गद्यांश 1-
मानवजीवनस्य संस्करणम् संस्कृतिः। अस्माकं पूर्वजाः मानवजीवनं संस्कर्तुं महान्तं प्रयत्नम् अकुर्वन्। ते अस्माकं जीवनस्य संस्करणाय यान् आचारान् विचारान् च अदर्शयन् तत् सर्वम् अस्माकं संस्कृतिः। “विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एवं” इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम्। विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभि एकम् एव ईश्वर भजन्ते।
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
प्रसंग- इस गद्यांश में भारतीय संस्कृति का महत्व बताया गया है और यह कि हमारे पूर्वजों ने अच्छे आचार-विचार देकर मानव जीवन को सँवारा।
अनुवाद- मनुष्य के जीवन को सँवारना ही संस्कृति है। हमारे पूर्वजों ने मानव जीवन को सुंदर बनाने के लिए बहुत प्रयत्न किए। उन्होंने जो आचार और विचार बताए, वही हमारी संस्कृति है। भारतीय संस्कृति का मूल यह है कि संसार का रचयिता ईश्वर एक ही है। विभिन्न मतों के लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।
गद्यांश 2 –
“विश्वस्य स्रष्टा ईश्वर एक एवं” इति भारतीयसंस्कृतेः मूलम् । विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभि एकम् एव ईश्वरः भजन्ते । अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति । तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यन्ते। अतः सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः।
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
प्रसंग- इस गद्यांश में भारतीय संस्कृति का मूल विचार बताया गया है कि सभी धर्मों में ईश्वर एक ही माना गया है।
अनुवाद- भारतीय संस्कृति का मूल विचार है—ईश्वर एक है। संसार में अलग-अलग मतों को मानने वाले लोग ईश्वर को विभिन्न नामों से पुकारते हैं, जैसे—अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ख्रिस्त, अल्लाह आदि। ये सभी नाम एक ही परमात्मा के हैं। लोग उसी ईश्वर को गुरु रूप में भी मानते हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति का संदेश है कि सभी मतों और धर्मों के प्रति समान भाव और सम्मान रखना चाहिए।
गद्यांश 3 –
भारतीया संस्कृतिः तु सर्वेषां मतावलम्बिनां सङ्गमस्थली। काले काले विविधाः विचाराः भारतीयसंस्कृतौ समाहिताः। एषा संस्कृतिः सामासिकी संस्कृतिः यस्याः विकासे विविधानां जातीनां, सम्प्रदायानां, विश्वासानाञ्च योगदानं दृश्यते। अतएव अस्माकं भारतीयानाम् एका संस्कृति एका च राष्ट्रीयता। सर्वेऽपि वयं एकस्याः संस्कृतेः समुपासकाः एकस्य राष्ट्रस्य च राष्ट्रीयाः। यथा भ्रातरः परस्परं मिलित्वा सहयोगेन सौहार्देन च परिवारस्य उन्नतिं कुर्वन्ति, तथैव अस्माभिः अपि सहयोगेन सौहार्देन च राष्ट्रस्य उन्नतिः कर्त्तव्या।
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
प्रसंग- भारतीय संस्कृति को विभिन्न धर्मों और विचारों की संगमस्थली बताते हुए राष्ट्र की उन्नति के लिए आपसी प्रेम, सहयोग और सौहार्द का संदेश दिया गया है।
अनुवाद- भारतीय संस्कृति सभी मतों और धर्मों को मानने वालों की संगमस्थली है। समय-समय पर अनेक प्रकार के विचार, जातियाँ, सम्प्रदाय और विश्वास इस संस्कृति में मिलते रहे हैं, इसलिए इसे समन्वयात्मक संस्कृति कहा जाता है। भारतीयों की संस्कृति एक है और हमारी राष्ट्रीयता भी एक है। हम सभी इसी एक संस्कृति को मानने वाले और एक ही राष्ट्र के नागरिक हैं। जैसे परिवार में भाई-भाई मिलकर सहयोग और प्रेम से परिवार की उन्नति करते हैं, उसी प्रकार हमें भी प्रेम, सहयोग और सौहार्द से अपने राष्ट्र की उन्नति करनी चाहिए।
गद्यांश 4 –
अस्माकं संस्कृतिः सदा गतिशीला वर्तते। मानवजीवनं संस्कर्तुम् एषा यथासमयं नवां नवां विचारधरां स्वीकरोति, नवां शक्ति च प्राप्नोति। अत्र दुराग्रहः नास्ति, यत् युक्तियुक्तं कल्याणकारि च तदत्र सहर्ष गृहीतं भवतिः। एतस्याः गतिशीलतायाः रहस्यं मानवजीवनस्य शाश्वतमूल्येषु निहितम् तद् यथा सत्यस्य प्रतिष्ठा, सर्वभूतेषु समभावः विचारेषु औदार्यम्, आचारे दृढ़ता चेति।
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
प्रसंग- जिसमें भारतीय संस्कृति की उदार, गतिशील और कल्याणकारी विचारधारा का वर्णन किया गया है।
अनुवाद- इस गद्यांश में बताया गया है कि भारतीय संस्कृति हमेशा गतिशील रहती है। मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए यह समय-समय पर नई-नई विचारधाराओं को स्वीकार करती रहती है और इससे इसमें नई शक्ति का संचार होता है। भारतीय संस्कृति में किसी प्रकार का हठ या जिद नहीं है। जो वस्तु उचित हो, तर्कसंगत हो तथा लोककल्याणकारी हो, उसे यह सहर्ष अपना लेती है। इस गतिशीलता और उदारता का रहस्य मानव जीवन के शाश्वत मूल्यों में छिपा है—जैसे सत्य की प्रतिष्ठा, सभी जीवों के प्रति समभाव, विचारों में उदारता और आचरण में दृढ़ता। यही मूल्य भारतीय संस्कृति को महान बनाते हैं।
गद्यांश 5-
एषां कर्मवीराणां संस्कृतिः। “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” इति अस्याः उद्द्घोषः। ‘पूर्व कर्म, तदनन्तरं फलम्’ इति अस्माकं संस्कृतेः नियमः। इदानीं यदा वयं राष्ट्रस्य नवनिर्माण संलग्नाः स्मः निरन्तरं कर्मकरणम् अस्माकं मुख्यं कर्त्तव्यम्। निजस्य श्रमस्य फलं भोग्यं, अन्यस्य श्रमस्य शोषणं सर्वथा वर्जनीयम्। यदि वयं विपरीतम् आचरामः तदा न वयं सत्यं भारतीय-संस्कृतेः उपासकाः। वयं तदैव यथार्थं भारतीयाः यदास्माकम् आचारे विचारे च अस्माकं संस्कृतिः लक्षिता भवेत् । अभिलाषामः वयं यत् विश्वस्य अभ्युदयाय भारतीयसंस्कृते एषः दिव्यः सन्देशः लोके सर्वत्र प्रसरेत्-
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
प्रसंग- भारतीय संस्कृति के कर्मप्रधान स्वरूप और उसके विश्वकल्याणकारी सन्देश का वर्णन किया गया है।
अनुवाद- यह कर्मवीरों की संस्कृति है। भारतीय संस्कृति का उद्घोष है कि मनुष्य कर्म करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे। हमारी संस्कृति का नियम है—पहले कर्म, फिर फल। आज जब हम राष्ट्र के नव-निर्माण में लगे हुए हैं, तब निरन्तर कर्म करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। अपने श्रम का फल भोगना योग्य है, परन्तु दूसरों के श्रम का शोषण हर प्रकार से त्याज्य है। यदि हम इसका उल्लंघन करते हैं, तो हम भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक नहीं कहलाते।
हम तभी वास्तविक भारतीय हैं, जब हमारे आचार और विचार में हमारी संस्कृति दिखाई दे। हम यह भी चाहते हैं कि विश्व के उत्थान हेतु भारतीय संस्कृति का यह दिव्य संदेश विश्व में सर्वत्र फैल जाए।
गद्यांश 6-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ।।
उत्तर
सन्दर्भ- यह गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित भारतीया संस्कृतिः पाठ से लिया गया है।
अनुवाद- सभी लोग सुखी हों।
सभी लोग रोग-रहित हों।
सभी लोगों को शुभ और अच्छा देखने को मिले।
और कोई भी व्यक्ति दुःख का भागी न बने।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 संस्कृतिः शब्दस्य किं तात्पर्यम् अस्ति ?
या
संस्कृतेः अर्थः कः ?
या
संस्कृतेः की परिभाषा अस्ति ?
उत्तर – मानवजीवनस्य संस्करणम् संस्कृतिः इति संस्कृति शब्दस्य तात्पर्यम्।
प्रश्न 2 भारतीयः संस्कृतेः मूलं किम् अस्ति ?
उत्तर – विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव इति भारतीय-संस्कृतेः मूलम् अस्ति।
प्रश्न 3 अस्माकं संस्कृतेः कः सन्देशः ?
या
अस्माकं संस्कृतेः कः दिव्यः सन्देशः अस्ति ?
उत्तर – सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः दिव्यः सन्देशः अस्ति।
प्रश्न 4 भारतीय संस्कृतिः कां सङ्गमस्थली ?
उत्तर – भारतीया संस्कृतिः सर्वेषां मतावलम्बिनां सङ्गमस्थली।
प्रश्न 5 अस्माकं संस्कृतिः कीदृशी वर्तते ?
या
भारतीया संस्कृतिः कीदृशी अस्ति ?
उत्तर – अस्माकं भारतीया संस्कृतिः सदा गतिशीला वर्तते।
प्रश्न 6 भारतीयसंस्कृतेः कः विशेषः गुणः अस्ति ?
उत्तर – भारतीयसंस्कृतौ सर्वेषां मतानां समभावः इति विशेषः गुणः अस्ति।
प्रश्न 7 अस्माकं संस्कृतेः कः नियमः ?
उत्तर – अस्माकं संस्कृतेः नियमः ‘पूर्व कर्म, तदनन्तरं फलम्’ इति अस्ति।
प्रश्न 8 अस्माकं मुख्यकर्त्तव्यं किम् अस्ति ?
उत्तर – निरन्तरं कर्मकरणम् अस्माकं मुख्यकर्त्तव्यम् अस्ति।
प्रश्न 9 “मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्” कस्याः अस्ति एषः दिव्यः सन्देशः ?
उत्तर – ‘मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्’ एषः भारतीयसंस्कृतेः दिव्यः सन्देशः अस्ति।
प्रश्न 10 भारतीयसंस्कृतिः कस्य अभ्युदयाय इति ?
उत्तर – भारतीयसंस्कृतिः विश्वस्य अभ्युदयाय इति।
प्रश्न 11 विश्वस्य स्रष्टा कः ?
उत्तर – विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव अस्ति।
