‘आन का मान नाटक’ का सारांश | Aan Ka Maan Natak ka Saaransh

प्रश्न 1


आन का मान’ नाटक की कथावस्तु (सारांश अथवा कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक का कथासार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के मार्मिक स्थलों का वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक की कथा (सारांश) संक्षेप में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।

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उत्तर

प्रथम अंक (कथा का आरम्भ)- श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की कथा की शुरुआत राजस्थान के तपते हुए रेगिस्तान से होती है। यह समय मुगल सम्राट औरंगजेब के शासन का है जब जोधपुर पर महाराजा जसवंत सिंह का राज्य था। महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उनके अवयस्क पुत्र अजीत सिंह की रक्षा और पालन की जिम्मेदारी उनके निष्ठावान और वीर सेनापति दुर्गादास पर आ जाती है। दुर्गादास केवल जोधपुर का सैनिक नहीं, बल्कि राजपूत मर्यादा, धर्म और परंपराओं का सच्चा रक्षक है।

उधर मुगल राजवंश में भी असंतोष व्याप्त है। अकबर द्वितीय के पुत्र बुलन्द अख्तर और पुत्री सफीयतुन्निसा औरंगजेब की कठोर, धार्मिक कट्टरता से भरी नीतियों का विरोध करते हैं। वे मानते हैं कि औरंगजेब हिंदू प्रजा पर अन्याय कर रहा है। इन्हीं परिस्थितियों में बुलन्द और सफीयत, दुर्गादास की सुरक्षा में रहते हुए जोधपुर आ जाते हैं। समय बीतने के साथ अजीत सिंह युवक हो उठता है और वह शासन संभालने लगता है। इसी दौरान अजीत सिंह और सफीयत के बीच अनकहा प्रेम जन्म लेता है।

परंतु सफीयत जानती है कि “हिंदू राजपूत युवक” और “मुगल मुसलमान युवती” का विवाह सामाजिक दृष्टि से कठिन होगा। दुर्गादास भी अजीत को समझाते हैं कि “राजपूत की आन उसका धर्म और मर्यादा है, और इसी आन का मान रखना जीवन का व्रत है।” प्रथम अंक उसी संघर्षपूर्ण वातावरण में समाप्त होता है।

द्वितीय अंक (नाटक का मार्मिक और भावनात्मक भाग)- द्वितीय अंक नाटक का सबसे भावुक और मार्मिक हिस्सा है। कथा का स्थान अब भीमनदी के तट पर स्थित ब्रह्मपुरी है जिसे औरंगजेब ने ‘इस्लामपुरी’ का नाम दे दिया है। इस अंक में औरंगजेब की दो पुत्रियों—मेहरुन्निसा और जीनतुन्निसा—के विचार सामने आते हैं। मेहरुन्निसा उदार विचारों की है और हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को गलत मानती है। जीनतुन्निसा पूर्णतः औरंगजेब के पक्ष में है।

मेहरुन्निसा द्वारा प्रजा की पीड़ा बताने पर औरंगजेब पहली बार अपने कठोर निर्णयों पर पश्चात्ताप महसूस करता है। वह अपने बेटों को प्रजा के प्रति उदार बनने की सलाह देता है और अपने अंतिम दिनों में यह वसीयत करता है कि उसका अंतिम संस्कार सादगी से किया जाए।

इसी बीच औरंगजेब के सैनिकों द्वारा दुर्गादास पकड़ा जाता है और राजदरबार में लाया जाता है। औरंगजेब दुर्गादास से सौदेबाजी करता है कि यदि वह बुलन्द और सफीयत को उसके हवाले कर दे, तो उसकी जान बचा ली जाएगी। परंतु दुर्गादास राजपूत धर्म, विश्वास, कर्तव्य और आन के लिए अपनी जान भी दाँव पर लगाने को तैयार हैं। वह औरंगजेब का प्रस्ताव ठुकरा देता है।

द्वितीय अंक का वातावरण तनावपूर्ण, करुण और चरम संवेदनात्मक प्रभाव लिए हुए है।

तृतीय अंक (त्याग, धर्म और मर्यादा)- तृतीय अंक में कथा अपने चरम और निर्णायक मोड़ पर पहुँचती है। अजीत सिंह सफीयत से विवाह करना चाहता है और बार–बार उसे मनाने की कोशिश करता है। लेकिन सफीयत अत्यंत उदार, समझदार और त्यागभाव से भरी है। वह कहती है—

“महाराज! प्रेम केवल भोग की नहीं, त्याग और बलिदान की भी माँग करता है।”

सफीयत समझती है कि हिंदू—मुस्लिम वैवाहिक संबंध उस समय समाज में भारी असंतोष और संघर्ष ला सकता है। इसलिए वह समाज और राज्य की भलाई को अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊँचा मानती है।

जब दुर्गादास सफीयत को पालकी में बैठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने लगते हैं, तब अजीत सिंह क्रोधित होकर उनके रास्ते में आ जाता है और कहता है—
“दुर्गादास जी! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं!”

दुर्गादास जानते हैं कि राजपूत मर्यादा में राजा की आज्ञा को सर्वोपरि माना जाता है। वे हृदय के भारी दुःख के साथ मातृभूमि को अंतिम प्रणाम करते हैं और राज्य छोड़ देते हैं। यही राजपूत आन और मान की वह सर्वोत्तम मिसाल है जिसके लिए पूरा नाटक लिखा गया है। सफीयत के विदा होने और दुर्गादास के स्वाभिमानी त्याग के साथ नाटक समाप्त हो जाता है।

‘आन का मान’ एक अत्यंत प्रभावशाली ऐतिहासिक नाटक है, जो त्याग, धर्मपालन, परंपराएँ, प्रेम, कर्तव्य, राष्ट्रभक्ति और मान–मर्यादा जैसे उच्च मूल्यों को जीवंत करता है। दुर्गादास का चरित्र राजपूत वीरता का प्रतीक बनकर उभरता है।

प्रश्न 2

‘आन का मान’ के आधार पर वीर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए अथवा चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) को चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“दुर्गादास का चरित्र ‘आन का मान’ नाटक को प्राणतत्त्व है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर उस प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।

उत्तर

वीर दुर्गादास का चरित्र चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ का नायक वीर दुर्गादास राठौर एक आदर्शवादी, कर्तव्यनिष्ठ, स्वामिभक्त और मानवता से परिपूर्ण चरित्र है। पूरा नाटक उसी के चारों ओर घूमता है, इसलिए वह नाटक का मूल आधार तथा प्राणतत्त्व है। उसकी वीरता, त्याग, न्यायप्रियता और अदम्य साहस उसे साहित्य का प्रेरणादायक चरित्र बनाते हैं।

1. मानवतावादी दृष्टिकोण– दुर्गादास का सबसे प्रमुख गुण उसकी मानवतावादी सोच है। वह धर्म, संस्कृति और वर्ग के भेद से ऊपर उठकर सोचता है। वह औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय को मुसलमान होते हुए भी सच्चा मित्र मानता है और सफीयतुन्निसा की रक्षा हेतु अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। उसकी नज़र में मनुष्य बड़ा है, धर्म छोटा।

2. हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक– दुर्गादास धार्मिक कट्टरता को नहीं मानता। वह भारत को हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का समान देश मानता है। उसका विश्वास है कि दोनों समुदाय मिलकर ही देश को महान बना सकते हैं। उसका चरित्र दोनों संस्कृतियों के मधुर समन्वय का प्रतीक है।

3. वचन का पक्का व राजपूत मर्यादा- दुर्गादास सच्चा राजपूत है—वचन का धनी और मान-मर्यादा का संरक्षक। वह कहता है कि “राजपूत की आन ही उसका जीवन है।” महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजीत सिंह की सुरक्षा के लिए वह अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करता है और अपनी निष्ठा पर कभी आंच नहीं आने देता।

4. सत्य, न्याय और देशभक्ति– दुर्गादास देश के प्रति अत्यंत निष्ठावान है। उसका विश्वास है कि राजपूतों की तलवार केवल न्याय और सत्य की रक्षा के लिए उठती है। देश, धर्म और समाज के लिए वह निजी सुख-सुविधाओं का त्याग कर देता है। उसकी देशभक्ति उसे नाटक का सर्वोच्च आदर्श पात्र बनाती है।

5. स्वामिभक्त और ईमानदार मित्र– दुर्गादास सच्चा मित्र और स्वामीभक्त है। अकबर द्वितीय के सभी साथी उसे छोड़ देते हैं, परंतु दुर्गादास कठिन समय में भी उसके साथ खड़ा रहता है और उसे सुरक्षित ईरान भेजता है। वह मित्रता और निष्ठा की ऊँची मिसाल है। कासिम भी उसकी निष्ठा की प्रशंसा करता है।

6. कर्तव्यपरायण और न्यायप्रिय– दुर्गादास हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य को सर्वोच्च मानता है। वह निजी भावनाओं से ऊपर उठकर राज्यहित और जनहित के लिए काम करता है। औरंगजेब भी उसकी कर्तव्यनिष्ठा को स्वीकार करता है। उसका यह गुण उसे आदर्श प्रशासक और सच्चा रक्षक सिद्ध करता है।

7. सुशासन का समर्थक– दुर्गादास मानता है कि अच्छा शासन प्रजा के लिए भगवान का वरदान होता है। इसलिए वह राज्य में न्याय, शांति और व्यवस्था को सर्वोपरि रखता है। उसकी सोच में आदर्श शासन और आदर्श समाज का सुंदर चित्र दिखाई देता है।

इस प्रकार वीर दुर्गादास का चरित्र वीरता, त्याग, निष्ठा, मानवता, धार्मिक सहिष्णुता और देशभक्ति का अद्वितीय संगम है। वह न केवल ‘आन का मान’ नाटक का नायक है, बल्कि पाठकों के लिए प्रेरणादायक आदर्श भी है। निश्चय ही कहा जा सकता है कि दुर्गादास का चरित्र ही इस नाटक का वास्तविक प्राणतत्त्व है।

प्रश्न 3

‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

औरंगज़ेब का चरित्र-चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित नाटक आन का मान में औरंगज़ेब को वीर दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी, कट्टर शासक तथा नाटक का मुख्य खलनायक रूप में चित्रित किया गया है। वह पूरे भारत पर एकछत्र शासन स्थापित करना चाहता है तथा हिन्दू समाज और मंदिरों के अस्तित्व को मिटाने के कुत्सित प्रयास करता है। उसके चरित्र के प्रमुख गुण निम्न प्रकार हैं—

1. कट्टर धार्मिक और संकीर्ण विचारधारा वाला व्यक्ति– औरंगज़ेब स्वभाव से अत्यंत कट्टर सुन्नी मुसलमान है। उसकी दृष्टि में इस्लाम के अतिरिक्त अन्य सभी धर्म हीन माने जाते हैं। वह चाहता है कि सब लोग इस्लाम को ही अपनाएँ। इसी कारण वह जोधपुर के कुमार अजीत सिंह को भी मुसलमान बनाने का षड्यंत्र करता है। धार्मिक संकीर्णता उसके पूरे व्यवहार में स्पष्ट झलकती है।

2. नृशंस, निर्दयी और क्रूर शासक– सत्ता प्राप्ति के लिए औरंगज़ेब किसी भी हद तक जा सकता है। वह अपने भाइयों दारा तथा शुजा की निर्ममता से हत्या कर देता है। अपने पिता शाहजहाँ, पुत्र कामबख्श, तथा पुत्री जेबुन्निसा को कैद कर देता है। उसे किसी पर दया नहीं आती; उसका हृदय कठोर और करूणाहीन है।

3. सादा जीवन-पसंद शासक– यद्यपि वह शक्तिशाली सम्राट है, फिर भी व्यक्तिगत जीवन में बहुत सादगी रखता है। वह सरकारी खजाने से अपने खर्च नहीं निकालता, बल्कि टोपी सिलकर और कुरान की आयतें लिखकर उनकी बिक्री से अपनी आजीविका चलाता है। विलासिता से दूरी उसका महत्त्वपूर्ण गुण है।

4. आत्मग्लानि से पीड़ित मनुष्य– बुढ़ापे में आकर औरंगज़ेब अपने जीवन के पाप, क्रूर कर्मों और अत्याचारों को याद कर गहरी ग्लानि महसूस करता है। वह मेहरुन्निसा से कहता है—

“हाथ थक गये हैं बेटी, सिर काटते-काटते।”

वसीयत में वह अपने पुत्रों से स्वयं को क्षमा करने की विनती करता है। यह दर्शाता है कि उसके कठोर मन में भी कहीं न कहीं पश्चाताप शेष है।

5. स्नेहभाव से युक्त पिता– युवा अवस्था में पिता और संतान दोनों के प्रति क्रूर रहने वाला औरंगज़ेब, वृद्धावस्था में अत्यधिक भावुक और स्नेहपूर्ण हो जाता है। वह अपने प्रिय पुत्र अकबर द्वितीय, जो ईरान में है, को सीने से लगाने के लिए अत्यंत व्याकुल दिखाई देता है। इस परिवर्तन से उसके भीतर का मानवीय पक्ष सामने आता है।

प्रश्न 4

सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की नायिका के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर स्त्री पात्र ‘सफीयतुन्निसा’ का चरित्रांकन कीजिए।

उत्तर

सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण

नाटक ‘आन का मान’ की प्रमुख नारी-पात्र सफीयतुन्निसा अत्यन्त प्रभावशाली, आदर्शवादी और बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी है। वह औरंगज़ेब के विरोधी पुत्र अकबर द्वितीय की पुत्री है। अकबर द्वितीय को ईरान भागना पड़ता है, जिससे सफीयतुन्निसा और उसके भाई बुलन्द अख्तर का पालन-पोषण वीर दुर्गादास राठौर करते हैं। यही परिवेश उसके चरित्र में त्याग, राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यपरायणता के गुण विकसित करता है।

नीचे सफीयतुन्निसा के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ प्रस्तुत हैं—

1. अत्यन्त रूपवती- सफीयतुन्निसा केवल 17 वर्ष की युवा है और अत्यन्त सुंदर, मनमोहक एवं आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी है। नाटक के अनेक पात्र उसके रूप-सौन्दर्य से प्रभावित हैं। उसका सौम्य एवं तेजस्वी रूप उसके चरित्र में नारी-शक्ति का प्रतीक बनकर उभरता है।

2. वाक्-पटु- सफीयतुन्निसा अपनी बात तर्कपूर्ण, प्रभावशाली और व्यंग्ययुक्त ढंग से कहने में निपुण है। कठिन परिस्थितियों में भी वह वाक्-कौशल का अद्भुत परिचय देती है। उसके शब्द न केवल मार्मिक होते हैं, बल्कि परिस्थिति को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।

3. संगीत प्रेमी- संगीत उसकी आत्मा है। वह एक उच्चस्तरीय संगीत-साधिका है। उसका मधुर स्वर सुनकर कोई भी मोहित हो जाता है। उसके गीतों में भावनाओं की सच्चाई और कोमलता स्पष्ट झलकती है।

4. त्याग, बलिदान और देशप्रेम– सफीयतुन्निसा के हृदय में राष्ट्रहित सर्वोपरि है। वह अपने जीवन, सुख और भावनाओं का त्याग देश की सुरक्षा के लिए करने को सदैव तैयार रहती है। उसके चरित्र में नारी के रूप में बलिदानी भावना का उत्कृष्ट रूप दिखायी देता है।

5. कर्तव्यनिष्ठ और राष्ट्र-समर्पित– वह कर्तव्य-पालन को जीवन का सर्वोच्च धर्म मानती है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने के लिए वह अपने भाई बुलन्द अख्तर के हाथ में राखी बाँधकर उसे युद्धभूमि में भेजती है। अपना व्यक्तिगत प्रेम और सुख भूलकर जनहित को प्राथमिकता देना उसकी कर्तव्यनिष्ठा को सिद्ध करता है।

6. शान्तिप्रिय एवं हिंसा-विरोधी– सफीयतुन्निसा चाहती है कि देश में शान्ति, सद्भाव और समृद्धि का वातावरण रहे। वह किसी भी प्रकार की हिंसा, क्रूरता और अत्याचार का प्रबल विरोध करती है। उसका चरित्र नारी के कोमल, संवेदनशील तथा करुणामय हृदय को दर्शाता है।

7. आदर्श प्रेमिका– सफीयतुन्निसा जोधपुर के युवराज अजीतसिंह से सच्चा प्रेम करती है। प्रेम में होने के बावजूद वह भावनाओं में बहकर गलत निर्णय नहीं लेती। वह अजीतसिंह को भी समझाती है कि—

“महाराज! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

इस प्रकार वह अपने प्रेम को उच्च, पवित्र और आदर्श रूप प्रदान करती है।

सफीयतुन्निसा ‘आन का मान’ की आदर्श नायिका है सौन्दर्य, बुद्धिमत्ता, त्याग, देशप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और आदर्श प्रेम जैसे सभी गुण उसके चरित्र को प्रभावशाली बनाते हैं। वह न केवल नाटक की नायिका है, बल्कि स्त्री–शक्ति और राष्ट्रभक्ति का जीवंत प्रतीक भी है।

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