कर्मवीर भरत (खण्डकाव्य) | Karamveer Bharat Khandkavya

प्रश्न 1
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ के कथानक का सारांश अथवा कथासार लिखिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ की किसी प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

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‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त रोचक, प्रेरणादायक और आदर्शमयी है। इसका कथानक रामायण के एक महत्वपूर्ण प्रसंग पर आधारित है। इसमें भरत को त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और लोकसेवा के आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा कैकेयी के चरित्र को भी मानवीय दृष्टि से समझाने का प्रयास किया गया है।

इस खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं—

(1) आगमन – इस सर्ग में अयोध्या से दूत का भरत के ननिहाल जाना और उन्हें अयोध्या बुलाना वर्णित है। भरत जब अयोध्या पहुँचते हैं, तो वहाँ का वातावरण अत्यन्त शोकपूर्ण पाते हैं। नगर में उदासी, नीरवता और दुख का माहौल देखकर वे चिन्तित हो जाते हैं और उन्हें किसी बड़े दुःख का आभास होता है।

(2) राजभवन – इस सर्ग में भरत की अपनी माता कैकेयी से भेंट होती है। कैकेयी उन्हें बताती है कि उसके वरदानों के कारण राम को वनवास जाना पड़ा और दशरथ का देहांत हो गया। यह सुनकर भरत अत्यन्त दुःखी और क्रोधित हो जाते हैं। वे अपनी माता के इस कार्य को अनुचित बताते हैं और गहरे शोक में डूब जाते हैं।

(3) कौशल्या–सुमित्रा मिलन – इस सर्ग में भरत, कौशल्या और सुमित्रा से मिलते हैं। भरत अपने को इस घटना का दोषी मानकर आत्मग्लानि से भर जाते हैं, परन्तु दोनों माताएँ उन्हें समझाती हैं कि इसमें उनका कोई दोष नहीं है। वे उन्हें धैर्य, संयम और कर्तव्य पालन का उपदेश देती हैं तथा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

(4) आदर्श वरण – इस सर्ग में गुरु वशिष्ठ भरत को जीवन के सत्य, नश्वरता और कर्तव्य का ज्ञान कराते हैं। भरत अपने पिता का विधिपूर्वक अंतिम संस्कार करते हैं। इसके बाद सभा में उनके राज्याभिषेक का प्रस्ताव रखा जाता है, किन्तु भरत इसे स्वीकार नहीं करते। वे यह निश्चय करते हैं कि वे स्वयं राजा नहीं बनेंगे, बल्कि राम को ही अयोध्या का राजा बनाएँगे और उन्हें वापस लाने के लिए वन जाएँगे।

(5) वन-गमन – इस सर्ग में भरत का वन की ओर प्रस्थान वर्णित है। उनके साथ शत्रुघ्न और अन्य लोग भी होते हैं। मार्ग में उनकी भेंट निषादराज से होती है, जो राम के प्रति अपनी भक्ति और सेवा-भावना प्रकट करता है। आगे चलकर भरत भरद्वाज के आश्रम पहुँचते हैं और उनसे चित्रकूट में राम के निवास का पता पाकर वहाँ जाने के लिए आगे बढ़ते हैं।

(6) राम–भरत मिलन – इस सर्ग में भरत की राम से चित्रकूट में भेंट होती है। भरत अत्यन्त विनम्रता से राम से अयोध्या लौटने का अनुरोध करते हैं, परन्तु राम अपने पिता के वचन का पालन करने के लिए वन में ही रहने का निश्चय करते हैं। तब भरत उनकी चरण-पादुका लेकर अयोध्या लौट आते हैं। वे स्वयं राजसिंहासन पर नहीं बैठते, बल्कि नन्दिग्राम में साधारण जीवन व्यतीत करते हुए राम के नाम से राज्य का संचालन करते हैं।

प्रश्न 2
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकोष के प्रथम (आगमन) सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
कर्मवीर भरत के आधार पर संक्षेप में बताइए कि भरत के अयोध्या लौटने पर उन्हें अयोध्या | किस रूप में दिखाई दी ? 

उत्तर

‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग ‘आगमन’ है। इसमें भरत के ननिहाल से अयोध्या आने तक की कथा का मार्मिक वर्णन किया गया है। इस सर्ग की शुरुआत मंगलाचरण से होती है। इसके बाद राम के वन-गमन और दशरथ की मृत्यु के पश्चात् अयोध्या से दूतों द्वारा भरत को ननिहाल से बुलाने की घटना का वर्णन है।

दूतों का ननिहाल पहुँचना और भरत की शंका – अयोध्या के दूत भरत के ननिहाल पहुँचकर उन्हें गुरु वशिष्ठ का संदेश देते हैं कि वे तुरंत अयोध्या आएँ। यह संदेश सुनकर भरत का मन अत्यन्त व्याकुल हो उठता है। वे बार-बार सोचते हैं कि ऐसी कौन-सी बात हो गई है कि उन्हें अचानक बुलाया जा रहा है, जबकि उनके बड़े भाई राम और लक्ष्मण पहले से अयोध्या में हैं।
भरत दूतों से पिता दशरथ, माता कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा तथा भाइयों राम और लक्ष्मण की कुशलक्षेम पूछते हैं। दूत सच्चाई छिपाकर सब कुछ ठीक होने का समाचार देते हैं, जिससे भरत की चिंता और भी बढ़ जाती है।

भरत का अयोध्या के लिए प्रस्थान – भरत अपने मामा से अनुमति लेकर तुरंत अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। वे शीघ्रता से यात्रा करते हुए जंगलों, नदियों और पर्वतों को पार करते हैं। कहा गया है कि वे सात दिन में अयोध्या के निकट पहुँच जाते हैं।
यात्रा के दौरान उन्हें प्रकृति भी उदास और शोकपूर्ण प्रतीत होती है। उन्हें हरियाली में भी सूखापन, प्रकाश में भी अंधकार और वातावरण में अजीब-सी नीरवता दिखाई देती है। यह सब उनके मन में अशुभ संकेत उत्पन्न करता है।

अयोध्या में प्रवेश और नगर की स्थिति – जब भरत अयोध्या में प्रवेश करते हैं, तो वहाँ का दृश्य देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठता है। उन्हें नगर पूरी तरह सूना और उदास दिखाई देता है। गलियाँ खाली हैं, घरों के आँगन साफ नहीं हैं, और कहीं भी उत्सव या हर्ष का वातावरण नहीं है।
लोग चुपचाप उदास खड़े हैं और आपस में भी धीरे-धीरे बात कर रहे हैं। गायें व्याकुल हैं और वातावरण में शोक की गहरी छाया है।

अयोध्या का सूनापन और अशुभ संकेत – भरत अयोध्या को वैभवहीन पाते हैं। न कहीं शंख-ध्वनि सुनाई देती है, न यज्ञ का धुआँ दिखाई देता है। बाजार सूने हैं, मंदिरों के द्वार बंद हैं और सड़कों पर कोई आवागमन नहीं है।
आकाश में गिद्ध मँडरा रहे हैं, जिससे अनिष्ट का संकेत मिलता है। यह सब देखकर भरत का मन अत्यन्त चिंतित हो उठता है। उनके बाएँ अंग फड़कने लगते हैं और उन्हें किसी बड़ी दुर्घटना की आशंका होने लगती है।

राजमहल की स्थिति – राजमहल पहुँचने पर भी भरत को वही शोकपूर्ण वातावरण दिखाई देता है। वहाँ कोई मंगलगीत नहीं गा रहा है, न कोई उत्सव का माहौल है। बन्दीजन और सूत भी मौन हैं।
महल सूना और निस्तब्ध प्रतीत होता है। जब भरत अपने पिता दशरथ का कक्ष खाली देखते हैं, तो वे और अधिक दुखी और चिंतित हो जाते हैं। अब उन्हें यह निश्चित होने लगता है कि कोई बड़ी अनहोनी हो चुकी है।

कैकेयी के कक्ष की ओर प्रस्थान – इन सब बातों से अत्यन्त व्याकुल और चिन्तित होकर भरत अपनी माता कैकेयी के कक्ष की ओर जाते हैं, जहाँ से आगे की घटनाओं का विकास होता है।

प्रश्न 3
‘कर्मवीर भरत’ के द्वितीय सर्ग अथवा राजभवन सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के दूसरे सर्ग में कैकेयी द्वारा राम को वन भेजने के कौन-से कारण प्रस्तुत किये गये हैं ? उन्हें स्पष्ट कीजिए।
या
‘कर्मवीर भरत खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘राजभवन में वर्णित घटनाओं पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर

‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य का द्वितीय सर्ग ‘राजभवन’ है। इस सर्ग में कैकेयी द्वारा राम को वन भेजने के कारणों का वर्णन तथा भरत की आत्मग्लानि और दुःख का मार्मिक चित्रण किया गया है।

भरत और कैकेयी का मिलन – अयोध्या पहुँचकर भरत राजभवन में अपनी माता कैकेयी से मिलते हैं। कैकेयी उन्हें प्रेमपूर्वक गले लगाती है और उनके ननिहाल का हाल पूछती है। भरत भी कुशलक्षेम बताकर अयोध्या की उदासी और शोकपूर्ण स्थिति का कारण पूछते हैं।

दशरथ की मृत्यु का कारण – तब कैकेयी भरत को बताती है कि उसने राजा दशरथ से दो वर माँगे थे—पहला, भरत को अयोध्या का राज्य मिले और दूसरा, राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।
वह कहती है कि राम अयोध्या में रहकर केवल एक राज्य का ही भला कर सकते थे, जबकि वन में जाकर वे दुखी और अभावग्रस्त लोगों की सेवा कर सकते हैं।
लेकिन जब दशरथ ने राम के वन-गमन की बात सुनी, तो वे अत्यन्त दुःखी हो गए और अंततः उन्होंने प्राण त्याग दिए।

राम को वन भेजने के कारण – कैकेयी अपने कार्य को उचित ठहराते हुए कहती है कि उसने यह सब किसी स्वार्थ या लोभ के कारण नहीं किया, बल्कि जनकल्याण के लिए किया है।
वह बताती है कि राम में असाधारण शक्ति, साहस और करुणा है। वे केवल राजसिंहासन के लिए नहीं बने हैं, बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए योग्य हैं।
इसी कारण उसने सोचा कि राम वन में जाकर वहाँ के अशिक्षित, दुखी और वनवासी लोगों का जीवन सुधारेंगे। वह यह भी कहती है कि लोग भले ही उसे दोष दें, पर उसने जो किया, वह जनहित के लिए किया।

भरत का शोक और आत्मग्लानि – यह सब सुनकर भरत अत्यन्त दुखी और स्तब्ध रह जाते हैं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं और वे “हाय पिता! हाय राम!” कहकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।
वे अपने आभूषण उतार फेंकते हैं और अपनी माता के इस कार्य की कड़ी निंदा करते हैं।
भरत कहते हैं कि हमारे वंश में बड़े पुत्र को ही राजा बनाने की परम्परा है, इसलिए राम ही अयोध्या के सच्चे अधिकारी हैं।
वे यह भी कहते हैं कि यदि कैकेयी ने त्याग दिखाना ही था, तो सभी पुत्रों को वन भेज देतीं, तब उसका त्याग महान माना जाता।

राम की महिमा का वर्णन – अंत में कैकेयी भरत को समझाते हुए कहती है कि वे राम की शक्ति को कम न आँकें। राम महान वीर हैं, जिन्होंने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया है।
उन्होंने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की और सीता का वरण कर अपनी शक्ति सिद्ध की है।
इसलिए भरत को शोक छोड़कर कर्तव्य मार्ग पर चलना चाहिए।

आगे की घटना – अपनी माता की बात सुनकर भी भरत का दुःख कम नहीं होता। वे मन ही मन अपनी माता की बुद्धि को दोष देते हैं और अत्यन्त दुःखी होकर अपने भाई शत्रुघ्न के साथ माता कौशल्या से मिलने के लिए चले जाते हैं।

प्रश्न 4
‘कर्मवीर भरत’ के ‘कौशल्या-सुमित्रा-मिलन’ शीर्षक तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ के आधार पर भरत के कौशल्या तथा सुमित्रा से हुए वार्तालाप का वर्णन संक्षेप में कीजिए। 

उत्तर

भरत और कौशल्या का मिलन – भरत और शत्रुघ्न माता कौशल्या के भवन में जाकर उनके चरणों में प्रणाम करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। उस समय माता कौशल्या अत्यन्त दुःखी अवस्था में होती हैं—उनके केश बिखरे हुए हैं, वस्त्र मलिन हैं, शरीर पर आभूषण नहीं हैं और आँखों में आँसू भरे हुए हैं।
वे दोनों पुत्रों को गले लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ती हैं और अपने दुःख को व्यक्त करती हैं।

भरत की आत्मग्लानि – भरत अत्यन्त दुःखी होकर माता कौशल्या से कहते हैं कि वे अपने को इस घटना का दोषी मानते हैं और अपने पापों का प्रायश्चित्त करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि यदि उनके पिता दशरथ जीवित होते, तो उनके अपराधों को क्षमा कर देते।
भरत यह भी कहते हैं कि वे अपनी माता कैकेयी की नीति को समझ नहीं पाए और अब अयोध्या का राज्य उनके लिए बोझ बन गया है। वे स्पष्ट कहते हैं कि यह कभी संभव नहीं है कि राम वन में रहें और वे राज्य-सुख भोगें। यह कहकर वे माता कौशल्या के चरणों में गिर पड़ते हैं।

कौशल्या का उपदेश और स्नेह – माता कौशल्या भरत को गले लगाकर समझाती हैं कि इसमें न तो उनका कोई दोष है और न ही कैकेयी का। वे कहती हैं कि कैकेयी ने भी कठोर हृदय बनाकर ही राम को वन भेजा है और उसका उद्देश्य भी अंततः अच्छा ही था।
कौशल्या भरत को आत्मग्लानि छोड़ने और अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देती हैं। वे कहती हैं कि भरत को राज्य का लोभ नहीं है, यह बात सब जानते हैं।
वे उन्हें साहस, आत्मविश्वास और धैर्य रखने का उपदेश देती हैं और कहती हैं कि जो व्यक्ति अपने मन को शुद्ध रखता है, वह निन्दा या अपयश से नहीं डरता और महान कार्य करता है।

भरत और सुमित्रा का मिलन – इसके बाद भरत माता सुमित्रा से मिलते हैं। सुमित्रा उन्हें देखकर अत्यन्त भावुक हो जाती हैं और उन्हें गले से लगा लेती हैं।
भरत दुःखी होकर सुमित्रा से कहते हैं कि यदि उनकी माता उन्हें वन भेज देतीं और राम को राज्य दे देतीं, तो आज यह स्थिति न होती। वे अपने भाग्य को दोष देते हैं और अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं।

सुमित्रा का धैर्य और उपदेश – माता सुमित्रा भरत को धैर्य बँधाती हैं और समझाती हैं कि राम वन के कष्टों से परिचित हैं और वे एक महान वीर हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने स्वयं अपने पुत्र लक्ष्मण को राम के साथ वन भेजा है और यह सब धर्म और कर्तव्य के लिए हुआ है।
सुमित्रा यह भी कहती हैं कि वे अपने पति के वियोग का दुःख सह चुकी हैं, परन्तु भरत को दुःखी देखकर उनका हृदय टूट जाता है।
वे उर्मिला और माण्डवी के दुःख का भी उल्लेख करती हैं और भरत से कहती हैं कि वे अपने मन का शोक त्यागकर सबका मार्गदर्शन करें और अपने कर्तव्य का पालन करें।

सर्ग का समापन – अंत में सुमित्रा भरत और शत्रुघ्न को प्रेमपूर्वक समझाकर उन्हें गुरु के पास भेज देती हैं ताकि वे आगे के कर्तव्यों का निर्णय कर सकें।

प्रश्न 5
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग ‘आदर्श वरण’ का सारांश लिखिए।
या
“चतुर्थ सर्ग ‘आदर्श वरण’ में सच्चे अर्थों में भरत की कर्मवीरता व्यक्त हुई है। उदाहरण सहित इस कथन की सत्यता की पुष्टि कीजिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ के चतुर्थ सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।

उत्तर

गुरु वशिष्ठ का उपदेश और भरत की स्थिति – भरत और शत्रुघ्न अत्यन्त दुःखी अवस्था में गुरु वशिष्ठ के पास पहुँचते हैं। वे गुरु के चरणों में प्रणाम करते हैं, परन्तु शोक और संकोच के कारण कुछ बोल नहीं पाते।
गुरु वशिष्ठ उन्हें धैर्य बँधाते हैं और समझाते हैं कि अब उनका सबसे बड़ा कर्तव्य अपने पिता दशरथ के अंतिम संस्कार को विधिपूर्वक करना है।
वे जीवन की नश्वरता का उपदेश देते हुए कहते हैं कि इस संसार में जन्म और मृत्यु, सुख और दुःख, हानि और लाभ सभी एक-दूसरे के साथ जुड़े हैं। मनुष्य इस जीवन-रूपी रंगमंच पर केवल एक पात्र है, जबकि ईश्वर ही इसका संचालक है।

दशरथ का अन्तिम संस्कार – जब भरत अपने पिता के निर्जीव शरीर को देखते हैं, तो वे अत्यन्त दुःखी होकर मूर्छित हो जाते हैं। होश आने पर वे अपने कर्तव्य को समझते हुए स्वयं को संभालते हैं।
दशरथ के पार्थिव शरीर को पालकी में रखकर सरयू नदी के तट पर ले जाया जाता है। वहाँ अयोध्यावासी भी शोक में डूबे हुए उनके साथ चलते हैं।
भरत विधिपूर्वक अपने पिता का दाह-संस्कार करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हैं। इस प्रकार वे अपने पुत्र धर्म का पूर्ण पालन करते हैं।

सभा और राज्याभिषेक का प्रस्ताव – अंतिम संस्कार के बाद गुरु वशिष्ठ की उपस्थिति में एक सभा आयोजित की जाती है। इस सभा में मंत्री सुमन्त भरत के राज्याभिषेक का प्रस्ताव रखते हैं।
वे कहते हैं कि यह शास्त्र और लोक दोनों की दृष्टि से उचित है तथा राजा दशरथ की इच्छा भी यही थी कि भरत अयोध्या के राजा बनें।

भरत का त्याग और आदर्श वरण – सुमन्त की बात सुनकर भरत अत्यन्त विनम्रता और दृढ़ता के साथ इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं। वे कहते हैं कि रघुकुल की परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है, इसलिए राम ही अयोध्या के सच्चे राजा हैं।
वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जब राम वन में कष्ट सह रहे हैं, तब वे स्वयं राजसुख भोगना अपने लिए पाप समान मानते हैं।
भरत यह भी कहते हैं कि वे इस कलंक को कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि उनके कारण राम को वन जाना पड़ा। इसलिए वे वन जाकर राम को वापस लाने का निश्चय करते हैं।

राम को वापस लाने का दृढ़ संकल्प – भरत यह संकल्प लेते हैं कि वे स्वयं वन में जाकर राम के चरणों में गिरकर उन्हें अयोध्या लौटने के लिए विनती करेंगे।
उनके इस उच्च विचार, त्याग और आदर्श को देखकर सभी लोग अत्यन्त प्रभावित और भावुक हो जाते हैं।
उनके शब्दों से उपस्थित लोगों को मानो नया जीवन और आशा मिलती है।

वन की ओर प्रस्थान – भरत के इस निर्णय के बाद शत्रुघ्न, माता कैकेयी, कौशल्या तथा अन्य अयोध्यावासी भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
भरत प्रारम्भ में पैदल ही चलते हैं, परन्तु माता कौशल्या के आग्रह पर वे रथ पर बैठ जाते हैं।
सभी लोग दिनभर यात्रा करते हुए तमसा नदी के तट तक पहुँचते हैं और वहाँ विश्राम करते हैं। अगले दिन वे गुरु वशिष्ठ की आज्ञा लेकर आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान करते हैं।

प्रश्न 6
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के ‘वन-गमन’ शीर्षक पंचम सर्ग का सारांश लिखिए।

उत्तर

निषादराज की शंका – जब भरत अपनी सेना और साथियों के साथ श्रृंगवेरपुर में गंगा तट पर पहुँचते हैं, तो वहाँ के राजा निषादराज उन्हें देखकर सन्देह में पड़ जाते हैं। रथ पर इक्ष्वाकु वंश की पताका देखकर उन्हें लगता है कि कहीं भरत राज्य के अभिमान में आकर राम को हानि पहुँचाने तो नहीं आए हैं।
इस शंका के कारण वे अपने साथियों के साथ यह निश्चय करते हैं कि वे किसी को भी गंगा पार नहीं जाने देंगे। परन्तु एक वृद्ध निषाद उन्हें समझाता है कि पहले भरत के आने का वास्तविक उद्देश्य जान लेना चाहिए, क्योंकि उनके साथ गुरु वशिष्ठ और माता कौशल्या भी हैं। यह सुनकर निषादराज को अपनी भूल का एहसास होता है।

भरत का सम्मान – सच्चाई जानने के बाद निषादराज को अपनी शंका पर लज्जा होती है और वे भरत का आदर-सत्कार करने लगते हैं। वे कन्द-मूल-फल आदि मँगवाकर उनका स्वागत करते हैं।
जब वे भरत से मिलते हैं, तो उनके विनम्र स्वभाव, सरलता और राम के प्रति गहरे प्रेम को देखकर अत्यन्त भावुक हो जाते हैं। गुरु वशिष्ठ से उन्हें यह ज्ञात होता है कि भरत राम को वापस अयोध्या लाने के लिए आए हैं। यह जानकर उनका हृदय भरत के प्रति श्रद्धा और सम्मान से भर जाता है।

गंगा पार और आगे की यात्रा – इसके बाद निषादराज अपने साथियों के साथ मिलकर सभी को नावों द्वारा गंगा नदी पार कराते हैं और पूरी सेवा-भावना से उनकी सहायता करते हैं।
गंगा पार करने के बाद भरत भरद्वाज के आश्रम, प्रयाग पहुँचते हैं। वहाँ वे राम के निवास स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
जब उन्हें पता चलता है कि राम चित्रकूट में हैं, तो वे अत्यन्त उत्साहित हो जाते हैं और अपने भाई शत्रुघ्न के साथ वहाँ के लिए प्रस्थान करते हैं। चित्रकूट निकट जानकर वे रथ छोड़कर पैदल ही आगे बढ़ते हैं, जिससे उनके मन में राम के प्रति गहरा प्रेम और श्रद्धा प्रकट होती है।

प्रश्न 7
‘कर्मवीर भरत’ के षष्ठ सर्ग ‘राम-भरत-मिलन’ का सारांश लिखिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग (अन्तिम सर्ग) की कथा लिखिए।

उत्तर

राम-भरत का मिलन – जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुँचते हैं, तो एक भील राम को उनके आने का समाचार देता है। यह सुनकर लक्ष्मण को थोड़ी शंका होती है, परन्तु राम भरत का नाम सुनते ही अत्यन्त प्रसन्न हो जाते हैं।
राम कुटिया से बाहर आकर देखते हैं कि भरत धूल से लथपथ होकर उनके चरणों में झुके हुए हैं। यह देखकर राम उन्हें प्रेमपूर्वक उठाकर गले से लगा लेते हैं।
शत्रुघ्न राम और लक्ष्मण के चरण स्पर्श करते हैं और सभी भाई-बहन मिलकर अत्यन्त भावुक हो जाते हैं। वे सीता के चरणों में भी प्रणाम करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

गुरु और माताओं का आगमन तथा दशरथ का शोक – गुरु वशिष्ठ और माताओं के आगमन पर राम उनका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं।
जब गुरु वशिष्ठ राम को उनके पिता दशरथ की मृत्यु का समाचार देते हैं, तो राम अत्यन्त दुःखी होकर “हाय पिता!” कहकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। बाद में गुरु के समझाने पर वे तर्पण आदि क्रियाएँ पूर्ण करते हैं।

भरत की विनती और राम का उत्तर – चित्रकूट में कुछ दिन सभी लोग प्रेम और स्नेह में व्यतीत करते हैं। बाद में गुरु वशिष्ठ के कहने पर लौटने की बात होती है, तब भरत अवसर पाकर राम से निवेदन करते हैं कि वे अयोध्या लौटकर राज्य संभालें।
माता कैकेयी भी अपने अपराध को स्वीकार करते हुए राम से राज्य ग्रहण करने का आग्रह करती हैं।
किन्तु राम कहते हैं कि वे पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते और चौदह वर्ष तक वन में ही रहेंगे। वे भरत के प्रेम और त्याग की सराहना करते हैं, परन्तु धर्म और मर्यादा को सर्वोपरि मानते हैं।

पादुका ग्रहण और भरत का आदर्श – अन्त में भरत कहते हैं कि वे अयोध्या जाकर स्वयं राजा नहीं बनेंगे, बल्कि नन्दिग्राम में रहकर राम के प्रतिनिधि के रूप में शासन करेंगे। वे राम से उनकी चरण-पादुकाएँ माँगते हैं।
राम उन्हें अपनी पादुकाएँ दे देते हैं। भरत उन्हें लेकर अयोध्या लौटते हैं और नन्दिग्राम में कुटी बनाकर साधारण जीवन बिताते हैं। वे सिंहासन पर राम की पादुकाएँ स्थापित कर उनके नाम से राज्य का संचालन करते हैं, जबकि शत्रुघ्न उनकी सहायता करते हैं।

प्रश्न 8

कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक (प्रधान पात्र) भरत का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य का नायक कौन है ? उसका चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर भरत के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ के आधार पर भरत के चरित्र की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ में भरत को कर्मवीर क्यों कहा गया है ? स्पष्ट कीजिए।
या
“भरत तप, त्याग और शील पर दृढ़ रहने वाला उदात्त चरित्र है।” ‘कर्मवीर भरत खण्डकाव्य के आधार पर इस कथन को प्रमाणित कीजिए। 
या
भरत को कर्मवीर की उपाधि क्यों दी गयी ? स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर

लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ द्वारा रचित ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य का नायक भरत है। इस काव्य में प्रारम्भ से अन्त तक भरत के चरित्र का अत्यन्त प्रभावशाली और आदर्श रूप में चित्रण किया गया है। वे एक महान, त्यागी और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आते हैं।

भरत के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

आज्ञाकारी और विनम्र – भरत अत्यन्त आज्ञाकारी पुत्र हैं। जब उन्हें गुरु वशिष्ठ का संदेश मिलता है, तो वे तुरंत अयोध्या लौटने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे अपने मामा से भी अनुमति लेकर ही प्रस्थान करते हैं।
उनके स्वभाव में विनम्रता और सरलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

राज्य के लोभ से रहित – भरत को राज्य और वैभव का बिल्कुल भी लोभ नहीं है। जब उन्हें पता चलता है कि राम को वनवास मिला है और उनके लिए राज्य माँगा गया है, तो वे अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं।
वे राज्य को स्वीकार करने से साफ मना कर देते हैं और उसे अपने लिए बोझ मानते हैं। उनके लिए राज्य से अधिक महत्वपूर्ण धर्म और न्याय है।

मर्यादा और कर्तव्य के पालनकर्ता – भरत अपने कुल की मर्यादा और कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हैं। रघुकुल की परम्परा के अनुसार बड़े भाई को ही राज्य मिलना चाहिए, इस नियम का वे पूरी निष्ठा से पालन करते हैं।
वे स्वयं सिंहासन पर न बैठकर राम की चरण-पादुकाएँ रखकर उनके प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाते हैं। यह उनके कर्तव्य और मर्यादा के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

भ्रातृ-प्रेम से परिपूर्ण – भरत के हृदय में राम के प्रति अपार प्रेम है। वे राम के बिना अयोध्या के सुखों को स्वीकार नहीं कर सकते।
वे वन जाकर राम को वापस लाने का प्रयास करते हैं और उनके चरणों में गिरकर उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं। उनका यह प्रेम अत्यन्त पवित्र और निस्वार्थ है।

त्यागी और कर्मवीर – भरत सच्चे अर्थों में कर्मवीर हैं। वे अपने स्वार्थ का त्याग करके कर्तव्य और धर्म का पालन करते हैं।
वे राजसुख छोड़कर नन्दिग्राम में साधारण जीवन बिताते हैं और चौदह वर्ष तक तपस्वी की तरह रहते हैं। उनका यह त्याग उन्हें महान बनाता है।

सच्चे योगी और आदर्श पुरुष – भरत राजमहल में रहकर भी योगी के समान जीवन बिताते हैं। वे भोग-विलास से दूर रहकर सादगी और संयम का जीवन जीते हैं।
उनमें पितृभक्ति, गुरु-निष्ठा, विनम्रता, सरलता और स्पष्टवादिता जैसे अनेक गुण विद्यमान हैं। वे एक आदर्श और अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं।

प्रश्न 9
‘कर्मवीर भरत’ के आधार पर कैकेयी का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
” ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी के चरित्र को उज्ज्वल बनाकर भारतीय नारी को गौरव प्रदान किया गया है।” खण्डकाव्य के आधार पर कैकेयी के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इस कथन की सत्यता सिद्ध कीजिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कैकेयी के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। 
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर किसी प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में कैकेयी का चरित्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली है। सामान्यतः रामायण में कैकेयी को दोषी माना जाता है, परन्तु इस खण्डकाव्य में कवि ने उनके चरित्र को एक उज्ज्वल, आदर्श और जनहितकारी नारी के रूप में प्रस्तुत किया है। उनमें साहस, त्याग, विवेक, दूरदर्शिता और मातृत्व जैसे अनेक गुण विद्यमान हैं।

वीरांगना और साहसी नारी – कैकेयी एक वीर और साहसी स्त्री हैं। वे केवल महल तक सीमित रहने वाली नारी नहीं हैं, बल्कि युद्धभूमि में भी अपने पति दशरथ के साथ जाती हैं और संकट के समय उनके प्राणों की रक्षा करती हैं।
वे निडर होकर कठिन निर्णय लेती हैं और लोक-निन्दा की परवाह नहीं करतीं। उनका वीरत्व इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है—

“असि अर्पण कर मैंने रण कंकण बाँधा है,
रणचण्डी का व्रत मैंने रण में साधा है।”

इससे स्पष्ट है कि कैकेयी में एक सच्ची वीरांगना के सभी गुण मौजूद हैं।

आदर्श माता – कैकेयी एक आदर्श माता हैं। वे अपने पुत्र भरत से अत्यधिक प्रेम करती हैं, परन्तु केवल उसका सुख ही नहीं चाहतीं, बल्कि उसका चरित्र महान बने, यह चाहती हैं।
वे राम और भरत में कोई भेद नहीं करतीं। उनके विचारों को ये पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं—

“राम-भरत में भेद? हाय कैसी दुर्बलता,
आगे चलते राम, भरत तो पीछे चलता।”

वे राम को वन इसलिए भेजती हैं ताकि वे जनसेवा करें और अपने जीवन को और महान बनाएं। इस प्रकार कैकेयी का मातृत्व त्याग और उच्च आदर्शों से भरा हुआ है।

जनहितैषी और व्यापक दृष्टिकोण – कैकेयी का दृष्टिकोण बहुत व्यापक और उदार है। वे केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के हित की सोचती हैं।
वे चाहती हैं कि राम वन में जाकर गरीब, अशिक्षित और उपेक्षित वनवासियों का उत्थान करें। उनके विचार इन पंक्तियों में व्यक्त होते हैं—

“जिन्हें नीच पामर कहकर हम दूर भगाते,
वे भी तो अपने हैं मानवता के नाते।
उन्हें उठाना क्या राजा का धर्म नहीं है,
गले लगाना क्या मानव का कर्म नहीं है।”

इन पंक्तियों से उनकी मानवता, समाज-सेवा और समानता की भावना स्पष्ट होती है।

राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदर्शिता – कैकेयी एक कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं। वे परिस्थितियों को भली-भाँति समझती हैं और दूरदर्शिता के साथ निर्णय लेती हैं।
राम को वन भेजने का निर्णय भी उनकी राजनीतिक समझ और जनहित की भावना का परिणाम है। वे चाहती हैं कि राम वनवासियों को संगठित करें और समाज में सुधार लाएँ।
इससे उनकी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता का परिचय मिलता है।

अपराध स्वीकार करने वाली और आत्मविश्लेषी – कैकेयी का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि वे अपने कार्यों की जिम्मेदारी स्वीकार करती हैं।
जब उनके निर्णय के कारण दुःखद परिणाम सामने आते हैं, तो वे स्वयं को दोषी मानती हैं और अपने अपराध को स्वीकार करती हैं—

“इस दुःखान्त नाटक की मैं हूँ सूत्रधारिणी,
हरे-भरे रघुकुल में प्रलय-विनाशकारिणी।”

यह उनके विनम्र, सच्चे और आत्मविश्लेषी स्वभाव को दर्शाता है।

प्रश्न 10
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) के अतिरिक्त किस पात्र के चारित्रिक गुणों से आप प्रभावित हैं ? उन गुणों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर राम के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के किसी प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए।

उत्तर

‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य में राम का चरित्र अत्यन्त आदर्श और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम, सिद्धान्तनिष्ठ, दयालु और कर्तव्यपरायण नायक हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

संकल्पवान और सिद्धान्तप्रिय – राम अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहने वाले हैं। वे एक बार जो संकल्प कर लेते हैं, उसे किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ते।
भरत और परिवार के बार-बार आग्रह करने पर भी वे अयोध्या लौटने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि वे पिता की आज्ञा का पालन करना चाहते हैं।

“क्षमा करें सब लोग, विवशता मेरे मन की,
अपनायी है कठिन राह मैंने जीवन की।
इतना होने पर भी अब मैं पुर को जाऊँ?
राज्य करूँ या पुत्रधर्म आदर्श मिटाऊँ?”

संवेदनशील और प्रेमपूर्ण – राम सिद्धान्तों के प्रति दृढ़ होते हुए भी अत्यन्त कोमल हृदय के हैं। वे अपने भाई भरत के प्रेम और भक्ति से भाव-विह्वल हो जाते हैं।

“भाई जो भी कहो वही मैं आज करूँगा,
तुम कह दो तो अयश सिन्धु में कूद पड़ूँगा।”

इससे स्पष्ट है कि उनके हृदय में अपने भाइयों के प्रति गहरा प्रेम है।

मर्यादा पुरुषोत्तम – राम मर्यादा और आदर्शों का पूर्ण पालन करते हैं। वे अपने माता-पिता, गुरु और कुल-परम्परा का सम्मान करते हैं।
वे भरत को अपनी चरण-पादुकाएँ देकर मर्यादा की रक्षा करते हैं और स्वयं वन में रहकर भी धर्म का पालन करते हैं।
उनके बारे में कहा गया है—

“रघुकुल के आदर्श जिन्हें लगते हैं प्यारे,
कहो कुशल से तो हैं भ्राता राम हमारे।”

द्वेषभाव से रहित – राम के मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं है।
यहाँ तक कि कैकेयी ने ही उन्हें वन भेजा, फिर भी वे उनके प्रति कोई क्रोध नहीं रखते, बल्कि उनका सम्मान करते हैं—

“माँ ने नारी को अमरत्व प्रदान किया है,
मोड़ा है इतिहास, नया आदर्श दिया है।”

शक्ति, शील और सौन्दर्य के प्रतीक – राम केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि शील और सौन्दर्य से भी युक्त हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन जनसेवा के लिए समर्पित है।

“राम हमारा शक्ति, शील, सौन्दर्य समन्वित,
उसका जीवन ही जन-सेवा हेतु समर्पित।”

दीनों के रक्षक और दुष्टों के संहारक – राम दीन-दुखियों की सहायता करने वाले और दुष्टों का नाश करने वाले हैं। वे करुणामय हैं, परन्तु अन्याय के विरुद्ध कठोर भी बन जाते हैं—

“दुःखी जनों को देख नयन उनके भर आते,
देख दुष्ट को लाल वही लोचन हो जाते।”

निष्कर्ष – इस प्रकार राम का चरित्र एक आदर्श, मर्यादापालक, कर्तव्यनिष्ठ, दयालु और महान पुरुष के रूप में सामने आता है। उनके उच्च आदर्श और गुण हमें जीवन में धर्म, कर्तव्य और प्रेम का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।

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