श्लोक 1.
॥ ॐ ॥ श्वेतकेतुहरुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥1॥
उत्तर
सन्दर्भ— प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी के संस्कृत-खण्ड के ‘छान्दोग्य उपनिषद् – षष्ठ अध्यायः’ पाठ से लिया गया है।
प्रसंग— इस श्लोक में ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को विद्या और ब्रह्मचर्य का उपदेश दे रहे हैं।
(इस पाठ के सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ और प्रसंग लागू होगा।)
व्याख्या— आरुणि का एक पुत्र था—श्वेतकेतु। एक दिन उसके पिता ने उससे कहा— “हे श्वेतकेतु! तुम ब्रह्मचर्य का पालन करो, क्योंकि हमारे कुल में ऐसा कोई नहीं हुआ जो बिना शिक्षा-दीक्षा के, केवल नाम का ब्राह्मण (ब्रह्मबन्धु) की तरह रहा हो।
जो व्यक्ति ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मण-धर्म का आचरण नहीं करता, उसे गुरु-कुल जाकर शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक होता है।”
श्लोक 2.
स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्चेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच ॥2॥
उत्तर
प्रसंग— इस श्लोक में यह बताया गया है कि श्वेतकेतु ने गुरुकुल में दीर्घकाल तक वेदों का अध्ययन किया और फिर गर्व से अपने पिता के पास लौटा।
व्याख्या— श्वेतकेतु बारह वर्ष की आयु में गुरुकुल गया और चौबीस वर्ष की आयु तक वहाँ रहकर समस्त वेदों का अध्ययन किया। शिक्षा पूर्ण होने पर वह अहंकारयुक्त, स्वाभिमानी तथा पाण्डित्य से गर्वित होकर शांत भाव से अपने पिता के पास लौटा। उसे देखकर उसके पिता ने उससे कुछ कहा।
श्लोक 3.
श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्य: येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥3॥
उत्तर
प्रसंग— इसमें श्वेतकेतु के पिता, उसके भीतर आए घमण्ड को देखकर उससे ज्ञान की वास्तविकता पूछते हैं।
व्याख्या— हे श्वेतकेतु! तुम जो इस प्रकार गर्वित, पाण्डित्य से भरे और अहंकारयुक्त हो, क्या तुमने यह भी जाना है कि वह कौन-सा आदेश / ज्ञान है—
जिसके समझ लेने पर अश्रुत भी श्रुत हो जाता है, अमत भी मत हो जाता है,और अविज्ञात भी ज्ञात हो जाता है?
अर्थात् क्या तुमने गुरु से वह उच्चतम ज्ञान पूछा है जो अज्ञात को भी ज्ञात करने की क्षमता देता है?
तुमने यह विशेष ज्ञान प्राप्त किया है या नहीं—क्या तुमने कभी अपने गुरु से इस विषय में पूछताछ की?
श्लोक 4.
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥4॥
उत्तर
प्रसंग— इस श्लोक में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि मूल सत्य क्या होता है।
व्याख्या— आरुणि कहते हैं— “हे श्वेतकेतु! जैसे एक मिट्टी के ढेले को जान लेने पर उससे बने सभी मिट्टी के बर्तनों को भी जाना जा सकता है, क्योंकि पात्रों के नाम तो केवल विकृति के कारण होते हैं— उनका वास्तविक सत्य मिट्टी ही है।”
अर्थात्—
सभी मिट्टी के पदार्थों में मूल तत्व मिट्टी ही होता है;
रूप-रंग बदल जाने पर केवल नाम बदल जाता है पर सत्य तत्व नहीं बदलता।
श्लोक 5.
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥5॥
उत्तर
प्रसंग— इस श्लोक में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को उदाहरण देकर मूल तत्व (सत्य) का ज्ञान समझा रहे हैं।
व्याख्या – पिता आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहते हैं— “हे श्वेतकेतु! जैसे चुम्बक (लोहमणि) को देखकर उसके लोहे का बना होने का पता तुरंत नहीं चलता, फिर भी वह वास्तव में लोहे का ही होता है।
परंतु उसका मूल स्वरूप—‘लोहा’ ही सत्य है।”
श्लोक 6.
यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं काष्र्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥6॥
उत्तर
प्रसंग— इन पंक्तियों में आरुणि श्वेतकेतु को वस्तुओं के उदाहरण देकर सत्य और मूल तत्व का ज्ञान समझा रहे हैं।
व्याख्या- पिता आरुणि आगे कहते हैं— “हे श्वेतकेतु! जैसे नखनिकृन्तन (नेलकटर) को देखकर तुरंत यह ज्ञात नहीं होता कि वह काँसे (कृष्णायस) का बना है, परंतु वास्तव में उसका मूल पदार्थ काँसा ही होता है।
उसके विभिन्न रूप और आकार केवल विकार या नाम मात्र हैं। परंतु उसका सत् स्वरूप—‘काँसा’ ही सत्य है।”
श्लोक 7.
न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यध्द्येतदवेदिष्यन्कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तदबीविति तथा सोम्येति होवाच ॥7॥
उत्तर
प्रसंग— इन पंक्तियों में श्वेतकेतु अपने पिता से विनम्र होकर स्वीकार करता है कि सच्चा ज्ञान उसे अभी तक नहीं मिला, और वह पिता से आत्म-ज्ञान का उपदेश देने की प्रार्थना करता है।
व्याख्या- पिता की बात सुनकर श्वेतकेतु विनम्र होकर कहता है—“हे पिता! मेरे गुरु तो आप ही हैं। यदि गुरु जानते होते तो मुझे अवश्य बताते। इसलिए अब आप ही मुझे यह आत्म-ज्ञान कराइए।”
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 श्वेतकेतुः कस्य पुत्रः आसीत्?
या
श्वेतकेतुः कः आसीत?
उत्तर – श्वेतकेतुः आरुणेयः, आरुणेः पुत्रः आसीत्।
प्रश्न 2 कः द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः वेदानधीत्य आगतः?
उत्तर– श्वेतकेतुः द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः वेदानधीत्य आगतः।
प्रश्न 3 श्वेतकेतुः कतिवर्षाणि सर्वान् वेदान् अपठत्?
उत्तर– श्वेतकेतुः द्वादशवर्षाणि सर्वान् वेदान् अपठत्।
प्रश्न 4 अनूचानमानी कः अभवत्?
उत्तर– अनूचानमानी श्वेतकेतुः अभवत्।
प्रश्न 5 मृत्पिण्डेन किं विज्ञातम्?
उत्तर– मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातम्।
प्रश्न 6 कुत्र लोहमयं विज्ञातम्?
उत्तर– लोहमणिना लोहमयं विज्ञातम्।
प्रश्न 7 कः आरुणिं गुरुरूपेण स्वीकरोति?
उत्तर– श्वेतकेतुः आरुणिं गुरुरूपेण स्वीकरोति।
