भगवतशरण उपाध्याय का जीवन-परिचय | Bhagwat Sharan Upadhyay Ka Jivan Parichay

प्रस्तावना

भगवतशरण उपाध्याय हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रसिद्ध विद्वान, इतिहासकार, पुरातत्वज्ञ तथा आलोचक थे। वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने भारतीय इतिहास, संस्कृति और समाज के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका व्यक्तित्व एक इतिहासवेत्ता, संस्कृति मर्मज्ञ, विचारक, निबंधकार, आलोचक और कथाकार के रूप में अत्यंत प्रतिष्ठित था। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय संस्कृति की गहराई और उसकी समन्वयकारी परंपरा को उजागर किया।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उनका परिवार शिक्षित और संस्कारी था। बचपन से ही उनकी रुचि अध्ययन, इतिहास और साहित्य के प्रति थी।

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उन्होंने अपने अध्ययन के दौरान भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व का गहन अध्ययन किया। यही अध्ययन आगे चलकर उनके जीवन का मुख्य क्षेत्र बन गया।

शिक्षा

भगवतशरण उपाध्याय ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और इतिहास, संस्कृति तथा पुरातत्व के क्षेत्र में गहरा ज्ञान अर्जित किया। वे अत्यंत विद्वान और अध्ययनशील व्यक्ति थे।

उनकी विद्वत्ता के कारण उन्हें देश-विदेश की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं से जुड़ने का अवसर मिला। उन्होंने अपने ज्ञान और शोध के माध्यम से भारतीय संस्कृति और इतिहास को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई।

साहित्यिक और विद्वतापूर्ण जीवन

भगवतशरण उपाध्याय का साहित्यिक जीवन अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण था। उन्होंने आलोचना, निबंध, कहानी, नाटक, यात्रावृत्त, रिपोर्ताज, बाल साहित्य तथा इतिहास विषयों पर लेखन किया।

वे भारतीय संस्कृति और इतिहास के गंभीर अध्येता थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों का गहन विश्लेषण किया। उनकी आलोचना में सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

उन्होंने भारतीय संस्कृति की समन्वयात्मक परंपरा को अपने ऐतिहासिक ज्ञान के माध्यम से स्पष्ट किया। उनके लेखन में भारतीय सभ्यता के विभिन्न पहलुओं का गहरा अध्ययन दिखाई देता है।

संपादन कार्य

भगवतशरण उपाध्याय ने संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने तीन खंडों में “भारतीय व्यक्तिकोश” का निर्माण किया, जो भारतीय व्यक्तित्वों का महत्वपूर्ण संकलन है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित “हिंदी विश्वकोश” के चार खंडों का संपादन भी किया। यह कार्य हिंदी साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

प्रमुख हिंदी कृतियाँ

भगवतशरण उपाध्याय की प्रमुख हिंदी कृतियाँ निम्नलिखित हैं —

  • भारतीय संस्कृति के स्रोत
  • कालिदास का भारत (दो खंड)
  • गुप्तकालीन संस्कृति
  • भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण
  • कालिदास और उनका युग
  • भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका
  • भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ (दो खंड)
  • प्राचीन यात्री (तीन खंड)
  • सांस्कृतिक चिंतन
  • इतिहास साक्षी है
  • ख़ून के छींटे इतिहास के पन्नों पर
  • समीक्षा के संदर्भ
  • साहित्य और परंपरा

इन रचनाओं में भारतीय संस्कृति, इतिहास और समाज का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

अंग्रेज़ी कृतियाँ

भगवतशरण उपाध्याय ने अंग्रेज़ी भाषा में भी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं —

  • इंडिया इन कालिदास
  • विमेन इन ऋग्वेद
  • द एंशेण्ट वर्ल्ड
  • फ़ीडर्स ऑफ़ इंडियन कल्चर

इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिचित कराया।

व्यक्तित्व और विचारधारा

भगवतशरण उपाध्याय का व्यक्तित्व अत्यंत विद्वत्तापूर्ण और बहुआयामी था। वे एक साथ पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार, आलोचक और साहित्यकार थे। उनका दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक और गहन था। उन्होंने इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों को विशेष महत्व दिया।

वे भारतीय संस्कृति की समन्वयात्मक परंपरा के समर्थक थे और अपने लेखन में उन्होंने संस्कृति की सामासिकता को स्पष्ट किया।

राजनयिक जीवन

अपने जीवन के अंतिम समय में भगवतशरण उपाध्याय मॉरीशस में भारत के राजदूत के रूप में कार्य कर रहे थे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत और मॉरीशस के सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निधन

भगवतशरण उपाध्याय का निधन 12 अगस्त 1982 को मॉरीशस में हुआ। उनके निधन से हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास के अध्ययन के क्षेत्र में एक महान विद्वान का अंत हो गया।

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