मीरा बाई का जीवन परिचय (Meera Bai Ka Jivan Parichay)

मीरा बाई हिन्दी साहित्य की महान भक्ति-कालीन कवयित्री थीं। वे कृष्ण-भक्ति की अनन्य साधिका मानी जाती हैं। उनके पदों में भक्ति, प्रेम, वैराग्य और आत्मसमर्पण की भावना अत्यंत मार्मिक रूप में प्रकट होती है। मीरा का जीवन और काव्य दोनों ही भक्ति और त्याग के प्रतीक हैं।

जन्म

मीराबाई का जन्म 1498 ई. में राजस्थान के मेड़ता (नागौर) में हुआ। उनके पिता रतन सिंह राठौड़ थे, जो राव दूदा सिंह के पुत्र थे। मीरा बचपन से ही भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहती थीं। कहा जाता है कि बाल्यावस्था में ही उन्होंने एक विवाह समारोह देखकर अपनी माता से पूछा – “मेरा दूल्हा कौन है?” तब उनकी माता ने मज़ाक में श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर संकेत कर दिया। उसी दिन से मीरा ने कृष्ण को अपना पति मान लिया।

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विवाह एवं वैराग्य

मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में हुआ। उनके पति थे भोजराज, जो राणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के बाद वे चित्तौड़गढ़ आ गईं।

1518 ई. में युद्ध में घायल होने के कारण उनके पति की 1521 ई. में मृत्यु हो गई। उसी समय राजनीतिक परिस्थितियाँ भी अत्यंत अशांत थीं। बाबर द्वारा भारत पर आक्रमण और 1527 का प्रसिद्ध खानवा का युद्ध इसी काल में हुआ, जिसमें राणा सांगा पराजित हुए।

पति की मृत्यु के बाद मीरा को सती होने के लिए प्रेरित किया गया, परंतु उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया। वे कृष्ण को अपना वास्तविक पति मानती थीं, इसलिए उन्होंने वैधव्य-रीति भी स्वीकार नहीं की।

भक्ति एवं साधना

मीरा बाई ने जीवन भर श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व माना। उनके भजनों में आत्मा और परमात्मा के मिलन की तीव्र आकांक्षा दिखाई देती है। वे स्थान-स्थान पर भ्रमण कर संतों के साथ सत्संग करती रहीं।

साहित्यिक योगदान

मीरा बाई ने अनेक पद और भजन रचे, जिनमें उनकी भक्ति-भावना की सच्ची अभिव्यक्ति है। उनके पद आज भी गाए जाते हैं और अत्यंत लोकप्रिय हैं।

प्रमुख रचनाएँ

मीरा बाई की रचनाएँ मुख्यतः—

  • मीरा के पद
  • भजन और पदावली

के रूप में जानी जाती हैं।

भाषा

मीरा बाई की भाषा ब्रजभाषा, राजस्थानी और गुजराती के मिश्रण से बनी है। उनकी भाषा सरल, सहज और भावपूर्ण है।

शैली

उनकी शैली—

  • गीतात्मक
  • भावप्रधान
  • भक्तिरसात्मक

है। उनके पद सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं।

रस

मीरा बाई के काव्य में—

  • भक्ति रस (प्रधान)
  • श्रृंगार रस (आध्यात्मिक रूप में)

का प्रयोग हुआ है।

निधन

मीरा बाई का निधन लगभग 1547 ई. में द्वारका में माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि वे श्रीकृष्ण में लीन हो गईं।

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