प्रश्न 1
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य का सारांश लिखिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
“जय सुभाष’ का कथानक राष्ट्रभक्ति से पूर्ण है।” सोदाहरण समझाइए। “जय सुभाष’ खण्डकाव्य का कथानक स्पष्ट कीजिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य हमें राष्ट्रीयता की प्रेरणा देता है। कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन, व्यक्तित्व और उनके आदर्शों पर आधारित एक प्रेरक काव्य रचना है। यह खण्डकाव्य राष्ट्रभक्ति, त्याग और साहस से पूर्ण है। इसे कुल सात सर्गों में विभक्त किया गया है, जो उनके जन्म से लेकर आजाद हिन्द फौज की स्थापना और स्वतंत्रता संग्राम तक की घटनाओं का वर्णन करते हैं।
- प्रथम सर्ग – जन्म और शिक्षा
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 ई० को कटक (उड़ीसा) में हुआ। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। सुभाष बचपन से ही तेज बुद्धि और साहस के उदाहरण थे। प्रेसीडेन्सी कॉलेज में पढ़ते समय अंग्रेज प्रोफेसर ऑटेन द्वारा भारतीयों की निन्दा करने पर सुभाष ने उसके गाल पर तमाचा मारकर स्वाभिमान और देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण दिया। उन्होंने बी.ए. और विदेश जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की। महात्मा गाँधी और चितरंजन दास से प्रभावित होकर उन्होंने आई.सी.एस. की उच्च पदवी त्याग दी और स्वतन्त्रता संग्राम में सक्रिय हो गए। - द्वितीय सर्ग – स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान
सन् 1921 में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन चल रहा था। उसी समय सुभाष ने नेशनल कॉलेज की स्थापना में भाग लिया और छात्रों में देशभक्ति और स्वतंत्रता की भावना जगाई। उन्होंने स्वयंसेवकों की सेना तैयार की और मोतीलाल नेहरू की ‘स्वराज्य पार्टी’ का समर्थन किया। इस दौरान उन्हें अलीपुर जेल में डाल दिया गया। - तृतीय सर्ग – संगठन कौशल और संघर्ष
सन् 1928 में कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष ने संगठन कौशल दिखाया। उन्हें कलकत्ता नगर का मेयर चुना गया। सभा में दिए गए ओजस्वी भाषणों के कारण उन्हें कई जेलों में बंद किया गया और यातनाएँ सहनी पड़ीं। पश्चिमी देशों में स्वास्थ्य लाभ के दौरान उन्होंने ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ नामक पुस्तक लिखी। - चतुर्थ सर्ग – फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष को अध्यक्ष बनाया गया। बाद में कांग्रेस के भीतर मतभेद होने पर उन्होंने त्यागपत्र देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ (अप्रगामी दल) की स्थापना की। इस समय वे सभी देशभक्तों के प्रिय और श्रद्धेय नेता बन गए। - पञ्चम सर्ग – छद्मवेश में स्वतंत्रता संग्राम
15 जनवरी, 1941 ई० को जाड़े की अर्द्ध-रात्रि में दाढ़ी बढ़ाये हुए, ये एक मौलवी के वेश में पुलिस की आँखों में धूल झोंककर कल गये और फ्रण्टियर मेल से पेशावर पहुँच गये और वहाँ से बर्लिन। बर्लिन में इन्होंने ‘आजाद हिन्द फौज’ की स्थापना की। दूर रहकर स्वतन्त्रता-संग्राम का नेतृत्व करना कठिन जानकर ये पनडुब्बी द्वारा टोकियो पहुँचे। जापानियों ने इन्हें पूरा सहयोग दिया। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई ने वीरता से इसे सेना का नेतृत्व किया। सुभाष ने दिल्ली चलो’ का नारा हर दिशा में गुंजित कर दिया। ‘आजाद हिन्द फौज’ का हर सैनिक स्वतन्त्रता संग्राम में जाने को उत्सुक था। - षष्ठ सर्ग – आजाद हिन्द फौज के अभियान
सुभाष ने ‘आजाद हिन्द फौज’ को दिल्ली पर आक्रमण और ब्रिटिशों को पराजित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने युवाओं को “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” का आह्वान किया। फौज ने कई मोर्चों पर अंग्रेजों को परास्त किया। - सप्तम सर्ग – द्वितीय विश्वयुद्ध और निधन
द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी तथा जापान की पराजय की चर्चा की गयी है। संसार में सुख-दु:ख और जय-पराजय का चक्र चलता रहता है। अंग्रेजों का पलड़ा धीरे-धीरे भारी होने लगा। आजाद हिन्द फौज की भी जय के बाद पराजय होने लगी। अगस्त, 1945 ई० में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अमेरिका द्वारा अणुबम गिरा दिया गया। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में आत्मसमर्पण कर दिया। 18 अगस्त, 1945 ई० को ताइहोक में इनका विमान आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष भी नहीं बच सके। जब तक सूर्य, चन्द्र और तारे रहेंगे, भारत के घर-घर में सुभाष अपने यश के रूप में अमर रहेंगे।
प्रश्न 2
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस के प्रारम्भिक जीवन (विद्यार्थी जीवन व बाल जीवन) पर प्रकाश डालिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए।
उत्तर
सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० को कटक (उड़ीसा) में हुआ। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। उनकी माता अत्यंत विदुषी और धार्मिक महिला थीं। बचपन में सुभाष ने अपनी माता से राम, कृष्ण, अर्जुन, बुद्ध, महावीर, शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि वीर और धार्मिक कथाएँ सुनीं। इन कथाओं से उनके हृदय में शौर्य और देशभक्ति की भावना विकसित हुई।
सुभाषचन्द्र बोस बचपन से ही तेजस्वी और बुद्धिमान थे। उन्होंने अपने कठिन परिश्रम और लगन से सभी शैक्षिक परीक्षाओं में उत्तम अंक प्राप्त किए। विद्यालय में उनके शिक्षक बेनीमाधव जी ने उनमें दीन-हीनों और गरीबों के प्रति करुणा और सेवाभाव जगाया। वे अपने अल्प उम्र में ही जाजपुर ग्राम में फैल रही भयंकर बीमारी में रोगियों की सेवा करने लगे। सुभाष ने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया। यहाँ उन्होंने सुरेशचन्द्र बनर्जी से आजीवन अविवाहित रहने की प्रेरणा प्राप्त की। कॉलेज में महर्षि विवेकानन्द का ओजस्वी भाषण सुनकर उन्होंने सत्य की खोज में मथुरा, हरिद्वार, वृन्दावन, काशी और हिमालय की कन्दराओं में भ्रमण किया, लेकिन उन्हें मानसिक शान्ति नहीं मिली।
फिर उन्होंने पुनः पढ़ाई शुरू की। प्रेसीडेन्सी कॉलेज में एक अंग्रेज प्रोफेसर ऑटेन ने भारतीयों की निन्दा की। सुभाष ने यह अपमान सहन नहीं किया और उसके गाल पर एक तमाचा जड़कर स्वाभिमान, देशभक्ति और साहस का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। इस कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने दूसरे कॉलेज में प्रवेश लिया और बी.ए. की परीक्षा तथा आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की। जब वे स्वदेश लौटे, तो उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति देखी। महात्मा गाँधी और देशबन्धु चितरंजन दास से प्रभावित होकर, उन्होंने सरकार द्वारा प्रदान किए गए उच्च आई.सी.एस. पद को त्याग दिया और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।
प्रश्न 3:
‘जय सुभाष’ के द्वितीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सुभाष के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में सुभाषचन्द्र बोस का स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय योगदान प्रस्तुत किया गया है। यह सर्ग उनके देशभक्ति, साहस और संगठन कुशलता को उजागर करता है।
सुभाष ने देखा कि भारत में अंग्रेजों के अत्याचार और अन्याय से जनता कष्ट में है। भारतमाता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अपना जीवन देश को समर्पित करने का निश्चय किया। सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चल रहा था। छात्रों ने विद्यालयों का बहिष्कार किया और वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार कर आन्दोलन को तीव्र बनाया। उस समय देशबन्धु चितरंजनदास बंगाल में आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। देशबन्धु ने नेशनल कॉलेज की स्थापना की और सुभाषचन्द्र बोस को उसका प्रधानाचार्य नियुक्त किया। इस पद पर सुभाष ने छात्रों में देशप्रेम और स्वतंत्रता की भावना जगाई। उन्होंने राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों की एक स्वयंसेवी सेना तैयार की, जिसने बंगाल के घर-घर में स्वतंत्रता का संदेश फैलाया।
इस सेना के प्रभाव से अंग्रेजों की सत्ता डगमगा गई। परिणामस्वरूप, सरकार ने देशबन्धु और सुभाष को जेल में डाल दिया। जेल में रहते हुए भी सुभाष का साहस और शक्ति बढ़ी। जब वे जेल से मुक्त हुए, तब बंगाल में भयंकर बाढ़ आई। सुभाष ने तन-मन-धन से बाढ़ पीड़ितों की मदद की। सुभाषचन्द्र बोस स्वराज्य पार्टी के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने पार्टी के कई प्रतिनिधियों को कौंसिल में प्रवेश दिलाया। उन्हें कलकत्ता महापालिका का चुनाव जीतकर अधिशासी अधिकारी बनाया गया। उन्होंने निर्धारित वेतन 13,000 रुपए की बजाय केवल आधा वेतन लेकर महापालिका का विकास किया। सरकार उनकी लोकप्रियता से चिढ़कर उन्हें अलीपुर, बरहामपुर और माण्डले जेल में भेजकर यातनाएँ दी। इसके बावजूद उनका साहस नहीं टूटा और जब वे जेल से मुक्त हुए, तो उन्होंने पुनः संघर्ष आरंभ किया। उनका अधिकांश जीवन कारागार में ही व्यतीत हुआ।
प्रश्न 4:
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु, कथासार) लिखिए।
या
‘जय सुभाष’ के आधार पर कलकत्ता में आयोजित 1928 ई० के कांग्रेस अधिवेशन का वर्णन कीजिए और बताइए कि इस अवसर पर सुभाष की क्या भूमिका रही?
उत्तर:
सन् 1928 ई० में कलकत्ता में कांग्रेस का 46वाँ अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में पं० मोतीलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाया गया। उनके सम्मान में अड़तालीस घोड़ों के रथ में शोभा-यात्रा निकाली गई, जिसका नेतृत्व सुभाषचन्द्र बोस स्वयं कर रहे थे। इस अवसर पर लोगों ने सुभाष की संगठन-कुशलता, उत्साह और कार्यनिष्ठा को देखा और सराहा। पं० मोतीलाल नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में उनके देशप्रेम, साहस और कर्मठता की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
इसके बाद सुभाष को कलकत्ता नगर का मेयर चुना गया। अपने कार्यकाल में ही उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के जुलूस का नेतृत्व किया। इस जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और सुभाष को लाठियों से पीटकर नौ माह के लिए अलीपुर जेल में डाल दिया। जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने पुनः सभाओं में ओजस्वी भाषण दिये, जिससे युवाओं में देशभक्ति की भावना और जोश बढ़ गया। इसके कारण उन्हें सिवनी, भुवाली, अलीपुर और माण्डले जेलों में भेजकर यातनाएँ दी गईं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया।
स्वास्थ्य लाभ के लिए सुभाष को पश्चिमी देशों में भेजा गया। वहाँ उन्होंने यूरोप के वैभव और समृद्धि को देखा और भारत की स्थिति तथा जनता के संघर्ष को वहां के लोगों के समक्ष रखा। पिता की बीमारी की खबर सुनकर वे भारत लौटे, परन्तु पिता के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। शोक और स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्हें पुनः यूरोप जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने “द इंडियन स्ट्रगल” नामक पुस्तक लिखकर भारत की स्वतंत्रता संग्राम की स्थिति और देशभक्ति की भावना का जीवंत वर्णन किया। सन् 1936 ई० में भारत लौटने पर उन्हें पुनः जेल भेजा गया। बाद में स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप फिर से भेजा गया। भारत लौटकर लखनऊ और हीरापुर के कांग्रेस अधिवेशनों में उनका त्याग, बलिदान और संगठन कौशल सराहा गया। इसके बाद उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया।
प्रश्न 5
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर इसके चतुर्थ सर्ग का सारांश (कथानक, कथावस्तु) लिखिए।
उत्तर:
चतुर्थ सर्ग में हीरापुर अधिवेशन से लेकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना तक की घटनाओं का वर्णन है। ताप्ती नदी के किनारे स्थित बिट्ठल नगर में कांग्रेस का इक्यावनवाँ अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषचन्द्र बोस को भव्य स्वागत किया गया। उन्हें अधिवेशन का अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया। अध्यक्षता के दौरान उनके ओजस्वी भाषण ने नवयुवकों में देशभक्ति, बलिदान और एकता की भावना को जाग्रत कर दिया। इस भाषण से स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक तीव्र गति मिली।
इसके बाद त्रिपुरा में कांग्रेस का अगला अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में अध्यक्ष पद के लिए सुभाष और पट्टाभि सीतारमैया के बीच चुनाव हुआ। सुभाष विजयी हुए। चूंकि महात्मा गांधी पट्टाभि सीतारमैया के पक्ष में थे, उन्होंने सुभाष की जीत को अपने लिए अस्वीकार्य समझा। उस समय कांग्रेस के विघटन को रोकने के लिए सुभाष ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ (अग्रगामी दल) की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने देशभर में घूमकर स्वतंत्रता की ज्योति जगाई। इस कार्य के कारण सुभाष जनता के प्रिय ‘नेताजी’ बन गए और सबकी श्रद्धा का केंद्र बन गए। सुभाष ने कलकत्ता में ‘ब्लैक हॉल’ संस्मारक को हटाने के लिए आंदोलन किया। कहा जाता है कि यह वह स्थान था जहाँ 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों को भारतीयों द्वारा जिन्दा जलाया गया था। इस आन्दोलन के दौरान सरकार ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया। जेल में रहते हुए सुभाष ने भूख हड़ताल की, जिससे सरकार को यह संस्मारक हटाना पड़ा। जनता के प्रबल आग्रह और सुभाष की दृढ़ता के कारण उन्हें जेल से मुक्त करके घर में नजरबन्द कर दिया गया।
प्रश्न 6
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर बताइए कि सुभाषचन्द्र बोस किन परिस्थितियों में वेश छोड़कर विदेश गये ? वहाँ जाकर उनके द्वारा भारत की स्वतन्त्रता के लिए किये गये प्रयत्नों का वर्णन कीजिए।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के ‘पाँचवें सर्ग’ का सारांश (कथासार लिखिए।
[संकेत द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ सर्ग से परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पाँचवें सर्ग का सारांश लिखिए।]
उत्तर
पाँचवें सर्ग में सुभाष के छद्मवेश में घर से भागने की कथा वर्णित है। उस समय सुभाष घर में नजरबन्द थे और सरकार ने उनकी सभी गतिविधियों पर कड़ा प्रतिबंध लगा रखा था। गुप्तचरों की कड़ी नजर और पुलिस के पहरे के बावजूद, सुभाष ने 15 जनवरी, 1941 की अर्द्धरात्रि में दाढ़ी बढ़ाकर और मौलवी के वेश में छद्म रूप धारण करके पुलिस की आंखों में धूल झोंक दी और फ्रंटियर मेल से पेशावर पहुँचे।
पेशावर से वे काबुल होते हुए बर्लिन पहुंचे। इस यात्रा में उन्हें कई कठिनाइयाँ और कष्ट सहने पड़े, और कई छद्मवेश धारण करने पड़े। बर्लिन पहुँचकर उन्होंने आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। दूर रहकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करना कठिन जानकर सुभाष पनडुब्बी द्वारा टोकियो पहुँचे। वहाँ जापानी सरकार ने उन्हें पूरा सहयोग दिया। बाद में वे रासबिहारी भट्टाचार्य के साथ सिंगापुर पहुँचे। यहाँ उनकी सेना में विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीय भी शामिल हुए। सुभाष ने संगठन को चार ब्रिगेडों में विभक्त किया, जिनमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी शामिल थीं। सहगल, शाहनवाज, ढिल्लन और लक्ष्मीबाई जैसे वीरों ने सेना का नेतृत्व किया। हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी धर्मावलंबी एकजुट होकर स्वतंत्रता संग्राम में तत्पर हो गए। सुभाष ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा पूरे भारत में गुंजाया और आजाद हिन्द फौज के हर सैनिक को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए उत्साहित किया। उनकी दूरदर्शिता और वीरता से आजाद हिन्द फौज ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इस प्रकार यह सर्ग दिखाता है कि सुभाषचन्द्र बोस ने किसी भी कठिन परिस्थिति में अपने साहस और बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए मातृभूमि की आज़ादी के लिए जीवन समर्पित किया।
प्रश्न 7
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग का सारांश लिखिए।
उत्तर:
षष्ठ सर्ग में आजाद हिन्द फौज के भारत पर आक्रमण और उनकी प्राप्त विजय का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सैनिकों को “दिल्ली चलो” और “जय हिन्द” के नारे दिए। उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए कहा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।” इस प्रकार उन्होंने अपने सैनिकों में देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने की प्रबल भावना जगाई।
सैनिकों ने सुभाष के उत्साहपूर्ण भाषणों से प्रेरणा पाई और शत्रु की विशाल सैन्य-शक्ति की परवाह न करते हुए संघर्ष किया। आजाद हिन्द फौज ने कई मोर्चों पर वीरता दिखाई। 18 मार्च, 1944 को कोहिमा तक पहुँचकर भयंकर गोलाबारी के बावजूद शत्रु को पीछे धकेला। इम्फाल नगर को घेरकर अंग्रेजों को पराजित किया। अराकान पर्वत-शिखर पर भी भारतीय तिरंगा फहराया गया। इस सर्ग में यह भी वर्णित है कि आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों के शिविरों पर धावा बोलकर कई मोर्चों पर उन्हें करारी हार दी और अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। इस प्रकार सुभाष और उनके सेनानियों ने अपने अदम्य साहस, बलिदान और संगठन-शक्ति से स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक योगदान दिया।
प्रश्न 8
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के सप्तम (अन्तिम) सर्ग की कथा लिखिए।
उत्तर:
सप्तम सर्ग में द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी और जापान की पराजय का वर्णन किया गया है। संसार में सुख-दुःख और जय-पराजय का चक्र निरन्तर चलता रहता है। इस समय अंग्रेजों का साम्राज्य धीरे-धीरे मजबूत होने लगा और आजाद हिन्द फौज की जय के बाद उसकी भी पराजय होने लगी। अंग्रेजों ने बर्मा (अब म्यांमार) में अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर अणुबम गिराकर विनाश मचाया। जापान ने मानवता की रक्षा के लिए जनहित में अमेरिका के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इस परिस्थिति को देखते हुए सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को आत्मसमर्पण कराने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी सेना के वीरों को उनके अद्भुत साहस और संघर्ष के लिए बधाई दी और आश्वासन दिया कि उचित समय आने पर वे स्वतंत्रता का बीड़ा फिर उठाएँगे। सुभाष विमान द्वारा टोकियो में जापान के प्रधानमंत्री हिरोहितो से मिलने जा रहे थे। दुर्भाग्यवश, 18 अगस्त, 1945 को ताइहोक में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और सुभाष का देहांत हो गया। इस समाचार से सम्पूर्ण भारत और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का मन गमगीन हो गया।
सुभाषचन्द्र बोस की वीरता, त्याग और देशभक्ति अमर हैं। उनके साहस और नेतृत्व की यशोगाथा आज भी नवयुवकों को देशभक्ति, बलिदान और स्वतन्त्रता की प्रेरणा देती है। उनकी वीरता और आदर्श आज भी भारत के घर-घर में सम्मान और स्मृति के रूप में जीवित हैं।
प्रश्न 9
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सुभाष में अनेक गुणों का समावेश था।”जय सुभाष’ के आधार पर खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘जय सुभाष खण्डकाव्य के आधार पर सुभाषचन्द्र बोस की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए, जो आपको अधिकाधिक प्रभावित करती हैं।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए कि सुभाषचन्द्र त्याग, अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के प्रतीक हैं।
या
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर
‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के व्यक्तित्व और उनके अद्भुत गुणों का विस्तृत चित्रण किया गया है। वे स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी थे और त्याग, साहस, नेतृत्व तथा देशभक्ति के प्रतीक थे। उनके प्रमुख चारित्रिक गुण निम्न प्रकार हैं-
- कुशाग्र बुद्धि एवं प्रखर प्रतिभाशाली – सुभाष बचपन से ही तेजस्वी और बुद्धिमान थे। उन्होंने मैट्रिक और इंटर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और विदेश जाकर आई० सी० एस० की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उनका यह ज्ञान और कौशल बाद में कलकत्ता अधिवेशन, फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना और आजाद हिन्द फौज के कुशल नेतृत्व में दिखाई दिया।
- समाजसेवी, अनुपम त्यागी और कष्ट-सहिष्णु – सुभाष मानवता और समाज सेवा में अग्रणी थे। जाजपुर में महामारी फैलने पर रोगियों की सेवा की और बंगाल में बाढ़ के समय पीड़ितों की मदद की। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने आई० सी० एस० का उच्च पद त्याग कर अपार बलिदान किया। वे कठिन जेल यातनाएँ सहकर भी देश सेवा का मार्ग नहीं छोड़े। उनके बारे में कवि ने लिखा है-
“दुःखी जनों का कष्ट कभी वह, नहीं देख सकते थे।
दोस्तों की सेवा करने में, वह न कभी थकते थे।”
- स्वाभिमानी, साहसी और निर्भीक – उनके हृदय में स्वाभिमान और साहस कूट-कूटकर भरा था। छात्रावस्था में प्रोफेसर ऑटेन द्वारा भारतीयों की निन्दा सुनकर उन्होंने उसे तमाचा मारकर देशभक्ति और स्वाभिमान प्रदर्शित किया। आई० सी० एस० का पद भी त्याग कर उन्होंने दिखाया कि वे किसी भी कीमत पर देश और अपने आदर्श के लिए पीछे नहीं हटते। कवि ने लिखा-
“स्वाभिमान का परिचय सबको, हो निर्भीक दिया था।
ले देशापमान का बदला, उत्तम कार्य किया था।”
- महान देशभक्त और स्वतंत्रता-प्रेमी – सुभाष का जीवन राष्ट्र और स्वतंत्रता के लिए समर्पित था। उन्होंने महात्मा गांधी और देशबन्धु चितरंजनदास के आह्वान पर अपनी युवावस्था अर्पित की। जेल यातनाएँ और खतरे उनके हौसले को नहीं कम कर सके। कवि लिखते हैं-
“की सुभाष ने राष्ट्र-प्रेम हित अर्पित मस्त जवानी।
मुक्ति युद्ध के बने शीघ्र ही वे महान् सेनानी॥”
- उत्साही और प्रेरक नेता – उनके उत्साह और वीरता से सामान्य जनता प्रेरित होती थी और अंग्रेज भयभीत। उन्होंने अंग्रेजों की कड़ी निगरानी से बचकर छद्मवेश में विदेश यात्रा की और आजाद हिन्द फौज का गठन किया। उनकी प्रेरक वाणी ने युवाओं में बलिदान और देशभक्ति का भाव उत्पन्न किया।
- जनता के प्रिय नेता – अपने महान कार्यों और देशभक्ति के कारण वे करोड़ों लोगों के प्रिय नेता बन गए। उन्होंने नवयुवकों को संगठित कर युवा-आन्दोलन का नेतृत्व किया और स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। कवि ने लिखा-
“वह हो गये समस्त देश की, श्रद्धा के अधिकारी।
लेने लगे प्रेरणा उनसे, बाल-वृद्ध-नर-नारी॥”
- महान सेनानी एवं योद्धा – आजाद हिन्द फौज का कुशल नेतृत्व कर वे अंग्रेजों की विशाल सेना को पराजित करने में सफल हुए। उनके नेतृत्व में सेना ने कई मोर्चों पर विजय प्राप्त की और भारतीय तिरंगा लहराया। कवि लिखते हैं-
“सेनानी सुभाष ने भीषण, रण-दुन्दुभी बजाई।
पाने हेतु स्वराज्य उन्होंने, छेड़ी विकट लड़ाई॥”
- ओजस्वी वक्ता और साहित्यकार – उनके भाषण ओजपूर्ण और प्रेरक थे। उन्होंने ‘द इंडियन स्ट्रगल’ पुस्तक लिखकर स्वतंत्रता संग्राम का सजीव चित्र प्रस्तुत किया। उनकी वाणी ने देशवासियों में देशभक्ति और बलिदान की भावना भर दी। कवि लिखते हैं-
“लगी गूंजने बंगभूमि में, उनकी प्रेरक वाणी।
मन्त्र मुग्ध होते थे सुनकर, उसको सारे प्राणी॥”
- त्याग और बलिदान के प्रतीक – सुभाष ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना राष्ट्र सेवा का मार्ग अपनाया। उनके जीवन और कार्य युवाओं को त्याग, साहस और राष्ट्रीयता की प्रेरणा देते हैं।
- युवा-आन्दोलन के प्रवर्तक – उन्होंने युवा संगठनों को एक सूत्र में पिरोकर नवयुवकों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से नवजवान सभा और युवा-आन्दोलन सफल हुआ। कवि लिखते हैं-
“नवयुवकों के भी प्रयाण की, आयी है शुभ बेला।
हो सकती है नहीं कभी भी, तरुणों की अवहेला॥”
- स्वतंत्रता के जन्मदाता – अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करके उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति की राह प्रशस्त की। उनके योगदान से भारत को स्वतंत्रता मिली। कवि लिखते हैं-
“मुक्त हुई उनके प्रयत्न से, अपनी भारतमाता।
दिन पन्द्रह अगस्त का अब भी, उनकी याद दिलाता॥”
सुभाषचन्द्र बोस का जीवन त्याग, साहस, नेतृत्व और देशभक्ति का आदर्श है। उनका व्यक्तित्व नवयुवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनका आदर्श जीवन युग-युग तक भारतीयों को स्वतंत्रता, बलिदान और सेवा का संदेश देता रहेगा।
