त्यागपथी खण्डकाव्य | Tyagpathi Khandkavya Class 12

प्रश्न 1.
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में (अपने शब्दों में) लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के प्रथम एवं द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ काव्यग्रन्थ की प्रमुख घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के तीसरे सर्ग का कथानक (कथा/कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के चौथे सर्ग के आधार पर राज्यश्री, हर्षवर्द्धन और दिवाकर मित्र के वार्तालाप का सारांश लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के प्रथम तीन सर्यों के आधार पर सम्राट् हर्षवर्द्धन के जीवन की कहानी लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ के पंचम (अन्तिम) सर्ग की कथा अपनी भाषा (अपने शब्दों) में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में पंचग सर्ग में वर्णित घटनाओं को अपने शब्दों में लिखिए।
या
आपको ‘त्यागपथी’ का कौन-सा सर्ग रुचिकर प्रतीत होता है और क्यों ? उस सर्ग का कथानक अपनी भाषा में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के पंचम संर्ग’ की कथावस्तु का उल्लेख कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के द्वितीय संर्ग’ की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ में वर्णित भारत की राजनीतिक उथल-पुथल का वर्णन कीजिए।
[ संकेत : प्रथम, द्वितीय व तृतीय सर्ग का सारांश संक्षेप में लिखें। ]

उत्तर

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त्यागपथी’ श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अञ्चल’ द्वारा रचित एक ऐतिहासिक खण्डकाव्य है, जिसकी कथा पाँच सर्गों में विन्यस्त है। इसमें सातवीं शताब्दी के महान् सम्राट हर्षवर्द्धन के जीवन-कार्य, त्याग, पराक्रम, राष्ट्रभक्ति और आदर्श शासन का चित्रण किया गया है। कवि ने हर्ष के माता-पिता की मृत्यु, भाई राज्यवर्द्धन की हत्या, बहन राज्यश्री की मुक्ति, कन्नौज विजय, दिग्विजय-अभियान तथा प्रयाग में सर्वस्व-दान जैसी प्रमुख घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया है।

प्रथम सर्ग

प्रथम सर्ग में थानेश्वर के राजकुमार हर्षवर्द्धन के जीवन की करुण और दारुण परिस्थितियों का चित्रण मिलता है। हर्ष वन में आखेट करने गए थे, तभी उन्हें संदेश मिलता है कि उनके पिता प्रभाकरवर्द्धन अत्यंत गंभीर ज्वर से पीड़ित हैं। यह सुनते ही वे तुरंत राजमहल लौट आते हैं और पिता की सेवा एवं उपचार में लग जाते हैं, पर उनकी सारी कोशिशों के बावजूद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं होता। उधर उनके बड़े भाई राज्यवर्द्धन उत्तरापथ में हूणों से युद्ध कर रहे थे; इसलिए हर्ष एक दूत के माध्यम से उन्हें पिता की अस्वस्थता का समाचार भेजते हैं। इस बीच हर्ष की माता अपने पति की बिगड़ती हालत से अत्यंत दुखी होकर आत्मदाह का निर्णय ले लेती हैं। हर्ष बहुत समझाते हैं, पर वे नहीं मानतीं और प्रभाकरवर्द्धन की मृत्यु से पहले ही सती हो जाती हैं। कुछ समय बाद पिता प्रभाकरवर्द्धन का भी देहांत हो जाता है। हर्ष पिता का अंतिम संस्कार कर अत्यंत शोकाकुल अवस्था में महल लौटते हैं। उनके मन में यही चिंता उठती है कि यह दुखद समाचार सुनकर उनकी बहन राज्यश्री और उनके अग्रज राज्यवर्द्धन किस प्रकार इस आघात को सह पाएँगे।

द्वितीय सर्ग

द्वितीय सर्ग में कथा अत्यंत वेदना और संघर्ष के बीच आगे बढ़ती है। राज्यवर्द्धन हूणों को परास्त कर सुरक्षित रूप से नगर लौटते हैं, किंतु अपने भाई हर्षवर्द्धन की शोक-विह्वल अवस्था देखकर वे फूट-फूटकर रो पड़ते हैं। माता-पिता की मृत्यु से व्यथित होकर वे वैराग्य ग्रहण करने का निश्चय कर लेते हैं, पर तभी एक अत्यंत दुखद समाचार मिलता है—मालवराज ने उनकी बहन राज्यश्री के पति गृहवर्मन की हत्या कर दी है और राज्यश्री को कारागार में बंद कर दिया है। यह सुनते ही राज्यवर्द्धन वैराग्य को त्यागकर मालवराज को दंड देने के लिए निकल पड़ते हैं। वे गौड़ नरेश को युद्ध में परास्त तो कर देते हैं, परंतु गौड़ नरेश छलपूर्वक उनकी हत्या करवा देता है। जब यह दुखद समाचार हर्षवर्द्धन को मिलता है, तो वे विशाल सेना सहित मालवराज से युद्ध करने के लिए प्रस्थान करते हैं। रास्ते में उन्हें ज्ञात होता है कि राज्यश्री बंधनमुक्त होकर विंध्याचल के वन प्रदेश की ओर चली गई है। यह सुनते ही हर्ष युद्ध का विचार छोड़ बहन की खोज में वन की ओर निकल पड़ते हैं। दिवाकर मित्र के आश्रम में एक भिक्षुक से उन्हें पता चलता है कि राज्यश्री आत्मदाह करने जा रही है। वे तुरंत पहुँचकर बहन को आत्मदाह से बचा लेते हैं और दिवाकर मित्र व राज्यश्री को साथ लेकर कन्नौज वापस लौट आते हैं।

तृतीय सर्ग

तृतीय सर्ग में हर्षवर्द्धन अपनी बहन राज्यश्री का छीना हुआ राज्य वापस दिलाने के लिए अपनी विशाल सेना सहित कन्नौज पर आक्रमण करते हैं। कन्नौज पर अनीतिपूर्वक अधिकार जमाए मालव-कुलपुत्र भयवश वहाँ से भाग जाता है। राज्यवर्द्धन का हत्यारा गौड़पति शशांक भी युद्ध का सामना न कर अपने प्रदेश लौट जाता है। कन्नौज के लोग हर्षवर्द्धन से आग्रह करते हैं कि वे स्वयं कन्नौज के राजा बन जाएँ, परंतु हर्ष अपनी बहन का राज्य स्वयं लेने से मना कर देते हैं। वे राज्यश्री से सिंहासन ग्रहण करने का अनुरोध करते हैं, पर वह भी राजसिंहासन स्वीकार नहीं करती। तब हर्षवर्द्धन कन्नौज के संरक्षक रूप में अपनी बहन के नाम से शासन चलाने लगते हैं।

इसके बाद छह वर्षों तक उनका दिग्विजय अभियान चलता है। इस अवधि में हर्षवर्द्धन कश्मीर, पञ्चनद, सारस्वत, मिथिला, उत्कल, गौड़, नेपाल, वल्लभी, सोरठ सहित अनेक राज्यों को जीतकर यवनों, हूणों और अन्य विदेशी आक्रांताओं का नाश करते हैं। वे उत्तर भारत को एक अखण्ड, शक्तिशाली और व्यवस्थित राज्य में बदल देते हैं। बहन के स्नेह में वे राजधानी भी कन्नौज ही स्थापित करते हैं। उनके शासनकाल में प्रजा सुखी, सुरक्षित और धर्मपरायण थी। कला, साहित्य, संस्कृति और धर्म—सभी का व्यापक विकास हुआ। इस प्रकार तृतीय सर्ग में हर्षवर्द्धन की वीरता, नीति, त्याग और राष्ट्रनिर्माण की अद्वितीय भावना का सशक्त चित्रण मिलता है।

चतुर्थ सर्ग

चतुर्थ सर्ग में राज्यश्री के अंतर्मन का संघर्ष प्रमुख रूप से उभरकर सामने आता है। वह एक विशाल राज्य की शासिका होते हुए भी अपने जीवन में गहरी व्यथा अनुभव करती है। अनेक दुःखों और संघर्षों से गुज़र चुकी राज्यश्री सांसारिक जीवन से विरक्त हो चुकी है। वह सब कुछ त्यागकर गेरुए वस्त्र धारण कर भिक्षुणी बनने का निश्चय कर लेती है। इस संकल्प के साथ वह अपने भाई हर्षवर्द्धन के पास संन्यास लेने की अनुमति माँगने जाती है। हर्षवर्द्धन उसे समझाते हैं कि वह मन से पहले ही संन्यासिनी है, फिर बाह्य रूप में संन्यास लेने की आवश्यकता ही क्या है? वह कहते हैं कि यदि वह गेरुए वस्त्र धारण करने पर अड़ी रहती है, तो अपने वचन के अनुसार वे भी उसके साथ संन्यास ग्रहण कर लेंगे।

इसी समय दिवाकर मित्र वहाँ पहुँचकर दोनों को गहरी समझ प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि यद्यपि दोनों भाई-बहन का हृदय संन्यासमय है, किन्तु वर्तमान समय में राष्ट्र की सुरक्षा, प्रजा का कल्याण और संस्कृति की रक्षा संन्यास से अधिक आवश्यक और पवित्र कर्तव्य है। आज देश को उनके त्याग की नहीं, बल्कि उनकी सक्रिय सेवा की आवश्यकता है। दिवाकर मित्र की सार्थक बातों का प्रभाव दोनों पर पड़ता है और वे संन्यास लेने का विचार पूर्ण रूप से त्याग देते हैं। इसके बाद दोनों पुनः दृढ़ निश्चय के साथ राष्ट्रसेवा और जनकल्याण में स्वयं को समर्पित कर देते हैं।

पंचम सर्ग

पंचम सर्ग में कवि हर्षवर्द्धन के आदर्श शासन, उनके त्याग और जनकल्याण की भावना का अत्यंत प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करते हैं। हर्षवर्द्धन एक आदर्श सम्राट के रूप में पूरे साम्राज्य का संचालन करते हैं। उनके राज्य में प्रजा हर प्रकार से सुखी है—न कोई भय है, न अन्याय। विद्वानों का सम्मान होता है और लोग धर्म, नीति, सदाचार तथा सद्भाव से जीवन व्यतीत करते हैं। महाराज हर्षवर्द्धन स्वयं भी सदैव जनकल्याण, धार्मिक चिंतन और शास्त्र-मनन में लगे रहते हैं। उनके आचरण और धर्मपालन से उनकी बहन राज्यश्री भी अत्यंत संतुष्ट रहती है। पूरा राज्य एकता, शांति और समृद्धि के सूत्र में बँधा हुआ है।

एक बार तीर्थराज प्रयाग में महाराज हर्षवर्द्धन ने संपूर्ण राजकोष दान कर देने की अद्वितीय घोषणा की—

“हुई थी घोषणा सम्राट की साम्राज्य भर से,
करेंगे त्याग सारा कोष ले संकल्प कर में।”

राजकोष का सारा धन दान कर देने के बाद वे अपनी बहन राज्यश्री से वस्त्र माँगकर पहनते हैं। इसके बाद उन्होंने यह नियम बना लिया कि प्रत्येक पाँच वर्ष बाद इसी प्रकार अपना सर्वस्व दान करेंगे। इस दान को वे अपनी प्रजा के प्रति ऋण-मुक्ति का माध्यम मानते हैं। अपने जीवन में उन्होंने छह बार इस महान दान-व्रत का पालन किया।

हर्षवर्द्धन केवल दान और परोपकार तक सीमित नहीं रहे—उन्होंने भारत की महान संस्कृति, धर्म और कला को दूर-दूर तक फैलाया और विश्व में भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया। इस प्रकार त्याग, परोपकार, वीरता और न्यायप्रियता से परिपूर्ण सम्राट हर्षवर्द्धन का शासनकाल हर दृष्टि से सुखकारी, लोककल्याणकारी और आदर्श सिद्ध होता है।

प्रश्न 2.
‘त्यागपथी’ के प्रमुख पात्रों का परिचय देते हुए बताइए कि आपको कौन-सा पात्र सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों ?

उत्तर

‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में अनेक महत्वपूर्ण पात्र आते हैं, जिनके माध्यम से कवि ने सम्राट हर्षवर्द्धन के समय की राजनीतिक परिस्थितियों, पारिवारिक भावनाओं और राष्ट्रीय चेतना का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। इनमें प्रभाकरवर्द्धन, उनकी धर्मपत्नी यशोमती, उनके पुत्र राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन तथा पुत्री राज्यश्री मुख्य पारिवारिक पात्र हैं। इसके साथ-साथ कन्नौज, मालव और गौड़ प्रदेश के राजा, सेनापति भण्ड, और विशेष रूप से आचार्य दिवाकर जैसे पात्र काव्य को जीवंत बनाते हैं। ‘त्यागपथी’ का नायक हर्षवर्द्धन है, जबकि राज्यश्री को नायिका का स्थान प्राप्त है। राज्यवर्द्धन वीर और धैर्यवान योद्धा हैं, माता यशोमती त्याग और पतिव्रत की प्रतिमूर्ति हैं, राज्यश्री करुणा, विवेक और त्यागमय जीवन का प्रतीक है, तथा आचार्य दिवाकर मार्गदर्शक के रूप में प्रकट होते हैं जो हर्ष और राज्यश्री को कर्तव्य मार्ग पर दृढ़ता से अग्रसर करते हैं। इन सभी पात्रों में मुझे हर्षवर्द्धन का चरित्र सबसे अधिक प्रभावित करता है; क्योंकि वह एक आदर्श भाई एवं पुत्र; देश-प्रेमी, अजेय-योद्धा, श्रेष्ठ शासक, महान् त्यागी, धर्मपरायण और महादानी है।।

प्रश्न 3.
‘त्यागपथी’ के नायक अथवा प्रमुख पात्र (हर्षवर्द्धन) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ काव्य के आधार पर हर्षवर्द्धन की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
या
” ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र देशप्रेम का प्रखरतम (आदर्श) उदाहरण है।” उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
” ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में सम्राट हर्षवर्द्धन का चरित्र ही केन्द्र है और उसी के चारों ओर कथानक का चक्र घूमता है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नाम को ध्यान में रखकर हर्षवर्द्धन का चरित्रांकन कीजिए।
या
हर्षवर्द्धन का चरित्र, आचरण का संवाहक है। सिद्ध कीजिए।
या
“‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में हर्ष एक इतिहास पुरुष के रूप में चित्रित है।” इस उक्ति के आलोक में हर्ष का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन का चरित्र आज के युवकों पर कितना प्रभावकारी है?
या
“हर्ष एक सच्चा त्यागपथी था।” उक्ति के आधार पर हर्ष का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“शौर्य था साकार नृप में अवतरित था ज्ञान।” कथन के आधार पर ‘त्यागपथी’ के हर्षवर्द्धन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।

उत्तर

त्यागपथी खण्डकाव्य के नायक हर्षवर्द्धन भारतीय इतिहास के एक उज्ज्वल पुरुष हैं। कवि ने उन्हें एक महान् त्यागी, आदर्श शासक, वीर योद्धा, धर्मपरायण और कर्त्तव्यनिष्ठ राजा के रूप में प्रस्तुत किया है। सम्पूर्ण कथानक की गति हर्षवर्द्धन के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द ही घूमती है। उनका चरित्र भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों का प्रतिनिधि है।

पहचान और नायकत्व – हर्षवर्द्धन इस काव्य के नायक हैं। कथा का आरम्भ, संघर्ष, मोड़ तथा अन्त—सब कुछ उन्हीं के चरित्र से जुड़ा हुआ है। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली है कि पूरा खण्डकाव्य उनके त्याग, शौर्य और आदर्श जीवन का चित्र बन जाता है। यह उक्ति उनके लिए पूर्णत: सत्य प्रतीत होती है—
“शौर्य था साकार नृप में, अवतरित था ज्ञान।”

आदर्श पुत्र और भाई – हर्षवर्द्धन अपने माता-पिता और भाई-बहन के प्रति अत्यन्त प्रेमपूर्ण एवं आदरपूर्ण भाव रखते हैं। पिता की बीमारी का समाचार पाते ही वे तुरन्त आखेट छोड़कर लौट आते हैं और उनकी सेवा करते हैं। माता द्वारा आत्मदाह का निश्चय सुनकर वे व्याकुल होकर कहते हैं—

“मुझ मन्द पुण्य को छोड़ न माँ तुम भी जाओ,
छोड़ो विचार यह, मुझे चरण से लिपटाओ।”

वे अपनी बहन राज्यश्री को अग्निदाह से बचाते हैं—

“दोनों करों से घेरकर छोटी बहिन के भाल को,
भूल खड़े थे निकट जलती चिता की ज्वाल को।”

बड़े भाई राज्यवर्द्धन के प्रति उनका प्रेम भी गहरा है—

“बाहर चले जब राज्यवर्द्धन, हर्ष पीछे चल पड़े,
ज्यों वन-गमन में राम के पीछे चले लक्ष्मण अड़े।”

देश-प्रेम – हर्षवर्द्धन का जीवन देश और प्रजा के लिए समर्पित है। उन्होंने अनेक छोटे-छोटे राज्यों को एकता में जोड़कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उनका उद्देश्य केवल राज्य-विस्तार नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा और कल्याण था। वे राष्ट्र-सेवा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं।

अजेय योद्धा – हर्षवर्द्धन अप्रतिम पराक्रम वाले योद्धा थे। विरोधी राजा उनके समक्ष टिक नहीं पाते थे। उनकी दिग्विजय और सैन्य-कौशल भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। इसी कारण कवि कहता है—
“उठा पाया न सिर कोई प्रवंचक।”

श्रेष्ठ शासक – हर्षवर्द्धन का शासन न्याय, सद्भावना और जनता के कल्याण पर आधारित था। उनकी प्रजा सुखी, ऐश्वर्य-सम्पन्न और सुरक्षित थी—

“शान्ति शुभता का व्रती था हर्ष का शासन,
था लिया जिसने प्रजा-हित राजसिंहासन।
थी सकल साम्राज्य में सुख श्री उमड़ आयी,
थी चतुर्दिक न्याय-समता की विभा छायी।”

वे राजसंपत्ति को प्रजा की धरोहर मानते थे—

“नहीं अधिकार नृप को पास रखे धन प्रजा का,
करे केवल सुरक्षा देश-गौरव की ध्वजा का।”

महान् त्यागी – हर्षवर्द्धन का सबसे बड़ा गुण उनका त्याग है। पिता की मृत्यु के बाद भी वे अपने बड़े भाई का अधिकार नहीं लेना चाहते। कन्नौज विजय के पश्चात् भी वे सिंहासन बहन राज्यश्री को देना चाहते हैं। प्रयाग के महामोक्ष पर्व पर उन्होंने छह बार अपना सर्वस्व दान कर दिया। इसी त्याग के कारण उन्हें ‘त्यागपथी’ कहा गया। कवि लिखता है—

“दिये सम्राट ने निज वस्त्र-आभूषण वहाँ परे,
बहिन से भीख में माँग वसन पहिना वहाँ पर।”

धर्मपरायण – हर्षवर्द्धन सभी मतों का सम्मान करते थे। उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध—सभी सम्प्रदायों में सामंजस्य स्थापित किया। उनका मत स्पष्ट था—

“रहे कल्याण मानवमात्र का ही धर्म मेरा,
रहे सर्वस्व-त्यागी पुण्य पर विश्वास मेरा।”

कर्त्तव्यनिष्ठ और दृढ़निश्चयी हर्षवर्द्धन अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते थे। बहन राज्यश्री का पता लगाने के लिए वे कठिन वनों में निकल पड़ते हैं—

“मैं स्वयं जाऊँगा बहिन को ढूँढ़ने वन-प्रान्त में,
पाए बिना उसको न क्षण भर हो सकेगा शान्त मैं।”

भाई की हत्या के बाद अधर्म के उन्मूलन का व्रत लेते हैं—

“लेकर चरण-रज आर्य की करता प्रतिज्ञा आज मैं,
निर्मूल कर दूँगा धरा से अधर्म गौड़ समाज मैं।”

महादानी – त्यागपथी के हर्षवर्द्धन आत्मसंयमी तथा महादानी हैं। महान् त्यागी होने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ नाम से पुकारा है। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई का अधिकार ग्रहण नहीं करना चाहते। कन्नौज विजय के बाद भी वे कन्नौज का सिंहासन राज्यश्री को देना चाहते हैं।

समग्र रूप से देखें, तो हर्षवर्द्धन इतिहास के महान् व्यक्तित्वों में से एक हैं। उनका चरित्र त्याग, सेवा, प्रेम, शौर्य, न्याय और धर्म का अनूठा संगम है। वे आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श राजा तथा महान् त्यागी के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। उनका जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्तम्भ है।

प्रश्न 4.
‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर राज्यश्री का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए।
या
‘त्यागपथी’ के प्रमुख नारी-पात्र राज्यश्री की चारित्रिक विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए/लिखिए।
या
‘त्यागपथी’ में निरूपित राज्यश्री की चारित्रिक छवि पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।

उत्तर

त्यागपथी खण्डकाव्य की प्रमुख नारी-पात्र राज्यश्री सम्राट हर्षवर्द्धन की छोटी बहन है। वह केवल एक राजकुमारी ही नहीं, बल्कि आदर्श भारतीय नारी-स्वरूप की प्रतीक है। उसका चरित्र त्याग, करुणा, सेवा, देशभक्ति और पातिव्रत्य के उच्च गुणों से सुशोभित है। हर्ष के बाद काव्य में सबसे प्रभावशाली चरित्र राज्यश्री का ही है।

माता-पिता की लाडली – राज्यश्री अपने माता-पिता की आँखों का तारा है। वह माँ के वात्सल्य और पिता के स्नेह की धारा में पली है। कवि उसकी प्रियत्व को इस प्रकार व्यक्त करता है—

“माँ की ममता की मूर्ति राज्यश्री सुकुमारी,
थी सदा पिता को, माँ को प्राणोपम प्यारी।”

आदर्श नारी – राज्यश्री एक आदर्श पुत्री, आदर्श पत्नी और आदर्श बहन के रूप में सामने आती है। पति की मृत्यु के बाद वह कम आयु में ही विधवा हो जाती है और गौड़पति द्वारा बन्दिनी भी बनाई जाती है। भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु का समाचार पाकर वह वन में भटकती हुई आत्मदाह करने को तैयार हो जाती है, परन्तु हर्षवर्द्धन द्वारा रोक लिए जाने पर वह स्वयं को जनसेवा के लिए समर्पित कर देती है। कवि उसके आदर्श रूप को दर्शाते हुए कहता है—

“विपुल साम्राज्य की अग्रज सहित वह शासिका थी,
अभ्यन्तर से तथागत की अनन्य उपासिका थी।”

देशभक्त एवं जन-सेविका – राज्यश्री के हृदय में देशप्रेम और लोककल्याण की प्रबल भावना है। हर्ष के समझाने पर वह संन्यास का विचार त्याग देती है और जीवन को राष्ट्रसेवा में लगाती है। उसके वचन उसकी देशभक्ति को प्रकट करते हैं—

“करूंगी साथ उनके मैं हमेशा राष्ट्र-साधन,
अहिंसा नीति का होगा सभी विधिपूर्ण पालन।”

और आगे—

“प्रजा के हित समर्पित है व्रती जीवन तुम्हारा,
सभी का हित सभी को सुख, तुम्हें दिन-रात प्यारा।”

करुणामयी नारी – राज्यश्री ने माता-पिता, पति और भाई—सभी को खोने के गहरे दुःख सहे हैं। इन दुःखों ने उसके भीतर असाधारण करुणा उत्पन्न कर दी है। अपने भाई हर्ष से मिलते समय उसकी पीड़ा अत्यन्त हृदयस्पर्शी प्रतीत होती है—

“सतत बिलखती थी बहिन माता-पिता की याद कर,
ले नाम सखियों का उमड़ती थी नदी-सी वारि भर।
था साखु अग्रज धैर्य देता माथ उसका ढाँपकर,
रोती रही अविरल बहिन बेतस-लता-सी काँपकर।”

त्यागमयी नारी – राज्यश्री त्याग की मूर्ति है। हर्षवर्द्धन द्वारा कन्नौज का सिंहासन सौंपे जाने पर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह कहती है—

“स्वीकार न मुझको कान्यकुब्ज सिंहासन,
बैठो उस पर तुम, करो शौर्य से शासन।”

वह शासन के बन्धनों में नहीं पड़ना चाहती; क्योंकि उसका मन संन्यास की ओर प्रवृत्त है। प्रयाग महोत्सव में वह अपने भाई के साथ अपना सर्वस्व प्रजा के लिए दान कर देती है—

“लुटाती थी बहन भी पास का सब तीर्थस्थल में,
पहिन दो वस्त्र केवल दीपती थी छवि विमल में।”

सुशिक्षिता एवं ज्ञान-सम्पन्न – राज्यश्री केवल भावनाशील ही नहीं, बल्कि सुशिक्षिता और विचारवान नारी है। आचार्य दिवाकर द्वारा संन्यास-धर्म और मानव-सेवा की सीख दिए जाने पर वह उसकी गहराई को समझती है और समाज-कल्याण में लगने का संकल्प लेती है। इससे उसके विद्वत्ता एवं विवेकशीलता का परिचय मिलता है।

इस प्रकार राज्यश्री का चरित्र भारतीय नारी की श्रेष्ठ परम्पराओं का सम्मिलित स्वरूप है। उसका त्याग, करुणा, देशभक्ति, पातिव्रत-धर्म और जनसेवा की भावना उसे आदर्श नारी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। त्यागपथी खण्डकाव्य में राज्यश्री का चरित्र हर्ष के समान ही अत्यन्त प्रेरणादायी और हृदयग्राही है।

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