नज़ीर अकबराबादी हिन्दी-उर्दू साहित्य के प्रमुख लोककवि माने जाते हैं। वे जन-जीवन के कवि थे। उनकी कविताओं में आम आदमी का जीवन, उसकी खुशियाँ, दुःख, मेल-जोल और सामाजिक यथार्थ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य में यथार्थवादी और जनकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं।
जन्म
नज़ीर अकबराबादी का जन्म 1735 ई. में दिल्ली में हुआ था। उनका वास्तविक नाम वली मोहम्मद था। बाद में वे आगरा में बस गए, जिस कारण उन्हें अकबराबादी कहा गया। उनका जीवन साधारण था और वे आम जनता के बीच रहकर कविता करते थे।
शिक्षा
नज़ीर अकबराबादी ने पारंपरिक शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी का अच्छा ज्ञान था। वे विद्यालय में अध्यापक भी रहे, जिससे उनका संपर्क सीधे जन-जीवन से बना रहा।
साहित्यिक जीवन
नज़ीर अकबराबादी का साहित्य आम लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने राजा-महाराजाओं या दरबारी विषयों की बजाय साधारण जन के जीवन, उनके पर्व-त्योहार, बाजार, मजदूर, फकीर और बच्चों तक को अपनी कविता का विषय बनाया।
उनकी कविताएँ समाज का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं।
प्रमुख काव्य-विषय
नज़ीर अकबराबादी की कविताओं के प्रमुख विषय हैं—
- मानव जीवन की सच्चाई
- सामाजिक समानता
- धार्मिक सहिष्णुता
- त्योहार (होली, दिवाली)
- बाजार और रोज़मर्रा का जीवन
प्रमुख रचनाएँ
नज़ीर अकबराबादी की प्रमुख कविताएँ हैं—
- आदमी-नामा
- बंजारानामा
- फकीरनामा
- होली
- दीवाली
भाषा
नज़ीर अकबराबादी की भाषा सरल, बोलचाल की मिश्रित हिन्दी-उर्दू है। उनकी भाषा जन-साधारण को सहज रूप से समझ में आती है।
शैली
उनकी शैली—
- वर्णनात्मक
- व्यंग्यात्मक
- लोकधर्मी
- यथार्थवादी
है। उनकी कविताओं में सहजता और स्पष्टता मिलती है।
साहित्यिक महत्व
नज़ीर अकबराबादी को हिन्दी-उर्दू साहित्य का पहला लोककवि माना जाता है। उन्होंने कविता को दरबार से निकालकर आम जनता तक पहुँचाया।
निधन
नज़ीर अकबराबादी का निधन 1830 ई. में आगरा में हुआ।
