प्रश्न 1
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘मेवाइ-मुकुट खण्डकाव्य का सारांश लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य की विषय-वस्तु स्पष्ट कीजिए। ‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य की घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के प्रथम और द्वितीय सर्ग की कथा लिखिए।
उत्तर
गंगारत्न पाण्डेय द्वारा रचित ‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप के त्याग, शौर्य, साहस और अदम्य स्वाभिमान से भरे जीवन के एक अत्यन्त मार्मिक और संघर्षपूर्ण काल का चित्रण किया गया है। इस काव्य की कथा हल्दीघाटी के युद्ध के बाद की परिस्थितियों से आरम्भ होती है, जब प्रताप मुगल सम्राट अकबर से युद्ध में पराजित होकर भी आत्मसम्मान नहीं खोते और अरावली के दुर्गम जंगलों में कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध रहते हैं। सम्पूर्ण काव्य सात सर्गों में विभाजित है, जिनमें प्रताप के जीवन-संघर्ष, पारिवारिक स्थिति, मानसिक द्वन्द्व और सहयोगियों की भूमिका का विस्तार से वर्णन किया गया है।
प्रथम सर्ग ‘अरावली’ में युद्ध के बाद की दयनीय स्थिति का चित्रण है। महाराणा प्रताप अपनी पत्नी रानी लक्ष्मी और छोटे पुत्र के साथ अरावली के जंगलों में भटक रहे हैं। उनके पास न भोजन की व्यवस्था है, न रहने का कोई साधन, फिर भी वे अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता के आदर्श से तनिक भी विचलित नहीं होते। अरावली पर्वतमाला को कवि ने ऐसे प्रस्तुत किया है, मानो वह स्वयं प्रताप की रक्षा के लिए खड़ी हो। इसी सर्ग में प्रताप का उदार चरित्र भी सामने आता है, जब वे शत्रु पक्ष की कन्या ‘दौलत’ को शरण देते हैं और उसके साथ पुत्री जैसा स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं।
द्वितीय सर्ग ‘लक्ष्मी’ में रानी लक्ष्मी के चरित्र का अत्यन्त मार्मिक चित्रण है। वह पहले राजमहलों में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जी चुकी है, किन्तु अब जंगल में कष्ट सह रही है। वह कन्द-मूल खाकर और भूमि पर सोकर भी धैर्यपूर्वक जीवन व्यतीत करती है। कभी-कभी अपने पुत्र की दयनीय अवस्था देखकर उसका हृदय विचलित हो उठता है, परन्तु वह अपने पति के आदर्शों के प्रति अटल रहती है और कठिनाइयों के सामने हार नहीं मानती। उसका यह दृढ़ निश्चय स्पष्ट होता है—“हमको नहीं डुबा पाएगा यह कष्टों का सागर।”
तृतीय सर्ग में महाराणा प्रताप के मन में चल रहे गहरे अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण किया गया है। वे एक ओर अपने राज्य मेवाड़ की दयनीय स्थिति को देखकर चिन्तित हैं, तो दूसरी ओर अपने भाई शक्तिसिंह के विश्वासघात से दुःखी भी हैं। फिर भी वे निराश नहीं होते और यह विश्वास रखते हैं कि एक दिन उनका भाई भी अपनी भूल समझकर लौट आएगा। वे यह दृढ़ संकल्प लेते हैं कि वे अपने प्राणों की आहुति देकर भी मेवाड़ को स्वतंत्र कराएँगे।
चतुर्थ सर्ग ‘दौलत’ में उस बालिका के मनोभावों को प्रस्तुत किया गया है, जिसे प्रताप ने शरण दी है। वह अपने पूर्व जीवन के वैभव को याद करती है, परन्तु उसे उसमें सच्चा प्रेम नहीं दिखाई देता। इसके विपरीत वह प्रताप के स्नेह, उदारता और महानता से अत्यन्त प्रभावित होती है और उनके प्रति श्रद्धा भाव रखती है। वह प्रताप और शक्तिसिंह की तुलना करते हुए प्रताप को सूर्य के समान महान बताती है।
पंचम सर्ग ‘चिन्ता’ में प्रताप, रानी लक्ष्मी और दौलत के बीच संवाद के माध्यम से उनके मन की गहरी भावनाओं का चित्रण किया गया है। प्रताप रानी की आँखों में आँसू देखकर व्यथित हो उठते हैं और मेवाड़ की मुक्ति के लिए दूर जाकर सेना संगठित करने का निश्चय करते हैं। यह सुनकर रानी भी अपने सारे दुःखों को भूलकर उनके इस संकल्प में साथ देने को तैयार हो जाती है।
षष्ठ सर्ग ‘पृथ्वीराज’ में अकबर के दरबारी कवि पृथ्वीराज का पत्र आता है, जिसमें वह अपनी भूल स्वीकार करता है और प्रताप का साथ देने का वचन देता है। वह बताता है कि भामाशाह भी प्रताप की सहायता के लिए तैयार हैं, जिससे प्रताप के मन में नई आशा का संचार होता है।
सप्तम और अन्तिम सर्ग ‘भामाशाह’ में भामाशाह अपनी संचित सम्पत्ति राणा प्रताप को अर्पित करते हैं, ताकि वे सेना संगठित कर सकें और मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र करा सकें। पहले प्रताप इसे स्वीकार करने में संकोच करते हैं, क्योंकि वे दान लेने को उचित नहीं मानते, परन्तु भामाशाह के तर्क से प्रभावित होकर वे उसे स्वीकार कर लेते हैं और उसे गले लगा लेते हैं। यही घटना प्रताप के संघर्ष को नई दिशा देती है।
इस प्रकार ‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य में महाराणा प्रताप के संघर्ष, त्याग, देशभक्ति, स्वाभिमान, धैर्य और आदर्शों का अत्यन्त प्रभावशाली और प्रेरणादायक चित्रण किया गया है। यह काव्य हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धान्तों और स्वतंत्रता के आदर्शों को नहीं छोड़ना चाहिए।
प्रश्न 2
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग (अरावली) का सारांश (कथा) संक्षेप में लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ के अरावली सर्ग की कथा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग ‘अरावली’ एक पूर्व-पीठिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें हल्दीघाटी के भीषण युद्ध के बाद की स्थिति का मार्मिक चित्रण मिलता है। महाराणा प्रताप ने अत्यन्त वीरता और साहस के साथ युद्ध किया, किन्तु परिस्थितियाँ उनके अनुकूल न होने के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। युद्ध के पश्चात् वे राजसी वैभव से दूर, साधनहीन होकर अरावली के दुर्गम जंगलों में अपने परिवार सहित भटकने को विवश हो जाते हैं। इस स्थिति में भी उनके मन में स्वतंत्रता के प्रति अटूट निष्ठा और संघर्ष का उत्साह बना रहता है।
अरावली पर्वत-श्रृंखला का वर्णन कवि ने अत्यन्त प्रभावशाली और मानवीकरण शैली में किया है। यह पर्वतमाला मानो एक जीवित प्रहरी की तरह महाराणा प्रताप की रक्षा करती हुई प्रतीत होती है। अरावली को इस बात का गर्व है कि उसके अंचल में ऐसा महान् वीर आश्रय लिए हुए है, जो मेवाड़ के स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्षरत है। उसे विश्वास है कि प्रताप एक दिन अवश्य अपने राज्य की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करेंगे।
इस सर्ग में प्रताप के कठिन जीवन का अत्यन्त करुण और यथार्थ चित्रण मिलता है। वे अपनी पत्नी लक्ष्मी और पुत्र अमर के साथ वन-वन भटकते हैं। रानी लक्ष्मी का जीवन भी अत्यन्त कष्टपूर्ण हो गया है, फिर भी वह एक आदर्श भारतीय नारी की भाँति धैर्य और साहस के साथ परिस्थितियों का सामना करती हैं। वह अपने पुत्र को गोद में लेकर वनवासिनी सीता की तरह वृक्ष के नीचे बैठी रहती हैं, जिससे उनकी दयनीय स्थिति का हृदयस्पर्शी चित्र सामने आता है।
प्रश्न 3
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के लक्ष्मी सर्ग (द्वितीय सर्ग) की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश (कथानक) लिखिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का द्वितीय सर्ग ‘लक्ष्मी सर्ग’ महाराणा प्रताप की पत्नी रानी लक्ष्मी के चरित्र पर आधारित है। इस सर्ग में उनके त्याग, धैर्य और कष्टपूर्ण जीवन का मार्मिक चित्रण किया गया है। रानी लक्ष्मी पहले राजसी वैभव में रहती थीं, किन्तु अब उन्हें जंगलों में अत्यन्त अभावपूर्ण जीवन बिताना पड़ रहा है। फिर भी एक आदर्श भारतीय पत्नी और वीर क्षत्राणी के रूप में वे अपने कष्टों की चिन्ता नहीं करतीं और धैर्यपूर्वक कन्द-मूल खाकर तथा भूमि पर सोकर जीवन व्यतीत करती हैं।
रानी को सबसे अधिक दुःख अपने छोटे पुत्र की दयनीय स्थिति देखकर होता है, जो राणा का पुत्र होकर भी दूध के लिए तरस रहा है। यह देखकर उनका हृदय व्याकुल हो उठता है और वे कभी-कभी अपने भाग्य को कोसने लगती हैं। वे सोचती हैं कि राणा ने केवल अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा की है, फिर भी उन्हें इतना कष्ट क्यों सहना पड़ रहा है। वे कहती हैं कि हमने स्वतंत्रता नहीं बेची, इसी कारण हमें ये दुःख सहने पड़ रहे हैं, परन्तु फिर भी वे साहस नहीं खोतीं और दृढ़ता से कहती हैं—“हमको नहीं डुबा पाएगा यह कष्टों का सागर।”
इसी बीच महाराणा प्रताप कुटी के बाहर आकर रानी से उनके जागने का कारण पूछते हैं। रानी कुछ न कहकर भीतर चली जाती हैं, परन्तु उनकी मनःस्थिति समझकर राणा प्रताप की आँखें भी भर आती हैं। इस प्रकार इस सर्ग में रानी लक्ष्मी के धैर्य, त्याग, करुणा और दृढ़ संकल्प का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
प्रश्न 4
‘मेवाड़-मुकुट के ‘प्रताप’ सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ‘प्रताप सर्ग पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का तृतीय सर्ग ‘प्रताप सर्ग’ महाराणा प्रताप के अन्तर्द्वन्द्व और उनके दृढ़ संकल्प का चित्रण करता है। इस सर्ग में राणा प्रताप एक वृक्ष के नीचे बैठकर गहन चिन्तन में डूबे हुए दिखाई देते हैं। उनके सामने मेवाड़ की स्वतंत्रता प्राप्त करने की बड़ी समस्या है। वे अपनी पत्नी लक्ष्मी के कष्टों को याद करते हैं, जिन्होंने उनके साथ वन-वन भटकते हुए भी कभी धैर्य नहीं खोया। इससे प्रेरित होकर वे भी अपने कर्तव्य का पालन करने का निश्चय करते हैं।
राणा प्रताप अपने भाई शक्तिसिंह के विश्वासघात को याद करके दुःखी होते हैं, जो अकबर के पक्ष में चला गया था। वे कहते हैं—
“शक्तिसिंह, जिसको मैंने था बन्धु बनाकर पाला,
वह भी मुझसे द्रोह कर गया, निकला विषधर काला।”
किन्तु इस विश्वासघात के बावजूद उनका उत्साह कम नहीं होता। वे आशा करते हैं कि एक दिन शक्तिसिंह को अपनी गलती का एहसास होगा और वह लौट आएगा। वे मन-ही-मन प्रतिज्ञा करते हैं कि मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए वे अपने प्राणों की भी आहुति दे देंगे। वे यह भी सोचते हैं कि अन्य वीर राजपूत जैसे मानसिंह अकबर के अधीन हो गये हैं, परन्तु वे स्वयं कभी अपना मस्तक नहीं झुकाएँगे।
राणा अपने स्वामिभक्त घोड़े चेतक को याद करके भावुक हो जाते हैं। साथ ही वे यह भी विचार करते हैं कि अरावली में रहकर युद्ध के लिए पर्याप्त साधन जुटाना कठिन है, इसलिए वे सिन्धु प्रदेश जाकर सेना एकत्र करने का निश्चय करते हैं। वे अपने वंश की आन-बान की रक्षा के लिए संघर्ष करने का दृढ़ संकल्प लेते हैं। इसी सोच में वे ‘दौलत’ के भविष्य के बारे में भी चिन्तित होते हैं और उससे मिलने के लिए चल पड़ते हैं।
प्रश्न 5
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के ‘दौलत’ सर्ग (चतुर्थ सर्ग) की कथावस्तु लिखिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का चतुर्थ सर्ग ‘दौलत सर्ग’ बालिका दौलत के चरित्र और उसके विचारों पर आधारित है। दौलत अकबर के मामा की पुत्री है, जो राणा प्रताप की शरण में रह रही है। इस सर्ग में वह एक वृक्ष की छाया में बैठकर अपने बीते जीवन को याद करती है। वह सोचती है कि अकबर के दरबार का भोग-विलास भरा जीवन बाहर से आकर्षक था, किन्तु उसमें सच्चा प्रेम और अपनापन नहीं था। इसके विपरीत, राणा प्रताप के साथ का सादा जीवन उसे अधिक सुखद और पवित्र लगता है।
दौलत के मन में अकबर की साम्राज्यवादी नीति के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वह देखती है कि शक्ति और अधिकार के लिए दूसरों पर अत्याचार किया जा रहा है। दूसरी ओर, राणा प्रताप के प्रति उसके मन में अत्यन्त सम्मान और श्रद्धा है। वह उन्हें पिता के समान मानती है और कहती है—
“सचमुच ये कितने महान, कितने गौरवशाली,
इनको पिता बनाकर मैंने बहुत बड़ी निधि पा ली।”
दौलत यह भी सोचती है कि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है, फिर भी लोग आपस में भेदभाव क्यों करते हैं। उसके मन में राणा के भाई शक्तिसिंह के प्रति भी आकर्षण है, किन्तु वह अपनी भावनाएँ प्रकट नहीं करती, क्योंकि वह राणा को और दुःख नहीं देना चाहती। वह शक्तिसिंह और प्रताप की तुलना करते हुए कहती है कि प्रताप सूर्य के समान महान हैं, जबकि शक्तिसिंह दीपक के समान हैं।
वह राणा प्रताप के लिए कुछ करने की इच्छा रखती है और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहती है। इसी सोच में डूबी हुई उसे अचानक किसी के आने की आहट सुनाई देती है और यहीं इस सर्ग का समापन हो जाता है। इस प्रकार इस सर्ग में दौलत के सरल हृदय, उदार विचार और राणा प्रताप के प्रति उसकी श्रद्धा का सुन्दर चित्रण किया गया है।
प्रश्न 6
‘मेवाड़-मुकुट के ‘चिन्ता’ सर्ग (पञ्चम सर्ग) में दिये रानी लक्ष्मी के मनोभावों को स्पष्ट कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘चिन्ता’ (पञ्चम) सर्ग का सारांश (कथावस्तु या कथानक) लिखिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का पञ्चम सर्ग ‘चिन्ता सर्ग’ रानी लक्ष्मी के मनोभावों और उनकी आन्तरिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण करता है। इस सर्ग में राणा प्रताप दौलत के पास पहुँचकर उसके चिन्तन का कारण पूछते हैं। दौलत स्वयं को निश्चिन्त बताकर राणा की चिन्ता को ही अपनी चिन्ता बताती है। राणा बताते हैं कि वे रानी लक्ष्मी की आँखों में आँसू देखकर व्याकुल हैं, क्योंकि वे स्वभाव से अत्यन्त धीर और गंभीर हैं और अपने दुःख को प्रकट नहीं करतीं।
इसके बाद दौलत राणा के साथ रानी लक्ष्मी के पास जाती है। रानी अपने पुत्र को गोद में लेकर बैठी हुई गहरे विचारों में डूबी होती हैं। वे सोचती हैं कि उनके कारण ही राणा को इतना कष्ट सहना पड़ रहा है और उन्हें अपना राज्य छोड़कर जंगलों में भटकना पड़ रहा है। उन्हें हल्दीघाटी के युद्ध का दृश्य याद आता है, जब राणा प्रताप वीरता से युद्ध कर रहे थे। उनके मन में आत्मग्लानि और दुःख की भावना उठती है।
तभी दौलत उनसे मधुर स्वर में बात करती है और उनके मन की पीड़ा को समझने का प्रयास करती है। इसी समय राणा प्रताप भी वहाँ पहुँचकर अपने निश्चय के बारे में बताते हैं कि वे मेवाड़ की स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सिन्धु प्रदेश जाकर सेना एकत्र करेंगे और या तो विजय प्राप्त करेंगे या प्राणों की आहुति दे देंगे।
राणा के इस दृढ़ संकल्प को सुनकर रानी लक्ष्मी में नया उत्साह जाग जाता है। वे अपने दुःख को त्यागकर एक वीर क्षत्राणी की तरह अपने पति के संकल्प में साथ देने के लिए तैयार हो जाती हैं और देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का निश्चय करती हैं। अंत में अगले दिन प्रस्थान करने का निर्णय लिया जाता है। इस प्रकार इस सर्ग में रानी लक्ष्मी के दुःख, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और देशप्रेम का सुन्दर चित्रण किया गया है।
प्रश्न 7
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के आधार पर कवि पृथ्वीराज और राणा प्रताप के बीच हुए वार्तालाप का सारांश लिखिए।
या
खण्डकाव्य के ‘पृथ्वीराज’ सर्ग (षष्ठ सर्ग) का कथानक संक्षेप में लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के ‘पृथ्वीराज’ सर्ग का सारांश लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के छठवें सर्ग का कथानक लिखिए।
उत्तर
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य का षष्ठ सर्ग ‘पृथ्वीराज सर्ग’ राणा प्रताप और कवि पृथ्वीराज के बीच हुए वार्तालाप पर आधारित है। इस सर्ग में प्रातःकाल जब राणा प्रताप यात्रा के लिए तैयार हो रहे होते हैं, तभी एक दूत अकबर के दरबारी कवि पृथ्वीराज का पत्र लेकर आता है। पत्र पढ़कर राणा प्रताप उनसे मिलने जाते हैं।
पृथ्वीराज राणा प्रताप के सामने अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने और अन्य राजपूत राजाओं ने स्वार्थवश अकबर का साथ देकर अपनी राजपूती मर्यादा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-प्रेम को भुला दिया था। उन्हें अपने इस कृत्य पर अत्यन्त पश्चाताप है। वे कहते हैं कि अब वे इस भूल को सुधारना चाहते हैं और राणा प्रताप का साथ देकर मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र कराना चाहते हैं।
वे राणा प्रताप को आश्वासन देते हैं कि अब उन्हें वन-वन भटकने नहीं दिया जाएगा और सभी राजपूत मिलकर अकबर से प्रतिशोध लेंगे। जब राणा प्रताप अपनी साधनहीनता की बात कहते हैं, तब पृथ्वीराज उन्हें बताते हैं कि भामाशाह उनके लिए सेना और धन की व्यवस्था करेंगे, जिससे वे पुनः शक्तिशाली बनकर संघर्ष कर सकें।
अन्त में पृथ्वीराज राणा प्रताप से आज्ञा लेकर भामाशाह को बुलाने के लिए चले जाते हैं। इस प्रकार इस सर्ग में पश्चाताप, देशभक्ति, स्वाभिमान और सहयोग की भावना का सुन्दर चित्रण किया गया है।
प्रश्न 8
‘मेवाइ-मुकुट’ के सातवें सर्ग ‘भामाशाह का सारांश लिखिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के आधार पर राणा प्रताप और भामाशाह के मध्य हुए वार्तालाप का वर्णन कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य में वर्णित किस घटना ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है ? उदाहरण देकर समझाइट।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य मेवाड़ की स्वाधीनता का संग्राम था।’ इस उक्ति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
इस सर्ग में राणा प्रताप एकान्त में बैठकर अपनी कठिन परिस्थितियों पर विचार कर रहे होते हैं। उन्हें लगता है कि अब उनके जीवन में कोई नया मोड़ आने वाला है। इसी समय पृथ्वीराज के साथ भामाशाह वहाँ आते हैं और राणा प्रताप को प्रणाम करते हैं। भामाशाह अत्यन्त विनम्रता के साथ अपनी संचित अपार धन-सम्पत्ति राणा के चरणों में अर्पित करना चाहते हैं, ताकि वे सेना एकत्र कर मेवाड़ को स्वतंत्र करा सकें। किन्तु राणा प्रताप अपने क्षत्रिय धर्म और मर्यादा के कारण इस धन को स्वीकार करने से मना कर देते हैं। वे कहते हैं—
“राजवंश ने जिनको जो कुछ दिया, न वापस लूँगा।
शेष प्राण हैं अभी, देश-हित हँस-हँस होम करूँगा।”
भामाशाह राणा को समझाते हैं कि यह धन उनका निजी नहीं, बल्कि देश का है और देश की रक्षा के लिए इसका उपयोग होना चाहिए। वे कहते हैं कि देश-सेवा केवल राजा का ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करे।
भामाशाह के इन सच्चे और तर्कपूर्ण शब्दों को सुनकर राणा प्रताप अत्यन्त प्रभावित होते हैं। वे कुछ समय के लिए मौन हो जाते हैं और फिर भामाशाह के त्याग और देशभक्ति को स्वीकार करते हुए उन्हें गले लगा लेते हैं। इसके बाद राणा प्रताप नये उत्साह के साथ सेना संगठित करने और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का संकल्प लेते हैं।
इस प्रकार इस सर्ग में भामाशाह के त्याग, देशप्रेम और राणा प्रताप के स्वाभिमान व आदर्शों का सुन्दर चित्रण किया गया है और इसी के साथ खण्डकाव्य का समापन होता है।
प्रश्न 9
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के आधार पर महाराणा प्रताप (खंण्डकाव्य के नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
मेवाइ-मुकुट खण्डकाव्य के नायक कौन हैं ? उनके चरित्र की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के जिस पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया हो, उसका चरित्रांकन कीजिए।
या
“महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के एक ऐसे महापुरुष हैं, जिनसे जातीय स्वाभिमान, देशप्रेम व स्वाधीनता के लिए सर्वस्व बलिदान की सीख राष्ट्र की पीढ़ियाँ निरन्तर ग्रहण करती रहेंगी।” मेवाड़-मुकुट के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट के आधार पर राणा प्रताप के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट के नायक के त्याग और पराक्रम का वर्णन कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर राणा प्रताप के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
महाराणा प्रताप ‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के नायक हैं। कवि ने उनके चरित्र के माध्यम से त्याग, वीरता, स्वाभिमान और देशभक्ति का अत्यन्त प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया है। वे सच्चे अर्थों में स्वतन्त्रता-प्रेमी थे। हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित होने के बाद भी उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, बल्कि अरावली के जंगलों में रहकर भी अपनी मातृभूमि मेवाड़ की स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहे। उनका यह संकल्प उनके शब्दों में प्रकट होता है कि वे अपने देश को पुनः स्वतन्त्र करेंगे या उसके लिए अपने प्राण न्योछावर कर देंगे।
राणा प्रताप के चरित्र में गहरा देशप्रेम दिखाई देता है। वे अपने राज्य, उसकी भूमि, जनता और संस्कृति से अत्यन्त प्रेम करते थे। वे अपने सुख-दुःख की चिन्ता किये बिना केवल मेवाड़ की स्वतन्त्रता के लिए जीते थे। उनका स्वाभिमान अत्यन्त ऊँचा था। वे किसी भी परिस्थिति में झुकना नहीं चाहते थे। इसी कारण वे अकबर के सामने सिर झुकाने के बजाय जंगलों में कष्टमय जीवन बिताना अधिक उचित समझते हैं। भामाशाह द्वारा दिया गया धन भी वे पहले इसलिए स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उनके स्वाभिमान के विरुद्ध है, किन्तु जब उसे देशहित का कार्य बताया जाता है, तब वे उसे स्वीकार कर लेते हैं।
उनका हृदय अत्यन्त उदार और विशाल था। वे शत्रु की कन्या ‘दौलत’ को भी अपनी पुत्री की तरह रखते हैं और उसे पूरा स्नेह देते हैं। इससे उनके चरित्र की महानता और मानवता का परिचय मिलता है। अपने भाई शक्तिसिंह के विश्वासघात से वे दुःखी अवश्य होते हैं, परन्तु उसे क्षमा भी कर देते हैं और यह विश्वास रखते हैं कि एक दिन वह अवश्य लौटेगा। इससे उनकी सहृदयता और क्षमाशीलता प्रकट होती है।
महाराणा प्रताप साहसी, धैर्यवान और पराक्रमी थे। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोया। वे कन्द-मूल खाकर, भूमि पर सोकर भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। युद्धभूमि में उनका पराक्रम अद्भुत था और वे शत्रुओं का सामना निर्भीकता से करते थे। उनके व्यक्तित्व में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, जिससे वे अपने साथियों को प्रेरित करते थे।
वे दृढ़-प्रतिज्ञ थे और अपने संकल्प को पूरा करने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते थे। उन्होंने यह प्रण लिया था कि जब तक मेवाड़ स्वतन्त्र नहीं हो जाएगा, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्ष, त्याग और बलिदान का प्रतीक है।
अतः कहा जा सकता है कि महाराणा प्रताप का चरित्र अत्यन्त महान, प्रेरणादायक और आदर्शपूर्ण है। वे स्वतन्त्रता-प्रेमी, देशभक्त, स्वाभिमानी, उदार, साहसी और दृढ़ निश्चयी वीर थे, जिनका जीवन हमें देश के लिए जीने और आवश्यक होने पर मर-मिटने की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 10
‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर भामाशाह का चरित्र-चित्रण कीजिए। |
या
भामाशाह का चरित्र आज के अर्थप्रधान युग में प्रासंगिक और अनुकरणीय होने के कारण अपना एक विशिष्ट महत्त्व रखता है। ‘मेवाड़-मुकुट के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट के आधार पर भामाशाह की देशभक्ति तथा त्याग-भावना पर प्रकाश डालिए।
या
भामाशाह के चरित्र की तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और बताइए कि उनसे आपको क्या प्रेरणा मिलती है ?
या
‘मेवाड़-मुकुट के आधार पर भामाशाह के चारित्रिक गुणों (विशेषताओं) पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भामाशाह ‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र हैं। वे महाराणा प्रताप के कठिन समय में उनके सहायता करने वाले समर्थ और त्यागशील व्यक्ति हैं। जब राणा प्रताप साधनहीन और कठिन परिस्थितियों में अरावली में भटक रहे थे, उसी समय भामाशाह उनकी सहायता के लिए आते हैं। उनका चरित्र देशभक्ति, त्याग और निष्ठा का आदर्श प्रस्तुत करता है। कवि ने उनके सम्मान में भामाशाह सर्ग की रचना की है।
- देशभक्त – भामाशाह को अपनी मातृभूमि मेवाड़ से गहरा प्रेम था। देश की सेवा में वे अपनी सम्पत्ति और साधन राणा प्रताप को समर्पित कर देते हैं। वे कहते हैं—
“यदि स्वदेश के मुक्ति यज्ञ में, यह आहुति दे पाऊँ।
पितरों सहित देव निश्चय ही, मैं कृतार्थ हो जाऊँ।”
इससे स्पष्ट है कि उनका प्रेम केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की भावना से प्रेरित है। - महान त्यागी – भामाशाह अपने पिता-पितामहों द्वारा संचित सम्पत्ति को राणा प्रताप के चरणों में अर्पित करते हैं। यह त्याग न केवल धन का है, बल्कि देश और धर्म के लिए समर्पण का भी आदर्श है। उनके त्याग से राणा प्रताप को साहस और प्रेरणा मिलती है।
- राजवंश में निष्ठावान – भामाशाह अपने सम्पत्ति और शक्ति को स्वयं का नहीं, बल्कि राजवंश का मानते हैं। वे कहते हैं कि यह सम्पदा हमारे पूर्वजों की है और इसे राजवंश की रक्षा में उपयोग करना हमारा धर्म है।
- तर्कशील और बुद्धिमान – राणा प्रताप धन लेने से अस्वीकार करें, तब भामाशाह तर्कपूर्वक समझाते हैं—
“देशहित में त्याग और बलिदान का अधिकार केवल राजवंश को ही नहीं है, वरन् यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे।”
यह उनकी बुद्धिमत्ता और देशहित के प्रति सोच को दर्शाता है। - विनम्र और शिष्ट – वे अत्यन्त विनम्र होकर अपनी सम्पदा राणा के चरणों में अर्पित करते हैं और स्वयं को उनका सेवक मानते हैं। वे कहते हैं—
“वह अधिकार देव सबका है, यह कर्त्तव्य सभी का।
सबको आज चुकाना है, ऋण मेवाड़ी माटी का।” - उत्साही और प्रेरक – भामाशाह राणा प्रताप का उत्साह बढ़ाते हैं और उन्हें मेवाड़ की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं। उनके शब्द राणा प्रताप के मन में आशा और संकल्प जगाते हैं—
“अविजित हैं, विजयी भी होंगे, देव शीघ्र निःसंशय।
मातृभूमि होगी स्वतन्त्र फिर, हम होंगे फिर निर्भय।”
भामाशाह का चरित्र देशभक्ति, त्याग, निष्ठा, तर्कशीलता, विनय और उत्साह का अनुपम उदाहरण है। उनका योगदान राणा प्रताप के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण था। भामाशाह जैसा त्याग और देशभक्ति का आदर्श आज भी प्रेरणादायक है।
प्रश्न 11
“मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर पृथ्वीराज का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
पृथ्वीराज अकबर के दरबारी कवि और मित्र हैं। प्रारम्भ में वे राणा प्रताप के विरुद्ध राजा मानसिंह के पक्ष में खड़े रहते हैं। लेकिन जब अकबर उनके कुल और स्वाभिमान को खतरे में डालता है, तब पृथ्वीराज का रक्त खौलता है और वे राणा प्रताप से मिलने आते हैं। वे राणा प्रताप से प्रार्थना करते हैं कि वे राजपूतों की लाज और स्वाभिमान बचाएँ।
पृथ्वीराज के चरित्र की विशेषताएँ
महाराणा प्रताप के प्रति श्रद्धा – पृथ्वीराज राणा प्रताप के बहुत सम्मान और श्रद्धा के भाव रखते हैं। जब वे महाराणा प्रताप से मिलते हैं, तो दोनों हाथ उठाकर उनकी जय-जयकार करते हैं और कहते हैं कि वे सिसौदिया कुल का भूषण हैं। उनका यह व्यवहार राणा प्रताप के यश और गुणों की प्रशंसा करता है।
पश्चात्ताप की भावना – पृथ्वीराज अपने पूर्व कृत्यों पर पछतावा करते हैं। जब राणा प्रताप उनसे क्रोधित होकर कुछ कहते हैं, तब भी वे शांति से सुनते हैं और सच्चे हृदय से अपनी गलतियों के लिए पश्चात्ताप करते हैं। वे स्वयं को ‘अकबर का चारण’ कहकर संबोधित करते हैं—
“यह अकबर का चारण अपने, जीवन की निधि खोकर।
आया, चरण शरण राणा की, आज पाप निज धोकर।”
प्रतिशोध की भावना – पृथ्वीराज का हृदय अकबर के प्रति प्रतिशोध की भावना से भरा है। जब राणा प्रताप उनसे पूछते हैं कि क्या वे अकबर से प्रतिशोध लेंगे, तो वे कहते हैं—
“बोले हाँ प्रतिशोध मात्र, प्रतिशोध लक्ष्य अब मेरा।
उसके हित ही लगा रहा हूँ, अरावली का फेरा।”
यह दर्शाता है कि वे अन्याय के खिलाफ न केवल भावुक हैं, बल्कि उसे सुधारने के लिए सक्रिय हैं।
सच्चा सहयोगी – पृथ्वीराज केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में भी सहयोगी हैं। वे राणा प्रताप के साथ भामाशाह को लाते हैं, जो उनकी सहायता हेतु लाखों स्वर्ण मुद्राएँ समर्पित करता है।
पृथ्वीराज का चरित्र श्रद्धा, पश्चात्ताप, प्रतिशोध और सच्चे सहयोग की भावना से भरा है। वे एक सच्चे देशभक्त और निष्ठावान मित्र के रूप में उभरते हैं। उनके व्यक्तित्व में राजपूतों की परंपरा, स्वाभिमान और देशभक्ति की झलक मिलती है।
प्रश्न 12
“मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘मेवाड़-मुकुट खण्डकाव्य के आधार पर किसी नारी पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर
रानी लक्ष्मी, महाराणा प्रताप की अद्धगिनी और सच्ची पत्नी हैं। खण्डकाव्य में उन्हें न केवल वीरांगना, बल्कि आदर्श पत्नी और स्नेही माँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:
- मानसिक संघर्ष और सहनशीलता –
लक्ष्मी इतने कठिन जीवन और वनवास के बावजूद मानसिक रूप से मजबूत हैं। उन्हें अपने और अपने परिवार के दु:ख का अनुभव होता है, लेकिन वे धैर्यपूर्वक इसे सहन करती हैं। वे सोचती हैं कि जीवन में अच्छे और धार्मिक व्यक्ति भी दुःख भोगते हैं, जबकि अन्य लोग सफलता प्राप्त करते हैं। यह मानसिक संघर्ष उन्हें और अधिक दृढ़ बनाता है। - महाराणा प्रताप के प्रति श्रद्धा और निष्ठा –
लक्ष्मी के हृदय में महाराणा प्रताप के प्रति गहरा प्रेम और श्रद्धा है। उनका मानना है कि उनका पति केवल यही किया कि उन्होंने अपने धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि के लिए कभी शीश नहीं झुकाया। उनके अनुसार इसी कारण उन्हें इतने कष्ट भोगने पड़ रहे हैं। लक्ष्मी इस बात को महान् और पुण्यकारी मानती हैं। वे कहती हैं कि “हमारा पति इतना महान है कि उनके जीवन के दुख भी गौरवपूर्ण हैं।” - परदुःख-कातरता –
लक्ष्मी स्वयं कठिनाइयों को सह सकती हैं, परन्तु दूसरों के दुःख उन्हें बहुत पीड़ित करते हैं। वे अपने पुत्र अमर और शत्रु की बेटी दौलत के कष्टों को देखकर बहुत चिंतित होती हैं। उनके लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि उनके प्रियजन भूखे और असहाय हैं। - उदारहृदया और स्नेहपूर्ण व्यवहार –
लक्ष्मी का हृदय विशाल और उदार है। वे दौलत को उतना ही स्नेह देती हैं जितना अपने पुत्र अमर को। दौलत यद्यपि शत्रु की पुत्री है, फिर भी लक्ष्मी उसे अपनी पुत्रीवत् पालती हैं। इस उदार हृदयता के कारण दौलत उन्हें अपनी माँ मानकर पूर्ण सम्मान देती है। - स्वतन्त्रता-प्रेम और वीरता –
लक्ष्मी अपनी स्वतंत्रता और देशभक्ति की भावना में दृढ़ हैं। वे कहती हैं कि चाहे कितने भी दुःख हों, वे अत्याचारियों के सामने कभी सिर नहीं झुकाएँगी। उनका मन स्वतंत्रता और न्याय के लिए सदैव सजग रहता है। वे अपने पति के साथ हर कठिनाई में खड़ी रहती हैं और युद्ध तथा संकट में भी धैर्य नहीं छोड़तीं। - दृढ़ता और साहस –
महाराणा प्रताप के कठिन निर्णय, जैसे कि मेवाड़ छोड़कर अरावली में संघर्ष करना, लक्ष्मी को और उत्साहित करते हैं। वे क्षत्राणी की भांति अपने परिवार और देश की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहती हैं। उनका साहस और धैर्य खण्डकाव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
रानी लक्ष्मी का चरित्र उदारहृदया, साहसी, सहनशील, देशभक्त और मातृवत्सल है। वे न केवल अपने परिवार के प्रति समर्पित हैं, बल्कि राष्ट्र और स्वतंत्रता के लिए भी सजग रहती हैं। कठिन परिस्थितियों में भी वे कभी नतमस्तक नहीं होतीं। खण्डकाव्य में उनका यह चरित्र हर पाठक और छात्र को देशभक्ति, धैर्य और वीरता की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 13
“मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य के आधार पर दौलत का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
दौलत अकबर के मामा की पुत्री है। वह राज-प्रासादों के वैभव और ऐश्वर्य को छोड़कर वन में महाराणा प्रताप के साथ रहने आती है। महाराणा प्रताप भी उसे अपनी पुत्री के समान स्नेह करते हैं। दौलत का चरित्र खण्डकाव्य में आदर्श स्त्री और सजीव पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- दरबारी जीवन से घृणा –
दौलत को अकबर के दरबारी जीवन में विलासिता और भव्यता के बावजूद छल-कपट और दम्भ दिखाई देता है। वहां लोगों में स्नेह और सहृदयता का अभाव है। यही कारण है कि वह इस जीवन को त्यागकर राणा प्रताप के वनवास में शांति और संतोष पाती है। - वन-जीवन के प्रति अनुराग –
दौलत राजकुमारी होते हुए भी प्रकृति और वन-जीवन से प्रेम करती है। वह वन के सौन्दर्य और शांति में सुख पाती है। उसे यहां का जीवन सरल, शांत और आनंदमय लगता है। - महाराणा प्रताप के प्रति श्रद्धा –
दौलत के हृदय में महाराणा प्रताप के प्रति अत्यधिक श्रद्धा और आदर है। वह देखती है कि राणा प्रताप उसके पिता के शत्रु होते हुए भी न्यायपूर्ण और उदार हृदय के हैं। वे पहले दौलत को भोजन कराते हैं और फिर स्वयं खाते हैं। इसमें अमर और दौलत में कोई भेद नहीं करते। - अकबर से घृणा –
दौलत को अकबर के प्रति भी घृणा है। उसका यह विश्वास है कि राणा प्रताप का अपराध केवल यह है कि उन्होंने अकबर की दासता स्वीकार नहीं की, फिर भी अकबर उन्हें कष्ट देता है। - रानी लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा –
दौलत रानी लक्ष्मी के लिए भी अत्यधिक श्रद्धाभाव रखती है। वह लक्ष्मी की वीरता, धैर्य और आदर्श पत्नी होने की प्रशंसा करती है। - त्याग और सेवा-भावना –
दौलत चाहती है कि वह महाराणा प्रताप की सेवा कर सके और उनके कार्य में सहयोगी बन सके। उसका जीवन केवल सेवा और समर्पण में सार्थक हो जाता है। - शक्तिसिंह के लिए प्रेम –
दौलत का शक्तिसिंह के प्रति प्रेम भी उसकी वन में आने की एक मुख्य वजह है। वह उसके गुणों से नहीं, बल्कि रूप और आकर्षण से प्रभावित है। यद्यपि वह जानती है कि शक्तिसिंह कभी वीर या पराक्रमी नहीं है, फिर भी उसका मन उसे वहां खींच ले जाता है।
दौलत एक नवयुवती है, जिसमें प्रेम, श्रद्धा, त्याग और सेवा की भावना विद्यमान है। अकबर का दरबार छोड़कर वन में आने के बाद भी वह शांति और संतोष पाती है। वह महाराणा प्रताप और रानी लक्ष्मी की सेवा में अपना जीवन सफल मानती है। उसकी कथा यह दर्शाती है कि सेवा, श्रद्धा और त्याग से व्यक्ति का जीवन आदर्श और मूल्यवान बन सकता है।
