‘पंचलाइट’ फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की आंचलिक कहानी है, जो बिहार के ग्रामीण जीवन और समाज की सजीव झाँकी प्रस्तुत करती है। कहानी महतो टोली के एक पिछड़े गाँव के परिवेश से शुरू होती है, जहाँ अधिकांश लोग अशिक्षित और सीधे-सादे हैं। रामनवमी के मेले में इस टोली के पंचों ने पेट्रोमैक्स खरीदा, जिसे गाँववाले ‘पंचलैट’ कहते हैं। पंचलाइट को देखकर लोग उत्साहित हैं, लेकिन समस्या यह है कि इसे जलाने का तरीका किसी को नहीं पता। इस पर गाँववाले सोचते हैं कि पंचलाइट को कौन जलाएगा।
गांव में गोधन नामक युवक है, जो मुनरी नामक लड़की से प्रेम करता है। गोधन पहले किसी कारण से पंचों द्वारा जाति से बहिष्कृत किया गया था, क्योंकि वह मुनरी के घर के सामने सिनेमा का गाना गाकर गुजरता था। मुनरी जानती है कि गोधन पंचलाइट जलाने में सक्षम है। वह चतुराई से अपनी सहेली कनेली के माध्यम से यह बात पंचों तक पहुँचाती है। पंच विचार करने के बाद गोधन को पुनः टोली में सम्मिलित करने का निर्णय लेते हैं।
गोधन पंचलाइट को जलाने आता है, लेकिन स्पिरिट उपलब्ध नहीं होता। अपनी विवेकशीलता और बुद्धिमत्ता से वह गरी के तेल का प्रयोग करके पंचलाइट जलाने में सफल होता है। पंच और गाँववाले उसकी इस कार्यकुशलता से बहुत प्रसन्न होते हैं। पंच उसे कहते हैं, “तुम्हारा सात खून माफ। खूब गाओ सलीमा का गाना।” गुलरी काकी, मुनरी की माँ, भी प्रसन्न होकर गोधन को शाम के भोजन पर बुलाती है। पंचलाइट की रोशनी में पूरे गाँव में उत्सव और कीर्तन का आयोजन होता है।
कहानी में गोधन का चरित्र विशेष महत्व रखता है। वह अशिक्षित होते हुए भी गुणवान, विवेकी और निडर है। वह जाति-पाँति और सामाजिक रूढ़ियों से परे प्रेम और मानवता का पालन करता है। गोधन का साहस, कुशलता और बुद्धिमत्ता उसे गाँव में सम्मान दिलाती है। मुनरी के प्रति उसकी सच्ची भक्ति और प्रेम भी कहानी में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
कहानी का शीर्षक ‘पंचलाइट’ पूरी कहानी का केन्द्रबिंदु है। यह केवल पेट्रोमैक्स को ही नहीं दर्शाता, बल्कि ग्रामीण जीवन में छोटे-छोटे उत्सव, लोगों की भावनाएँ और सामाजिक रूढ़ियों की स्थिति को भी उजागर करता है। पंचलाइट जलने के पीछे की आवश्यकता यह दिखाती है कि कभी-कभी किसी वस्तु या कार्य की आवश्यकता ही पुराने नियमों और निषेध को व्यर्थ साबित कर देती है।
कहानी का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि ग्रामीण समाज में जाति और टोली का प्रभाव लोगों के व्यवहार और निर्णयों को प्रभावित करता है। इसके साथ ही रेणु जी ने यह भी दिखाया है कि आवश्यकता, बुद्धिमत्ता और सही मार्गदर्शन से रूढ़िवादी और पिछड़ेपन की समस्याओं का समाधान संभव है। कहानी अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम-सुधार और सामाजिक चेतना का संदेश देती है।
‘पंचलाइट’ कहानी में रेणु जी ने ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी, लोगों की भोली-भाली मानसिकता, सरलता और उत्साहपूर्ण जीवन को बड़े कुशल ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी में प्रयुक्त ग्राम्य भाषा, स्थानीय शब्दावली और आम बोलचाल के तरीके इसे और अधिक प्रामाणिक बनाते हैं। पाठक को यह महसूस होता है कि वे गाँव के जीवन में खुद मौजूद हैं, जहाँ उत्सव और मनोवैज्ञानिक संघर्ष, प्रेम और समाजिक रूढ़ियाँ आपस में मिलकर एक मार्मिक चित्र बनाती हैं।
