प्रश्न 1.
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘अयोध्या’ सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘दशरथ’ खण्ड की कथा का सार लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चौथे सर्ग ‘श्रवण’ की कथावस्तु लिखिए।
या
‘अवणकुमार’ खण्डकाव्य के छठे सर्ग ‘सन्देश’ की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के ‘आश्रम’ शीर्षक सर्ग की कथा संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के प्रमुख सामाजिक प्रसंगों का वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रथम सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ काव्य के ‘श्रवण’ शीर्षक सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार खण्डकाव्य के सातवें (सप्तम) सर्ग ‘अभिशाप का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के सर्गों का नामोल्लेख करते हुए ‘निर्वाण’ (अष्टम) सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के आखेट सर्ग की कथा संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग ‘आखेट’ की कथावस्तु का उद्घाटन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के सर्गों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के किसी मार्मिक अंश (श्रवण सर्ग) की कथा का उल्लेख कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के जो कारुणिक प्रसंग जनमानस को बहुत प्रभावित करते हैं, उन पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कारुणिक प्रसंग का वर्णन कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के कथानक में महाराज दशरथ की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के ‘निर्वाण’ सर्ग की कथावस्तु लिखिए।
उत्तर
डॉ. शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथा वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के प्रसिद्ध श्रवणकुमार प्रसंग पर आधारित है। यह कथा माता-पिता की आज्ञापालन, पुत्र की भक्ति, शिकार के दौरान हुई दुर्घटना, पुत्र के प्राण-त्याग और माता-पिता के हृदयविदारक विलाप पर केंद्रित है। काव्य में श्रवणकुमार का चरित्र सात्विक, भक्ति-परायण और आदर्श पुत्र के रूप में चित्रित किया गया है। इसके माध्यम से कवि ने सत्य, धर्म, भक्ति और करुणा के आदर्शों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है।
प्रथम सर्ग ‘अयोध्या’
प्रथम सर्ग में ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की कथा की पृष्ठभूमि तैयार की गई है। इसमें अयोध्या नगरी की स्थापना, उसका नामकरण, और राज्यकुल के वैभव एवं गौरवमयी विशेषताओं का वर्णन किया गया है। कवि ने नगरी की सुंदरता और उसकी प्रजा की आदर्श जीवनशैली को उजागर किया है।
सरि सरयू के पावन तट पर है साकेत नगर छविमान ।
जिसमें श्री शोभा वैभव के कभी तने थे विपुल वितान॥
मनु-वंशज इक्ष्वाकु भूप की कीर्ति-पताका लोक-ललाम ।
अनुपम शोभाधाम अयोध्या चित्ताकर्षक अति अभिराम ॥
कवि ने यह भी बताया है कि अयोध्या में नैतिकता और सदाचार की विशेष प्रधानता है। यहाँ हर व्यक्ति नियम-व्यवहार और सदाचार का पालन करता है। वस्तुएँ उचित मूल्य पर मिलती हैं और लोग परस्पर सम्मानपूर्वक रहते हैं। नगरी की सुंदरता और व्यवस्थित जीवन शैली इसको अत्यन्त रमणीय बनाती है। अयोध्या का वातावरण इतना सुशोभित और भव्य है कि यहाँ का जीवन सुख-शांति और आनन्द से भरपूर प्रतीत होता है। यहाँ के जंगल, सरयू नदी के पावन तट, फूलों से सुसज्जित उपवन और प्राकृतिक दृश्य मन मोह लेते हैं।
ऐसी अयोध्या के शब्द-वेध-निपुण राजकुमार दशरथ एक दिन शिकार करने की योजना बनाते हैं:
ऐसे वातावरण भव्य में दशरथ-उर में उठी उमंग ।
देखें सरयू-वन में मृगया आज दिखाती है क्या रंग ॥
इस सर्ग के माध्यम से कवि ने अयोध्या के वैभव, प्रकृति की सुंदरता, प्रजा की आदर्श जीवन शैली और राजकुमार दशरथ के चरित्र का परिचय पाठकों को दिया है। यही पृष्ठभूमि आगे की कथा के लिए मार्ग प्रशस्त करती है, जिसमें श्रवणकुमार के माता-पिता और उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग आने वाले सर्गों में उजागर होंगे।
द्वितीय सर्ग : आश्रम
द्वितीय सर्ग में सरयू नदी के किनारे बसे एक सुंदर आश्रम का वर्णन किया गया है। इस आश्रम में श्रवणकुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता के साथ खुशी-खुशी रहते हैं। आश्रम का वातावरण बहुत शांत और सुखमय है। यहाँ हर जगह शरद और वसंत का सौंदर्य दिखाई देता है। तालाबों में साफ पानी और खिलते हुए कमल इसे और सुंदर बनाते हैं।
वन में रहने वाले मनुष्य, पशु-पक्षी और कीट-पतंग भी आपस में प्रेम और शांति से रहते हैं। यहाँ किसी प्रकार की नफरत या कटुता नहीं है। कवि ने इस आश्रम का वर्णन करते हुए भारतीय जीवन और दर्शन के आदर्श दिखाए हैं। श्रवणकुमार अपने माता-पिता के आज्ञाकारी पुत्र हैं। वह हर दिन माता-पिता की सेवा में लगे रहते हैं और उनके लिए सभी आवश्यक काम करते हैं। उनका जीवन माता-पिता के सुख और संतोष के लिए समर्पित है।
जननी और जनक को श्रद्धा-सहित नवाकर शीश ।
आह्निक-क्रिया निवृत्ति-हेतु जाता सरयू-तट पा आशीष ॥
इस सर्ग में हमें आश्रम का शांत और सुंदर वातावरण और श्रवणकुमार का धर्मपरायण, सात्त्विक और माता-पिता के प्रति समर्पित जीवन देखने को मिलता है।
तृतीय सर्ग : आखेट
इस सर्ग में दशरथ एक सपना देखते हैं जिसमें वे मृग-शावक का वध कर रहे होते हैं। यह सपना उन्हें असामान्य और अशुभ प्रतीत होता है। वहीं, श्रवणकुमार अपने माता-पिता के लिए जल लेने नदी की ओर जाते हैं। उसी समय उनकी बायीं आँख फड़कने लगती है। इसे देखकर दशरथ चिंतित हो जाते हैं और यह शकुन उन्हें अशुभ प्रतीत होता है।
सवेरे जल्दी उठकर दशरथ आखेट के लिए वन की ओर चल देते हैं। इसी समय श्रवणकुमार के माता-पिता को बहुत प्यास लगी होती है। श्रवणकुमार उनकी आज्ञा मानकर जल लेने जाते हैं। जल में पात्र डूबने की आवाज को दशरथ किसी हिंसक पशु की आवाज समझकर अपने धनुष से बाण छोड़ देते हैं। यह बाण सीधे श्रवणकुमार के हृदय में जाकर लग जाता है।
श्रवणकुमार का चीत्कार सुनकर दशरथ अत्यन्त व्याकुल और दुखी हो जाते हैं। वे हतप्रभ होकर देख रहे होते हैं कि क्या हुआ। उनका सारथी उन्हें सांत्वना देता है और परिस्थिति समझाने की कोशिश करता है।
चतुर्थ सर्ग : श्रवण
इस सर्ग की शुरुआत श्रवणकुमार के मार्मिक विलाप से होती है। उसे समझ में नहीं आता कि उसके कोई शत्रु नहीं है, फिर भी उस पर बाण क्यों चला दिया गया। बाण लगने के बाद भी उसकी चिंता अपने लिए नहीं, बल्कि वृद्ध और प्यासे माता-पिता की होती है।
मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है ।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है ॥
दशरथ जब श्रवणकुमार को देखते हैं और उसका विलाप सुनते हैं, तो वे अत्यन्त व्याकुल और दुखी हो जाते हैं। जब श्रवणकुमार अपनी आँखें खोलते हैं, तो सारथी उन्हें समझाता है कि ये अजपुत्र दशरथ हैं और शिकार के भ्रम में आज यह भयंकर भूल हो गई। श्रवणकुमार कहता है—
“राजन्! मुझे मारकर आपने एक नहीं वरन् तीन प्राणियों के प्राण ले लिए हैं। मेरे अन्धे माता-पिता आश्रम में प्यासे बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप यह जल का पात्र लेकर वहाँ जाइए और उन्हें मेरे प्राण-त्याग की सूचना दे दीजिए।” इतना कहकर श्रवणकुमार प्राण त्याग देता है। उसके शव को सारथी की देखभाल में छोड़ दिया जाता है और अत्यन्त दुःखी दशरथ जलपात्र लेकर आश्रम की ओर चले जाते हैं।
इस सर्ग में कवि ने श्रवणकुमार के सात्त्विक जीवन, उसके मार्मिक और करुणिक अंत तथा दशरथ के मन में उत्पन्न आत्मग्लानि और शोक का बहुत सुंदर वर्णन किया है।
पंचम सर्ग : दशरथ
इस सर्ग की शुरुआत राजा दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व और दुःख से होती है। उन्हें अपने किए पर अत्यन्त अपराध-बोध और आत्मग्लानि होती है। वे सिर झुकाकर आश्रम की ओर जा रहे हैं और सोच रहे हैं कि इस घटना से जो घाव उनके हृदय पर लगा है, उसका प्रायश्चित वे कैसे करें।
हाय चलेगी युग-युगान्त तक अब मेरी यह पाप कथा।
जो मुझको ही नहीं वंशजों को भी देगी मर्म व्यथा ॥
दशरथ अपने इस दुःख और शोक में अत्यन्त व्याकुल हैं। वे सोचते हैं कि उनका यह पाप केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके वंशजों को भी पीड़ा देगा। इस प्रकार सर्ग में राजा दशरथ की मानसिक पीड़ा और अपराध-बोध का मार्मिक चित्रण किया गया है।
षष्ठ सर्ग : सन्देश
षष्ठ सर्ग में श्रवणकुमार के माता-पिता की असहाय और दुःखी दशा तथा राजा दशरथ के क्रोध और क्षोभ का मार्मिक चित्रण किया गया है। श्रवणकुमार के माता-पिता अपने पुत्र के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और उसकी प्रतीक्षा में अत्यन्त व्याकुल हैं। जब दशरथ के कदमों की आवाज़ सुनते हैं, तो माता-पिता उससे पूछते हैं–
श्रवण-पिता ने कहा, ”आज प्रिय क्योंकर तुमने किया विलम्ब ?
करती रही विविध आशंका अब तक वत्स तुम्हारी अम्ब ।”
इस सर्ग में माता-पिता अपनी चिंता और डर के कारण अपने पुत्र से प्रश्न करते हैं और उसकी सुरक्षा के लिए व्याकुल दिखाई देते हैं। दशरथ उन्हें श्रवणकुमार की मृत्यु की भयंकर घटना का समाचार देते हैं। माता-पिता श्रवणकुमार के निधन के समाचार सुनकर अत्यन्त करुण विलाप करने लगते हैं। उनका हृदय दुःख और पीड़ा से भर जाता है। इस प्रकार कवि ने इस सर्ग में माता-पिता की करुणावस्था और दशरथ की मानसिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है।
सप्तम सर्ग : अभिशाप
सप्तम सर्ग में श्रवणकुमार के माता-पिता का करुण विलाप अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपने प्रिय पुत्र श्रवणकुमार के मृत शरीर को सरयू नदी के तट पर देखकर उनका धैर्य टूट जाता है। उन्होंने अपने पुत्र को बड़े स्नेह और श्रद्धा से पाला था और उसकी सेवा में अपना जीवन व्यतीत किया था। अब उसी पुत्र की मृत्यु ने उनके हृदय को इतनी गहरी चोट पहुंचाई कि वे अपनी पीड़ा को रोक नहीं पाते। वे विलाप करते-करते कुछ समय के लिए अचेत हो जाते हैं। कुछ देर बाद जब वे सचेत होते हैं, तब भी उनका शोक कम नहीं होता और वे पुनः अपने मृतक पुत्र के प्रति करुण विलाप करने लगते हैं।
वे अपने पुत्र द्वारा किए गए सभी सुकर्मों, उसकी भक्ति और माता-पिता के प्रति उसकी सेवा को याद करते हुए अत्यधिक हृदयविदारक शोक व्यक्त करते हैं—
कौन हमारे लिए विपिन से कन्द मूल फल लायेगा।
कौन अतिथि-सा हमें खिलाने में सच्चा सुख पायेगा।
इस दौरान उनका हृदय व्यथित है और वे अपने पुत्र की मृत्यु से उत्पन्न पीड़ा में पूरी तरह डूबे हुए हैं। उनके विलाप से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने जीवन में पुत्र को किस प्रकार स्नेह और आदर दिया था। अन्त में श्रवणकुमार के पिता दशरथ से कहते हैं कि यद्यपि यह पाप अनजाने में हुआ है, परन्तु पाप तो पाप ही है। वे अपनी पीड़ा और आत्मग्लानि प्रकट करते हुए कहते हैं—
पुत्र-शोक से कलप रहा हूँ जिस प्रकार मैं, अजनन्दन।
सुत-वियोग में प्राण तजोगे इसी भाँति करके क्रन्दन।
इस सर्ग में कवि ने माता-पिता के दुःख, करुणा, और शोक का गहन और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है। पाठक उनके मनोविज्ञान और गहन दुःख को महसूस कर सकते हैं। यह सर्ग श्रवणकुमार की पुण्यात्मा और उसके पराक्रम के साथ-साथ माता-पिता के गहन प्रेम और हृदयविदारक पीड़ा को उजागर करता है।
अष्टम सर्ग : निर्वाण
इस सर्ग में दशरथ अपनी गलती और श्रवणकुमार के प्राणत्याग से अत्यंत दुःखी हैं। उन्होंने अपने पुत्र को मारने का शाप अनजाने में दे दिया था, और अब उन्हें अपने शांत और उदार हृदय में क्रोध कैसे उत्पन्न हुआ, इसका गहरा पछतावा होता है। उन्हें यह समझ में आता है कि उनके पुत्र श्रवणकुमार का वध तो नियति के विधान के अनुसार हुआ और इसमें किसी का दोष नहीं था। वे अपने मृत पुत्र को श्रद्धांजलि देने उठते हैं। उसी समय, दिव्य रूपधारी श्रवणकुमार अपने पिता-माता को संतोष और आशीर्वाद देते हुए कहते हैं—
“मैं प्रतिकृत हो गया आपकी सेवा परिचर्या कर तात।
मुझे श्रेष्ठ पद मिला आज है पा आशीष तुम्हारा मात।”
इस प्रकार, पुत्र का शोक में व्याकुल माता-पिता रुदन करते-करते प्राण त्याग देते हैं। अंततः सारथी द्वारा तैयार की गई चिता में श्रवणकुमार और उसके माता-पिता तीनों का नश्वर शरीर भस्म हो जाता है।
कवि ने इस सर्ग में माता-पिता और पुत्र के बीच गहरे प्रेम, श्रद्धा और कर्तव्यपरायणता का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है। साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि नियति के विधान और कर्तव्य का पालन सर्वोपरि है, और इस प्रकार खण्डकाव्य का भाव पाठकों के हृदय में गहराई से उतरता है।
नवम सर्ग : उपसंहार
नवम सर्ग में दशरथ अपने हृदय की गहरी पीड़ा और दुःख के साथ अयोध्या लौटते हैं। उन्हें डर होता है कि यदि इस घटना का खुलासा हुआ तो उनका अपयश फैल सकता है। इसलिए वे वन में हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का किसी को भी उल्लेख नहीं करते। लेकिन जब राम के वनगमन का समय आता है, तब दशरथ अपने भीतर की पीड़ा और चिंता को सहन नहीं कर पाते। भावविह्वल होकर वे रानी कौशल्या को पूरी घटना का वृत्तान्त सुनाते हैं। इस समय वे पुत्र-वियोग की पीड़ा से अत्यंत आहत और बेचैन हो जाते हैं। अंततः इस मानसिक और भावनात्मक पीड़ा के बोझ के कारण दशरथ प्राण त्याग देते हैं।
इस सर्ग में कवि ने दशरथ के गहरे मातृ-पितृ प्रेम, पुत्रवियोग की मार्मिक पीड़ा और आत्मग्लानि का प्रभाव अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है। साथ ही यह दिखाया गया है कि नियति और अनजाने कर्म के कारण होने वाली घटनाओं में भी व्यक्ति की भावनाएँ और मनोबल कितने महत्वपूर्ण होते हैं।
प्रश्न 2.
श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) श्रवणकुमार का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में वर्णित मातृ एवं पितृभक्ति का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के किसी एक पात्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
“‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का नायक वह आदर्श पात्र है जो युगों-युगों तक अनुकरणीय रहेगा।” इस कथन के आधार पर श्रवणकुमार का चरित्रांकन कीजिए।
या
वर्तमान सामाजिक एवं सांस्कृतिक संकट की बेला में श्रवणकुमार का चरित्र भावी युवा पीढ़ी का संवाहक बन सकता है। सतर्क उत्तर दीजिए।
या
कुमार के चारु-चरित पर, संस्कार का प्रचुर प्रभाव।” कथन के आलोक में श्रवणकुमार के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
श्रवणकुमार खण्डकाव्य का प्रमुख पात्र श्रवणकुमार अपने चरित्र की विशेषताओं के कारण आदर्श पुत्र और आदर्श युवा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह खण्डकाव्य आरंभ से अंत तक उसके चारित्रिक जीवन, मातृ-पितृभक्ति और नैतिक आचरण के इर्द-गिर्द घूमता है।
1. मातृ-पितृभक्त – श्रवणकुमार की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी मातृ-पितृभक्ति है। वह अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता की सेवा में दिन-रात लगा रहता है। यहां तक कि दशरथ के बाण से घायल होने पर भी उसकी चिंता अपने माता-पिता की सुरक्षा और सुख-सुविधा को लेकर बनी रहती है।
मुझे बाण की पीड़ा सम्प्रति इतनी नहीं सताती है ।
पितरों के भविष्य की चिन्ता जितनी व्यथा बढ़ाती है ॥
2. सत्यप्रिय और निष्कलंक – श्रवणकुमार अपने कुल, गोत्र और जाति का सही-सही परिचय देता है। वह किसी से कुछ नहीं छिपाता और अपने जीवन में सत्य का पालन करता है।
वैश्य पिता माता शूद्रा थी मैं यों प्रादुर्भूत हुआ ।
संस्कार के सत्य भाव से मेरा जीवन पूत हुआ ॥
3. सरल और क्षमाशील स्वभाव – उसका स्वभाव बहुत ही सरल और क्षमाशील है। उसके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या क्रोध नहीं है। दशरथ के बाण से घायल होने पर भी वह अपने हृदय में किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं रखता।
4. भारतीय संस्कृति का प्रेमी – श्रवणकुमार चार वेदों और छह दर्शन का पालन करता है और धर्म के दस लक्षणों (दम, अस्तेय, अक्रोध, सत्य, धृति, विद्या, क्षमा, बुद्धि, सुकुमारता, शौच एवं इन्द्रिय-निग्रह) अपनाता है। माता, पिता, गुरु और अतिथि की वह देवतुल्य पूजा करता है।
दम अस्तेय अक्रोध सत्य धृति, विद्या क्षमा बुद्धि सुकुमार।
शौच तथा इन्द्रिय-निग्रह हैं, दस सदस्य मेरे परिवार ॥
5. आत्मसंतुष्ट और लोभी नहीं – श्रवणकुमार भोग और ऐश्वर्य की किसी भी वस्तु के प्रति लोभी नहीं है। वह सन्तोषी स्वभाव का है और जीवन में संयम का पालन करता है।
वल्कल वसन विटप देते हैं, हमको इच्छा के अनुकूल।
नहीं कभी हमको छू पाती, भोग ऐश्वर्य वासन्न-धूल ॥
6. संस्कारों को महत्व देने वाला – वह किसी भी व्यक्ति के प्रति भेदभाव नहीं रखता और जीवन में कर्म, शील एवं संस्कारों को सर्वोच्च महत्व देता है। यही कारण है कि उसका जीवन पवित्र और आदर्श है।
विप्र द्विजेतर के शोणित में अन्तर नहीं रहे यह ध्यान ।
नहीं जन्म के संस्कार से, मानव को मिलता सम्मान ॥
7. अतिथि-सत्कार में निपुण – भारतीय परंपरा के अनुसार अतिथि का सत्कार महापुण्य का कार्य है। जब दशरथ उसके वन में आते हैं, तब भी वह उन्हें अपना आदरयुक्त अतिथि मानता है और उनका स्वागत करता है।
श्रवणकुमार उदार, सत्यनिष्ठ, मातृ-पितृभक्त, सरल, क्षमाशील और संस्कारी पात्र है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ उसे खण्डकाव्य का आदर्श नायक बनाती हैं और वर्तमान समाज में भी युवाओं के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
प्रश्न 3.
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के चरित्रों में देवोपम गुणों के साथ-साथ मानव-सुलभ दुर्बलताएँ भी दिखाई देती हैं। इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार लिखिए।
उत्तर
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में चरित्रों का चित्रण अत्यन्त सजीव और मनोयोगपूर्ण है। डॉ० शिवबालक शुक्ल ने पात्रों में देवोपम गुणों के साथ-साथ मानव-सुलभ दुर्बलताओं का संतुलन बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। यही इस खण्डकाव्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
श्रवणकुमार में सत्यवादिता, संस्कारों का पालन, क्षमाशीलता और आत्मसंतोष जैसे देवोपम गुण दिखाई देते हैं। ये गुण उसे आदर्श और अनुकर्णीय पात्र बनाते हैं। फिर भी उसकी मानव-सुलभ दुर्बलताएँ, जैसे माता-पिता से अत्यधिक मोह, मृत्यु का भय और अपनी सीमाओं की चिंता, उसे केवल आदर्श ही नहीं बल्कि सामान्य मनुष्य के समान व्यवहारिक बनाती हैं।
दशरथ के चरित्र में भी देवोपम गुण स्पष्ट हैं—न्यायप्रियता, सत्यनिष्ठा, उदारता और कर्तव्यपरायणता। इसके बावजूद वह स्वप्न देखकर शंकित हो जाते हैं और श्रवणकुमार के अंधे माता-पिता के शाप की संभावना से भयभीत होते हैं। उनके मन में कुल-परम्परा और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति चिन्ता भी इस दुर्बलता को दर्शाती है।
श्रवणकुमार के माता-पिता का चरित्र भी इसी द्वैत का उदाहरण है। पुत्र मृत्यु की खबर सुनकर वे क्षणिक रूप से विवेक खो देते हैं और दशरथ को शाप दे डालते हैं, यह उनकी मानव-सुलभ दुर्बलता है। लेकिन बाद में वे अपने किए पर पश्चात्ताप करते हैं और समझते हैं कि शाप देना व्यर्थ था, यही उनका देवोपम पक्ष है।
इस प्रकार खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र मनुष्य और आदर्श का मिश्रण प्रस्तुत करता है। उनके गुण और दुर्बलताएँ दोनों ही पाठकों के हृदय को आकर्षित करती हैं और उन्हें जीवन में नैतिकता, कर्तव्यपरायणता और सहानुभूति के महत्व का बोध कराती हैं।
प्रश्न 4.
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के आधार पर दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में दशरथ का चरित्र अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे केवल अयोध्या के राजा ही नहीं, बल्कि आदर्श शासक, न्यायप्रिय एवं संवेदनशील पिता के रूप में चित्रित हैं। उनका चरित्र एक आदर्श राजा और मनुष्य का सम्मिश्रण है, जिसमें महान गुणों के साथ-साथ मानवीय भावनाएँ और दुर्बलताएँ भी दिखाई देती हैं।
1. उत्तम कुलोत्पन्न और वंश गौरव – राजा दशरथ इक्ष्वाकु वंश से उत्पन्न हैं। उनका कुल बहुत ही प्रसिद्ध और गौरवशाली है। उनके पूर्वज पृथु, त्रिशंकु, सगर, दिलीप, रघु, हरिश्चन्द्र और अज जैसे ऐतिहासिक और आदर्श राजा रहे हैं। दशरथ को अपने वंश पर अत्यंत गर्व है।
“क्षत्रिय हूँ मम शिरा जाल में रघुवंशी है रक्त प्रवाह ।।
हस्ति पोत अथवा मृगेन्द्र के पाने की है उत्कट चाह ॥”
2. लोकप्रिय और न्यायप्रिय शासक – दशरथ अपने राज्य के लिए प्रजावत्सल हैं। उनके राज्य में प्रजा संतुष्ट और सुरक्षित रहती है। वे चोरी, अन्याय और अन्य प्रकार के पाप को रोकते हैं। विद्वज्जनों का सम्मान और सेवा उनके राज्य की विशेषता है।
“सुख समृद्धि आमोदपूर्ण था कौशलेश का शुभ शासन।
दुःख था केवल एक दुःख को, जिसे मिला था निर्वासन ॥”
3. धनुर्विद्या और आखेट में निपुण –
दशरथ धनुर्विद्या में कुशल हैं। शब्दभेदी बाण चलाने में माहिर होने के कारण उन्हें आखेट करना पसंद है। विशेषकर श्रावण मास में वर्षा के बाद हरियाली में वे शिकार का आयोजन करते हैं।
“शब्द-भेद के निपुण अहेरी, रविकुल के भावी भूपाल ।
लक्ष्य करें मृग महिष नाग वृक, शूकर सिंह व्याघ्र विकराल ॥”
4. विनम्र और दयालु – उनमें अहंकार नहीं है। दूसरों के दुःख को देखकर वे व्याकुल हो जाते हैं। वे अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अहंकार नहीं करते। स्वप्न में मृग-शावक के वध का संकेत देखकर ही वे चिंतित हो उठते हैं।
5. संवेदनशील और पश्चात्तापी – श्रवणकुमार की मृत्यु पर दशरथ अत्यंत दुखी हो जाते हैं। वे अपने किए हुए कुकर्म का प्रायश्चित्त करने में लगे रहते हैं। उनका दु:ख केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वंश और राज्य पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण भी है।
“हाय चलेगी युग युगान्त तक अब मेरी यह पाप कथा।
जो मुझको ही नहीं वंशजों को भी देगी मर्म व्यथा ॥”
6. आत्म-तपस्वी और न्यायप्रिय – वे अपने अपराध को स्वयं अक्षम्य मानते हैं। उनका न्यायप्रिय और तपस्वी स्वभाव दिखाता है कि वे अपने कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करते हैं।
“करें मुनीश क्षमा वे होंगे, निस्पृह करुणा सिंन्धु अगाध ।
पर मेरे मन न्यायालय में क्षम्य नहीं है यह अपराध ॥”
7. अपराध-बोध और सावधान – श्रवणकुमार के पिता द्वारा उन्हें शाप दिए जाने पर वे अत्यंत दुःखी और असहाय महसूस करते हैं। वे अपनी गलती और उसके परिणाम का बोध रखते हुए भी किसी को इस दुर्घटना की जानकारी नहीं देते।
“रही खरकती हाय शूल-सी पीड़ा उर में दशरथ के।
ग्लानि-त्रपा, वेदना विमण्डित शाप-कथा वे कह न सके।”
8. तेजस्वी और प्रभावशाली – श्रवणकुमार के पास पहुँचने पर दशरथ का तेज और शक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनका तेज उनके रूप, चाल, और व्यक्तित्व में स्पष्ट होता है।
“रूपवान् है तेज आपका, अंग-अंग से फूट रहा।
परिचय दें उर उत्सुकता है, सचमुच धीरज छूट रहा ॥”
दशरथ का चरित्र गुणों और मानव-सुलभ दुर्बलताओं का मिश्रण है। वे न्यायप्रिय, संवेदनशील, आत्मग्लानि से परिपूर्ण और तपस्वी हैं। उनके निर्णयों में उनकी उदारता, कुलपरंपरा की चिंता, और अपने कर्मों की जिम्मेदारी साफ झलकती है। यही उन्हें ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य का एक आदर्श और जीवंत पात्र बनाता है।
प्रश्न 5.
पंचम एवं सप्तम सर्ग के आधार पर दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व पर प्रकाश डालिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में चित्रित दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
“‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में दशरथ के अन्तर्द्वन्द्व का व्यापक चित्रण है।” इस कथन को सोदाहरण प्रमाणित कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ में चित्रित महाराज दशरथ का मानसिक अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत महाराज दशरथ के मानसिक असमंजस का वर्णन कीजिए।
या
“दशरथ का अन्तर्द्वन्द्व ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य की अनुपम निधि है।” इस उक्ति के आलोक में दशरथ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के पंचम और सप्तम सर्ग में महाराज दशरथ के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व को बहुत ही मार्मिक और विस्तृत रूप में चित्रित किया गया है।
1. पंचम सर्ग में दशरथ का आन्तरिक द्वन्द्व – पंचम सर्ग में दशरथ अपने हृदय में गहरे दुःख, ग्लानि और आत्मग्लानि का अनुभव कर रहे हैं। उन्हें यह आभास होता है कि उनके हाथों एक निर्दोष और उदार हृदय के पुत्र श्रवणकुमार की मृत्यु हुई है। इस स्थिति में वे स्वयं को दोषी पाते हैं और सोचते हैं कि श्रवणकुमार के माता-पिता उनके प्रति उदार रहेंगे या कठोर शाप दे देंगे।
दशरथ के मन में अपने कुल और वंश की प्रतिष्ठा को लेकर भी चिंता है। वे सोचते हैं कि क्या उनके कुल के सभी सदस्यों को शापित होना ही लिखा है, जैसे उनके पूर्वजों ने विभिन्न कारणों से भुगता।
“रघुकुल में शापित होने की, परम्परागत परिपाटी।
पार पड़ेगी करनी ही हाँ, दुःख की यह दुर्गम घाटी ॥”
इस सर्ग में दशरथ की लज्जा, ग्लानि, चिन्ता, भय और शंका उनके अन्तर्मन की जटिलता को दर्शाती है। उनके मन में भाव-विकल्प और निर्णय की उलझन स्पष्ट दिखाई देती है।
2. सप्तम सर्ग में दशरथ का अन्तर्मन – सप्तम सर्ग में दशरथ श्रवणकुमार के मृत शरीर को उठाकर उसके माता-पिता के पास ले जाते हैं। इस समय उनका हृदय अत्यधिक व्यथित और करुणा-प्रधान है। ग्लानि और पश्चात्ताप के कारण वे स्वयं लगभग चेतनाशून्य होते हैं। उन्हें दिशा, मार्ग और कार्य की स्पष्ट समझ नहीं रहती। इस समय उनका मन तनाव और दुःख से भरा होता है।
“अनुभव-दिग्सूक्ति का नहीं थी बेचारे दशरथ के पास,
दिग्भ्रम हुआ, पाथ-पथ दुर्गम, हृदय क्षुब्ध, मन हुआ उदास।”
इस चित्रण में कवि ने दशरथ की विनम्रता, दयालुता, उदारता और आत्म-तपस्विता को भी स्पष्ट रूप से दिखाया है। वे केवल अपने अपराध और प्रायश्चित्त की चिंता ही नहीं करते, बल्कि पूरी संवेदनशीलता से मृतक पुत्र के माता-पिता की भावनाओं का भी ख्याल रखते हैं।
3. मानसिक द्वन्द्व का सार – दशरथ का अन्तर्द्वन्द्व उनके चरित्र का प्रमुख पहलू है। इसमें वे स्वयं के अपराध, वंश की प्रतिष्ठा, पुत्र और प्रजा के प्रति कर्तव्य, और करुणा तथा संवेदनशीलता के भावों के बीच झूलते हुए दिखाई देते हैं। उनका यह द्वन्द्व उन्हें मानव-सुलभ दुर्बलताओं और उच्च आदर्शों के बीच संतुलित व्यक्तित्व प्रदान करता है।
प्रश्न 6.
‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य के मार्मिक स्थलों का सोदाहरण निदर्शन कीजिए।
या
“‘श्रवणकुमार’ काव्य के अभिशाप सर्ग में करुण रस का सांगोपांग वर्णन है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘श्रवणकुमार’ के कथानक के मार्मिक स्थल की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
डॉ. शिवबालक शुक्ल द्वारा रचित ‘श्रवणकुमार’ खण्डकाव्य वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के श्रवणकुमार प्रसंग पर आधारित है। इसमें कथा नौ सर्गों में विभक्त है, किन्तु विशेषकर अंतिम छः सर्गों में करुण रस की गहन धारा प्रवाहित होती है। बाण लगने पर श्रवणकुमार का मार्मिक क्रन्दन, दशरथ की आत्मग्लानि, श्रवण के माता-पिता का करुण-विलाप, उनका दशरथ को शाप देना, पुत्र-शोक में प्राण त्यागना और दशरथ का दु:खी मन से अयोध्या लौटना ऐसे प्रसंग हैं, जो किसी भी सहृदय पाठक को करुणा से भर देते हैं। यही कारण है कि श्रवणकुमार का नाम मातृ-पितृभक्ति का पर्याय बन गया।
अभिशाप सर्ग इस खण्डकाव्य का सबसे प्रभावशाली सर्ग है। इस सर्ग में करुण रस और वात्सल्य रस का सुंदर संगम हुआ है। जब श्रवणकुमार पर बाण लगता है, तब उसका मार्मिक क्रन्दन होता है। दशरथ की आत्मग्लानि और अपराध-बोध से हृदय भारित हो जाता है। श्रवणकुमार के पिता अपने क्रोध में दशरथ को शाप दे देते हैं, परन्तु बाद में अपराध की स्वीकृति करने के कारण उनके हृदय में सहानुभूति भी है। कवि ने इसे बहुत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है:
“पुत्र-शोक में कलप रहा हूँ, जिस प्रकार मैं अज-नन्दन।
सुत-वियोग में प्राण तजोगे, इसी भाँति करके क्रन्दन ॥”
श्रवणकुमार की माता के विलाप में करुण रस और वात्सल्य रस दोनों प्रवाहित होते हैं:
“मणि खोये भुजंग-सी जननी, फन-सा पटक रही थी, शीश।
अन्धी आज बनाकर मुझको, किया न्याय तुमने जगदीश ?”
साथ ही उनके वात्सल्य का भाव भी देखा जा सकता है:
“धरा स्वर्ग में रहो कहीं भी ‘माँ’ मैं रहूँ सदा अय प्यार।
रहो पुत्र तुम, ठुकराओ मत मुझ दीना का किन्तु दुलार ॥”
इस सर्ग में दशरथ का अन्तर्मन भी प्रमुख रूप से चित्रित है। वह अपराध-बोध, ग्लानि, पश्चात्ताप और करुणा से व्याकुल हैं। वे सोचते हैं कि क्या श्रवणकुमार के माता-पिता उन्हें क्षमा करेंगे अथवा कठोर शाप देंगे। दशरथ के मन में कुल के दुर्भाग्य और परंपरा के कारण शापित होने का भय भी व्याप्त है। कवि ने इसे भी मार्मिक रूप में व्यक्त किया है:
“अनुभव-दिग्सूक्ति का नहीं थी बेचारे दशरथ के पास,
दिग्भ्रम हुआ, पाथ-पथ दुर्गम, हृदय क्षुब्ध, मन हुआ उदास ।”
श्रवणकुमार के माता-पिता का विलाप और करुणागीत, दशरथ की आत्मग्लानि और करुणा, तथा वात्सल्य का भाव इस सर्ग में अत्यन्त गहन है। यहाँ श्रवणकुमार के पिता का क्रोध और पश्चात्ताप, माता की संवेदनशीलता और दशरथ की अंतर्मन की दशा सभी पात्रों के देवोपम गुण और मानव-सुलभ दुर्बलताओं का मिश्रण दर्शाता है।
अतः अभिशाप सर्ग केवल भावनात्मक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि काव्यगत तकनीक, रस प्रवाह और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से भी अत्यन्त विशिष्ट है। यहाँ करुण रस की संपूर्ण अनुभूति पाठक को होती है और यही इसे खण्डकाव्य का सबसे मार्मिक तथा प्रभावशाली सर्ग बनाता है।
