देव हिन्दी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख और प्रतिष्ठित कवि माने जाते हैं। वे रीतिकाल की श्रृंगारप्रधान काव्यधारा के उत्कृष्ट प्रतिनिधि थे। उनकी कविता में नायिका-भेद, सौंदर्य-चित्रण, अलंकार और काव्य-शिल्प का अद्भुत संयोजन मिलता है। उन्होंने रीतिकालीन काव्य को कलात्मक ऊँचाई प्रदान की।
जन्म एवं परिचय
कवि देव का जन्म 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में माना जाता है। उनके जन्म-स्थान और जन्म-तिथि के विषय में विद्वानों में मतभेद है, परंतु अधिकांश विद्वान उन्हें ब्रज क्षेत्र से संबंधित मानते हैं। वे जीवनभर विभिन्न राजदरबारों से जुड़े रहे और आश्रय में रहकर काव्य-रचना करते रहे।
साहित्यिक जीवन
देव का साहित्यिक जीवन पूर्णतः रीतिकालीन परंपरा से जुड़ा हुआ था। उस समय कविता का उद्देश्य काव्य-शास्त्रीय नियमों के अनुसार श्रृंगार, अलंकार और नायिका-भेद का सुंदर चित्रण करना था। देव ने इस परंपरा को पूरी निष्ठा से अपनाया।
उनकी कविता में—
- प्रेम की कोमलता
- नायिका के सौंदर्य का सूक्ष्म वर्णन
- भाव और कला का संतुलन
स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वे संस्कृत काव्य-परंपरा से भी अत्यंत प्रभावित थे।
प्रमुख कृतियाँ
कवि देव की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
- रसविलास
- काव्यरसायन
- सुखसागर
- भवानी विलास
इन ग्रंथों में उन्होंने नायिका-भेद, रस, अलंकार और श्रृंगार का विस्तृत विवेचन किया है।
भाषा
कवि देव की भाषा ब्रजभाषा है। उनकी भाषा की विशेषताएँ हैं—
- मधुरता
- कोमलता
- अलंकारिक सौंदर्य
ब्रजभाषा उनके श्रृंगारिक भावों को अत्यंत प्रभावशाली बनाती है।
शैली
देव की शैली को निम्न रूपों में देखा जा सकता है—
- रीतिबद्ध शैली
- अलंकारप्रधान शैली
- श्रृंगारिक शैली
उनकी शैली में शब्द-सज्जा और काव्य-नियमों का पूर्ण पालन मिलता है।
रस एवं भाव
देव की कविता में मुख्य रूप से—
- श्रृंगार रस (प्रधान)
- कहीं-कहीं करुण रस
मिलता है। उनका श्रृंगार संयोग और वियोग दोनों रूपों में सुंदर ढंग से प्रस्तुत हुआ है।
साहित्य में स्थान
कवि देव को हिन्दी साहित्य में रीतिकाल के प्रमुख कवियों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने रीतिकालीन कविता को शिल्प, सौंदर्य और अलंकार की दृष्टि से समृद्ध किया।
