अन्योक्तिविलासः हिंदी अनुवाद | Sanskrit Chapter 2 Class 10

अन्योक्तिविलास : (अन्योक्तियों का सौन्दर्य)

श्लोक 1
नितरां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप ! कदापि मा कृथाः ।। अत्यन्तसरसहृदयो यतः परेषां गुणग्रहीतासि।

उत्तर

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सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में कवि ने कुएँ के माध्यम से सज्जनों को यह संदेश दिया है कि उन्हें स्वयं को कभी तुच्छ या छोटा नहीं समझना चाहिए।

अनुवाद– हे कुएँ! तुम यह सोचकर कभी दुखी मत हो कि तुम बहुत नीचे (गहरे) हो। क्योंकि तुम अत्यन्त सरस हृदय वाले हो, जल से भरे हो और दूसरों के गुणों (रस्सियों) को ग्रहण करने वाले हो।

श्लोक 2
नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः ॥ 

उत्तर

सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में कवि ने हंस के माध्यम से यह शिक्षा दी है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य, विवेक और मर्यादा को निभाने में आलस्य नहीं करना चाहिए।

अनुवाद– हे हंस! यदि तुम ही दूध और पानी को अलग करने (सच्चाई और असत्य का विवेक करने) में आलस्य करोगे, तो इस संसार में दूसरा कौन है जो अपने कुल की मर्यादा का पालन करेगा?

श्लोक 3
कोकिल ! यापय दिवसान् तावद् विरसान् करीलविटपेषु ।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति। 

उत्तर

सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में कवि ने कोयल के माध्यम से विद्वान् और गुणी व्यक्तियों को संदेश दिया है कि उन्हें बुरे दिनों में धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। समय बदलता है। अच्छा अवसर अवश्य आता है।

अनुवाद– हे कोयल ! जब तक भौंरों से युक्त कोई आम का पेड़ लहराने नहीं लगता, तब तक तुम अपने नीरस (शुष्क) दिनों को किसी भी प्रकार से करील के पेड़ पर ही बिताओ। भाव यह है कि जब तक अच्छे दिन नहीं आते, तब तक व्यक्ति को अपने बुरे दिनों को किसी न किसी प्रकार से व्यतीत कर लेना चाहिए।

श्लोक 4
रे रे चातक ! सावधानमनसा मित्र ! क्षणं श्रूयतम् ।
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः ॥
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ॥

उत्तर

सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में चातक के माध्यम से यह बताया गया है कि हमें किसी के सामने दीन वचन बोलकर याचना नहीं करनी चाहिए।

अनुवाद– हे चातक! सावधान मन से क्षण भर सुनो। आसमान में बहुत-से बादल रहते हैं, पर सभी एक जैसे नहीं होते। कुछ तो वर्षा से पृथ्वी को गीला कर देते हैं और कुछ व्यर्थ में गर्जना करते हैं। इसलिए तुम जिसे भी देखते हो, उसके सामने दीन वचन मत कहो। भाव यह है कि हर किसी के सामने याचना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हर कोई दानी नहीं होता, जो हमें कुछ दे।

श्लोक 5
न वै ताडनात् तापनाद् वह्निमध्ये,
न वै विक्रयात् क्लिश्यमानोऽहमस्मि ।
सुवर्णस्य मे मुख्यदुःखं तदेकं ।
यतो मां जनाः गुञ्जया तोलयन्ति ॥

उत्तर

सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में स्वर्ण के माध्यम से गुणवान और स्वाभिमानी व्यक्ति के मन की व्यथा को व्यक्त किया गया है।

अनुवाद– मैं (स्वर्ण) न तो पीटे जाने से, न अग्नि में तपाए जाने से और न ही बेचे जाने से दुःखी होता हूँ। मेरे दुःख का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग मुझे रत्ती (घुँघची) से तोलते हैं। मेरे दुःख का कारण केवल इतना है कि मेरी तुलना किसी तुच्छ वस्तु से की जाती है। अर्थात् गुणवान व स्वाभिमानी व्यक्ति को कष्टों को सहने में इतनी पीड़ा नहीं होती, जितनी मानसिक पीड़ा उसके स्वाभिमान को ठेस लगने से होती है।

श्लोक 6
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ।
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः।।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे।
हा हन्त! हन्ता नलिनीं गज उज्जहारः ।।

सन्दर्भ– प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘संस्कृत खण्ड’ में संकलित ‘अन्योक्तिविलासः’ नाम‌क पाठ से लिया गया है।

प्रसंग- इस श्लोक में कमलिनी में बन्द भौंरे के माध्यम से यह बताया गया है कि वह सुखद प्रभात की आशा कर रहा था, परन्तु उसी बीच अचानक हाथी द्वारा कमलिनी उखाड़ ली गई।

अनुवाद– (कमलिनी में बन्द भौंरा सोचता है कि) “रात व्यतीत होगी। सुन्दर प्रभात होगा। सूर्य निकलेगा। कमलों का समूह खिलेगा।” इस प्रकार कमल पुट में बैठे हुए भौंरे के ऐसा सोचते-सोचते हाय! बड़ा दु:ख है कि हाथी उसी कमलिनी को उखाड़कर ले गया। (और भौरा कमल के पुष्प में बन्द रह गया)। भाव यह है कि व्यक्ति सोचता कुछ है, पर ईश्वर की इच्छा से कुछ और ही हो जाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
उत्तर– कूपः नितरां नीचः अस्मि इति विचार्य दुःखम् अनुभवति।

प्रश्न 2. अत्यन्तसरसहृदयो यतः किं ग्रहीतासि ?
उत्तर– अत्यन्त सरस हृदयः यतः परेषां गुणग्रहीतासि।

प्रश्न 3. नीर-क्षीर-विषये हंसस्य का विशेषता अस्ति ?
उत्तर– हंसस्य विशेषता अस्ति यत् सः नीरं क्षीरं च पृथक् करोति (नीर–क्षीर विवेक)।

प्रश्न 4. कविः हंसं किं बोधयति ?
उत्तर– कविः हंसं बोधयति यत् नीर–क्षीर-विवेके आलस्यं न कुर्यात्।

प्रश्न 5. हंसस्य किं कुलव्रतम् अस्ति ?
उत्तर– हंसस्य कुलव्रतम् नीर-क्षीर-विवेकः अस्ति।

प्रश्न 6. कविः कोकिलं किं कथयति (बोधयति) ?
उत्तर– कविः कोकिलं बोधयति यत् यावत् रसालः न समुल्लसति तावत् करीलविटपेषु दिवसान् यापय।

प्रश्न 7. कविः चातकं किम् उपदिशति ?
उत्तर– कविः चातकं उपदिशति यत् सर्वेषां पुरतः दीनं वचः न ब्रूयात्।

प्रश्न 8. सुवर्णस्य किं मुख्यदुःखम् अस्ति ?
उत्तर– जनाः सुवर्णं गुञ्जया सह तोलयन्ति— एतदेव तस्य मुख्यदुःखम् अस्ति।

प्रश्न 9. कोशगतः भ्रमरः किम् अचिन्तयत् ?
उत्तर– कोशगतः भ्रमरः अचिन्तयत् “रात्रिर्गमिष्यति, सुप्रभातं भविष्यति, भास्वानुदेष्यति, पङ्कजालिः हसिष्यति।”

प्रश्न 10. भ्रमरे चिन्तयति गजः किम् अकरोत् ?
उत्तर– भ्रमरः चिन्तयति, तदा गजः नलिनीम् उज्जहार।

प्रश्न 11. कीदृशाः अम्भोदाः गगने वसन्ति ?
उत्तर– गगने सर्वे अम्भोदाः समानाः न वसन्ति; केचिद् वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति, केचिद् वृथा गर्जन्ति।

प्रश्न 12. गजः काम् उज्जहार ?
उत्तर– गजः नलिनीम् उज्जहार।

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