कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय (Kavi Biharilal Ka Jivan Parichay)

जीवन परिचय

रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ मुक्तक कवि बिहारीलाल का जन्म लगभग 1595 ई. (कुछ विद्वान 1603 ई. भी मानते हैं) बसुआ गोविंदपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश) में एक माथुर चौबे (ब्राह्मण) परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम बिहारीलाल चौबे था। उनके पिता का नाम पंडित केशवराय चौबे था, जो स्वयं विद्वान एवं धर्मपरायण व्यक्ति थे। बचपन में वे अपने पिता के साथ ओरछा आ गए, जहाँ उनका प्रारंभिक जीवन बुंदेलखंड के सांस्कृतिक वातावरण में बीता। बाद में विवाह के उपरांत वे अपनी ससुराल मथुरा में रहने लगे, जहाँ ब्रज संस्कृति और श्रीकृष्ण भक्ति का उनके व्यक्तित्व तथा काव्य पर गहरा प्रभाव पड़ा।

बिहारीलाल बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, प्रतिभाशाली और काव्य-रचना में रुचि रखने वाले थे। उन्होंने अल्प शब्दों में गहन भाव व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता विकसित की। वे कुछ समय तक मुगल सम्राट शाहजहाँ के संपर्क में भी रहे, किंतु बाद में आमेर (जयपुर) के राजा मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में राजकवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। कहा जाता है कि उनके प्रत्येक उत्कृष्ट दोहे पर राजा उन्हें एक स्वर्ण अशर्फ़ी पुरस्कार स्वरूप प्रदान करते थे। उनके दोहे इतने प्रभावशाली थे कि उन्होंने केवल एक ग्रंथ के आधार पर हिंदी साहित्य में अमर स्थान प्राप्त कर लिया।

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शिक्षा

बिहारीलाल की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने संस्कृत, ब्रजभाषा, काव्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र और छंदशास्त्र का गहन अध्ययन किया। माना जाता है कि उन्होंने प्रसिद्ध रीतिकालीन कवि आचार्य केशवदास से भी काव्य की शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत साहित्य, भारतीय काव्यशास्त्र तथा ब्रज संस्कृति का गहरा अध्ययन उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। औपचारिक शिक्षा के संबंध में अधिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, किंतु उनकी विद्वत्ता उनके दोहों में स्पष्ट झलकती है।

साहित्यिक जीवन

बिहारीलाल रीतिकाल के रीतिसिद्ध कवि माने जाते हैं। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन में मुख्य रूप से मुक्तक काव्य की रचना की। उन्होंने महाकाव्य या खंडकाव्य लिखने के स्थान पर दोहों के माध्यम से जीवन, प्रेम, सौंदर्य, भक्ति और नीति का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया। उनके दोहों में कम शब्दों में गहरे और व्यापक भाव व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है।

बिहारी का अधिकांश जीवन राजदरबारों से जुड़ा रहा, किंतु उनका काव्य केवल दरबारी प्रशंसा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम, नायक-नायिका के मनोभावों, प्रकृति-सौंदर्य, सामाजिक व्यवहार तथा मानवीय जीवन के अनेक पक्षों का अत्यंत कलात्मक चित्रण किया। उनके दोहे साहित्यिक सौंदर्य, अलंकारों की योजना और भावों की गहनता के कारण हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।

बिहारीलाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने बहुत कम रचनाएँ लिखीं, लेकिन जो लिखा वह अमर हो गया। उनका एकमात्र प्रमुख ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ हिंदी साहित्य का अनुपम ग्रंथ माना जाता है। इसमें लगभग 700 से अधिक दोहे (प्रचलित संस्करणों में 713 दोहे) संकलित हैं। इन दोहों में मुख्य रूप से श्रृंगार, भक्ति और नीति का सुंदर समन्वय मिलता है। हिंदी साहित्य में उन्हें “गागर में सागर भरने वाला कवि” कहा जाता है, क्योंकि वे थोड़े शब्दों में अत्यंत गहन भाव व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता रखते थे।

रचनाएँ

बिहारीलाल की प्रमुख रचना निम्नलिखित है—

  • बिहारी सतसई (बिहारी सतसई / सतसई)

‘बिहारी सतसई’ में लगभग 713 दोहे संकलित हैं। इन दोहों का मुख्य विषय—

  • श्रृंगार रस
  • भक्ति
  • नीति
  • राधा-कृष्ण प्रेम
  • प्रकृति चित्रण
  • नायक-नायिका भेद
  • मानवीय जीवन एवं व्यवहार

यही एक ग्रंथ उन्हें हिंदी साहित्य के अमर कवियों की श्रेणी में स्थापित करने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुआ।

भाषा-शैली

बिहारीलाल की भाषा परिष्कृत, साहित्यिक, मधुर और परिमार्जित ब्रजभाषा है। उन्होंने अत्यंत कम शब्दों में गहरे भाव व्यक्त करने की अद्भुत कला विकसित की। उनकी शैली मुक्तक शैली है, जिसमें प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण होता है। उनके काव्य में उपमा, रूपक, श्लेष, अनुप्रास, यमक और उत्प्रेक्षा जैसे अलंकारों का अत्यंत सुंदर एवं स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। उनकी भाषा में माधुर्य, संक्षिप्तता, चित्रात्मकता और भावों की गहनता का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है।

साहित्य में स्थान

बिहारीलाल हिंदी साहित्य के रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ मुक्तक कवि माने जाते हैं। उन्होंने केवल ‘बिहारी सतसई’ जैसी एक महान कृति के माध्यम से अमर यश प्राप्त किया। उनके दोहे हिंदी साहित्य में संक्षिप्तता, सौंदर्य, भाव-गांभीर्य और अलंकारिकता के सर्वोत्तम उदाहरण माने जाते हैं। हिंदी साहित्य में उनका स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण, सम्माननीय और स्थायी है। वे रीतिकाल के शिरोमणि कवियों में गिने जाते हैं और उनकी रचनाएँ आज भी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में समान रूप से पढ़ी जाती हैं।

निधन

कवि बिहारीलाल का निधन लगभग 1663 ई. (कुछ विद्वानों के अनुसार 1664 ई.) में वृंदावन में हुआ माना जाता है।

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