कर्ण खण्डकाव्य | Karan Khandkavya

प्रश्न 1
‘कर्ण’ खण्डकाव्य में कितने सर्ग हैं ? उनके नाम बताइए।

उत्तर
कर्ण खण्डकाव्य में सात सर्ग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—

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  1. रंगशाला में कर्ण,
  2. द्यूतसभा में द्रौपदी,
  3. कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान,
  4. श्रीकृष्ण और कर्ण,
  5. माँ-बेटा,
  6. कर्ण-वध,
  7. जलांजलि।

प्रश्न 2
‘कर्ण खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। 
या
‘कर्ण खण्डकाव्य के कथानक पर प्रकाश डालिए।

उत्तर

श्री केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है और प्रत्येक सर्ग में कर्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का क्रमबद्ध तथा विस्तृत वर्णन किया गया है। इस खण्डकाव्य में कर्ण के जन्म से लेकर उसके वध और उसके प्रति श्रद्धांजलि तक की सम्पूर्ण जीवन-गाथा अत्यन्त मार्मिक ढंग से प्रस्तुत की गई है।

प्रथम सर्ग ‘रंगशाला में कर्ण’ में कर्ण के जन्म और प्रारम्भिक जीवन का वर्णन है। कुन्ती को सूर्यदेव के वरदान से एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, किन्तु समाज के भय से उसने उसे नदी में बहा दिया। अधिरथ और राधा ने उसका पालन-पोषण किया, जिससे वह सूत-पुत्र कहलाया। जब कर्ण रंगशाला में अपनी वीरता दिखाने पहुँचा, तब उसकी जाति के कारण उसका अपमान किया गया। दुर्योधन ने उसे सम्मान देकर अपना मित्र बनाया और अंगदेश का राजा बना दिया। द्रौपदी के स्वयंवर में भी कर्ण को अपमानित होना पड़ा, जिससे उसके मन में पीड़ा और आक्रोश उत्पन्न हुआ।

द्वितीय सर्ग ‘द्यूतसभा में द्रौपदी’ में द्यूत-क्रीड़ा और द्रौपदी के चीर-हरण का प्रसंग है। युधिष्ठिर जुए में सब कुछ हार जाते हैं और द्रौपदी को भी दाँव पर लगा देते हैं। उस समय कर्ण द्रौपदी के प्रति कठोर और अपमानजनक शब्द कहता है तथा दु:शासन को उसे अपमानित करने के लिए उकसाता है। बाद में कर्ण को अपने इस व्यवहार पर गहरा पछतावा होता है, जो उसके चरित्र की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।

तृतीय सर्ग ‘कवच-कुण्डल दान’ में कर्ण की अद्वितीय दानवीरता का वर्णन है। कर्ण यह प्रतिज्ञा करता है कि वह किसी भी याचक को निराश नहीं करेगा। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उससे उसके जन्मजात कवच और कुण्डल माँगते हैं। कर्ण यह जानते हुए भी कि इससे उसकी मृत्यु निश्चित हो सकती है, उन्हें अपने शरीर से काटकर दान कर देता है। यह उसकी महान त्याग-भावना और उदारता का प्रतीक है।

चतुर्थ सर्ग ‘श्रीकृष्ण और कर्ण’ में श्रीकृष्ण कौरव-पाण्डव युद्ध को रोकने का प्रयास करते हैं। जब यह प्रयास असफल हो जाता है, तब वे कर्ण को उसके जन्म का सत्य बताते हैं और उसे पाण्डवों के पक्ष में आने के लिए कहते हैं। कर्ण भावुक हो जाता है, किन्तु वह दुर्योधन के प्रति अपनी मित्रता और कृतज्ञता को निभाते हुए यह प्रस्ताव ठुकरा देता है। वह अपने जीवनभर के अपमान और उपेक्षा को याद करता है और उसी के आधार पर अपना निर्णय करता है।

पञ्चम सर्ग ‘माँ-बेटा’ में कुन्ती और कर्ण का अत्यन्त मार्मिक मिलन होता है। कुन्ती उसे अपना पुत्र होने का रहस्य बताती है और पाण्डवों का साथ देने का आग्रह करती है। कर्ण अपनी माता से अपनी पीड़ा व्यक्त करता है और दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि मानता है। वह कुन्ती को वचन देता है कि वह अर्जुन के अतिरिक्त किसी अन्य पाण्डव को नहीं मारेगा, जिससे उसकी उदारता और संवेदनशीलता का परिचय मिलता है।

षष्ठ सर्ग ‘कर्ण-वध’ में महाभारत युद्ध का विस्तार से वर्णन है। कर्ण कौरव सेना का सेनापति बनता है और अत्यन्त वीरता से युद्ध करता है। वह अपने पराक्रम से पाण्डवों को कठिन चुनौती देता है और घटोत्कच का वध भी करता है। किन्तु युद्ध के दौरान उसके रथ का पहिया भूमि में धँस जाता है। उसी समय श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन अवसर का लाभ उठाकर कर्ण का वध कर देता है। यह प्रसंग अत्यन्त करुण और भावपूर्ण है।

सप्तम सर्ग ‘जलांजलि’ में कर्ण की मृत्यु के बाद की घटनाओं का वर्णन है। कुन्ती अपने पुत्रों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताती है कि वह उनका बड़ा भाई था। यह सुनकर युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं और कर्ण के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। वे कर्ण को जलांजलि देते हैं और उसके महान गुणों—दानवीरता, साहस, त्याग और दृढ़ता—का स्मरण करते हैं। साथ ही वे अपनी माता को इस सत्य को छिपाने के लिए दोषी भी ठहराते हैं।

इस प्रकार ‘कर्ण’ खण्डकाव्य की कथावस्तु कर्ण के जीवन के संघर्ष, अपमान, त्याग, मित्रता और वीरता की एक अत्यन्त प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी गाथा है, जो पाठकों को गहरी प्रेरणा देती है।

प्रश्न 3
‘कर्ण’ काव्य के प्रथम सर्ग (रंगशाला में कर्ण) की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए।

उत्तर

प्रथम सर्ग का नाम ‘रंगशाला में कर्ण’ है। इस सर्ग में कर्ण के जन्म से लेकर द्रौपदी के स्वयंवर तक की घटनाओं का मार्मिक और प्रभावशाली वर्णन किया गया है। कुन्ती ने अविवाहित अवस्था में सूर्यदेव की उपासना के फलस्वरूप एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, परन्तु लोक-लाज और कुल-मान की रक्षा के लिए उसने उस शिशु को नदी में बहा दिया। उस बालक को सारथी अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने पाल-पोसकर बड़ा किया, इसलिए वह ‘सूत-पुत्र’ और ‘राधेय’ कहलाया। कर्ण बचपन से ही तेजस्वी, वीर और प्रतिभाशाली था, किन्तु उसकी जाति के कारण उसे समाज में सम्मान नहीं मिला। एक दिन वह राजसभा की रंगशाला में पहुँचा, जहाँ उसने अपने शौर्य का परिचय देना चाहा, परन्तु अर्जुन और गुरु कृपाचार्य ने उसे ‘सूत-पुत्र’ कहकर अपमानित किया। यह अपमान उसके हृदय में गहराई तक बैठ गया। उसी समय दुर्योधन ने उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे सम्मान दिया और अंगदेश का राजा बनाकर अपने पक्ष में कर लिया, जिससे कर्ण का आत्मविश्वास बढ़ा और वह दुर्योधन का परम मित्र बन गया। आगे द्रौपदी के स्वयंवर में जब कर्ण लक्ष्यवेध करने उठा, तब द्रौपदी ने भी उसे हीन जाति का कहकर रोक दिया और उसका अपमान किया। इस प्रकार कर्ण को जीवन में बार-बार अपमान सहना पड़ा, किन्तु वह मौन रहकर सब सहता रहा। उसके मन में प्रतिशोध की भावना जाग उठी और उसने मन-ही-मन यह संकल्प किया कि वह एक दिन अपने अपमान का बदला अवश्य लेगा। इस प्रकार इस सर्ग में कर्ण के जीवन की प्रारम्भिक पीड़ा, अपमान और संघर्ष का अत्यन्त करुण एवं प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

प्रश्न 4
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग (द्यूतसभा में द्रौपदी) का सारांश लिखिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपनी भाषा में लिखिए।

उत्तर

द्वितीय सर्ग – ‘द्यूतसभा में द्रौपदी’ में अर्जुन द्वारा द्रौपदी के स्वयंवर में मत्स्य-वेध करने से लेकर द्रौपदी के चीर-हरण तक की अत्यन्त करुण और मार्मिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। द्रौपदी के स्वयंवर में अर्जुन ने ब्राह्मण वेश में लक्ष्य भेदकर द्रौपदी का वरण किया और बाद में द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी बनकर उनके साथ रहने लगी। विदुर की सलाह से युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का आधा राज्य मिला, जहाँ उन्होंने इन्द्रप्रस्थ बसाकर आदर्श शासन स्थापित किया और राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया। इस यज्ञ में दुर्योधन ने पाण्डवों की समृद्धि और वैभव देखकर ईर्ष्या और द्वेष से भर गया। सभाभवन में जल और स्थल के भ्रम के कारण जब वह गिर पड़ा, तब द्रौपदी के व्यंग्य ने उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला और भड़का दी। इसके बाद दुर्योधन ने शकुनि की कुटिल सलाह से द्यूत-क्रीड़ा (जुआ) का आयोजन किया और पाण्डवों को उसमें आमन्त्रित किया। इस द्यूत में युधिष्ठिर धीरे-धीरे अपना सारा धन, राज्य, भाइयों और अन्त में द्रौपदी को भी हार गये। दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन द्रौपदी को बाल पकड़कर भरी सभा में घसीट लाया। द्रौपदी ने सबके सामने न्याय की गुहार लगायी, परन्तु भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और अन्य सभासद मौन रहे। कर्ण, जो पहले से ही अपने अपमान का बदला लेना चाहता था, इस अवसर पर क्रोधित होकर द्रौपदी को ‘दासी’ कहकर अपमानित करता है और दुःशासन को उसके वस्त्रहरण के लिए उकसाता है। विकर्ण ने इस अन्याय का विरोध किया, किन्तु उसकी बात किसी ने नहीं मानी। इस प्रकार इस सर्ग में द्रौपदी के अपमान, कौरवों की क्रूरता और कर्ण के प्रतिशोध-भाव का अत्यन्त हृदयविदारक चित्रण किया गया है

प्रश्न 5
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग (कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान) की कथा का सारांश लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान के प्रसंग को लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता का वर्णन कीजिए।

उत्तर

तृतीय सर्ग ‘कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल दान’ में कर्ण की अद्भुत दानशीलता, वचन-पालन और त्याग-भावना का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इस सर्ग की शुरुआत दुर्योधन के वैष्णव-यज्ञ से होती है, जिसे वह चक्रवर्ती सम्राट बनने के उद्देश्य से करता है। इसी समय कर्ण यह दृढ़ प्रतिज्ञा करता है कि जब तक वह अर्जुन का वध नहीं कर लेगा, तब तक वह किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाएगा, चाहे उसे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें। उसकी इस प्रतिज्ञा से दुर्योधन अत्यन्त प्रसन्न होता है, जबकि युधिष्ठिर चिन्तित हो जाते हैं। कर्ण के पास जन्म से ही दिव्य कवच और कुण्डल थे, जो उसे अजेय बनाते थे। अर्जुन के पिता इन्द्र को अपने पुत्र के प्राणों की चिन्ता हुई, इसलिए वे ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास दान माँगने पहुँचे। यद्यपि सूर्यदेव ने कर्ण को स्वप्न में इन्द्र की इस चाल के प्रति सावधान कर दिया था, फिर भी कर्ण अपनी प्रतिज्ञा से नहीं डिगा और उसने स्पष्ट कहा—

“ब्राह्मण माँगे दान, कर्ण ले निज हाथों को मोड़।
कोई भी याचक बनकर यदि मुझसे मेरे प्राण भी माँगे, तो वह भी मेरे लिए अदेय नहीं।”

इसके बाद कर्ण ने इन्द्र को पहचानते हुए भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपने शरीर से कवच-कुण्डल काटकर सहर्ष दान दे दिए, जो उसकी जीवन-रक्षा का सबसे बड़ा आधार थे। इस प्रकार इस सर्ग में कर्ण की महान दानवीरता, त्याग, वचन-निष्ठा और उदारता का अत्यन्त प्रेरणादायक चित्रण किया गया है, जिससे वह महाभारत का एक महान और आदर्श पात्र सिद्ध होता है।

प्रश्न 6
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के ‘श्रीकृष्ण और कर्ण’ नामक चतुर्थ सर्ग की कथा (कथावस्तु या कथानक) का सारांश लिखिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथा लिखिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के बीच हुए वार्तालाप का उद्धरण देते हुए चतुर्थ सर्ग की कथा का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर

चतुर्थ सर्ग ‘श्रीकृष्ण और कर्ण’ में श्रीकृष्ण द्वारा कौरव और पाण्डवों के बीच सन्धि कराने के प्रयास तथा कर्ण को समझाने की मार्मिक कथा का वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से दूत बनकर कौरव सभा में जाते हैं और दुर्योधन से न्याय की बात करते हैं, परन्तु दुर्योधन अहंकारवश युद्ध के अलावा किसी भी समाधान को स्वीकार नहीं करता। तब श्रीकृष्ण निराश होकर कर्ण को अपने रथ में साथ ले जाते हैं और उसे समझाते हैं कि वह वास्तव में कुन्ती का पुत्र है और पाण्डवों का बड़ा भाई है, इसलिए उसे धर्म का साथ देते हुए पाण्डवों की ओर से युद्ध करना चाहिए। वे उसे सम्राट बनने का भी प्रस्ताव देते हैं। यह सुनकर कर्ण अत्यन्त भावुक हो उठता है और अपने जीवन की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहता है—

“यों न उपेक्षित होता मैं, यों भाग्य न मेरा सोता।
स्नेहमयी जननी ने यदि रंचक भी चाहा होता॥”

कर्ण आगे कहता है कि उसे जीवनभर अपमान और तिरस्कार ही मिला है, इसलिए अब वह अधिरथ और राधा को ही अपना माता-पिता मानता है और उन्हें छोड़कर वह कुन्ती को स्वीकार नहीं कर सकता। वह दुर्योधन के उपकारों को भी नहीं भूल सकता, जिसने उसे सम्मान और मित्रता दी, इसलिए वह उसके प्रति कृतघ्न नहीं बन सकता। कर्ण यह भी स्वीकार करता है कि उसे द्रौपदी के अपमान का गहरा पश्चाताप है और वह अपने इस पाप का प्रायश्चित्त युद्ध में प्राण देकर करना चाहता है। साथ ही वह श्रीकृष्ण से विनती करता है कि उसके जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बताएं, क्योंकि वे सत्य जानकर राज्य त्याग देंगे। इस प्रकार कर्ण अपने कर्तव्य, मित्रता और आत्मसम्मान को सर्वोपरि मानते हुए श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है।

प्रश्न 7
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के माँ-बेटा’ नामक पञ्चम सर्ग की कथा का सारांश अथवा कथानक लिखिए।
या
‘कर्ण खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण तथा कुन्ती के वार्तालाप का वर्णन कीजिए।

उत्तर

पञ्चम सर्ग में कुन्ती द्वारा कर्ण के पास जाने का वर्णन है। महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में पाँच दिन शेष हैं। इसलिए पाण्डवों के भविष्य की चिन्ता से व्याकुल कुन्ती कर्ण के पास उसके आश्रम में पहुँचती है। कर्ण पहले ही उसे पहचान लेता है और ‘सूत-पुत्र राधेय’ कहकर प्रणाम करता है। यह सुनकर कुन्ती का हृदय करुणा से भर उठता है और वह आँसुओं के साथ कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताती है कि वह उसका पुत्र है और पाण्डवों का बड़ा भाई है। वह कर्ण से आग्रह करती है कि वह अपने भाइयों का साथ देकर दुर्योधन का साथ छोड़ दे। यह सुनकर कर्ण के हृदय में वर्षों से दबा हुआ दर्द उमड़ पड़ता है और वह अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहता है—

“क्यों तुमने उस दिन न कही, सबके सम्मुख ललकार।
कर्ण नहीं है सूत-पुत्र, वह भी है राजकुमार॥”

कर्ण अपनी माँ से पूछता है कि जब उसे जीवनभर अपमान और तिरस्कार सहना पड़ा, तब उसका मातृ-प्रेम कहाँ था। वह स्पष्ट कहता है कि अब अधिरथ और राधा ही उसके माता-पिता हैं और वह अपने मित्र दुर्योधन के उपकारों को भूलकर उसका साथ नहीं छोड़ सकता। कर्ण के वचन सुनकर कुन्ती अत्यन्त दुःखी और निरुत्तर हो जाती है। तब कर्ण अपनी उदारता और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए कहता है कि वह केवल अर्जुन से ही युद्ध करेगा और अन्य किसी पाण्डव को नहीं मारेगा। वह कुन्ती को यह वचन देता है कि चाहे वह जीवित रहे या मारा जाए, कुन्ती सदा पाँच पुत्रों की माता ही बनी रहेगी। इस प्रकार कुन्ती संतुष्ट होकर लौट जाती है, किन्तु यह भेंट कर्ण के मन में गहरे भावों का तूफान उत्पन्न कर देती है।

प्रश्न 8
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के ‘कर्ण-वध’ नामक षष्ठ सर्ग की कथा को संक्षेप में लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य की सबसे प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।
या
“कर्ण अपने प्रण व धुन का पक्का
था
” खण्डकाव्य के आधार पर इसकी पृष्टि कीजिए। 

उत्तर

इस सर्ग में महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से लेकर कर्ण के मृत्यु तक की कथा का वर्णन है। पाँच दिन बाद महाभारत का युद्ध आरम्भ हुआ। भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति बनाये गये। वे इस शर्त पर सेनापति बने कि वे कर्ण का सहयोग नहीं लेंगे; क्योंकि वह कपटी, अत्याचारी, अधिरथी तथा अभिमानी है। कर्ण ने उनका प्रण सुनकर प्रतिज्ञा की कि वह भीष्म पितामह के जीवित रहते शस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे अन्यथा सूर्य-पुत्र नहीं कहलाएँगे। भीष्म प्रतिदिन अकेले दस सहस्र वीरों को मारते थे, किन्तु दसवें दिन बाणों से घायल होकर वे शरशय्या पर गिर पड़े। कर्ण के भीष्म पितामह के पास पहुँचने पर उन्होंने कर्ण को भर आँख निहारने की इच्छा प्रकट की, उसे जल के भंवर में नाव खेने वाला कहा तथा उसे दानवीर, धर्मवीर और महावीर बतलाया

घूण्र्य काल-जल में बस तू ही नौका खेने वाला।
दानवीर तू, धर्मवीर तू, तू सम्बल आरत का।
जो न कभी बुझ सकता, वह दीप महाभारत का।

भीष्म पितामह ने कहा कि मैंने तेरा सूत-पुत्र कह कर तिरस्कार किया, केवल इसलिए कि तुम किसी भी तरह इस युद्ध से विरत हो जाओ और दुर्योधन अपने इस युद्धरूपी काण्ड में सफल न हो सके। उन्होंने पुनः कहा कि तुम यह सन्देह छोड़ दो कि तुम सूत-पुत्र हो। तुम भी अर्जुन आदि की तरह कुन्ती के ही पुत्र हो। हमारी इच्छा यही है कि तुम पाण्डवों से मिल जाओ। कर्ण ने अपने को प्रतिज्ञाबद्ध बताते हुए ऐसा करने से मना कर दिया। उसने पितामह से कहा कि विधि के लिखे हुए को कौन बदल सकता है? मुझसे भी मेरा। मन यही कहता है कि मैं अपनी मृत्यु की कहानी स्वयं लिख रहा हूँ। किन्तु यह भी सत्य है पितामह कि मैं अपना साहस नहीं छोडूंगा। भले ही उस ओर कृष्ण हों, किन्तु अर्जुन को मारने हेतु मैं हर प्रयास करूंगा। यह सुनकर पितामह ने कर्ण की जय-जयकार की और उसके मार्ग के समस्त अमंगलों को दूर होने की कामना की। उसे अपने शस्त्रास्त्र उठाकर दुर्योधन का स्वप्न पूर्ण करने के लिए कहा।

भीष्म के बाद द्रोणाचार्य को सेनापति नियुक्त किया गया। पन्द्रहवें दिन वे भी वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध के सोलहवें दिन कर्ण कौरव दल के सेनापति बने। उनकी भयंकर बाण-वर्षा से पाण्डव विचलित होने लगे, तभी भीम का पुत्र घटोत्कच भयंकर मायापूर्ण आकाश युद्ध करता हुआ कौरव सेना फ्र टूट पड़ा। घटोत्कच के भीषण प्रहार से कौरव सेना में त्राहि-त्राहि मच गयी। उन्होंने रक्षा के लिए कर्ण को पुकारा। कर्ण ने अमोघ-शक्ति का प्रहार कर घटोत्कच को मार डाला। इस अमोघ-शक्ति का प्रयोग वह केवल अर्जुन पर करना चाहता था, किन्तु परिस्थितिवश उसे उसका प्रयोग घटोत्कच पर करना पड़ गया। वह सोचने लगा, यह सब कुछ कृष्ण को माया है, अब अर्जुन की विजय निश्चित है। थोड़ा-सा दिन शेष था। अचानक कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया। सारथी प्रयास करने पर भी रथ का पहिया न निकाल सका, तब कर्ण रथ से उतरकर स्वयं पहिया निकालने लगा। तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रहार करने के लिए आदेश दिया; क्योंकि युद्ध में धर्म-अधर्म का विचार किये बिना शत्रु को परास्त करना चाहिए। आदेश पाते ही अर्जुन ने नि:शस्त्र कर्ण का बाण-प्रहार से वध कर दिया। कर्ण की मृत्यु पर श्रीकृष्ण भी अश्रुपूर्ण नेत्रों से रथ से उतर ‘कर्ण! हाय वसुसेन वीर’ कहकर दौड़ पड़े।

प्रश्न 9
‘कर्ण खण्डकाव्य के जलांजलि’ नामक सप्तम सर्ग की कथा का सार लिखिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के सम्बन्ध में युधिष्ठिर और कुन्ती के मध्य हुए वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए। 
या
ऐसा कीर्तिवान भाई पा होता कौन न धन्य ।
किन्तु आज इस पृथ्वी पर, हतभाग्य न मुझ-सा अन्य ।।
उक्त पंक्तियों में व्यक्त वेदना का भाव पठित खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर सप्तम सर्ग का मार्मिक चित्रांकन कीजिए।

उत्तर

सप्तम सर्ग (जलांजलि) में महाभारत युद्ध के बाद की बहुत ही दुखद घटना का वर्णन है। कर्ण के मरते ही कौरव सेना कमजोर पड़ जाती है और युद्ध का अन्त हो जाता है। इसके बाद युधिष्ठिर अपने सभी मृत भाइयों और रिश्तेदारों को जलदान करते हैं। उसी समय माता कुन्ती उनसे कहती हैं कि कर्ण को भी अपने बड़े भाई के रूप में जलांजलि दो। यह सुनकर युधिष्ठिर आश्चर्य में पड़ जाते हैं। तब कुन्ती उन्हें बताती हैं कि कर्ण उनका ही सबसे बड़ा पुत्र था, जिसे उन्होंने समाज के डर से जन्म के समय ही छोड़ दिया था। यह सच जानकर युधिष्ठिर बहुत दुखी हो जाते हैं और उन्हें पछतावा होता है कि उन्होंने अपने ही बड़े भाई के खिलाफ युद्ध किया। वे कर्ण के गुणों—जैसे दानवीरता, बहादुरी और दृढ़ निश्चय—को याद करते हैं और कहते हैं कि ऐसा महान भाई पाकर भी वे उसे पहचान नहीं सके, इसलिए वे अपने आपको बहुत दुर्भाग्यशाली मानते हैं। वे कुन्ती को भी इस बात के लिए दोष देते हैं कि अगर यह सच पहले बता देतीं, तो कर्ण को जीवनभर अपमान नहीं सहना पड़ता। अन्त में युधिष्ठिर कर्ण को पूरे सम्मान के साथ जलांजलि देते हैं और इसी के साथ खण्डकाव्य का अन्त हो जाता है।

प्रश्न 10
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र उदघाटित कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए और बताइए कि उन्हें जीवनभर अपने किस कृत्य के प्रति ग्लानि रही ? 
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की वीरता पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की तीन या चार चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की दानशीलता पर प्रकाश डालते हुए उसके अन्य गुणों पर प्रकाश डालिए।
या
कर्ण सच्चे दानवीर, युद्धवीर तथा प्राणवीर थे।” इस कथन की पुष्टि कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कीजिए। 

उत्तर

श्री केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित  ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक कर्ण महाभारत के एक महान, वीर, दानवीर और करुण पात्र हैं। उनका जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्ष, अपमान और दुःख से भरा रहा, फिर भी उन्होंने अपने गुणों के कारण ऊँचा स्थान प्राप्त किया। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(1) जन्म से परित्यक्त – कर्ण का जन्म कुन्ती से हुआ था, लेकिन समाज के डर और लोक-लाज के कारण उन्हें जन्म के तुरंत बाद ही नदी में बहा दिया गया। बाद में सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने उनका पालन-पोषण किया। इसी कारण वे ‘सूत-पुत्र’ कहलाए। इस घटना के कारण वे जीवनभर माँ के स्नेह से वंचित रहे और उनके मन में गहरी पीड़ा बनी रही।

(2) पग-पग पर अपमानित – कर्ण को जीवन में हर कदम पर अपमान सहना पड़ा। जब वे रंगशाला में अपनी वीरता दिखाना चाहते थे, तब अर्जुन और अन्य लोगों ने उन्हें सूत-पुत्र कहकर तिरस्कृत किया। द्रौपदी के स्वयंवर में भी उन्हें प्रतियोगिता में भाग लेने से रोक दिया गया। इन घटनाओं ने उनके मन में हीन भावना और प्रतिशोध की आग भर दी।

(3) अद्वितीय दानवीर – कर्ण की सबसे बड़ी विशेषता उनकी दानशीलता थी। उन्होंने प्रण किया था कि कोई भी याचक उनके द्वार से खाली हाथ नहीं जाएगा। जब इन्द्र ब्राह्मण का वेश बनाकर उनसे उनके जन्मजात कवच-कुण्डल माँगने आए, तब कर्ण ने बिना किसी संकोच के उन्हें अपने शरीर से काटकर दान कर दिया। यह जानते हुए भी कि इससे उनकी मृत्यु निश्चित हो सकती है, उन्होंने अपने वचन को नहीं तोड़ा।

(4) दृढ़प्रतिज्ञ और आत्मविश्वासी – कर्ण अपने वचनों के बहुत पक्के थे। उन्होंने जो भी प्रण किया, उसे हर हाल में निभाया। उन्होंने अर्जुन को मारने का संकल्प लिया और अन्त तक उस पर अडिग रहे। उन्हें अपने शौर्य और पराक्रम पर पूरा विश्वास था और वे कभी पीछे नहीं हटे।

(5) वीर और पराक्रमी योद्धा – कर्ण एक महान धनुर्धर और अजेय योद्धा थे। युद्ध में उनका साहस और पराक्रम अद्भुत था। उन्होंने महाभारत युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया और अन्त तक वीरता से लड़ते रहे। उनकी युद्ध-कुशलता के कारण शत्रु भी उनसे भयभीत रहते थे।

(6) कृतज्ञ और सच्चा मित्र – कर्ण दुर्योधन के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ थे। जब सबने उनका अपमान किया, तब दुर्योधन ने उन्हें सम्मान दिया और राजा बनाया। इस उपकार को कर्ण कभी नहीं भूले और जीवनभर उसके साथ रहे। उन्होंने श्रीकृष्ण के समझाने पर भी दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा, क्योंकि वे उसे धोखा देना उचित नहीं समझते थे।

(7) स्नेह और ममता के भूखे – कर्ण के जीवन का सबसे दुखद पक्ष यह था कि उन्हें कभी माँ का स्नेह नहीं मिला। वे हमेशा प्रेम और अपनापन पाने के लिए तरसते रहे। जब कुन्ती उनसे मिलने आयी, तब उन्होंने अपने जीवन की पीड़ा व्यक्त की और बताया कि उन्हें जीवनभर केवल तिरस्कार ही मिला।

(8) पश्चात्ताप की भावना – कर्ण के चरित्र में एक कमी भी थी, जिसका उन्हें जीवनभर पछतावा रहा। द्यूतसभा में द्रौपदी के अपमान के समय उन्होंने दुःशासन को उकसाया था। बाद में उन्हें इस कार्य पर बहुत दुःख हुआ और वे इसे अपना सबसे बड़ा पाप मानते रहे।

(9) करुण जीवन – कर्ण का पूरा जीवन करुणा और दुःख से भरा हुआ था। जन्म से ही त्याग, समाज का अपमान, स्नेह की कमी और अन्त में अन्यायपूर्ण मृत्यु—इन सबने उनके जीवन को अत्यन्त मार्मिक बना दिया।

इस प्रकार कर्ण एक महान दानवीर, वीर योद्धा, कृतज्ञ मित्र और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे। उनका जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी अपने गुणों, वचनों और आत्मसम्मान को नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन साथ ही गलत संगति और प्रतिशोध की भावना से भी बचना चाहिए।

प्रश्न 11
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर भीष्म पितामह का चरित्र-चित्रण कीजिए। 

उतर

‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर भीष्म पितामह महाभारत के एक महान, आदर्श और सम्मानित पात्र हैं। वे कौरव और पाण्डव दोनों के लिए पूजनीय थे और सभी उन्हें अत्यन्त श्रद्धा से पितामह कहते थे। उनका चरित्र वीरता, नीति, धर्म और त्याग का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

(1) वीर शिरोमणि – भीष्म पितामह अत्यन्त वीर और पराक्रमी योद्धा थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने प्रतिदिन हजारों सैनिकों का वध करने का संकल्प लिया था। उनके शौर्य और युद्ध-कौशल के सामने बड़े-बड़े योद्धा भी टिक नहीं पाते थे। उनकी वीरता के कारण कौरव और पाण्डव दोनों ही उनका सम्मान करते थे।

(2) परम नीतिज्ञ और कर्तव्यनिष्ठ – भीष्म पितामह बहुत बुद्धिमान और नीतिज्ञ थे। वे जानते थे कि कौरव अन्याय के मार्ग पर हैं, फिर भी अपने कर्तव्य और प्रतिज्ञा के कारण उन्हें कौरवों की ओर से युद्ध करना पड़ा। उन्होंने अपनी बुद्धिमानी से कई बार युद्ध की दिशा को प्रभावित किया। कर्ण को कठोर शब्द कहकर उन्होंने उसे युद्ध से दूर रखने की नीति अपनाई, ताकि विनाश को कुछ कम किया जा सके।

(3) धर्म और न्याय के समर्थक – भीष्म पितामह सच्चे धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे। वे हमेशा सत्य, न्याय और धर्म का समर्थन करते थे। वे मन से पाण्डवों के पक्ष में थे, क्योंकि पाण्डव धर्म के मार्ग पर चल रहे थे। वे अन्याय और अधर्म से घृणा करते थे और चाहते थे कि धर्म की विजय हो।

(4) शौर्य और पराक्रम के प्रेमी – भीष्म पितामह वीरता और पराक्रम का बहुत सम्मान करते थे। शर-शय्या पर पड़े होने के बाद भी उन्होंने कर्ण की वीरता और शौर्य की प्रशंसा की। उन्होंने स्वीकार किया कि कर्ण एक महान योद्धा है और उसके प्रति अपने कठोर शब्दों पर उन्हें पछतावा भी हुआ।

(5) त्याग और आदर्श जीवन – भीष्म पितामह का जीवन त्याग और आदर्श का प्रतीक था। उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और सिंहासन का त्याग किया। उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह कर्तव्य और धर्म के पालन में लगा दिया।

इस प्रकार भीष्म पितामह एक महान वीर, धर्मप्रिय, नीतिज्ञ और त्यागी पुरुष थे। उनका चरित्र हमें सिखाता है कि मनुष्य को हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य, धर्म और आदर्शों का पालन करना चाहिए।

प्रश्न 12
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। 

उत्तर

‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण एक महान, उदात्त और दिव्य चरित्र के रूप में प्रस्तुत होते हैं। वे भगवान के अवतार माने जाते हैं और उनका मुख्य उद्देश्य धर्म की स्थापना तथा अधर्म का नाश करना है। उनके चरित्र में अनेक श्रेष्ठ गुण दिखाई देते हैं, जिन्हें निम्न प्रकार से समझा जा सकता है—

(1) कूटनीतिज्ञ और बुद्धिमान – श्रीकृष्ण अत्यन्त चतुर और कूटनीति में निपुण हैं। वे पाण्डवों के हित के लिए हर प्रकार की नीति अपनाते हैं। कर्ण को समझाते हुए वे दुर्योधन के दोष बताते हैं—

“दुर्योधन का साथ न दो, वह रणोन्मत्त पागल है।
द्वेष, दम्भ से भरा हुआ, अति कुटिल और चंचल है॥”

और उसे अपने पक्ष में लाने के लिए प्रलोभन भी देते हैं—

“चलो तुम्हें सम्राट बनाऊँ, अखिल विश्व का क्षण में।”

इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि वे हर प्रकार की नीति का उपयोग करना जानते हैं।

(2) परिस्थितियों के मर्मज्ञ (त्रिकालदर्शी) – श्रीकृष्ण भविष्य को जानने वाले और परिस्थितियों को समझने वाले हैं। वे जानते हैं कि कर्ण को सामान्य रूप से हराना कठिन है, इसलिए उचित समय पर अर्जुन को संकेत देते हैं—

“बाण चला दो, चूक गये तो लुटी सुकीर्ति सँजोयी।”

इससे उनकी दूरदर्शिता और समय की समझ प्रकट होती है।

(3) पाण्डवों के रक्षक और हितैषी – श्रीकृष्ण पाण्डवों के सच्चे मित्र और रक्षक हैं। वे हर परिस्थिति में उनकी रक्षा करते हैं और उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं। उनका उद्देश्य धर्म का साथ देना है, इसलिए वे सदैव पाण्डवों के पक्ष में रहते हैं।

(4) धर्म के समर्थक – श्रीकृष्ण सदा धर्म और न्याय का समर्थन करते हैं। वे अधर्म का नाश करने के लिए ही पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं और हर परिस्थिति में धर्म की विजय सुनिश्चित करते हैं।

(5) पराक्रम के प्रेमी – श्रीकृष्ण वीर और पराक्रमी व्यक्तियों का सम्मान करते हैं। वे कर्ण की भी प्रशंसा करते हैं—

“धर्मप्रिय, धृति-धर्म धुरी को तुम धारण करते हो।
वीर, धनुर्धर धर्मभाव तुम भू-भर में भरते हो।”

इससे उनकी निष्पक्षता और महानता का परिचय मिलता है।

(6) मायावी और अलौकिक शक्ति वाले – श्रीकृष्ण की माया और अलौकिक शक्तियाँ अद्भुत हैं। वे बिना अस्त्र-शस्त्र उठाए भी युद्ध की दिशा बदल देते हैं। कर्ण भी उनकी माया को स्वीकार करता है—

“घेरे रहती है अर्जुन को छाया सदा तुम्हारी।”

इससे स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण की शक्ति और प्रभाव असाधारण है।

(7) करुणामय और मार्गदर्शक – श्रीकृष्ण दयालु और करुणामय हैं। वे कर्ण को भी समझाने का प्रयास करते हैं कि वह अधर्म का साथ छोड़ दे, लेकिन जब वह नहीं मानता, तब वे धर्म की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लेते हैं।

इस प्रकार श्रीकृष्ण एक महान, बुद्धिमान, कूटनीतिज्ञ, धर्मनिष्ठ और करुणामय व्यक्तित्व के धनी हैं। उनका चरित्र हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन में सदैव धर्म, सत्य और न्याय का पालन करना चाहिए तथा बुद्धि और धैर्य से कार्य करना चाहिए।

प्रश्न 13
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख नारी पात्र ‘कुन्ती’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर

‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती एक प्रमुख नारी पात्र हैं। वे पाण्डवों की माता और महाराज पाण्डु की पत्नी हैं। उनका जीवन संघर्ष, पीड़ा और ममता से भरा हुआ है। उनके चरित्र में एक माँ का स्नेह, दुःख और विवशता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

(1) अभिशप्त (विवश) माता – कुन्ती एक ऐसी माँ हैं, जिन्हें परिस्थितियों ने विवश कर दिया। अविवाहित होने पर सूर्य की कृपा से उन्हें कर्ण की प्राप्ति हुई, परन्तु लोक-लाज और समाज के डर से उन्होंने अपने नवजात पुत्र को नदी में बहा दिया। उस समय उनके हृदय में अपार ममता थी, फिर भी उन्हें यह कठोर निर्णय लेना पड़ा। इस कारण वे जीवनभर इस पीड़ा को सहती रहीं।

(2) दुःखी और पीड़ित माँ – कुन्ती का जीवन दुःखों से भरा है। एक ओर उनके पुत्र पाण्डव कष्ट झेल रहे हैं, दूसरी ओर कर्ण उनके सामने होते हुए भी उनसे दूर है। जब वे कर्ण से मिलने जाती हैं, तो कर्ण उन्हें अपने जीवन की पीड़ा सुनाता है और उन्हें ताना भी देता है। यह सुनकर कुन्ती का हृदय दुःख से भर जाता है और वे अत्यन्त व्यथित होकर लौटती हैं।

(3) चिन्तित माँ – महाभारत का युद्ध होने वाला है और कुन्ती को यह चिंता सताती है कि उनके ही पुत्र आपस में लड़ेंगे। कर्ण अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा कर चुका है, जिससे कुन्ती और भी अधिक चिंतित हो जाती हैं। वे इस भय से व्याकुल रहती हैं कि कहीं उनके पुत्र एक-दूसरे के हाथों मारे न जाएँ।

(4) ममतामयी माँ – कुन्ती के चरित्र में सबसे प्रमुख गुण उनकी ममता है। उन्होंने भले ही कर्ण को जन्म के बाद त्याग दिया, लेकिन उनका मातृ-हृदय हमेशा उसके लिए तड़पता रहा। जब वे कर्ण से मिलती हैं, तो उससे स्नेहपूर्वक कहती हैं—

“माँ कहकर झंकृत कर दो मेरे प्राणों का तार।”

इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि वे कर्ण से केवल एक बार ‘माँ’ कहलाने की इच्छा रखती हैं। युद्ध के बाद भी वे युधिष्ठिर से कर्ण को बड़े भाई के रूप में जलदान करने का आग्रह करती हैं, जिससे उनका स्नेह प्रकट होता है।

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