कुहासा और किरण नाटक की कथावस्तु (कथानक सारांश)| Class 12 Chapter 1

प्रश्न 1
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु (कथानक, सारांश) पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रथम अंक की कथावस्तु लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सारांश लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के तृतीय अंक की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के अन्तिम अंक की कथावस्तु लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का कथानक समस्यामूलक है, जो स्वाधीन भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित है। कथावस्तु के आधार पर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का सारांश लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ का कथासार अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर

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‘कुहासा और किरण’ का सारांश

विष्णु प्रभाकर का नाटक ‘कुहासा और किरण’ स्वाधीनता-पूर्व और स्वतंत्र भारत के आरंभिक राजनीतिक वातावरण पर आधारित है। यह नाटक देशभक्तों और राष्ट्रद्रोहियों के संघर्ष का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। नाटक की पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता-प्राप्ति से लगभग 15 वर्ष पूर्व की कथा है। इस दौरान मुल्तान में चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, चन्दर, हाशमी और कृष्णदेव नामक देशभक्त अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की योजना बनाते हैं। परन्तु कृष्णदेव, जो उनके साथ था, सरकार का मुखबिर बन जाता है और बाकी देशभक्त कठोर कारावास में चले जाते हैं। जेल से 1946 में मुक्त होने के बाद हाशमी और चन्दर निर्धनता के कारण जीवन संघर्ष में विफल हो जाते हैं। राजेन्द्र नौकरी करता है, परन्तु उसकी सेहत कमजोर होती है, जबकि चन्द्रशेखर तपेदिक रोग से पीड़ित हो जाता है और उसकी पत्नी मालती बेसहारा हो जाती है।

प्रथम अंक में नाटक का आरम्भ नेताजी कृष्ण चैतन्य के निवास से होता है। उनकी षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उनकी सचिव सुनन्दा और अन्य लोग उन्हें बधाई देने आते हैं। कृष्ण चैतन्य अब राजनीतिक पेंशन प्राप्त कर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जीवन यापन कर रहे हैं, पर उनके कार्य कई बार गैर-कानूनी भी होते हैं। उनकी पत्नी गायत्री को उनके घृणित कृत्यों से कष्ट होता है। इसी दौरान देशभक्त राजेन्द्र का पुत्र अमूल्य नौकरी के लिए कृष्ण चैतन्य के पास आता है और उसे संपादक की नौकरी मिलती है। चन्द्रशेखर की पत्नी मालती भी पेंशन दिलाने के लिए कृष्ण चैतन्य के पास आती है और उनकी असली पहचान अमूल्य के सामने खुलती है।

द्वितीय अंक में अमूल्य के आवेदन पत्र की चर्चा विपिन बिहारी के कक्ष में होती है। सभी को पता चलता है कि वर्तमान में समाज और राजनीति में महान दिखने वाला कृष्ण चैतन्य, असल में मुखबिर कृष्णदेव है। कृष्ण चैतन्य अमूल्य को फंसाने की योजना बनाता है, और अमूल्य आत्महत्या तक करने का प्रयास करता है, पर पुलिस उसे बचा लेती है। इस दौरान गायत्री उसे बुरे कार्य छोड़ने की सलाह देती है, लेकिन दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है।

तृतीय अंक में कृष्ण चैतन्य अपनी पत्नी गायत्री के चित्र के सामने बैठकर अपने कृत्यों के लिए प्रायश्चित्त करता है। सुनन्दा और गुप्तचर विभाग के अधिकारी अमूल्य की मदद करते हैं और उसे निर्दोष साबित कराते हैं। कृष्ण चैतन्य मालती से क्षमा याचना करते हुए अपना सर्वस्व उसे सौंप देते हैं और भ्रष्ट अधिकारियों विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र को गिरफ्तार कराया जाता है। नाटक का समापन यह संदेश देकर होता है कि बलिदान, सत्य और प्रायश्चित्त कभी व्यर्थ नहीं जाता और अंततः न्याय की जीत होती है।

प्रश्न 2
‘कुहासा और किरण’ नाटक के उस पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र (नायक) अमूल्य का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

अमूल्य का चरित्र चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक का प्रमुख पुरुष पात्र अमूल्य है, जो देशभक्त राजेन्द्र का पुत्र है। अमूल्य अपने चरित्र और आचार-व्यवहार में ऐसे नवयुवक का प्रतिनिधित्व करता है, जो भ्रष्ट समाज और कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के मार्ग पर चलता है। वह अपने पिता की तरह देशभक्ति में दृढ़ है और देश को व्यक्ति से ऊपर मानता है। उसका कहना है कि “हमारे लिए देश सबसे ऊपर है। देश की स्वतंत्रता हमने प्राणों की बलि देकर पायी थी, उसे अब कलंकित नहीं होने देंगे।” अमूल्य अपने सभी कर्तव्यों के प्रति जागरूक है। पिता की असमय मृत्यु के बावजूद वह परिश्रम और ईमानदारी से अपने अध्ययन और कार्यों को पूरा करता है। वह सत्यवादी और निर्भीक युवक है, जो कृष्ण चैतन्य जैसे भ्रष्ट और चालाक व्यक्ति के संपर्क में भी अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ता। जब वह षड्यन्त्र में फँसता है, तब भी वह साहसपूर्वक पुलिस और अन्य अधिकारियों के सामने अपनी बात रखता है और भ्रष्ट लोगों के चेहरे बेनकाब करता है। अमूल्य आधुनिक युवकों के लिए आदर्श मार्गदर्शक है; वह भ्रष्टाचार और छल-कपट के मुखौटे उतारकर समाज में न्याय और सत्य स्थापित करना चाहता है। उसके सरल और विनम्र स्वभाव के कारण लोग उससे प्रभावित होते हैं, जैसे सुनन्दा कहती है कि अमूल्य पिता के गुणों और सरल स्वभाव का प्रतीक है। नाटक में अमूल्य अपने कर्तव्यनिष्ठ, साहसी, देशभक्त और सत्यनिष्ठ व्यक्तित्व से समाज के अंधकार को प्रकाश की किरणों से आलोकित करने का प्रयास करता है। वह वास्तव में तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्श का जीवंत प्रतीक है।

प्रश्न 3
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण कीजिए।
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर कृष्ण चैतन्य की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर

कृष्ण चैतन्य का चरित्र चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक में कृष्ण चैतन्य का चरित्र मुख्यतः अवसरवादी, स्वार्थी और भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह नाटक का खलनायक है, जो अपने स्वार्थ और लाभ के लिए समाज और देश के साथ गद्दारी करता है। कृष्ण चैतन्य अपने मित्रों का मुखबिर बनकर उन्हें जेल में भिजवाता है और फिर कांग्रेसी नेता बनकर जनता और प्रशासन को धोखा देता है। वह अत्यंत चतुर और चालाक है, हमेशा सोच-समझकर कार्य करता है और अपनी चालाकी के कारण अपने कुकृत्यों को छुपा लेता है। उसके जीवन में भ्रष्टाचार, क्रूरता, कठोरता और धनलिप्सा प्रबल रूप से दिखाई देती है। ‘मुलताने षड्यन्त्र’ के दौरान वह देशद्रोही बनता है और बाद में भी अपने घृणित कृत्यों से देश और समाज का ह्रास करता है। कृष्ण चैतन्य का व्यक्तित्व कृत्रिमता और आडम्बर से परिपूर्ण है; वह समाज के सामने धर्म और सेवा का ढोंग करता है, जिससे लोग उसके प्रभाव में आ जाते हैं। उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली और दूरदर्शी भी है; यही कारण है कि वह अपना वास्तविक नाम ‘कृष्णदेव’ बदलकर ‘कृष्ण चैतन्य’ रख लेता है और अमूल्य जैसी प्रतिभाशाली युवाओं को अपने उद्देश्यों के अनुसार नियोजित करता है। नाटक के अंतिम भाग में, पत्नी गायत्री के बलिदान के बाद, कृष्ण चैतन्य में प्रायश्चित्त और आत्मपरिष्कार की भावना उत्पन्न होती है। वह अपने कुकृत्यों के लिए पश्चाताप करता है और कहता है—“मैंने देश के साथ जो गद्दारी की है, उसकी सजा मुझे मिलनी चाहिए।” इस प्रकार उसका चरित्र न केवल भ्रष्टता और स्वार्थ का प्रतीक है, बल्कि अंत में अपने दोषों के सुधार के प्रयास से पाठकों की सहानुभूति भी आकर्षित करता है।

प्रश्न 4
सुनन्दा के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ की नायिका के चरित्र की विशेषताएँ उदघाटित कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर ‘सुनन्दा’ को चरित्रांकन (चरित्र-चित्रण) कीजिए।

उत्तर

सुनन्दा का चरित्र चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक में सुनन्दा प्रमुख नारी पात्र है, जो सहज, जागरूक और देशभक्त नवयुवती का प्रतिनिधित्व करती है। वह भ्रष्टाचार और पाखण्ड के खिलाफ दृढ़ प्रतिज्ञ है और अपने साहस, विवेक और दूरदर्शिता के बल पर समाज में व्याप्त गलतियों का पर्दाफाश करती है। कृष्ण चैतन्य की सचिव होने के बावजूद वह उसके भ्रष्ट कृत्यों और मुखौटाधारी आचरण का विरोध करती है और कभी भी सत्य और न्याय के मार्ग से नहीं हटती। उसकी वाक्पटुता और व्यंग्यपूर्ण शैली भी उल्लेखनीय है; वह सीधे और स्पष्ट शब्दों में भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को चुनौती देती है और जनता के सामने उनके वास्तविक स्वरूप को उजागर करने का प्रयत्न करती है। सुनन्दा का हृदय सहृदयी है; उसे अमूल्य से सहानुभूति है और जब अमूल्य झूठे आरोपों में फँसता है, तब वह उसे बचाने और न्याय दिलाने के लिए सक्रिय रहती है। वह समाचार-पत्रों और समाज में शक्ति-संचालन की महत्ता को समझती है और इसे सकारात्मक कार्यों में लगाती है। सुनन्दा की स्पष्टता, साहस, देशभक्ति और प्रगतिशील दृष्टिकोण उसे नाटक का एक प्रभावशाली और आदर्श नारी पात्र बनाता है

प्रश्न 5.
‘कुहासा और किरण’ नाटक के आधार पर अमूल्य और कृष्ण चैतन्य के चरित्रों की तुलना कीजिए।

उत्तर

अमूल्य और कृष्ण चैतन्य का चरित्र तुलना

‘कुहासा और किरण’ नाटक में अमूल्य और कृष्ण चैतन्य दोनों मुख्य पुरुष पात्र हैं, पर इनके चरित्र और आचार में स्पष्ट विरोधाभास है।
अमूल्य सत्य, ईमानदारी, देशभक्ति और कर्तव्यपरायणता का प्रतीक है। वह भ्रष्ट और अवसरवादी समाज में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है, निर्भीक और साहसी है, और समाज के लिए उज्जवल आदर्श प्रस्तुत करता है। उसका व्यवहार सरल, सहृदयी और न्यायप्रिय है।

इसके विपरीत, कृष्ण चैतन्य अवसरवादी, स्वार्थी और भ्रष्ट है। वह मित्रघाती और चालाक है, अपने लाभ के लिए समाज और देश के साथ गद्दारी करता है, और अपने आडम्बर और मुखौटे से लोगों को भ्रमित करता है। वह प्रभावशाली और दूरदर्शी जरूर है, पर उसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ और सत्ता है।

सारांश यह है कि अमूल्य सत्य और न्याय के पक्ष में, जबकि कृष्ण चैतन्य स्वार्थ और छल के पक्ष में खड़ा है। अमूल्य का चरित्र उत्कृष्ट आदर्श है, जबकि कृष्ण चैतन्य का चरित्र चालाक और खलनायकीय है। इस प्रकार दोनों के व्यक्तित्व एक-दूसरे के पूर्ण विपरीत हैं

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