गरुड़ध्वज नाटक का सारांश एवं चरित्र-चित्रण | Garuddhwaj Natak ka Saaransh aur Charitra Chitran

प्रश्न 1.

‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु (कथानक) को संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रथम अंक को कथासार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम (तृतीय) अंक की घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक अंक के कथानक पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार लिखिए कि उसमें निहित राष्ट्रीय एकता का भाव स्पष्ट हो। ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम अंक का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के तीसरे अंक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

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उत्तर

गरुड़ध्वज नाटक की कथावस्तु

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ एक ऐतिहासिक राष्ट्रवादी नाटक है, जिसमें प्रथम शती ईसा-पूर्व के भारत का राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक स्वरूप बड़े कलात्मक रूप में उभरकर आता है। नाटक का केंद्रबिंदु शुंग वंश के पराक्रमी सेनापति विक्रममित्र, मालवा के जननायक विषमशील तथा महान कवि कालिदास जैसे चरित्रों का त्याग, शौर्य, नीति, भारतीय संस्कृति-समर्पण और राष्ट्रीय एकता है। इस नाटक की कथा तीन अंकों में विभाजित है—

1. प्रथम अंक- प्रथम अंक की घटनाएँ विदिशा में घटित होती हैं। यहाँ प्रजा सुखी है, शासन व्यवस्थित है, और शुंग सेनापति विक्रममित्र अपने को महाराज कहलवाना नहीं चाहते—वे स्वयं को सेनापति कहकर ही संतुष्ट रहते हैं। उनके कठोर शासन में बौद्ध पाखंड का अंत हुआ है और ब्राह्मण धर्म को प्रतिष्ठा मिली है।

विक्रममित्र ने एक युवती वासन्ती को बचाया है, जिसे उसके पिता किसी यवन को देना चाहते थे। वह युवक एकमोर से प्रेम करती है। इसी समय कवि-योद्धा कालिदास प्रवेश करते हैं और वृद्ध विक्रममित्र (जो 87 वर्ष के हैं) को उनके आजन्म ब्रह्मचर्य के कारण ‘भीष्म पितामह’ कहते हैं।

अंक में अचानक समाचार आता है कि काशी का सेनापति देवभूति एक यवन-श्रेष्ठी की पुत्री कौमुदी का अपहरण कर ले गया है। विक्रममित्र तत्काल कालिदास को काशी पर चढ़ाई करने और कौमुदी को मुक्त कराने का आदेश देते हैं।

2. द्वितीय अंक- द्वितीय अंक में दो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटित होती हैं—

पहली घटना में तक्षशिला के राजा अन्तिलिक का मंत्री हलोदर विक्रममित्र के पास दूत बनकर आता है। वह भारतीय संस्कृति का प्रशंसक है और सीमा-विवाद को युद्ध की बजाय वार्ता से हल करना चाहता है। वार्ता सफल रहती है और हलोदर विदिशा के लिए रत्नजड़ित स्वर्ण ‘गरुड़ध्वज उपहारस्वरूप देता है।

दूसरी घटना में कालिदास काशी पर आक्रमण कर बौद्ध आचार्यों और दरबार को अपनी विद्वत्ता से प्रभावित करते हैं। वे कौमुदी को मुक्त कराते हैं, देवभूति को बंदी बनाते हैं और काशी-नरेश को भी परास्त कर विदिशा ले आते हैं। विदिशा लौटने पर वासन्ती उनका स्वागत करती है।

3. तृतीय (अंतिम) अंक- अंतिम अंक की घटनाएँ अवन्ति (उज्जयिनी) में घटती हैं। मालवा में शकों का आतंक छाया होता है, किन्तु युवा वीर विषमशील अपने साहस से शकों को परास्त करता है। उसके नेतृत्व में अनेक राजा एकजुट होकर राष्ट्रीय एकता की मिसाल कायम करते हैं। अवन्ति के महाकाल मंदिर पर गरुड़ध्वज सदैव फहराता है—जो शक्ति, धर्म और भारतीय स्वाभिमान का प्रतीक है।

विषमशील के विजयी होकर लौटने पर काशी-राज अपनी पुत्री वासन्ती का विवाह कालिदास से कराने की अनुमति लेता है। इसके बाद राजमाता जैन आचार्यों को क्षमादान देती हैं—यह घटना धर्म-सौहार्द और सामाजिक समन्वय की प्रतीक है।

अंत में कालिदास की मन्त्रणा से विषमशील का नाम बदलकर विक्रमादित्य रखा जाता है—जो भारतीय इतिहास के महानतम सम्राटों में से एक बने। विक्रममित्र संन्यास ग्रहण कर देते हैं और महामंत्री कालिदास विक्रम संवत् का शुभारंभ करते हैं। यहीं नाटक समाप्त होता है।

प्रश्न 2.

‘गरुड़ध्वज’ नाटक का नायक कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पात्र के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
विक्रममित्र की चारित्रिक विशेषताओं का उदघाटन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक पुरुष-पात्र की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के शौर्य एवं त्याग का वर्णन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर ‘विक्रममित्र’ की चारित्रिक विशेषताएँ उद्घाटित कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के विक्रममित्र का चरित्रांकन कीजिए।

उत्तर

विक्रममित्र का चरित्र चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत गरुड़ध्वज नाटक का नायक विक्रममित्र है। नाटक के आरम्भ से लेकर अंत तक सारी घटनाएँ इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हैं, इसलिए इन्हें नाटक का मेरुदण्ड कहा जा सकता है। वे शुंग वंश के अंतिम शासक, ब्रह्मचारी, नीतिपरायण, त्यागी, वीर और प्रजावत्सल शासक के रूप में चित्रित किए गए हैं। उनके चरित्र में आदर्श भारतीय शासन, उच्च नैतिकता, नीति, धर्म-रक्षा और राष्ट्र-सेवा का सम्मिश्रण मिलता है। उनकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

1. सज्जन और आदर्श महापुरुष– विक्रममित्र अत्यंत विनम्र, सादे स्वभाव के और उच्च चरित्र वाले महापुरुष हैं। वे स्वयं को महाराज कहलवाना पसंद नहीं करते, बल्कि सेनापति कहलवाना ही उचित समझते हैं। क्योंकि उनके लिए शासन सिंहासन नहीं, सेवा का माध्यम है। नारियों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है; वे किसी भी स्त्री पर होने वाले अत्याचार को सहन नहीं करते।

2. अनुशासनप्रिय शासक– उनके शासन की सबसे बड़ी विशेषता कठोर अनुशासन है। मर्यादा-भंग उनके राज्य में अक्षम्य अपराध है। यही कारण है कि उनके सेवक भी उनसे आदर और भय दोनों का अनुभव करते हैं। वे स्वयं भी नियमों का पालन करते हैं और दूसरों से भी वही अपेक्षा रखते हैं।

3. प्रजावत्सल और सेवाभावी– विक्रममित्र अपनी प्रजा को संतान के समान स्नेह करते हैं। वे अत्याचारी नहीं, बल्कि प्रजाहितकारी शासक हैं। उनका कथन—

“सेनापति धर्म और जाति का सबसे बड़ा सेवक है।”

वे अपनी प्रजा की सुख-शान्ति को सर्वोपरि मानते हैं और किसी प्रकार का अत्याचार नहीं होने देते। उनकी प्रजावत्सलता ही उन्हें एक लोकप्रिय शासक बनाती है।

4. वैदिक संस्कृति और भागवत धर्म के रक्षक– विक्रममित्र वैदिक संस्कृति की रक्षा को अपना जीवन-धर्म मानते हैं। वे ब्राह्मण धर्म को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष करते हैं। उनके आदेश से कालिदास काशी जाकर बौद्ध आचार्यों को तर्क से परास्त करते हैं—यह उनकी धर्म-रक्षा का प्रमाण है।

5. संगठित राष्ट्र-निर्माता– विक्रममित्र एक महान राष्ट्र-निर्माता हैं। उस समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था, परन्तु उन्होंने इन्हें एकजुट कर एक सुदृढ़ राष्ट्र की स्थापना की। उनका वाक्य—

“देश का गौरव और उसकी शांति की रक्षा ही मेरा धर्म है।”

उनके प्रयासों से भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरता है।

6. निष्काम कर्मयोगी और त्यागी– यद्यपि वे राजा हैं, फिर भी ‘महाराजा’ कहलाना पसंद नहीं करते। उनका जीवन कर्तव्य और सेवा से संचालित है, न कि पद और अधिकार से। जब विषमशील योग्य हो जाता है, तो वे सिंहासन छोड़कर संन्यास ले लेते हैं। कालिदास का उन्हें “भीष्म पितामह” कहना उनके निष्काम कर्म की सच्ची पहचान है।

7. नीतिप्रिय और न्यायप्रिय नेता– विक्रममित्र के राज्य में किसी भी प्रकार की अनीति दबाई नहीं जा सकती। वे कहते हैं—

“विक्रममित्र के शासन में अनीति चाहे कितनी छोटी क्यों न हो, छिप नहीं सकती।”

इससे सिद्ध होता है कि वे न्याय को सर्वोच्च मानने वाले आदर्श राजनेता हैं।

8. शरणागतवत्सल– उनकी शरण में आने वाला चाहे कोई भी हो, वे उसकी रक्षा अवश्य करते हैं। चंचु और कालकाचार्य को क्षमादान देना उनकी दयालुता और उदारता का प्रमाण है।

9. निरभिमानी और विनम्र– राजा होकर भी उनमें अहंकार का लेश मात्र भी नहीं है। राजदूत हलोदर जब उनकी प्रशंसा करता है, तो वे कहते हैं—

“जब सारा श्रेय मुझे दिया जाता है, तो मैं लज्जा से भर उठता हूँ।”

उनके भीतर की सादगी उन्हें एक महापुरुष के रूप में स्थापित करती है।

प्रश्न 3

‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर (नायिका) वासन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ के प्रमुख नारी-पात्र (नायिका) के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख स्त्री-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

वासन्ती का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र रचित ‘गरुड़ध्वज नाटक की नायिका वासन्ती है। वह काशी–नरेश की इकलौती, अत्यन्त संस्कारी और रूपवती पुत्री है। बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण राजकुल उससे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने में संकोच करते हैं। परिणामस्वरूप काशिराज उसकी असहमति के बावजूद उसका विवाह शाकल के वृद्ध यवन राजकुमार से करने को तैयार हो जाते हैं।
किन्तु विक्रममित्र के प्रयास से वासन्ती इस अनचाहे विवाह से बच जाती है और कालिदास की प्रेयसी के रूप में नाटक में उज्ज्वल स्थान प्राप्त करती है। उसके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

(1) रूप-लावण्य की प्रतिमूर्ति– वासन्ती रूप, गुण और कान्ति में अनुपम है। उसका सौन्दर्य केवल व्यक्तित्व को नहीं, बल्कि हृदय को भी मोह लेता है।
कुमार विषमशील कालिदास से कहते हैं—
“और तुम्हारी वासन्ती—रूप और गुण का इतना अद्भुत मिश्रण… पता नहीं कितने कुण्ड इस पर्वतीय स्रोत के सामने फीके पड़ेंगे।”
इससे स्पष्ट है कि वासन्ती रूप-सौन्दर्य में अद्वितीय नारी है।

(2) उदार हृदय तथा प्रेमभावना से परिपूर्ण– वासन्ती के हृदय में प्रेम और उदारता की धारा निरंतर बहती है। वह सभी प्राणियों—बड़े-छोटे, अपने-पराये—के प्रति एक समान करुणा और अपनत्व रखती है। उसका कोमल स्वभाव उसे नाटक की सबसे सहदय पात्र के रूप में प्रस्तुत करता है।

(3) धार्मिक संकीर्णता से पीड़ित– उसके पिता बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। उस समय की धार्मिक संकीर्णता ऐसी थी कि कोई भी राजकुल इस कारण वासन्ती से विवाह-संबंध नहीं जोड़ना चाहता। यह स्थिति वासन्ती को मानसिक रूप से आहत करती है। धार्मिक प्रतिबंधों और संकीर्ण विचारों के कारण उसका जीवन संकटों से घिर जाता है। यही कारण है कि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए बाध्य की जाती है।

(4) आत्मग्लानि एवं निराशा से व्यथित– प्रिय न होने वाले विवाह के दबाव, समाज की संकीर्ण सोच और अपनी असहायता से पीड़ित होकर वासन्ती आत्मग्लानि में डूब जाती है। वह स्वयं को इतना असहाय पाती है कि वह अपने जीवन का अन्त करने का प्रयास करती है। किन्तु उसी समय विक्रममित्र उसे रोक लेते हैं। वह वेदनापूर्ण स्वर में कहती है—
“वह महापुरुष कौन होगा, जो स्वेच्छा से आग के साथ विनोद करेगा?”
यह संवाद उसकी गहन पीड़ा और आत्मसम्मान दोनों को उजागर करता है।

(5) स्वाभिमानिनी एवं दृढ़ नारी– विश्व के सामने वह चाहे कितनी ही असहाय क्यों न हो, परन्तु अपने निर्णयों में वह दृढ़ है। वासन्ती किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं करना चाहती, जो केवल विक्रममित्र के दबाव में उससे संबंध स्थापित करे। उसका यह व्यवहार स्पष्ट करता है कि वह स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान की प्रतीक है।

(6) सहृदया और विनोदप्रिय– यह सच है कि वह परिस्थिति से दुखी है, पर उसका हृदय विनोदप्रिय और रसिक भी है। कालिदास की काव्य–श्रृंखला उसे अत्यन्त आकृष्ट करती है। वह कला और सौन्दर्य की सच्ची उपासिका है।

(7) आदर्श प्रेमिका– वासन्ती एक पवित्र, त्यागमयी, भावुक और आदर्श प्रेमिका है। उसका प्रेम वासना या आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मिक और पावन भावनाओं पर आधारित है। कालिदास के प्रति उसके हृदय में सच्चा प्रेम है, जो उसे सशक्त बनाता है।

प्रश्न 4

‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर नायिका ‘मलयवती’ का चरित्रांकन कीजिए।

उत्तर

मलयवती का चरित्र-चित्रण

राजकुमारी मलयवती, श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत नाटक गरुड़ध्वज की प्रमुख नायिका है। उसका चरित्र अत्यन्त प्रभावशाली, सौम्य, विनोदी, कलाप्रिय और आदर्श प्रेम से ओतप्रोत है। पूरे नाटक में उसके व्यक्तित्व की विविध विशेषताएँ पाठकों को आकर्षित करती हैं। उसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. अपूर्व सुन्दरी– मलयवती रूप और सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति है। वह मलय देश की राजकुमारी होने के साथ-साथ अत्यन्त मनोहारिणी है। विदिशा के राजउद्यान में उसका सौन्दर्य देखकर कुमार विषमशील भी मोहित हो जाते हैं। उसका रूप नाटक में अनेक पात्रों को आकर्षित करता है।

2. ललित कलाओं की प्रेमिका– मलयवती को संगीत, नृत्य, चित्रकला और अन्य ललित कलाओं में गहरी रुचि है। इन्हीं कलाओं में दक्षता प्राप्त करने के लिए वह विदिशा आती है और वहाँ विशेष रूप से चित्रकला तथा संगीत का गहन अभ्यास करती है। इससे पता चलता है कि वह कला-प्रिय एवं प्रतिभाशाली राजकुमारी है।

3. हँसमुख एवं विनोदप्रिय स्वभाव– मलयवती का स्वभाव अत्यन्त प्रसन्नचित्त और विनोदी है। वह अपनी सखी वासन्ती के साथ खुलकर हास-परिहास करती है। जब महाकवि कहते हैं कि मलयवती और वासन्ती को राजकुमारी के स्थान पर राजकुमार होना चाहिए था, तो वह हँसते हुए चुटकी लेती है—
“इस तरह की उलट-फेर में तो कुमारों को कुमारियाँ होना पड़ेगा, और महाकवि भी कहीं उस चक्र में न आ जाएँ!”
उसकी यह बात उसके चंचल, सरल और हास्यमय व्यक्तित्व का प्रमाण है।

4. आदर्श एवं एकनिष्ठ प्रेमिका– मलयवती के हृदय में कुमार विषमशील के प्रति गहरा प्रेम है। वह हृदय से उनका वरण करती है और एकनिष्ठ भाव से केवल उन्हीं का चिन्तन करती है। वह स्वप्न में भी किसी अन्य का विचार नहीं स्वीकारती। उसका प्रेम शुद्ध, पवित्र और विश्वासपूर्ण है। अंततः इसी सच्चे प्रेम की विजय होती है और उसका विवाह कुमार विषमशील से हो जाता है।

मलयवती का चरित्र एक अपूर्व सुन्दरी, कलाप्रिय, हँसमुख, बुद्धिमती, दृढ़-निश्चयी और आदर्श प्रेमिका का प्रतीक है। वह नाटक में एक आदर्श राजकुमारी की छवि को पूर्णता प्रदान करती है।

प्रश्न 5

‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर कालिदास का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

कालिदास का चरित्र-चित्रण

‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्रों में कालिदास अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। नाटक में उनका चरित्र वीरता, बुद्धिमत्ता, काव्य-प्रतिभा, मित्रता और प्रेम—सभी गुणों से संपन्न दिखाई देता है। विक्रममित्र और विषमशील के बाद यदि किसी पात्र का प्रभाव सर्वाधिक दिखाई देता है, तो वह कालिदास ही हैं। वे कवि भी हैं, सैनिक भी, मित्र भी और न्यायप्रिय व्यक्तित्व भी। नाटक में उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. अदम्य वीरता– कालिदास केवल महाकवि ही नहीं, बल्कि एक साहसी योद्धा भी हैं। जब दुष्ट देवभूति कौमुदी का अपहरण कर ले जाता है, तब कालिदास वीरतापूर्वक उसका पीछा करते हैं और उसे काशी में जाकर पकड़ लाते हैं। इस कार्य से उनका पराक्रम स्पष्ट होता है। यही वीरता देखकर काशीराज प्रसन्न होते हैं और राजकुमारी वासन्ती स्वयं उनसे प्रेम करने लगती है।

2. सच्चे और हँसमुख मित्र– कालिदास, राजकुमार विषमशील के अत्यन्त निकट मित्र हैं। दोनों के बीच परिहास, हास्य और आत्मीय वार्तालाप लगातार चलते रहते हैं। कालिदास अपने मित्र विषमशील को मलयवती के प्रति उनके आकर्षण को लेकर चुटकी लेते हुए कहते हैं—
“किस तरह भूल गये विदिशा के प्रासाद का वह उपवन… घूम-घाम कर मलयवती को आँखों से पी जाना चाहते थे।”
यह संवाद उनके विनोदप्रिय, सरल और आत्मीय मित्र-स्वभाव का प्रमाण है।

3. आदर्श प्रेमी और संवेदनशील कवि– कालिदास वासन्ती से सच्चा प्रेम करते हैं और उसके मान-सम्मान के प्रति अत्यन्त सजग रहते हैं। जब वासन्ती की पवित्रता पर किसी प्रकार की शंका व्यक्त की जाती है, तब कालिदास स्पष्ट शब्दों में कहते हैं—
“उन्होंने तो उस यवन को देखा भी नहीं, फिर उसकी पवित्रता में शंका करना पार्वती की पवित्रता में शंका करना होगा।”
यह कथन उनके पवित्र प्रेम, संवेदनशीलता और दृढ़ विश्वास को दर्शाता है। साथ ही, उनके काव्य-विचार और भाषा-चातुर्य से उनका ‘महाकवि’ स्वरूप भी उजागर होता है। इसी कारण नाटक में मलयवती भी उन्हें हँसते हुए “महाकवि” कहकर संबोधित करती है।

4. गुणों का विलक्षण संगम– कालिदास मात्र कवि या सैनिक ही नहीं, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। उनमें वीरता, कोमलता, कठोरता, न्यायप्रियता और प्रेम—सभी का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। वे राजकार्य का सम्मान करते हैं और साथ ही हृदय से भावुक भी हैं। उनके व्यक्तित्व में शक्ति और सौम्यता का संतुलन दिखाई देता है।

नाटक के सभी पुरुष-पात्रों में कालिदास सर्वथा विशिष्ट दिखाई देते हैं। वे वीर योद्धा, सच्चे मित्र, आदर्श प्रेमी, महाकवि, उदार हृदय और विवेकशील पुरुष इन सभी गुणों के धनी हैं। इस प्रकार उनका चरित्र ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की शक्ति, आकर्षण और श्रेष्ठता का एक महत्वपूर्ण आधार है।

प्रश्न 6

‘गरुडध्वज’ के आधार पर विषमशील का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विषमशील के शौर्य एवं त्याग का वर्णन कीजिए।

उत्तर

विषमशील का चरित्र-चित्रण

‘गरुड़ध्वज’ नाटक में कुमार विषमशील एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पात्र हैं। वे मालवा के गर्दभिल्लवंशी महाराज महेन्द्रादित्य के वीर वंशज हैं। उनका चरित्र नाटक के आरम्भ से अंत तक निरंतर विकसित होता है। उनमें उच्च आदर्श, वीरता, प्रेम, त्याग और विवेक मिलकर उन्हें एक आदर्श राजकुमार के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

1. उदार और गुणग्राही स्वभाव– कुमार विषमशील का हृदय अत्यंत विशाल और उदार है। वे सदैव दूसरों के गुणों को पहचानते और उनका सम्मान करते हैं। कवि कालिदास की काव्य-प्रतिभा, वीरता और व्यक्तित्व से वे अत्यंत प्रभावित रहते हैं और उनसे गहरा मैत्री-संबंध स्थापित कर लेते हैं। उनकी यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि वे अहंकाररहित और गुणों को ग्रहण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष हैं।

2. अद्भुत वीरता और शौर्य– विषमशील के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनकी वीरतापूर्ण वृत्ति है। वे अपने शौर्य बल से शकारि क्षत्रियों को पराजित करते हैं और अनेक क्षेत्रों में विजय प्राप्त करते हैं। उनकी योग्यता देखकर ही सेनापति विक्रममित्र निश्चिंत होकर उन्हें राज्य की बागडोर सौंपने की घोषणा करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विषमशील एक योग्य, पराक्रमी और सक्षम सेनानायक हैं।

3. भावुक और सच्चे प्रेमी– यद्यपि विषमशील धीर, गंभीर और संयमी स्वभाव के हैं, फिर भी जब मलय देश की राजकुमारी मलयवती को देखते हैं, तो उनके भीतर प्रेम का अंकुर फूट पड़ता है। यह प्रेम शुद्ध, ईमानदार और गंभीर है। वे मलयवती के प्रति बाहरी दिखावे के बजाय हृदय की सच्ची भावनाओं से जुड़ते हैं। यह उन्हें एक आदर्श प्रेमी के रूप में प्रस्तुत करता है।

4. विवेकशील और संयमी व्यक्तित्व– कुमार विषमशील परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेने वाले विवेकशील व्यक्ति हैं। कालिदास के साथ वे मित्रवत हास्य करते हैं लेकिन विक्रममित्र जैसे वरिष्ठ सेनापति के सामने अत्यंत विनम्र और संयत रहते हैं। जब विक्रममित्र साकेत और पाटलिपुत्र की सत्ता भी उन पर सौंपना चाहते हैं, तब विषमशील विनम्रता और विवेक से कहते हैं कि—
“अवन्ति में रहते हुए इतने दूरस्थ राज्यों की व्यवस्था करना सरल नहीं। अभी कुछ दिन आप ही इसकी व्यवस्था करें।”
यह उनका राजनीतिक परिपक्वता, दूरदृष्टि और आत्मसंयम दर्शाता है।

5. कृतज्ञ और विनम्र स्वभाव– विषमशील दूसरों के उपकार को हृदय से स्वीकार करते हैं। कालिदास के प्रति कृतज्ञ होकर वे कहते हैं—
“तुम्हारा अधिकार मेरे मन पर सदैव बना रहे— यही मेरी कामना है।”
उनका विनम्र और आभारी स्वभाव उनके उच्च चरित्र की पहचान है।

नाटक में उनका चरित्र एक ऐसे राजकुमार की छवि प्रस्तुत करता है, जो मानवता, न्याय, प्रेम और कर्तव्य—सभी में संतुलन बनाए रखता है। इसलिए विषमशील को इस नाटक का “आदर्श नायक” कहा जा सकता है।

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