रश्न 9.
ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
स्याम तुमहिं स्याँ कौं नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने ॥
ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने ।
बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने ॥
हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेह सयाने ।
कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने ॥
साँच कहाँ तुमक अपनी सौं, बूझति बात निदाने ।
सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने ॥
उत्तर
शब्दार्थ- जाहु = जाओ, तुमहिं = तुम्हें, स्याँ = वहाँ, पठयौ = भेजा, भुलाने = रास्ता भूलकर, नारिनि = नारियों, जोग = योग, बिबेक = विवेक, अयाने = अज्ञानी, सहि कै = सहकर, जिय गुनि लेह = मन में विचार कर लो, अबला = स्त्री, दसा दिगंबर = योगियों की नग्न अवस्था, मष्ट करौ = चुप हो जाओ, सौं = सौगन्ध, निदाने = अन्त में, नैकहुँ = थोड़ा-सा, मुसकाने = मुस्कराए।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में गोपियाँ उद्धव के साथ परिहास करती हुई उनकी योग-संबन्धी शिक्षा का विरोध करती हैं। वे कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रज में नहीं भेजा होगा, बल्कि वे स्वयं मार्ग भूलकर यहाँ आ गए हैं अथवा श्रीकृष्ण ने उनसे परिहास करने के लिए उन्हें भेजा है।
व्याख्या- गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! अब तुम यहाँ से चले जाओ, क्योंकि हम तुम्हें भली-भाँति पहचान गई हैं। हमें विश्वास नहीं होता कि श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ भेजा है। ऐसा लगता है कि तुम स्वयं रास्ता भटककर यहाँ आ गए हो। यदि वास्तव में श्रीकृष्ण ने तुम्हें भेजा होता, तो तुम हमसे ऐसी बातें न कहते।
वे आगे कहती हैं कि ब्रज की प्रेममयी स्त्रियों को योग का उपदेश देते समय तुम्हें तनिक भी लज्जा नहीं आती। यद्यपि लोग तुम्हें बड़ा ज्ञानी और बुद्धिमान मानते हैं, किन्तु हमें तो तुममें विवेक दिखाई नहीं देता। यदि विवेक होता तो प्रेम में डूबी हुई गोपियों को योग और निर्गुण ब्रह्म का उपदेश न देते।
गोपियाँ व्यंग्यपूर्वक कहती हैं कि जो बात तुमने हमसे कह दी, उसे हमने किसी प्रकार सहन कर लिया; परन्तु अब किसी दूसरी गोपी से ऐसी बात मत कहना। वह तुम्हारी बात सहन नहीं कर सकेगी। एक ओर हम सरल और प्रेममयी स्त्रियाँ हैं और दूसरी ओर योगियों की कठोर साधना तथा दिगम्बर अवस्था है। दोनों में कोई समानता नहीं है, इसलिए अब चुप हो जाओ और सोच-समझकर बात करो।
अन्त में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम्हें अपनी सौगन्ध है, सच-सच बताओ कि जब श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ भेजा था, तब क्या वे थोड़ा-सा मुस्कराए नहीं थे? अवश्य मुस्कराए होंगे, क्योंकि उन्होंने तुम्हें यहाँ भेजकर हमारे साथ ही नहीं, तुम्हारे साथ भी परिहास किया है।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में गोपियों की तर्कशीलता, चतुरता तथा प्रेमजनित आक्रोश का स्वाभाविक चित्रण हुआ है।
- गोपियाँ अपनी तीक्ष्ण तर्कशक्ति से उद्धव के ज्ञान और योग के उपदेश को अस्वीकार कर देती हैं।
- प्रेम की महत्ता को ज्ञान और योग से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।
- नारी-स्वभाव, सौगन्ध दिलाने तथा प्रेमपूर्ण व्यंग्य का यथार्थ चित्रण हुआ है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं मधुर ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – श्रृंगार रस (वियोग पक्ष)।
- गुण – माधुर्य।
- शब्दशक्ति – व्यंजना की प्रधानता।
- अलंकार –
- ‘दसा दिगंबर’ में अनुप्रास अलंकार है।
भाव-साम्य
प्रेम के सामने ज्ञान, तर्क और ध्यान भी फीके पड़ जाते हैं। इसी भाव को व्यक्त करते हुए कवि कोलरिज ने कहा है—
“समस्त भाव, विचार और सुख प्रेम के सेवक हैं।”
प्रश्न 10.
निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बुझति साँच न हाँसी ॥
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ?
कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जौ रे करैगौ गाँसी ।
सुनत मौन है रह्यौ बावरी, सूर सबै मति नासी ॥
उत्तर
शब्दार्थ- निरगुन = निर्गुण ब्रह्म, देस कौ बासी = किस देश का रहने वाला, मधुकर = भ्रमर (यहाँ उद्धव के लिए प्रयुक्त), समुझाइ = समझाकर, सौंह = शपथ, साँच = सत्य, हाँसी = हँसी या मजाक, जनक = पिता, जननी = माता, नारि = पत्नी, दासी = सेविका, बरन = रंग या वर्ण, भेष = वेशभूषा, अभिलाषी = इच्छा रखने वाला, पावैगौ = पाओगे, गाँसी = छल-कपट, मौन = चुप, बावरी = बावला, मति = बुद्धि, नासी = नष्ट हो गई।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- इस पद में गोपियाँ उद्धव द्वारा बताए गए निर्गुण ब्रह्म के विषय में प्रश्न पूछती हैं। उनके प्रश्नों के माध्यम से कवि ने निर्गुण भक्ति का खण्डन तथा सगुण श्रीकृष्ण भक्ति का समर्थन किया है।
व्याख्या- गोपियाँ उद्धव से व्यंग्यपूर्ण ढंग से कहती हैं कि हे उद्धव! हमें यह बताओ कि तुम्हारा यह निर्गुण ब्रह्म किस देश का रहने वाला है? हम तुमसे यह बात मजाक में नहीं, बल्कि शपथ देकर सच-सच पूछ रही हैं। इसलिए हमें इसका सही उत्तर दो।
वे आगे पूछती हैं कि उस निर्गुण ब्रह्म का पिता कौन है और उसकी माता कौन है? उसकी पत्नी कौन है तथा उसकी दासियाँ कौन हैं? उसका रंग कैसा है, उसका वेश कैसा है और उसे किस रस में रुचि है? गोपियाँ निर्गुण ब्रह्म को एक सामान्य व्यक्ति की तरह मानकर प्रश्न करती हैं और इस प्रकार उसके स्वरूप को समझने का प्रयास करती हैं।
वे उद्धव से कहती हैं कि यदि तुमने हमारी बातों का उत्तर देते समय किसी प्रकार का छल-कपट किया, तो उसका परिणाम तुम्हें अवश्य भुगतना पड़ेगा। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के इन सरल किन्तु तर्कपूर्ण प्रश्नों को सुनकर उद्धव मौन हो गए। उनके पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था और उनका सारा ज्ञान-गर्व समाप्त हो गया।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में गोपियों द्वारा निर्गुण ब्रह्म का व्यंग्यपूर्ण खण्डन तथा सगुण भक्ति का समर्थन किया गया है।
- गोपियों की सरलता, तर्कशीलता तथा चतुराई का सुन्दर चित्रण हुआ है।
- व्यंग्य और हास्य के माध्यम से गूढ़ दार्शनिक विषय को सरल बनाया गया है।
- प्रेम की भावना को ज्ञान और तर्क से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं साहित्यिक ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वियोग-श्रृंगार तथा हास्य रस।
- गुण – माधुर्य।
- अलंकार –
- ‘समुझाइ सौंह दै’ तथा ‘पावैगौ पुनि’ में अनुप्रास अलंकार।
- निर्गुण ब्रह्म को मानवीय रूप देकर उसके विषय में प्रश्न पूछने से मानवीकरण अलंकार।
- ‘मधुकर’ के माध्यम से उद्धव को सम्बोधित करने में अन्योक्ति अलंकार।
- शब्दशक्ति – व्यंजना की प्रधानता।
प्रश्न 11.
सँदेसौ देवकी सौं कहियौ ।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, दया करत ही रहियौ ॥
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।।
प्रात होत मेरे लाल लडैडौँ, माखन रोटी भावै ॥
तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते ।
जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते ॥
सूर पथिक सुन मोहिं रैनि दिन, बढ्यौ रहत उर सोच ।
मेरौ अलक लडैतो मोहन, हैहै करत सँकोच ॥
उत्तर
शब्दार्थ- सँदेसौ = सन्देश, देवकी सौं = देवकी से, धाइ = धाय, पालन-पोषण करने वाली सेविका, सुत = पुत्र, टेव = आदत, लडैडौँ = लाड़ला, भावै = अच्छा लगता है, उबटनौ = उबटन, तातो = गर्म, भजि जाते = भाग जाते थे, जोइ-जोइ = जो-जो, सोइ-सोइ = वही-वही, क्रम-क्रम = धीरे-धीरे, न्हाते = स्नान करते थे, पथिक = यात्री, रैनि = रात, उर = हृदय, अलक लडैतो = अत्यन्त दुलारा, मोहन = श्रीकृष्ण, सँकोच = झिझक।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद भक्तिकाल के महान कृष्णभक्त कवि सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। यह हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पद’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
प्रसंग- श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद माता यशोदा अत्यन्त दुःखी रहती हैं। वे अपने पुत्र के वियोग में व्याकुल होकर देवकी के लिए एक सन्देश भेजती हैं और अपने हृदय की ममता तथा चिन्ता को व्यक्त करती हैं।
व्याख्या- माता यशोदा एक पथिक के माध्यम से देवकी को सन्देश भेजते हुए कहती हैं कि हे देवकी! कृष्ण वास्तव में तुम्हारे पुत्र हैं। मैं तो केवल उनकी धाय अर्थात् पालन-पोषण करने वाली सेविका हूँ। फिर भी मैंने उन्हें अपने पुत्र के समान स्नेह और ममता से पाला है, इसलिए उनके प्रति मेरा वात्सल्य स्वाभाविक है।
यशोदा आगे कहती हैं कि यद्यपि तुम श्रीकृष्ण की आदतों को जानती ही होगी, फिर भी मेरा मन उनके विषय में कुछ बातें कहने को उत्सुक हो रहा है। मेरा लाड़ला कृष्ण प्रातःकाल उठते ही माखन और रोटी खाना पसन्द करता था। उसे तेल, उबटन और गर्म पानी बिल्कुल अच्छे नहीं लगते थे। इन वस्तुओं को देखते ही वह नहाने से बचने के लिए भाग जाता था।
उस समय मैं उसे मनाने के लिए उसकी इच्छानुसार जो भी वस्तु माँगता, वही दे देती थी। तब वह प्रसन्न होकर धीरे-धीरे स्नान करता था। सूरदास जी कहते हैं कि यशोदा पथिक से अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि मुझे दिन-रात यही चिन्ता सताती रहती है कि मेरा प्यारा मोहन मथुरा में नया वातावरण पाकर किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर भी संकोच करता होगा और अपनी इच्छा किसी से कह नहीं पाता होगा।
काव्यगत सौन्दर्य
(1) भाव पक्ष
- प्रस्तुत पद में माता यशोदा के वात्सल्य, ममता और पुत्र-वियोग का अत्यन्त मार्मिक चित्रण हुआ है।
- बालक श्रीकृष्ण की बाल-सुलभ आदतों का स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक वर्णन किया गया है।
- माता के हृदय में पुत्र के प्रति रहने वाली चिन्ता और स्नेह को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
- कवि ने बाल-मनोविज्ञान का अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत किया है।
(2) कला पक्ष
- भाषा – सरल, सरस एवं मधुर ब्रजभाषा।
- शैली – मुक्तक शैली।
- छन्द – गेय पद।
- रस – वात्सल्य रस।
- शब्दशक्ति – व्यंजना।
- गुण – माधुर्य।
- अलंकार –
- ‘लाल लडैडौँ’ में अनुप्रास अलंकार।
- ‘जोइ-जोइ’, ‘सोइ-सोइ’ तथा ‘क्रम-क्रम’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
भाव-साम्य
माता के हृदय में अपने पुत्र के प्रति सदैव प्रेम, चिन्ता और ममता बनी रहती है। यशोदा का यह वात्सल्य भाव भारतीय मातृत्व की आदर्श भावना को अत्यन्त मार्मिक रूप में प्रस्तुत करता है।
