रामवृक्ष बेनीपुरी हिन्दी साहित्य के प्रमुख निबंधकार, नाटककार, कथाकार और पत्रकार थे। वे राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक यथार्थ के लेखक थे। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, स्वतंत्रता आंदोलन, ग्रामीण जीवन और सामाजिक चेतना का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जन्म
रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसंबर 1899 ई. को बेनीपुर गाँव, जिला मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) में हुआ था। उनके गाँव के नाम पर ही उनका उपनाम ‘बेनीपुरी’ पड़ा। उनका जीवन साधारण और संघर्षपूर्ण रहा।
शिक्षा
रामवृक्ष बेनीपुरी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई। आगे चलकर उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की, परंतु उनका झुकाव पढ़ाई से अधिक सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों की ओर रहा। वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन से संबंध
बेनीपुरी जी महात्मा गांधी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। वे असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए।
स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। जेल जीवन के अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व और लेखन को और अधिक परिपक्व बनाया।
वे केवल लेखक ही नहीं, बल्कि कर्मठ स्वतंत्रता सेनानी भी थे।
साहित्यिक जीवन
रामवृक्ष बेनीपुरी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक और पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनकी भाषा सरल, ओजपूर्ण और भावनात्मक है। वे विशेष रूप से भावात्मक निबंधों के लिए प्रसिद्ध हैं।
प्रमुख कृतियाँ—
- अंबपाली
- गेंहूँ और गुलाब
- माटी की मूरतें
- नेत्रदान
- पतितों के देश में
उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन, किसान, मजदूर और आम जनता की समस्याओं का सजीव चित्रण मिलता है।
प्रमुख कृतियाँ
रामवृक्ष बेनीपुरी की प्रमुख रचनाएँ हैं—
- माटी की मूरतें
- गांधीनामा
- कृष्णकथा
- चिता के फूल
भाषा
रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा सरल, सजीव और प्रभावशाली है। वे बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं, जिससे उनकी रचनाएँ पाठकों के हृदय को सीधे छूती हैं।
शैली
उनकी शैली—
- भावप्रधान
- वर्णनात्मक
- राष्ट्रवादी
- यथार्थवादी
है। वे अपने विचार स्पष्ट और सशक्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
विचारधारा
रामवृक्ष बेनीपुरी राष्ट्रवादी और समाज-सुधारक लेखक थे। वे सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों के समर्थक थे।
निधन
रामवृक्ष बेनीपुरी का निधन 9 सितंबर 1968 ई. को हुआ।
