ज्योति जवाहर खण्डकाव्य | Jyoti Jawahar Khand Kavya

प्रश्न 1
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक, कथासार) संक्षेप में लिखिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य का कथानक राष्ट्रीय एकता के परिवेश में देश की विभिन्नताओं के बीच अभिन्नता की एक शाश्वत कड़ी के रूप में उभरकर सामने आता है।” इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त कीजिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ के नायक के व्यक्तित्व के निर्माण में पूरे भारत का योगदान रहा। कथानक के आधार पर इस तथ्य को स्पष्ट कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ की कथावस्तु (कथासार) अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

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श्री देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ द्वारा रचित ‘ज्योति-जवाहर’ नामक खण्डकाव्य की कथावस्तु घटनाप्रधान न होकर भावप्रधान है। इस खण्डकाव्य में भारत के निर्माता युगावतार पं० जवाहरलाल नेहरू का विराट लोकनायक का रूप चित्रित हुआ है। कवि ने सम्पूर्ण कथानक को एक ही सर्ग ‘प्रवेश’ में रचा है। कथावस्तु का सारांश निम्नवत् है–

कथानक का प्रारम्भ नायक में देवत्व और मनुजत्व के सम्मिश्रण से हुआ है। विधाता ने जवाहरलाल नेहरू के अलौकिक व्यक्तित्व का निर्माण अपनी रचना का समस्त कौशल लगाकर किया है। कवि की भव्य कल्पना है कि विधाता ने इन्हें सूर्य से ज्योति,चन्द्रमा से सुघड़ता, हिमालय से स्वाभिमान, सागर से मन की गहराई, वायु से गति और धरती से धैर्य लेकर दिव्य पुरुष के रूप में रचा है। कवि के अनुसार नेहरू जी के व्यक्तित्व में अनेक राज्यों के महान् पुरुषों के गुणों के साथ-साथ राज्यों के सामाजिक-सांस्कृतिक गुणों का भी समावेश निम्नलिखित रूप में हुआ है

गुजरात प्रान्त में जन्मे महात्मा गाँधी से ये कर्मयोग के सिद्धान्त की प्रेरणा पाकर जीवन के संघर्ष की प्रेरणा लेते हैं। इन्हें गाँधीजी का शुभाशीष, सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, समानता, ममता आदि के रूप में उसी प्रकार प्राप्त हुआ है, जैसे राम को वशिष्ठ का शुभाशीष प्राप्त हुआ था।
महाराष्ट्र ने उन्हें वीर शिवाजी की तलवार के रूप में शक्ति प्रदान की, जिससे वे विदेशी शक्तियों से उसी प्रकार लोहा लेते रहे; जिस प्रकार वीर शिवाजी ने औरंगजेब से लोहा लिया था।

नेहरू जी ने राजस्थान से संघर्षों में जीना सीखा तथा यहाँ के महापुरुषों से संकटों में अपने पथ से किसी भी प्रकार से विचलित न होने की शिक्षा ली। हल्दीघाटी की माटी वीर जवाहर को स्वतन्त्रता पर मिटने की भावनी देती है।

राजस्थान उन्हें भारत की सम्पूर्ण सांस्कृतिक, ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पवित्र कला, जौहर-व्रत, स्वामिभक्ति और त्याग सौंपता है। वह राणा साँगा, कुम्भा, जयमल और महाराणा प्रताप का शौर्य तथा त्याग उनको प्रदान करता है।

सतपुड़ा राज्य भारत की अखण्डता की घोषणा करता है।

कालिदास की भावुकता, कुमारिल की विलक्षण प्रतिभा, अंगारों की भाषा वाला फकीर मोहन तथा अकबर से लड़ने वाली चाँदबीबी’ जैसी महान् विभूतियों को सतपुड़ा अपने हृदय में धारण किये हुए है। इन विभूतियों की समस्त विशेषताओं को वह नेहरू जी को समर्पित कर देता है।

बंगाल भी जवाहर पर अपना वैभवे न्योछावर करने में पीछे नहीं है। विवेकानन्द तथा दीनबन्धु ऐण्डूज की कर्मठता ने नेहरू जी को बहुत अधिक प्रभावित किया है। बंगाल प्रदेश तो नेहरू जी को बंकिम चन्द्र का राष्ट्र-प्रेम, टैगोर तथा शरत् की अमर कला, सुभाषचन्द्र बोस की देशभक्ति आदि सभी कुछ समर्पित कर गौरव का अनुभव कर रहा है।

असम अपने जंगलों, पर्वतों और नदियों की प्राकृतिक सुषमा को नेहरू जी पर वारता हुआ धन्य हो रहा है। रामायण के अनुवादक माधव कन्दली तथा मनसा नामक भक्त-कवि के गीतों ने नेहरू जी के मन को शुद्धता प्रदान की है।

बिहार गौतम बुद्ध की तपोभूमि है। यह सत्य, दया, अहिंसा, क्षमा, त्याग आदि का नन्दन वन है। महावीर स्वामी की विभूति वैशाली नेहरू जी को मानवीय गुणों के मोती अर्पित करती है।

समुद्रगुप्त की यशोगाथा आज भी विद्यमान है। समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त ने भी अपनी वीरता से भारत का मस्तक कभी झुकने नहीं दिया। कलिंग को जीतने के बाद अशोक वैराग्य-भावना से ओत-प्रोत हो गये। इस प्रदेश की ये सभी घटनाएँ नेहरू जी के व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव डालती हैं।

उत्तर प्रदेश अपनी कोख में वीर जवाहर को जन्म देकर धन्य है। मथुरा, वृन्दावन और अयोध्या की गली-गली में चर्चा है कि आज राम और कृष्ण ने प्रयाग में जन्म लिया है। उत्तर प्रदेश तुलसी की राममयी वाणी, सारनाथ में बुद्ध के उपदेश, कबीर की आडम्बरहीनता एवं साम्प्रदायिक सौहार्द, सूर के गीतों का उपहार लिये इस महामानव का अभिनन्दन करता है।

पंजाब भी अपनी गौरवमयी परम्परा को सौंपते हुए जननायक जवाहर के व्यक्तित्व की अभिवृद्धि में योग दे रहा है। सिकन्दर को स्वाभिमान का पाठ पढ़ाने वाले राजा पोरस का पौरुष, गुरु नानक की वाणी आदि सब कुछ पंजाब वीर जवाहर को सौंप देता है।

कश्मीर का सौन्दर्य नेहरू जी को आकर्षित करता है तथा उन पर फूलों की वर्षा करता है।

कुरुक्षेत्र नेहरू जी को अर्जुन की संज्ञा से विभूषित करता है तथा अर्जुन से गाण्डीव उठवाकर दुर्योधन जैसे अत्याचारी व्यक्तियों को समाप्त करने का आदेश देता है।

पराधीनता के पाश में जकड़ी दिल्ली अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता की ज्योति को सौंपते हुए गौरवान्वित है। वह उन्हें जहाँगीर का न्याय तथा शाहजहाँ की कलात्मक सौगात को अर्पित करती है।

वास्तव में सम्पूर्ण भारत ने नेहरू जी को अपनी सभी निधियाँ अर्पित की हैं। यमुना अपने संगम के राजा के अभिनन्दन के लिए अपनी निधियों को न्यौछावर करने संगम तक गयी है। अत: यह कथन भी पूर्ण रूप से उपयुक्त ही है कि ज्योति-जवाहर’ के नायक के व्यक्तित्व के निर्माण में सम्पूर्ण भारतवर्ष का योगदान रहा है।

प्रश्न 2
‘ज्योति-जवाहर’ का कथानक घटनाप्रधान न होकर भावप्रधान है।” इस कथन का क्या अभिप्राय है ? 
या
नेहरू के व्यक्तित्व के निर्माण में किन शक्तियों का योगदान ‘ज्योति-जवाहर खण्डकाव्य के आधार पर संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि ने पंजाब के व्यक्तित्व का चित्रण किस प्रकार किया है? विस्तार से लिखिए। ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर मेवाड़ के गौरव का वर्णन कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ के आधार पर बताइए कि नेहरू के व्यक्तित्व को किन-किन व्यक्तियों ने किस रूप में प्रभावित किया? 

उत्तर

‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कथानक घटनाप्रधान नहीं है, बल्कि भावप्रधान है। इसका अर्थ यह है कि इस काव्य का मुख्य उद्देश्य केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं है, बल्कि नायक पं० जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व, उनके गुण, उनके आदर्श और उनके भारत के प्रति दृष्टिकोण को उजागर करना है। कवि ने इस काव्य में नेहरू के मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक पक्षों को भी प्रमुख रूप से दर्शाया है। नायक का व्यक्तित्व सम्पूर्ण भारत की चेतना और गौरव का प्रतीक है।

नेहरू जी के व्यक्तित्व के निर्माण में पूरे भारत के विभिन्न राज्यों और महान विभूतियों का योगदान रहा। गुजरात ने उन्हें महात्मा गांधी से कर्मयोग, सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, समानता और ममता जैसे गुण दिए। नरसी मेहता की भक्तिमयी वाणी ने उनके हृदय की पवित्रता और भक्ति भाव को बढ़ाया। गुजरात के ही कवि पद्मनाभ और महर्षि दयानन्द की चारित्रिक विशेषताओं ने उनके जीवन में नैतिकता, साहस और दृढ़ निश्चय को विकसित किया।

महाराष्ट्र ने वीर शिवाजी की तलवार और संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास की शिक्षाओं के माध्यम से उन्हें शक्ति, साहस, कर्मयोग और देशभक्ति का मार्ग दिखाया। इनके विचारों और उपदेशों ने नेहरू के निर्णय और नेतृत्व क्षमता को मजबूती दी। राजस्थान ने उन्हें भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वीर परंपराओं का अनुभव कराया। हल्दीघाटी की मिट्टी और वीरों की परंपरा ने उन्हें संकटों में अडिग रहने और अपने सिद्धांतों के लिए लड़ने की शक्ति प्रदान की। राणा साँगा, जयमल और महाराणा प्रताप का शौर्य और त्याग उनके व्यक्तित्व में वीरता और निष्ठा के प्रतीक बन गए।

सतपुड़ा राज्य ने भारत की अखंडता और सौहार्द का महत्व बताया। यहाँ की नदियाँ, जैसे नर्मदा, ताप्ती, महानदी, कृष्णा और कावेरी ने उन्हें जीवन में धर्म और संस्कृति की सीख दी। महावीर और गौतम बुद्ध के उपदेशों ने उन्हें सत्य, अहिंसा और दया का मार्ग दिखाया। रामानुजाचार्य और शंकराचार्य के दार्शनिक तत्त्वों ने उनके आत्म-ज्ञान और विवेक को मजबूत किया। सतपुड़ा के संत अय्यर से सत्याग्रह का मंत्र उन्हें प्राप्त हुआ।

बंगाल ने बंकिम चन्द्र का राष्ट्र-प्रेम, टैगोर और शरत की अमर कला, सुभाषचंद्र बोस की देशभक्ति, महाप्रभु चैतन्य की भक्तिपूर्ण वाणी और कवियों की रचनाओं के माध्यम से उनके व्यक्तित्व को समृद्ध किया। असम की प्राकृतिक सुंदरता और उसकी साहित्यिक परंपरा ने उनके मन को संवेदनशील और शुद्ध बनाया। बिहार ने गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के माध्यम से उनके व्यक्तित्व में मानवीय गुण, दया, क्षमा और त्याग के मूल्य जोड़े।

उत्तर प्रदेश ने तुलसी, कबीर, सूर और राम-कृष्ण जैसी विभूतियों के माध्यम से नैतिकता, संस्कृति, भक्ति और साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश नेहरू जी के व्यक्तित्व में सम्मिलित किया। पंजाब ने वीरता, गुरु नानक की शिक्षाएँ, सिकंदर और राजा पोरस की परंपरा, जलियाँवाला बाग की करुणा-कथा और मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की सभ्यता से साहस, न्याय और राष्ट्रीय चेतना के मूल्य उनके व्यक्तित्व में जोड़े। कश्मीर ने सौंदर्य और शांति का अनुभव कराया। कुरुक्षेत्र ने उन्हें अर्जुन की संज्ञा दी और गाण्डीव का प्रतीक बनाकर न्याय और धर्म का पाठ पढ़ाया। दिल्ली ने मुहम्मद गोरी, चंगेज खाँ और तैमूरलंग जैसी स्मृतियों से इतिहास का संदेश और अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ की कला और हिन्दू-मुस्लिम एकता की दृष्टि उन्हें सिखाई।

संपूर्ण भारत ने अपने गौरव, संस्कृति, वीरता और ज्ञान नेहरू जी को अर्पित किया। उनके व्यक्तित्व में सम्पूर्ण भारत का प्रतीक उभरता है। कवि स्पष्ट रूप से कहते हैं –

“जब लगा देखने मानचित्र, भारत न मिला तुमको पाया।
जब तुझको देखा नयनों में, भारत का चित्र उभर आया।”

इस प्रकार, ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में नायक का व्यक्तित्व केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की चेतना, गौरव, संस्कृति, वीरता और नैतिकता का प्रतीक बनकर प्रस्तुत किया गया है। कवि ने इसे भावप्रधान शैली में दर्शाकर खण्डकाव्य को मौलिक और प्रभावशाली रूप दिया है।

प्रश्न 3
‘ज्योति-जवाहर’ के आधार पर खण्डकाव्य के नायक पं० जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
“‘ज्योति-जवाहर’ में नेहरू का विराट् व्यक्तित्व ही भारतीय राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।” उक्त कथन की पुष्टि कीजिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में व्यक्त राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर पं० जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण आधुनिक भारत के निर्माता एवं देशप्रेमी के रूप में कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ के नायक के विविध गुणों और उसकी प्रधान चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ के नायक की किन्हीं तीन/चार व्यक्तिगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘ज्योति-जवाहर’ के नायक के प्रेरक चरित्र का वर्णन कीजिए। 
या
“ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के नायक में देश-प्रेम, विश्व-बन्धुत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तथा राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के समन्वित दर्शन होते हैं।” इस कथन की पुष्टि संक्षेप में कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य कें जिस पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया हो, उसका चरित्र-चित्रण कीजिए। 

उत्तर

श्री देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ द्वारा रचित ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के नायक पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं। इस खण्डकाव्य में कवि ने नेहरू के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक विशेषताओं से समाहित करके चित्रित किया है।

1. अलौकिक व्यक्तित्व ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि श्री देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ ने नेहरू जी को अलौकिक पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके व्यक्तित्व में सूर्य, चन्द्रमा, हिमालय, सागर, वायु और धरती से प्राप्त विशेषताओं का समावेश है। कवि राही जी कहते हैं:

“सूरज से लेकर ज्योति, चाँद से लेकर सुघराई तन की।
हिमगिरि से लेकर स्वाभिमान, सागर से गहराई मन की॥
लेकर मारुत से गति अबाध, धरती से ले धीरज सम्बले।
विधि ने तुझको ही सौंप दिया, अपनी रचना का पुण्य सकल॥”

इस पंक्ति से स्पष्ट है कि नेहरू जी केवल मानव नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की चेतना और गौरव का प्रतीक हैं। उनकी अलौकिकता उनके व्यक्तित्व को विराट, प्रभावशाली और प्रेरणादायक बनाती है।

2. गाँधीजी से प्रेरणा – नेहरू जी महात्मा गाँधी के अनुयायी थे। गाँधीजी से उन्हें सत्य, अहिंसा, करुणा, मानव-प्रेम, दया और क्षमा जैसी विशेषताएँ प्राप्त हुईं। कवि लिखते हैं:

“उन्हें गाँधी से सत्य, अहिंसा, उदारता, मानव-प्रेम, करुणा का आशीर्वाद उसी प्रकार प्राप्त हुआ था, जैसे राम को वशिष्ठ का शुभाशीष प्राप्त हुआ था।”

गांधीजी के कर्मयोग से प्रेरित होकर नेहरू जी ने अपने जीवन को कर्ममय और राष्ट्र सेवा में समर्पित किया। इस प्रकार उनका व्यक्तित्व केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि देश की सेवा में समर्पित आदर्श पुरुष का रूप लेता है।

3. समन्वयकारी लोकनायक – काव्य में नेहरू जी का व्यक्तित्व सम्पूर्ण भारत का संगम है। कवि उन्हें ‘संगम का राजा’ कहते हैं। उन्होंने भारत के हर प्रान्त की संस्कृति, धर्म, कला और साहित्य का अवदान अपने व्यक्तित्व में समाहित किया। कवि लिखते हैं:

“मथुरा वृन्दावन अवधपुरी की, गली-गली में बात चली।
फिर नया रूप धरकर उतरा, द्वापर त्रेता का महाबली॥”

यह दिखाता है कि नेहरू जी का व्यक्तित्व सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की चेतना, गौरव और एकता का प्रतीक है।

4. राष्ट्रीय भावों के प्रेरक – नेहरू जी भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति के भाव जगाने वाले हैं। उनके व्यक्तित्व में अशोक की युद्ध–विरक्ति, बुद्ध की करुणा, महावीर की अहिंसा, प्रताप का स्वाभिमान, शिवाजी की देशभक्ति और विवेकानन्द की आत्मदर्शन झलकती है। कवि राही जी कहते हैं:

“आजादी की मुमताज जिसे, अपने प्राणों से प्यारी है।
उस पर अपनी मुमताज सहित, यह शाहजहाँ बलिहारी है॥”

इस पंक्ति से यह स्पष्ट है कि नेहरू जी के व्यक्तित्व में राष्ट्रीय चेतना, बलिदान और देशभक्ति का भाव प्रमुख है।

5. स्वाधीनता-सेनानी और वीरता – काव्य में नेहरू जी को एक महान देशभक्त और अजेय स्वाधीनता-सेनानी के रूप में दिखाया गया है। महाराष्ट्र ने उन्हें शिवाजी की तलवार का रूप देकर शक्ति दी, झाँसी और बिठूर ने उनके कार्यक्षमता में विश्वास रखा, और राजस्थान ने उन्हें संघर्ष और त्याग की भावना दी। कवि लिखते हैं:

“महाराष्ट्र ने उन्हें वीर शिवाजी की तलवार के रूप में शक्ति दी।
राजस्थान और झाँसी की वीर परंपरा ने उन्हें संघर्ष की शिक्षा दी।”

इससे स्पष्ट है कि उनका व्यक्तित्व वीरता और संघर्ष से परिपूर्ण था।

6. दृढ़ पुरुष और नीतिज्ञ – नेहरू जी में कठिनाइयों में धैर्य और सही निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी। असम की मिट्टी ने उन्हें धैर्य और कठोरता सिखाई। कवि लिखते हैं:

“काँटों की नोकों पर खिलना, मेरे जीवन की शैली है।
मेरी दिनचर्या पर्वत से, लेकर जंगल तक फैली है॥”

वे ऊपर से कठोर और भीतर से कोमल हैं। इसीलिए नेहरू जी स्वयं कहते हैं:

“मुझमें कोमलता है लेकिन, कायरता मेरा मर्म नहीं।
बैरी के सम्मुख झुक जाना, मेरे जीवन का धर्म नहीं॥”

इससे स्पष्ट है कि उनका व्यक्तित्व साहसी, दृढ़ और नैतिक मूल्यों से ओत-प्रोत था।

7. आधुनिक भारत के निर्माता – स्वतंत्रता के बाद नेहरू जी नए भारत के निर्माता बने। उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की और देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनका लक्ष्य भारत को सभी जातियों, धर्मों और समुदायों की एकता में मजबूत करना और विश्व-शांति में योगदान देना था।

8. संपूर्ण भारत की प्रतीकता – कवि ने न केवल नेहरू जी के व्यक्तिगत गुण दिखाए हैं, बल्कि भारत के सभी प्रान्तों और विभूतियों का योगदान उनके व्यक्तित्व में शामिल किया है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल, असम, बिहार, पंजाब और कश्मीर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विशेषताएँ उनके व्यक्तित्व में समाहित हैं। कवि कहते हैं:

“जब लगा देखने मानचित्र, भारत न मिला तुमको पाया।
जब तुझको देखा नयनों में, भारत का चित्र उभर आया।”

यह पंक्ति दिखाती है कि नेहरू जी का व्यक्तित्व सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 4
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर कलिंग युद्ध (मर्मस्पर्शी प्रसंग) का वर्णन कीजिए तथा उसके परिणाम का उल्लेख कीजिए।
या
‘ज्योति-जवाहर’ में वर्णित कलिंग युद्ध की घटना और सम्राट् अशोक पर उसके प्रभाव का वर्णन कीजिए। यह भी बताइए कि इस खण्डकाव्य की कथा में इसका क्या महत्त्व है ?
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य की ऐसी घटना का उल्लेख कीजिए जिसने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया हो और क्यों ? 
या
‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य के आधार पर कलिंग युद्ध का वर्णन कीजिए।

उत्तर

‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि श्री देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ ने आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू को भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रतीक रूप में चित्रित किया है। इसके लिए कवि ने भारतीय इतिहास की अनेक घटनाओं का वर्णन किया है।

1. कलिंग युद्ध की मार्मिक घटना ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कवि श्री देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ ने कलिंग युद्ध का अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी वर्णन किया है। यह युद्ध सम्राट अशोक के शासनकाल में हुआ। इस युद्ध में रक्त की नदियाँ बह गई थीं और मानव अपने प्राणों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए मछलियों की तरह तैरते दिखाई दे रहे थे। अस्त्र-शस्त्रों की भयंकर आवाजें चारों ओर गूँज रही थीं और नरमुण्ड धरती पर गिर रहे थे। माताएँ अपने बच्चों के मृत शरीर को देखकर बिलख रही थीं, बहनों की आंसुओं से माँग का सिंदूर धुल गया और अगणित परिवारों का जीवन वीरानी में बदल गया। कवि लिखते हैं:

“हर ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी। नरमुण्ड कटकट कर धरती पर गिर रहे थे। न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हो गयी थी।”

इस युद्ध का दृश्य अत्यंत क्रूर और मनुष्य के लिए असहनीय था।

2. अशोक पर कलिंग युद्ध का प्रभाव – कलिंग युद्ध के दौरान हुई इस भीषण हिंसा ने सम्राट अशोक के हृदय को झकझोर कर रख दिया। युद्ध की हिंसा देखकर उनका मन द्रवित हो गया और उनमें दया और करुणा जागृत हुई। उन्होंने यह महसूस किया कि उनके शासन के तहत कितने निर्दोष लोगों का जीवन संकट में पड़ा। कवि इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार करते हैं:

“सोने चाँदी का आकर्षण अब उसे घिनौना लगता था।
साम्राज्यवाद का शीशमहल कुटिया से बौना लगता था।”

अशोक ने स्वयं यह प्रण किया कि अब वे हिंसा नहीं करेंगे और किसी को भी युद्ध में शामिल नहीं करेंगे। इस घटना ने उनके हृदय में वैराग्य और अहिंसा का बीज बो दिया।

3. कलिंग युद्ध के परिणाम कलिंग युद्ध के परिणामस्वरूप अशोक पूरी तरह अहिंसक और वैरागी बन गए। उन्होंने तलवार त्याग दी और महात्मा बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण करते हुए बौद्ध भिक्षु बन गए। कवि ने इसे इस प्रकार व्यक्त किया है:

“जाने कैसी थी कचोट, छिन पहले जिसने जगा दिया।
हिंसा की जगह अहिंसा का, अंकुर अन्तर में जमा दिया।”

यह स्पष्ट करता है कि इस युद्ध ने अशोक के चरित्र और जीवन को पूरी तरह बदल दिया। जो कभी अजेय था, वह अब स्वयं पर विजय पा गया। कवि लिखते हैं:

“जो कभी न हारा औरों से, वह आज स्वयं से हार गया।
भिक्षुक अशोक, राजा अशोक से, पहले बाजी मार गया।।”

4. कथा में महत्त्व ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में कलिंग युद्ध का प्रसंग न केवल इतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया है, बल्कि इसका उद्देश्य नायक पं० जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व और विचारों को उजागर करना भी है। अशोक की हिंसा से अहिंसा की ओर यात्रा, नेहरू जी के विचारों के समान है। कवि इस प्रसंग के माध्यम से नेहरू जी के अहिंसक और शांतिप्रिय व्यक्तित्व को दिखाना चाहते हैं।

5. भाव और संदेश – काव्य में कलिंग युद्ध का वर्णन भावप्रधान है। युद्ध की भयंकरता, रक्तपात और हृदयस्पर्शी दृश्य न केवल पाठक को प्रभावित करते हैं, बल्कि यह संदेश देते हैं कि हिंसा का परिणाम केवल विनाश होता है। अहिंसा और करुणा के मार्ग को अपनाना मानवता के लिए आवश्यक है। इस युद्ध का महत्त्व इस बात में है कि यह हिंसा से शांति की ओर परिवर्तन का प्रतीक बन गया।

कलिंग युद्ध का प्रसंग ‘ज्योति-जवाहर’ खण्डकाव्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें अशोक को युद्ध में वीर दिखाया गया है, फिर भी हिंसा और नरसंहार देखकर उनका हृदय बदल जाता है। अशोक के वैराग्य और अहिंसक बनने की घटना ने न केवल उन्हें बदल दिया, बल्कि नेहरू जी के शांतिप्रिय और अहिंसक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित किया। इस प्रकार यह प्रसंग नायक के व्यक्तित्व और खण्डकाव्य के संदेश दोनों के लिए केंद्रीय है।

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