बिहारीलाल, जिन्हें सामान्यतः बिहारी कहा जाता है, हिन्दी साहित्य के रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। वे मुक्तक काव्य के अद्वितीय कवि थे। उनकी रचनाओं में श्रृंगार, नीति, भक्ति और जीवन-दर्शन का अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली रूप देखने को मिलता है।
जन्म एवं परिचय
कवि बिहारीलाल का जन्म 1595 ई. के लगभग ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में माना जाता है। उनका जीवनकाल मुगल काल के समय से जुड़ा हुआ है। वे आमेर के राजा जयसिंह के दरबार में राजकवि के रूप में रहे।
साहित्यिक जीवन
बिहारीलाल का साहित्यिक जीवन मुख्य रूप से राजाश्रय में बीता। उन्होंने अल्प शब्दों में गहन भाव प्रकट करने की अद्भुत कला विकसित की। उनकी कविता में जीवन के सूक्ष्म अनुभव, प्रेम की गहराई और नीति की स्पष्टता दिखाई देती है।
प्रमुख कृति
बिहारीलाल की एकमात्र लेकिन अत्यंत प्रसिद्ध रचना है—
बिहारी सतसई
- इसमें लगभग 700 दोहे संकलित हैं
- विषय—
- श्रृंगार
- नीति
- भक्ति
- समाज और जीवन
यह ग्रंथ हिन्दी साहित्य का अमूल्य रत्न माना जाता है।
भाषा
बिहारी की भाषा ब्रजभाषा है। उनकी भाषा की विशेषताएँ—
- संक्षिप्तता
- मधुरता
- भाव-गहनता
कम शब्दों में अधिक अर्थ कहना उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।
शैली
- मुक्तक शैली
- सूत्रात्मक शैली
- अलंकारिक शैली
उनकी शैली में उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
रस
बिहारी की कविता में मुख्य रूप से—
- श्रृंगार रस (प्रधान)
- नीति रस
- शांत रस
मिलता है।
साहित्य में स्थान
बिहारीलाल को हिन्दी साहित्य में मुक्तक काव्य का सम्राट कहा जाता है। उन्होंने दोहे को उच्च साहित्यिक स्तर प्रदान किया।
निधन
कवि बिहारीलाल का निधन 1663 ई. के लगभग माना जाता है।
