तुमुल खण्डकाव्य | Tumul Khand Kavya Class 10

प्रश्न 1
तुमुल’ खण्डकाव्य का कथानक या सारांश संक्षेप में लिखिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

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श्री श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य एक पौराणिक कथा पर आधारित है। इसमें मुख्य रूप से लक्ष्मण और मेघनाद के भीषण युद्ध का वर्णन किया गया है। यह काव्य 15 सर्गों में विभाजित है।

प्रथम सर्ग ( ईश-स्तवन) में कवि ने मंगलाचरण के रूप में ईश्वर की स्तुति की है, जिसमें निराकार, निर्गुण और सर्वशक्तिमान ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रकाश डाला गया है।

द्वितीय सर्ग ( दशरथ-पुत्रों का जन्म एवं बाल्यकाल ) इस सर्ग में अयोध्या के राजा दशरथ के चार पुत्र—राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—के जन्म का वर्णन है।
चारों भाइयों में बहुत प्रेम था। वे बचपन में खेलते-कूदते थे और सभी को प्रिय थे। राम और लक्ष्मण विशेष रूप से वीर और धर्म का पालन करने वाले थे। उनका जन्म राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ था।

तृतीय सर्ग ( मेघनाद) इस सर्ग में रावण के पुत्र मेघनाद का वर्णन है। वह बहुत शक्तिशाली, पराक्रमी और युद्ध में निपुण था। देवता भी उससे डरते थे। वह अपने पिता का आज्ञाकारी और लंका का सबसे बड़ा योद्धा था।

चतुर्थ सर्ग (मकराक्ष-वध) राम मकराक्ष नामक राक्षस को मार देते हैं। इससे रावण बहुत दुखी और चिंतित हो जाता है। उसे लगता है कि अब उसके राज्य पर खतरा है, इसलिए वह अपने पुत्र मेघनाद को याद करता है।

पञ्चम सर्ग ( रावण का आदेश )  रावण मेघनाद को बुलाकर कहता है कि वह लक्ष्मण को मारकर बदला ले। वह मेघनाद की वीरता की प्रशंसा करता है और उसे युद्ध में जाने के लिए प्रेरित करता है।

षष्ठ सर्ग ( मेघनाद-प्रतिज्ञा ) मेघनाद अपने पिता के सामने प्रतिज्ञा करता है कि वह युद्ध में विजय प्राप्त करेगा। वह गर्व से कहता है कि वह शत्रुओं का नाश करेगा और लंका की रक्षा करेगा।

सप्तम सर्ग ( मेघनाद का अभियान) मेघनाद युद्ध के लिए निकलता है। उसके जाने से चारों ओर भय का वातावरण बन जाता है। वह पहले यज्ञ करता है ताकि उसे दिव्य शक्ति मिल सके, फिर रथ पर बैठकर युद्धभूमि की ओर बढ़ता है।

अष्टम सर्ग (युद्धासन्न सौमित्र)  मेघनाद की आवाज सुनकर लक्ष्मण भी युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। वे राम की आज्ञा लेकर रणभूमि में पहुँचते हैं। उनके साथ हनुमान, अंगद और अन्य वानर भी होते हैं। सभी युद्ध के लिए उत्साहित होते हैं।

नवम सर्ग (लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा लक्ष्मण की मूच्र्छा )यह सबसे महत्वपूर्ण सर्ग है। दोनों वीरों के बीच बहुत भयंकर युद्ध होता है। वे एक-दूसरे पर लगातार बाण चलाते हैं। अंत में मेघनाद ‘शक्ति-बाण’ चलाता है, जिससे लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर जाते हैं। यह देखकर पूरी वानर सेना दुखी हो जाती है।

दशम सर्ग ( हनुमान द्वारा उपदेश) लक्ष्मण को मूर्छित देखकर वानर सेना रोने लगती है। तब हनुमान उन्हें समझाते हैं कि वीरों को दुख में धैर्य रखना चाहिए। उनकी बातों से सभी का साहस वापस आता है।

एकादश सर्ग ( उन्मन राम ) जब लक्ष्मण को राम के पास लाया जाता है, तो राम बहुत दुखी हो जाते हैं। वे अपने भाई के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते और अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं।

द्वादश सर्ग ( राम-विलाप और सौमित्र का उपचार) वैद्य सुषेण बताते हैं कि लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी बूटी लानी होगी। हनुमान उसे लाने के लिए हिमालय जाते हैं। उन्हें बूटी पहचान में नहीं आती, इसलिए वे पूरा पर्वत ही उठा लाते हैं। संजीवनी के प्रयोग से लक्ष्मण ठीक हो जाते हैं।

त्रयोदशसर्ग( विभीषण की मन्त्रणा ) विभीषण बताते हैं कि मेघनाद यज्ञ कर रहा है। यदि यज्ञ पूरा हो गया, तो वह अजेय हो जाएगा। इसलिए लक्ष्मण को तुरंत जाकर उसे रोकने के लिए कहा जाता है।

चतुर्दशसर्ग ( यज्ञ-विध्वंस और मेघनाद-वध)  लक्ष्मण यज्ञ स्थल पर पहुँचकर मेघनाद पर हमला करते हैं। दोनों के बीच फिर से भयंकर युद्ध होता है। मेघनाद कहता है—
“इस प्रकार यज्ञ के समय हमला करना उचित नहीं है।” फिर भी अंत में लक्ष्मण अपने पराक्रम से उसे मार देते हैं।

पंचदश सर्ग ( राम की वन्दना ) युद्ध जीतने के बाद लक्ष्मण अपनी विजय का श्रेय राम को देते हैं। वे कहते हैं कि यह सब राम की कृपा से संभव हुआ।अंत में भगवान की स्तुति के साथ काव्य समाप्त होता है।

प्रश्न 2
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग “ईश-स्तवन” है। इस सर्ग में कवि ने काव्य का आरम्भ भगवान की वन्दना से किया है। यह भारतीय परम्परा के अनुसार मंगलाचरण है, जिसमें ईश्वर से आशीर्वाद माँगा जाता है।

ईश्वर का स्वरूप : कवि ने ईश्वर को निराकार, निर्गुण और सर्वशक्तिमान बताया है। ईश्वर का कोई निश्चित रूप नहीं है, फिर भी वे हर जगह विद्यमान हैं। वे सबके स्वामी और सबके रक्षक हैं।

ईश्वर की सर्वव्यापकता : कवि के अनुसार ईश्वर सृष्टि के कण-कण में बसे हुए हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु—हर जगह उनका ही वास है। वे दिखाई नहीं देते, लेकिन उनकी शक्ति हर जगह महसूस होती है।

सृष्टि के कर्ता : ईश्वर ही इस संसार के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। संसार में जो कुछ भी होता है, वह उनकी इच्छा से ही होता है।

कवि की प्रार्थना : कवि भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसे शक्ति और बुद्धि दें, ताकि वह अपने काव्य को अच्छे से पूरा कर सके। वह ईश्वर से प्रेरणा और सफलता की कामना करता है।

प्रश्न 3
‘तुमुलखण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दशरथ के चार पुत्र—राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—के जन्म और उनके बाल्यकाल का सुन्दर वर्णन किया गया है। इन चारों भाइयों में आपस में बहुत प्रेम और स्नेह था, जिससे पूरा राजमहल आनंद और खुशी से भर गया था। उनके बचपन की चंचल और मधुर लीलाएँ सभी को प्रसन्न करती थीं और अयोध्या की शोभा को और बढ़ा देती थीं। विशेष रूप से राम और लक्ष्मण का जन्म राक्षसों के विनाश और साधु-संतों की रक्षा के लिए हुआ था। लक्ष्मण अपने बड़े भाई राम के प्रति अत्यंत समर्पित, आज्ञाकारी, वीर और गुणवान थे। राजा दशरथ एक आदर्श राजा थे, जो धर्मप्रिय, न्यायप्रिय, दानी और प्रजा का भला चाहने वाले थे। इस प्रकार इस सर्ग में राम-लक्ष्मण के महान उद्देश्य, भाइयों के प्रेम और दशरथ के उत्तम चरित्र का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

प्रश्न 4
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग को कथानक लिखिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग में रावण के पराक्रमी पुत्र मेघनाद का चरित्र विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। मेघनाद अत्यंत वीर, धीर, संयमी, उदार और शीलवान था। उसकी पराक्रम और साहस के कारण युद्ध में कोई भी उसके सामने टिक नहीं सकता था। उसने इन्द्र के पुत्र जयन्त को भी पराजित किया था और उसकी शक्ति के आगे देवता और राक्षस दोनों ही भयभीत हो जाते थे। कवि ने मेघनाद के अद्भुत पराक्रम, रणकौशल और वीरता का ऐसा चित्रण किया है कि पाठक उसके अद्वितीय शौर्य और नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होते हैं। इस सर्ग में मेघनाद की वीरता और रावण के परिवार में उसकी महत्ता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है।

प्रश्न 5
‘तुमुल’ के आधार पर ‘मकराक्ष-वध’ नामक चतुर्थ सर्ग के कथानक का सारांश लिखिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में ‘मकराक्ष-वध’ की घटना का वर्णन है। इस सर्ग में राम से युद्ध करते समय मकराक्ष को मार दिया गया। मकराक्ष के मारे जाने के बाद राक्षस सेना भयभीत होकर युद्धभूमि छोड़कर भाग खड़ी हुई। यह देखकर रावण अत्यंत चिन्तित और भयभीत हो गया। उसी समय रावण को अपने पराक्रमी और वीर पुत्र मेघनाद की याद आई, जो उसके समान ही साहसी और युद्ध-कौशल में प्रवीण था। रावण ने मेघनाद की वीरता और शौर्य का स्मरण करते हुए उसे युद्ध में राम और लक्ष्मण का सामना करने के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। इस सर्ग में मेघनाद के साहस और युद्धकुशलता की महिमा का वर्णन प्रमुख रूप से किया गया है।

प्रश्न 6
‘तुमुल’ के आधार पर रावण का आदेश’ नामक पञ्चम सर्ग का सारांश लिखिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग में रावण अपने पराक्रमी पुत्र मेघनाद को बुलाता है और उसे मकराक्ष की मृत्यु का बदला लेने का आदेश देता है। इस सर्ग में रावण मेघनाद की अजेय शक्ति और अद्भुत शौर्य का भी वर्णन करता है। मेघनाद उसके पास चरण-स्पर्श कर विनम्र भाव से बैठ जाता है। रावण, अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहता है कि सम्पूर्ण राज्य में युद्ध का भय फैला हुआ है और यदि हम राम से बदला नहीं लेंगे तो यह हमारी कायरता होगी। इसलिए वह मेघनाद को निर्देश देता है कि वह युद्ध में लक्ष्मण को पराजित करे और राम के सामने अपना बल दिखाए। इसके साथ ही रावण मेघनाद की वीरता की प्रशंसा करता है और उसे युद्ध में सफलता के साथ मकराक्ष का बदला लेने तथा वानर सेना को बाणों से परास्त करने का आदेश देता है। इस सर्ग में मेघनाद की वीरता, रावण का भय और युद्ध की गंभीर तैयारी का विस्तृत चित्रण है।

प्रश्न 7
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘मेघनाद-प्रतिज्ञा’ नामक षष्ठ सर्ग का सारांश लिखिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘मेघनाद-प्रतिज्ञा’ सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर

षष्ठ सर्ग में मेघनाद का अद्भुत साहस और दृढ़ निश्चय दिखाई देता है। वह अपने पिता रावण को आश्वस्त करता है कि उसके रहते उन्हें किसी प्रकार का शोक नहीं होगा। मेघनाद जोरदार गर्जन करता है, जिससे पूरा स्वर्ण-महल कांप उठता है। वह कहता है कि वह राम के सामने जाकर युद्ध करेगा और लक्ष्मण की शक्ति को भी देखेगा। यदि शत्रु आकाश में या पाताल में छिप जाए, तब भी उसे कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी। मेघनाद अपने पिता को विश्वास दिलाता है कि वह निश्चित ही विजय प्राप्त करेगा। वह इतना ही नहीं कहता, बल्कि यह भी प्रतिज्ञा करता है कि यदि वह युद्ध में सफल न हुआ, तो वह जीवन में कभी युद्ध का नाम नहीं लेगा। इस सर्ग में मेघनाद की वीरता, निश्चय और पराक्रम का शानदार चित्रण किया गया है।

प्रश्न 8
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘मेघनाद-अभियान’ सर्ग का सारांश लिखिए।

उत्तर

सप्तम सर्ग में मेघनाद के युद्ध के लिए प्रस्थान करने की घटनाएँ दर्शायी गई हैं। रावण के सामने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के बाद मेघनाद जब युद्धभूमि की ओर बढ़ा, तो उसके क्रोध और शक्ति का प्रभाव इतना प्रबल था कि देवलोक के सभी देवता डर के मारे काँप उठे। उसका चेहरा लाल हो गया और उसकी हुंकार सुनकर बड़े वीर भी भयभीत हो गए। मेघनाद ने अपना युद्ध रथ सजाया और युद्ध के वाद्य बजाने का आदेश दिया, जिससे पवन डर के मारे हिल गया, पर्वत काँप उठे, पृथ्वी शोकाकुल हो गई और सूर्य भी त्रस्त हो गया। युद्ध शुरू करने से पहले उसने यज्ञ किया और फिर रथ पर बैठकर शत्रुओं से मुकाबला करने के लिए आगे बढ़ा। रणभूमि में पहुँचकर वह सिंह की तरह गर्जन करने लगा। इस सर्ग में मेघनाद की वीरता, साहस और अद्भुत शक्ति का स्पष्ट चित्रण किया गया है।

प्रश्न 9
‘तुमुल’ के ‘युद्धासन्न सौमित्र’ नामक अष्टम सर्ग का सारांश लिखिए।

उत्तर

अष्टम सर्ग में लक्ष्मण को युद्ध के लिए तैयार होने का चित्रण किया गया है। मेघनाद की भयंकर रण-गर्जना सुनकर उसकी सेना भी डर और गहन शोर मचाने लगी। राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने भी युद्ध के लिए मोर्चा संभाला। लक्ष्मण को देखते ही हनुमान और अन्य वीर भी युद्ध के लिए तत्पर हो गए। लक्ष्मण ने बहुत ही तेज़ी से मेघनाद के सामने अपनी शक्ति दिखाई और दोनों वीरों के बीच भयंकर संघर्ष का संकेत हुआ। मेघनाद के विशाल ललाट, लंबी भुजाएँ और वीरवेश देखकर लक्ष्मण उसकी प्रशंसा करने लगे। उन्होंने सोचा कि इतनी वीरता देखकर युद्ध करना कठिन है, पर अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्होंने बाण चलाने का निश्चय किया। मेघनाद ने लक्ष्मण की प्रशंसा सुनकर उनकी शक्ति और ज्ञान का सम्मान किया, पर शत्रु होने के नाते युद्ध से पीछे नहीं हटा और दोनों के बीच भयंकर युद्ध की शुरुआत हुई।

प्रश्न 10
तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद-लक्ष्मण युद्ध का वर्णन कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के ‘लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध’ तथा ‘लक्ष्मण की मूच्र्छा’ नामक नवम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद की वीरता का वर्णन कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के किसी एक सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के नवम् सर्ग का सारांश लिखिए। 

उत्तर

नवम सर्ग में लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भयंकर युद्ध का वर्णन है। मेघनाद ने नम्र भाव से लक्ष्मण से कहा कि वे उनके सामने युद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि लक्ष्मण नीतिज्ञ और ज्ञानी हैं। परंतु उन्होंने अपने पिता रावण से की गई प्रतिज्ञा के अनुसार युद्ध करना अनिवार्य समझा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वे चाहे लड़ना चाहें या नहीं, युद्ध में उनकी प्रतिज्ञा पूरी करनी होगी और वह बिना युद्ध किए नहीं लौटेंगे। यह सुनकर लक्ष्मण क्रुद्ध हो गए और उनका क्रोध इतना प्रबल हुआ कि सम्पूर्ण वातावरण थर्राने लगा। उन्होंने मेघनाद से कहा कि जैसे सर्प दूध पीकर भी अपना विष नहीं छोड़ता, वैसे ही दुष्टजन कभी सुधरते नहीं।

मेघनाद ने लक्ष्मण की क्रोधपूर्ण वाणी सुनकर हँस दिया। मेघनाद के हँसने पर लक्ष्मण का क्रोध और भी बढ़ गया और दोनों के बीच भयंकर संघर्ष शुरू हो गया। लक्ष्मण के भीषण प्रहारों से मेघनाद की सेना के छक्के छूट गए। भागती हुई सेना को संभालते हुए मेघनाद ने अपनी वीरता दिखाई और कहा कि उन्होंने अपने पिता के सम्मुख जो प्रतिज्ञा की है, उसे अवश्य पूरा करेंगे। दोनों वीर सिंह के समान लड़ रहे थे और उनके शरीर रक्त से लथपथ हो गए।

अंततः मेघनाद ने लक्ष्मण की थोड़ी शिथिलता देख ‘शक्ति-बाण’ का प्रयोग किया, जिससे लक्ष्मण मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। लक्ष्मण की मूर्च्छा देखकर मेघनाद ने सिंह-गर्जना करते हुए भागती हुई वानर सेना को नष्ट किया और युद्ध में अपनी विजय के साथ लंका की ओर लौट गया। इस सर्ग में मेघनाद की अद्भुत वीरता, रण-कौशल और अपने पिता के प्रति निष्ठा का चित्रण बखूबी किया गया है।

प्रश्न 11
तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर हनुमान द्वारा दिये गयें उपदेश का वर्णन कीजिए। 

उत्तर

दशम सर्ग में लक्ष्मण के मूर्च्छित होने और मेघनाद के शक्ति-बाणों से वानर सेना की हिम्मत टूट जाने के बाद हनुमान ने अपने साथी वानरों को समझाया और उनका मनोबल बढ़ाया। वानर सेना अत्यंत व्याकुल हो गई थी और कुछ लोग विलाप करने लगे। हनुमान ने उन्हें कहा कि वीरों को शोक में डूबकर कमजोर नहीं होना चाहिए। लक्ष्मण केवल थोड़ी देर के लिए अचेत हुए हैं, परंतु उनके रक्षक श्रीराम हैं और जिनके साथ राम हैं, उनके सामने कोई शक्ति टिक नहीं सकती।

हनुमान ने वानरों को यह भी समझाया कि यदि तुम शोक में रहते रहो तो शत्रु तुम्हारा मजाक बनाएंगे और तुम्हारा साहस टूट जाएगा। इसलिए तुरंत शोक को त्यागो, अपने क्रोध को नियंत्रण में रखो और बदला लेने के लिए तत्पर हो जाओ। हनुमान के उपदेश ने वानरों पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने अपना डर और दुःख त्याग दिया और युद्ध के लिए तैयार हो गए। दूसरी ओर, इस समय कुटी में बैठे श्रीराम का मन भी उदास था। उन्होंने लक्ष्मण की अवस्था देख कर चिंता की, और कुछ अशुभ संकेतों से उनका मन और अधिक व्याकुल हो गया।

प्रश्न 12
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के एकादश सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

एकादश सर्ग में राम की व्याकुलता और मनोव्यथा का चित्रण किया गया है। कुटी में बैठे हुए श्रीराम अपने मन में विचार कर रहे थे कि आज अचानक यह व्यथा क्यों जन्म ले रही है। वे सोच रहे थे कि मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिससे मेरा मन अशांत हो रहा है और मेरे पैर काँप रहे हैं। राम के हृदय में चिंता और शोक की लहरें उमड़ने लगीं, उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी और शरीर में कम्पन होने लगा।

इसी समय अंगद, हनुमान और सुग्रीव, मूर्च्छित लक्ष्मण को लेकर कुटी में पहुंचे। लक्ष्मण को देखते ही राम अत्यंत व्याकुल हो गए। उनकी चिंता और प्रेम भाव उन्हें इतना प्रभावित कर गया कि वे पछाड़ खाकर बैठ गए। इस दृश्य से राम की गहरी मानवीय संवेदनशीलता और अपने प्रिय भाइयों के प्रति प्रेम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

प्रश्न 13
‘तुमुल’ के ‘राम-विलाप और सौमित्र का उपचार’ जामवः द्वादश सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। 
या
‘तुमुल’ के आधार पर युद्ध में लक्ष्मण के ‘मूर्च्छित होने पर राम-विलाप का वर्णन कीजिए।

उत्तर

द्वादश सर्ग में लक्ष्मण के मूर्च्छित होने और युद्ध में उसकी गंभीर अवस्था के कारण राम की अत्यधिक व्यथा और विलाप का चित्रण किया गया है। लक्ष्मण की दशा देखकर राम अत्यंत दुखी हो गए। वे कहने लगे कि हे लक्ष्मण! तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम बालक होकर भी अपने प्राणों की रक्षा करते हुए अत्यंत वीरता दिखाते हो। हे उर्मिला के प्रिय! उठो और अपने नेत्र खोलकर पुनः चैतन्य हो जाओ।

राम की इस दु:खी दशा को देखकर वानर सेनापति जांबवन्त ने सुझाव दिया कि लंका में सुषेण नामक कुशल वैद्य हैं, उन्हें तुरन्त बुलाया जाए। हनुमान वायु के वेग से सुषेण को लेकर पहुँचे। सुषेण ने कहा कि लक्ष्मण का उपचार केवल संजीवनी बूटी से ही संभव है। इसके बाद हनुमान उस पर्वत की ओर दौड़े जहाँ संजीवनी बूटी पाई जाती थी। मार्ग में कालनेमि नामक राक्षस का वध करते हुए हनुमान पर्वत पर पहुँचे। लेकिन संजीवनी बूटी की पहचान न होने के कारण हनुमान ने पूरे पर्वत को ही उठाकर लंका पहुँचाया। वैद्य के द्वारा उपचार किए जाने पर लक्ष्मण पुनः सचेत होकर मुस्कराने लगे। लक्ष्मण के स्वस्थ होने से वानर-सेना में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। इस सर्ग में लक्ष्मण की वीरता, राम की करुणा और वानर-सेना का साहस तथा हनुमान की तत्परता और शक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

प्रश्न 14
‘तुमुल’ के ‘विभीषण की मन्त्रणा सर्ग का सारांश लिखिए।
या
विभीषण ने मेघनाद के वध के लिए राम को कौन-सी मन्त्रणा दी ? ‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

त्रयोदश सर्ग में विभीषण द्वारा राम को मेघनाद के वध के लिए दी गई उपयुक्त मन्त्रणा का वर्णन है। राम और लक्ष्मण के निकट सभी वानर और रीछ युद्ध की तैयारी में बैठे थे। तभी विभीषण आकर राम को सूचित करता है कि मेघनाद निकुम्भिला पर्वत पर यज्ञ कर रहा है। यदि यह यज्ञ पूरा हो गया, तो मेघनाद युद्ध में अजेय हो जाएगा और राम कभी भी सीता को रावण से मुक्त नहीं कर पाएंगे।

विभीषण राम से बार-बार आग्रह करता है कि युद्ध में मेघनाद को हराने के लिए यज्ञ को बीच में ही रोकना अत्यावश्यक है। राम विभीषण की बातों पर विचार करते हैं और लक्ष्मण तथा अन्य वीरों को आदेश देते हैं कि वे यज्ञ स्थल पर पहुँचकर मेघनाद का सामना करें और यज्ञ का विध्वंस करें। राम हनुमान, नील, नल, अंगद, जांबवन्त और अन्य वीरों से कहते हैं कि वे लक्ष्मण के साथ रहकर युद्ध में उसकी सहायता करें, क्योंकि मेघनाद अत्यंत पराक्रमी और दुर्धर्ष योद्धा है। राम के चरण छूकर लक्ष्मण मेघनाद का वध करने की प्रतिज्ञा करता है और ससैन्य युद्ध के लिए प्रस्थान करता है। इस सर्ग में विभीषण की बुद्धिमत्ता और रणनीति, राम की दूरदर्शिता तथा लक्ष्मण और वानर सेना की तत्परता और वीरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

प्रश्न 15
‘तुमुल’ के ‘मख (यज्ञ) विध्वंस’ और ‘मेघनाद-वध’ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘तुमुल’ का जो सर्ग आपको बहुत रुचिकर लगा हो, उसकी कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘तुमुल खण्डकाव्य की किसी मुख्य घटना का वर्णन कीजिए।

उत्तर

चतुर्दश सर्ग में मेघनाद-वध और यज्ञ-विध्वंस की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन है। लक्ष्मण युद्ध के लिए यज्ञ-स्थल पर पहुँचते हैं और मेघनाद पर तीव्र बाणों की वर्षा शुरू कर देते हैं। उनके बाणों से इतना प्रहार हुआ कि मेघनाद का रक्त यज्ञ की भूमि में बहने लगा और यज्ञ की अग्नि भी बुझती प्रतीत हुई। इस बाण-प्रहार से रीछ और वानरों के हाथों सभी यज्ञकर्ता मारे गये। केवल मेघनाद ही अपने स्थान पर दृढ़ रहकर आहुतियाँ डालता रहा और युद्ध में अपनी वीरता दिखाता रहा।

लक्ष्मण के बाणों की वर्षा देखकर मेघनाद क्रोधित हो जाता है और कहता है कि यह छल-कपट से युद्ध करना वीरता का लक्षण नहीं है। वह लक्ष्मण की वीरता की धिक्कार करता है और कहता कि उनकी रणनीति अयोग्य है। परन्तु, विभीषण के उकसाने और मार्गदर्शन से लक्ष्मण अपने प्रहार जारी रखते हैं। अन्ततः लक्ष्मण के तीव्र बाणों से मेघनाद यज्ञ-भूमि में मारा जाता है। इस सर्ग में लक्ष्मण की अद्भुत वीरता, शौर्य और धर्म के प्रति निष्ठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनके प्रहार से रघुवंश की विजय होती है और देवता लक्ष्मण की कीर्ति का जयगान करते हैं।

प्रश्न 16
‘तुमुल’ के आधार पर अन्तिम सर्ग ‘राम की वन्दना’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग में राम की वन्दना और युद्ध का समापन दर्शाया गया है। इस सर्ग में मेघनाद का शव यज्ञ-भूमि में ही छोड़ दिया जाता है और वानर सेना राम की ओर लौटती है। युद्ध में लक्ष्मण की विजय का समाचार विभीषण राम को सुनाता है राम लक्ष्मण से कहते हैं:

मैं जानता था तुम्हीं, मार सकते हो मेघनाद को।
था व्यग्र सुनने के लिए, निज बन्धु जय संवाद को॥”

इससे यह स्पष्ट होता है कि राम लक्ष्मण की वीरता, साहस और युद्ध कौशल को पहले से ही पहचानते थे और उनकी सफलता से अत्यन्त प्रसन्न हैं। लक्ष्मण अपनी प्रशंसा सुनकर राम के चरणों में झुक जाते हैं और भाव-विभोर होकर कहते हैं:
“हे राम! जिस पर आपकी कृपा हो जाती है वह तो जग-विजेता हो ही जाता है।”

इस सर्ग का मुख्य आशय यह है कि धर्म और न्याय की जीत होती है, और वीरता एवं निष्ठा का फल निश्चित रूप से मिलता है। साथ ही यह सर्ग राम और लक्ष्मण के मधुर संबंध, आदर्श नेतृत्व और विजय का महत्त्व भी दर्शाता है।

प्रश्न 17
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक अथवा प्रधान पात्र लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य का नायक कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मण के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं; सौन्दर्य शील और शक्ति का वर्णन कीजिए।
या
‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

‘तुमुल’ खण्डकाव्य का नायक लक्ष्मण हैं। वे राम के छोटे भाई और रघुकुल के प्रदीप हैं। कवि ने अपने काव्य में लक्ष्मण के तेजस्वी, वीर और गुणी व्यक्तित्व को केंद्रबिंदु बनाया है। इस खण्डकाव्य से लक्ष्मण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(1) वीरता और पराक्रम – लक्ष्मण अत्यन्त वीर और साहसी हैं। वे युद्ध में पीछे नहीं हटते। मेघनाद के ललकारने पर भी उन्होंने युद्ध स्वीकार किया। यद्यपि मेघनाद के शक्ति-बाण से पहले वे मूर्च्छित हो जाते हैं, फिर भी अन्ततः विजय उन्हीं की होती है। कवि लिखते हैं-

“रण ठानकर जिससे भिड़े, उससे विजय पायी सदा।
संग्राम में अपनी ध्वजा, सानन्द फहरायी सदा ॥”

(2) सौन्दर्य और तेजस्विता – लक्ष्मण अत्यन्त सुंदर और तेजस्वी हैं। उनके व्यक्तित्व में कोमलता, नम्रता और तेजस्विता है। उनके बोलने की शैली मधुर और कानों को प्रिय है। मेघनाद उन्हें ‘लावण्ययुक्त ब्रह्मचारी’ कहकर संबोधित करता है। कवि लिखते हैं-

“थी बोल में सुन्दर सुधा, उर में दया का वास था।
था तेज में सूरज, हँसी में चाँद का उपहास था।”

(3) शक्ति और युद्ध कौशल – लक्ष्मण अतुलनीय शक्ति संपन्न हैं। वे शत्रु के मनोभाव भली-भाँति समझते हैं और युद्ध में पराजित नहीं होते। उन्होंने मेघनाद की वीरता और सौन्दर्य की प्रशंसा भी की। युद्ध में उनकी शक्ति का वर्णन इस प्रकार है-

“आकाश को अपने निशित नाराच से भरने लगे।
उस काल देवों के सहित देवेन्द्र भी डरने लगे।”

(4) विनम्रता और शील लक्ष्मण बाल्यकाल से ही दयालु और शीलवान् हैं। वे राम के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हैं। युद्ध में मेघनाद को देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है, परन्तु वे धर्म और वीरता का पालन करते हैं। कवि लिखते हैं-

“आके, आँखों से तुझे देख के तो, इच्छा होती युद्ध की ही नहीं है।
कैसे तेरे साथ में मैं लडूंगा, कैसे बाणों से तुझे मैं हतूंगा ॥”

(5) शत्रु पर विजय लक्ष्मण अपने पराक्रम, बाहुबल और युद्धकौशल से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। यज्ञ-भूमि में उन्होंने नि:शस्त्र मेघनाद का वध किया। राम भी कहते हैं-

“मैं जानता था तुम्हीं, मार सकते हो मेघनाद को।”

(6) मानवीय गुण – लक्ष्मण में क्षमा, धीरता, दया और मानवीय गुण भरे हुए हैं। कवि लिखते हैं-

“निशि दिन क्षमा में क्षिति बसी, गम्भीरता में सिन्धु था।
था धीरता में अद्रि, यश में खेलता शरदिन्दु था॥
थी बोल में सुन्दर सुधा, उर में दया का वास था।
था तेज में सूरज, हँसी में चाँद का उपहास था।”

प्रश्न 18
‘तुमुल खण्डकाव्य के आधार पर प्रतिनायक मेघनाद का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
“तुमुल’ खण्डकाव्य में नायक लक्ष्मण के समान प्रबल एवं प्रभावशाली मेघनाद का चरित्र है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में कौन-सा पात्र आपको सर्वप्रिय है? उसकी चारित्रिक विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए। 
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण-मेघनाद की वीरता और पराक्रम को उजागर किया गया है। दोनों में से किसकी वीरता आपको सर्वाधिक प्रभावित करती है ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
या
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर मेघनाद की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए। 

उत्तर

श्री श्यामनारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में मेघनाद प्रमुख प्रतिनायक हैं। उनका व्यक्तित्व नायक लक्ष्मण के समान ही प्रभावशाली और प्रबल है। उनका चरित्र शक्ति, शौर्य, सौन्दर्य और युद्धकौशल से परिपूर्ण है। इस खण्डकाव्य से मेघनाद की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं।

1. सौन्दर्यवान और प्रभावशाली: मेघनाद का रूप और व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली है। वह रावण का पुत्र है और उसके शरीर-रूप में अद्भुत तेजस्विता और सौन्दर्य है। कवि लिखते हैं-

“महारथी प्रसिद्ध था, गुणी विवेक-बद्ध था।
सुदेश था सुकेश था, नितान्त रम्य वेष था।”

नीलगगन में चाँद की तरह उसका मुकुट चमकता है। उसका ललाट, पुष्ट वक्षस्थल और लंबे भुजाएँ उसे अद्वितीय बनाती हैं। बड़े वीर भी उसे देखकर मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।

2. पितृ-आज्ञापालक:मेघनाद अपने पिता रावण की आज्ञा का पालन करता है। जब रावण उसे मकराक्ष के वध का बदला लेने और राम-लक्ष्मण से युद्ध करने का आदेश देता है, तो वह तुरंत युद्ध के लिए तैयार हो जाता है। युद्ध से पहले वह अपने पिता के चरण स्पर्श कर सम्मान व्यक्त करता है। इसका उदाहरण इस प्रकार है:

हे तात! आपके होने पर शोक की कोई आवश्यकता नहीं। मैं युद्ध में सफलता प्राप्त करूंगा।”

3. अतुल पराक्रमी: मेघनाद का पराक्रम अत्यंत महान है। रावण अपने पुत्र के बल और शौर्य पर गर्व करता है। युद्ध में वह इतना शक्तिशाली है कि पवन और पर्वत कांपने लगते हैं, पृथ्वी शोकाकुल हो जाती है और सूर्य भी त्रस्त होता है।

4. यज्ञनिष्ठ: मेघनाद अपने युद्ध के पूर्व यज्ञ करता है और यज्ञ के प्रति उसकी भक्ति अद्वितीय है। युद्ध में अजेय होने के लिए वह यज्ञ करता है और लक्ष्मण के प्रहारों से घायल होने के बावजूद यज्ञ से उठता नहीं।

5. आत्मविश्वासी और अभिमानी: मेघनाद अपने शौर्य, पराक्रम और युद्ध-कौशल पर पूर्ण विश्वास रखता है। वह अपने पिता से कहता है कि वह युद्ध में लक्ष्मण को परास्त कर देगा और इसे सिद्ध भी करता है। उसकी गर्वपूर्ण बातें सुनकर सभी भयभीत हो जाते हैं। कवि लिखते हैं-

“जो जो कहा उसको उन्होंने, ध्यान से तो सुन लिया।
पर गर्व से घननाद ने, सौमित्र को लख हँस दिया।”

6. शिष्ट और विवेकशील: युद्ध में लक्ष्मण की विनम्र वाणी से मेघनाद प्रभावित होता है। वह युद्ध में विवेकपूर्वक निर्णय करता है और अपने शत्रु की चाल को भलीभाँति समझता है। यज्ञ करते समय घायल होने पर भी वह अपने विवेक और शील के अनुसार कार्य करता है।

7. धैर्यशील और वीर: मेघनाद अपने साहस, पराक्रम और दृढ़ संकल्प से शत्रु के सामने अडिग रहता है। वह केवल बल का प्रयोग नहीं करता, बल्कि युद्ध में रणनीति और विवेक से काम लेता है।

मेघनाद अत्यंत सौन्दर्यवान, शक्तिशाली, पितृ-आज्ञापालक, यज्ञनिष्ठ, आत्मविश्वासी, विवेकशील और धैर्यशील प्रतिनायक हैं। उसका चरित्र लक्ष्मण के समान ही प्रभावशाली है। यही कारण है कि खण्डकाव्य में उसकी पराजय भी अत्यंत प्रभावशाली और पाठकों के लिए रोमांचक बन जाती है।

प्रश्न 19
‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर राम के चरित्र का वर्णन कीजिए।

उत्तर

तुमुल’ खण्डकाव्य में राम का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली, वीर, सहिष्णु और कोमल हृदय वाला प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. वीर योद्धा राम अत्यंत बलशाली और पराक्रमी योद्धा हैं। युद्ध में उनके सामने कोई टिक नहीं पाता। उन्होंने मकराक्ष का वध किया, जिससे युद्ध का प्रारंभिक पराजय राक्षसों पर स्पष्ट हो गया। उनकी वीरता और युद्धकौशल को देखकर सभी वानर और देवता भी प्रभावित हुए।
उद्धरण:
“राम ने मकराक्ष को हराया और युद्ध में विजय पायी।”

2. कोमल हृदय – राम का हृदय अत्यंत कोमल और दयालु है। जब लक्ष्मण मेघनाद के शक्ति-बाणों से मूर्च्छित हो जाते हैं, तो राम व्याकुल होकर आँसू बहाते हैं और गहरे विलाप करते हैं। उनका यह भाव दर्शाता है कि वे केवल वीर नहीं, बल्कि भावनाओं में भी संवेदनशील हैं।
उद्धरण:
“मैं जी न सकता तुम बिना, तुम बाल भक्त अनन्य हो।”

3. बन्धुस्नेही और प्रेमपूर्ण राम अपने भाई लक्ष्मण के प्रति अत्यधिक स्नेहशील और बन्धुस्नेही हैं। वे लक्ष्मण की विजय की प्रतीक्षा करते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते हैं। लक्ष्मण की वीरता देखकर राम उन्हें आशीष देते हैं और उनकी सफलता में प्रसन्न होते हैं।
उद्धरण:
“था व्यग्र सुनने के लिए, निज बन्धु जय संवाद को।”

4. भक्त का हठ मानने वाले राम धर्म और भक्त की इच्छा का पालन करने वाले हैं। यज्ञरत मेघनाद को निःशस्त्र मारने का आदेश देना, जो सामान्यतः कठिन और अनुचित लगता, राम ने भक्त विभीषण के हठ की पूर्ति के लिए किया। वे हमेशा न्याय और धर्म का ध्यान रखते हैं।
उद्धरण:
“कुछ देर सोच-विचार कर, भगवान ने यह तय किया।
रखना उचित है भक्त का हठ, तय यही निश्चय किया।”

5. न्यायप्रिय और विवेकशील राम अपने कार्यों में हमेशा न्यायप्रिय और विवेकशील हैं। वे युद्ध में केवल शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि नीति, धर्म और विवेक से कार्य करते हैं। उनका चरित्र आदर्श नायक का प्रतीक है।

‘तुमुल’ खण्डकाव्य में राम का चरित्र वीर, कोमल हृदय, बन्धुस्नेही, भक्त और न्यायप्रिय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे अपने पराक्रम और नीति के द्वारा न केवल युद्ध में श्रेष्ठ हैं, बल्कि मानवता और आदर्श नेतृत्व का भी उदाहरण हैं।

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