रश्मिरथी खण्डकाव्य | Rashmirathi Khandkavya

प्रश्न 1.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ की कथा (सारांश) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पाँचवें (पंचम) सर्ग की कथा (कथावस्तु) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर उसके प्रथम और द्वितीय सर्गों की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर सप्तम सर्ग (कर्ण के बलिदान) की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित कर्ण और अर्जुन के युद्ध का सोदाहरण वर्णन कीजिए।

उत्तर

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रश्मिरथी हिन्दी साहित्य का एक अत्यन्त प्रसिद्ध खण्डकाव्य है, जिसकी रचना रामधारी सिंह दिनकर ने की है। इसकी कथा महाभारत पर आधारित है और इसमें कर्ण के जीवन, उसके संघर्ष, त्याग, मित्रता और वीरता का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया गया है। यह काव्य सात सर्गों में विभाजित है

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन – प्रथम सर्ग में कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से कर्ण के व्यक्तित्व का परिचय दिया है। कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से सूर्यदेव के प्रभाव से हुआ था, किन्तु अविवाहित होने के कारण कुन्ती ने लोक-लाज के भय से नवजात शिशु को एक पेटी में रखकर नदी में बहा दिया। उस बालक को एक सूत (सारथी) ने पाया और उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार वह सूत-पुत्र कहलाया, किन्तु जन्म से क्षत्रिय होने के कारण उसमें अद्भुत वीरता, तेज, शौर्य और प्रतिभा विद्यमान थी। साधारण परिवार में पलने के बावजूद कर्ण ने अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से शस्त्र और शास्त्र दोनों में प्रवीणता प्राप्त की और एक महान धनुर्धर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

आगे चलकर जब गुरु द्रोणाचार्य ने कौरव और पाण्डव राजकुमारों की धनुर्विद्या का सार्वजनिक प्रदर्शन आयोजित किया, तब अर्जुन की अद्भुत प्रतिभा देखकर सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। उसी समय कर्ण भी वहाँ उपस्थित हुआ और उसने अर्जुन को चुनौती देते हुए अपनी वीरता का परिचय दिया—

“आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कारे।”

कर्ण की इस निर्भीक चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी। तभी कृपाचार्य ने उसका परिचय पूछते हुए उसकी जाति और गोत्र जानना चाहा। जब कर्ण ने स्वयं को सूत-पुत्र बताया, तो उसे अर्जुन से युद्ध करने के योग्य नहीं माना गया। यह घटना उस समय के समाज में व्याप्त जाति-भेद की कठोरता को दर्शाती है। इसी समय दुर्योधन ने कर्ण की प्रतिभा को पहचानकर उसे अंगदेश का राजा घोषित कर दिया और अपना मुकुट उसके सिर पर रख दिया। इस प्रकार दुर्योधन ने कर्ण को सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान की, जिसका कर्ण के हृदय पर गहरा प्रभाव पड़ा। कर्ण भावविह्वल होकर जीवनभर के लिए दुर्योधन का मित्र और सहयोगी बन गया।

इस सर्ग के अंत में जहाँ कौरव कर्ण को अपने साथ सम्मानपूर्वक ले जाते हैं, वहीं दूसरी ओर कुन्ती अपने पुत्र की पहचान छिपी रहने की पीड़ा से व्याकुल होकर अपने भाग्य को कोसती है। इस प्रकार प्रथम सर्ग में कर्ण के जन्म, संघर्ष, अपमान, वीरता और दुर्योधन के साथ उसकी अटूट मित्रता की नींव को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास – इस सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम के शांत, पवित्र और तपोमय वातावरण के वर्णन से होता है। जब द्रोणाचार्य ने कर्ण को उसकी जाति के कारण शिक्षा देने से मना कर दिया, तब कर्ण ने निश्चय किया कि वह किसी भी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर बनेगा। इसी उद्देश्य से वह परशुराम के आश्रम में पहुँचा। चूँकि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे, इसलिए कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनसे धनुर्विद्या सीखनी आरम्भ कर दी। अपनी लगन, परिश्रम और प्रतिभा के बल पर वह शीघ्र ही गुरु का प्रिय शिष्य बन गया।

एक दिन की घटना कर्ण के जीवन की सबसे निर्णायक घटना बन जाती है। परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। उसी समय एक विषैला कीट कर्ण की जंघा में घुसकर उसे काटने लगा। असहनीय पीड़ा होने के बावजूद कर्ण ने अपने गुरु की नींद भंग न हो, इसलिए तनिक भी हिलना उचित नहीं समझा। उसकी जंघा से रक्त की धारा बहने लगी, परन्तु वह स्थिर बना रहा। जब रक्त की धारा का स्पर्श परशुराम को हुआ, तब उनकी नींद खुली। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर वे चकित रह गए और बोले कि इतनी पीड़ा सहने की क्षमता किसी ब्राह्मण में नहीं हो सकती। तब कर्ण ने सत्य स्वीकार करते हुए स्वयं को सूत-पुत्र बताया। सत्य जानकर परशुराम अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने इसे छल समझा और कर्ण को शाप देते हुए कहा—

“सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा।”

शाप मिलने के बाद भी कर्ण के मन में अपने गुरु के प्रति कोई द्वेष नहीं था। वह विनम्रतापूर्वक उनके चरणों की धूलि लेकर, आँसुओं से भरी आँखों के साथ आश्रम से विदा हो जाता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश – कौरवों के साथ द्यूत-क्रीड़ा में हार जाने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। यह कठिन अवधि पूरी करने के बाद जब पाण्डव अपने अधिकार के लिए वापस लौटते हैं, तब वे शान्तिपूर्ण समाधान चाहते हैं। इसी उद्देश्य से श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से सन्धि प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। वे दुर्योधन और कौरवों को समझाते हैं कि युद्ध से केवल विनाश होगा, अतः शान्ति स्थापित की जाए। किन्तु दुर्योधन अपने अहंकार में अंधा होकर इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है और यहाँ तक कि श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का भी प्रयास करता है, जो असफल रहता है। जब सन्धि का मार्ग बंद हो जाता है और युद्ध निश्चित हो जाता है, तब श्रीकृष्ण कर्ण को समझाने का प्रयास करते हैं। वे उसे उसके वास्तविक जन्म का रहस्य बताते हैं कि वह कुन्ती का पुत्र है और इस प्रकार पाण्डवों का बड़ा भाई है। वे कर्ण से आग्रह करते हैं कि वह दुर्योधन का साथ छोड़कर पाण्डवों के साथ मिल जाए, जिससे यह भयानक युद्ध टल सकता है और लाखों लोगों का जीवन बच सकता है।

किन्तु कर्ण इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता। वह अत्यन्त मार्मिक शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त करता है कि जब वह भरी सभा में अपमानित हो रहा था, तब किसी ने उसे सम्मान नहीं दिया, जबकि दुर्योधन ने उसे अपनाया, सम्मान दिया और राजा बनाया। इसलिए वह अपने मित्र के प्रति कृतज्ञ है और किसी भी स्थिति में उसका साथ नहीं छोड़ सकता। कर्ण की मित्रता और त्याग की भावना इन पंक्तियों में स्पष्ट झलकती है—

“धरती की तो है क्या बिसात?
आ जाए अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ।”

कर्ण श्रीकृष्ण से यह भी निवेदन करता है कि उसके जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बताया जाए, क्योंकि यदि उन्हें सत्य का पता चल गया तो वे राज्य उसे सौंप देंगे और वह राज्य पुनः दुर्योधन को दे देगा। अन्त में कर्ण श्रीकृष्ण को प्रणाम करके वहाँ से चला जाता है। इस सर्ग में जहाँ श्रीकृष्ण की महान कूटनीति, दूरदर्शिता और लोक-कल्याण की भावना प्रकट होती है, वहीं कर्ण की अद्वितीय मित्रता, कृतज्ञता और त्याग की भावना अत्यन्त प्रभावशाली रूप में सामने आती है।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा – चतुर्थ सर्ग में कर्ण की अद्वितीय दानशीलता और उदार हृदय का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। इस सर्ग में कर्ण के उस महान गुण को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है, जिसके कारण वह ‘दानवीर कर्ण’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। कर्ण का नियम था कि वह प्रतिदिन एक निश्चित समय तक याचकों को दान देता था और उस समय किसी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाता था।

श्रीकृष्ण यह भली-भाँति जानते थे कि जब तक कर्ण के शरीर पर सूर्यदेव द्वारा प्रदत्त दिव्य कवच और कुण्डल सुरक्षित हैं, तब तक उसे कोई भी योद्धा पराजित नहीं कर सकता। इसलिए देवताओं के राजा इन्द्र ने कर्ण की दानशीलता की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुँचे और उससे उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये।

कर्ण ने तुरंत समझ लिया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं इन्द्र हैं, जो छलपूर्वक उससे उसके कवच और कुण्डल माँग रहे हैं। फिर भी कर्ण ने अपनी प्रतिज्ञा और दानधर्म का पालन करते हुए बिना किसी संकोच के अपने कवच और कुण्डल काटकर दान में दे दिए। यह त्याग अत्यन्त असाधारण था, क्योंकि यही कवच और कुण्डल उसके जीवन की रक्षा करते थे। कर्ण की इस महान दानवीरता को देखकर इन्द्र भी लज्जित हो उठे और उनके मुख पर ग्लानि छा गई—

“अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला ॥”

इन्द्र ने कर्ण की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए उसे महादानी, पवित्र और महान आत्मा बताया तथा स्वयं को छल करने वाला और कुटिल कहा। वे कर्ण के इस महान त्याग से अत्यन्त प्रभावित हुए और उसे पुरस्कारस्वरूप एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ ‘एकघ्नी’ अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती – इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की गहरी चिन्ता से होता है। वह इस बात से व्याकुल है कि महाभारत के युद्ध में उसके ही दो पुत्र—कर्ण और अर्जुन—एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध करेंगे। अपनी ममता से विवश होकर कुन्ती कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण नदी तट पर सन्ध्या-वंदन कर रहा होता है। कुन्ती की आहट पाकर उसका ध्यान भंग होता है और वह आदरपूर्वक उनका अभिवादन कर परिचय पूछता है। तब कुन्ती अत्यन्त भावुक होकर अपने जीवन का रहस्य प्रकट करती है कि कर्ण सूत-पुत्र नहीं, बल्कि उसका ही पुत्र है, जिसे उसने लोक-लाज के कारण जन्म के बाद नदी में बहा दिया था।

कुन्ती कर्ण से विनती करती है कि वह अपने भाइयों—पाण्डवों—का साथ दे और इस भयंकर युद्ध को टाल दे। वह चाहती है कि उसके सभी पुत्र एक साथ मिलकर सुखपूर्वक जीवन बिताएँ। किन्तु कर्ण अत्यन्त धैर्य और दृढ़ता के साथ उत्तर देता है कि उसे अपने जन्म का सत्य पहले से ही ज्ञात है, परन्तु वह अपने मित्र दुर्योधन का साथ किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ सकता। वह मानता है कि दुर्योधन ने ही उसे सम्मान और प्रतिष्ठा दी है, इसलिए वह उसके प्रति कृतज्ञ है। तब असहाय कुन्ती एक माँ के रूप में उससे दान माँगती है और कहती है कि जब वह सभी को दान देता है, तो क्या अपनी माँ को भी कुछ नहीं दे सकता? इस पर कर्ण अत्यन्त करुण भाव से उत्तर देता है कि वह उसे चार पुत्रों का दान देता है। वह वचन देता है कि वह अर्जुन को छोड़कर किसी भी पाण्डव का वध नहीं करेगा।

कर्ण का यह कथन अत्यन्त मार्मिक है कि यदि वह युद्ध में अर्जुन के हाथों मारा गया, तो कुन्ती के पाँच पुत्र जीवित रहेंगे, और यदि वह अर्जुन को मार देगा, तो वह दुर्योधन का साथ छोड़कर कुन्ती के पास आ जाएगा, तब भी कुन्ती के पाँच पुत्र ही रहेंगे। इस प्रसंग की भावुकता इन पंक्तियों में स्पष्ट झलकती है—

“हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सूँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से।”

अन्त में कुन्ती अत्यन्त दुखी और निराश होकर वहाँ से लौट जाती है। इस सर्ग में माँ के वात्सल्य, कर्ण की कर्तव्यनिष्ठा, मित्रता और त्याग का अत्यन्त मार्मिक एवं प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण – इस सर्ग में युद्ध का वातावरण अत्यन्त तीव्र और मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। महाभारत का भीषण युद्ध चल रहा है और भीष्म पितामह शर-शय्या पर पड़े हुए हैं। ऐसे समय कर्ण उनके पास आशीर्वाद लेने के लिए जाता है। भीष्म उसे समझाते हैं कि यह युद्ध अत्यन्त विनाशकारी है और इससे केवल नरसंहार ही होगा, इसलिए वह युद्ध से विरत हो जाए। किन्तु कर्ण अपने कर्तव्य और मित्रता के प्रति अडिग रहता है और दुर्योधन का साथ छोड़ने से स्पष्ट इंकार कर देता है। यहाँ कर्ण के दृढ़ संकल्प, कर्तव्यनिष्ठा और मित्र-भक्ति का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

इसके बाद युद्ध और भी उग्र हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, परन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कर्ण के सामने नहीं आने देते, क्योंकि उन्हें यह भय है कि कर्ण अपने पास सुरक्षित एकघ्नी अस्त्र का प्रयोग करके अर्जुन का वध कर सकता है। अर्जुन की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण एक युक्ति अपनाते हैं और भीम के पुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में उतार देते हैं। घटोत्कच अपने मायावी युद्ध-कौशल से कौरव सेना में भारी विनाश करता है, जिससे पूरी सेना में भय और हाहाकार मच जाता है।

कौरव सेना की इस दयनीय स्थिति को देखकर दुर्योधन अत्यन्त व्याकुल हो उठता है और कर्ण से विनती करता है कि वह किसी भी प्रकार सेना की रक्षा करे। वह कर्ण को एकघ्नी अस्त्र के प्रयोग के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि अब यही एकमात्र उपाय बचा था। कर्ण भी परिस्थिति की गम्भीरता को समझते हुए अपने अमोघ अस्त्र का प्रयोग करता है और घटोत्कच का वध कर देता है। इस प्रकार कौरव सेना तो बच जाती है, किन्तु कर्ण का सबसे बड़ा अस्त्र समाप्त हो जाता है।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा – यह ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का अन्तिम और अत्यन्त मार्मिक सर्ग है, जिसमें कर्ण के जीवन का चरम बिन्दु तथा उसका महान् बलिदान प्रस्तुत किया गया है। युद्ध अपने अन्तिम चरण में पहुँच चुका है और कौरव सेना के सेनापति के रूप में कर्ण पाण्डवों की सेना पर भयंकर आक्रमण करता है। उसके अद्भुत पराक्रम और गर्जना से पाण्डव सेना में भय और भगदड़ मच जाती है। कर्ण एक-एक कर पाण्डव पक्ष के प्रमुख योद्धाओं को पराजित करता हुआ आगे बढ़ता है। इसी क्रम में वह युधिष्ठिर को पकड़ लेता है, किन्तु माता कुन्ती को दिये अपने वचन का स्मरण करते हुए उन्हें जीवित छोड़ देता है। इसी प्रकार वह भीम, नकुल और सहदेव को भी परास्त कर छोड़ देता है। इससे कर्ण की उदारता, वचन-पालन और उच्च चरित्र का परिचय मिलता है।

युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आता है जब कर्ण और अर्जुन आमने-सामने होते हैं। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के समीप ले आता है और दोनों महायोद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध आरम्भ होता है। कर्ण के तीव्र और घातक बाणों से अर्जुन कुछ समय के लिए मूर्च्छित हो जाता है, किन्तु श्रीकृष्ण उसे पुनः प्रेरित करते हैं और युद्ध जारी रहता है। दोनों ओर से भीषण संघर्ष होता है, जो महाभारत युद्ध का चरम दृश्य बन जाता है।

इसी निर्णायक क्षण में कर्ण के जीवन की विडम्बना सामने आती है। उसके रथ का पहिया रक्त और कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर उसे निकालने का प्रयास करता है और युद्ध-विराम की बात कहता है, क्योंकि वह धर्म के नियमों का पालन करना चाहता है। किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन को पूर्व में कौरवों द्वारा किये गये अधर्म और अन्याय का स्मरण कराते हैं और उसे अवसर का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करते हैं—

खड़ा है देखता क्या मौन भोले !
शरासन तान, बस अवसर यही है, घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है, किन्तु परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध हो जाती हैं। इसी बीच अर्जुन अवसर देखकर कर्ण पर बाण चला देता है और कर्ण वीरगति को प्राप्त होता है। इस प्रकार कर्ण का जीवन अत्यन्त करुण और वीरतापूर्ण अन्त को प्राप्त होता है। कर्ण की मृत्यु के बाद पाण्डव पक्ष में विजय की प्रसन्नता है, किन्तु श्रीकृष्ण के हृदय में गहरी पीड़ा है। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह विजय मर्यादा खोकर प्राप्त हुई है और वास्तव में चरित्र की दृष्टि से कर्ण ही सच्चा विजेता था। वे कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य के समान सम्मान देने की बात कहते हैं।

इस सर्ग के माध्यम से कवि ने यह स्पष्ट किया है कि सच्ची विजय केवल युद्ध में नहीं, बल्कि चरित्र, त्याग, उदारता और मानवता में होती है। कर्ण का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष, दान, वचन-पालन और मित्रता का प्रतीक रहा है। उसका बलिदान यह सन्देश देता है कि महानता परिस्थितियों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुणों और कर्मों से निर्धारित होती है।

प्रश्न 2.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर नायक (प्रमुख पात्र) कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण की वीरता एवं त्याग का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि ‘दिनकर’ ने महारथी कर्ण के किन गुणों पर प्रकाश डाला है ? अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित कर्ण की संवेदना पर प्रकाश डालिए।
या
“मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब इसे तोल सकता है धन ?” कथन के आधार पर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के कर्ण के व्यक्तित्व का निरूपण कीजिए।

उत्तर

‘रश्मिरथी’ कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का व्यक्तित्व शौर्य, त्याग, दान, मित्रता और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम है। कवि ‘दिनकर’ ने कर्ण को एक ऐसे नायक के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें उच्चतम मानवीय गुण विद्यमान हैं। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

(1) नायक – कर्ण ‘रश्मिरथी’ का केन्द्रीय और सर्वप्रधान पात्र है। सम्पूर्ण कथा उसी के इर्द-गिर्द घूमती है और काव्य का नामकरण भी उसी के व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर किया गया है। ‘रश्मिरथी’ का अर्थ है—पुण्य रूपी रश्मियों (किरणों) का रथी, अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो तेज, तप, त्याग और पुण्य का प्रतीक हो। कर्ण का चरित्र इन सभी गुणों से युक्त है। कवि ने उसे आदर्श नायक के रूप में स्थापित किया है—

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी।
जाति-गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी॥

(2) साहसी और वीर योद्धा – कर्ण अत्यन्त साहसी, निर्भीक और पराक्रमी योद्धा है। वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नहीं खोता। शस्त्र-विद्या के प्रदर्शन के समय वह निर्भीक होकर अर्जुन को चुनौती देता है, जिससे उसकी वीरता और आत्मविश्वास का परिचय मिलता है। वह अपनी जाति के आधार पर नहीं, बल्कि अपने भुजबल और पराक्रम के आधार पर अपनी पहचान स्थापित करना चाहता है—

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुजबल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच-कुण्डल से॥

(3) सच्चा और अटूट मित्र – कर्ण की मित्रता उसके चरित्र का सबसे उज्ज्वल पक्ष है। दुर्योधन ने जब उसे अपमान से बचाकर अंगदेश का राजा बनाया, तभी से कर्ण उसके प्रति कृतज्ञ और समर्पित हो गया। वह जीवनभर दुर्योधन का साथ निभाता है। श्रीकृष्ण और कुन्ती के बार-बार समझाने पर भी वह अपने मित्र को नहीं छोड़ता। वह मित्रता को धन-संपत्ति से भी अधिक मूल्यवान मानता है—

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

(4) सच्चा गुरुभक्त – कर्ण अपने गुरु परशुराम के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु और विनम्र है। जब कीट उसकी जाँघ को काटता है और रक्त बहने लगता है, तब भी वह गुरु की नींद न टूटे, इसलिए स्थिर रहता है। यह उसकी गुरु-भक्ति और सहनशीलता का अद्भुत उदाहरण है। गुरु द्वारा शाप दिये जाने पर भी वह उनका सम्मान करता है और विनम्रतापूर्वक आश्रम से विदा लेता है—

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा॥

(5) परम दानवीर और त्यागी कर्ण की दानशीलता अद्वितीय है। वह कभी किसी याचक को निराश नहीं करता। उसका जीवन दान और त्याग का प्रतीक है। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उससे उसके कवच-कुण्डल माँगते हैं, जिन्हें वह बिना संकोच दान में दे देता है, जबकि वही उसके जीवन की रक्षा करते थे। इसी प्रकार वह अपनी माता कुन्ती को भी वचन देता है कि वह चार पाण्डवों को नहीं मारेगा।

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था॥

(6) महान् सेनानी और रणकुशल योद्धा कर्ण महाभारत के युद्ध में कौरवों का सेनापति बनकर अद्भुत वीरता का परिचय देता है। उसके रणकौशल से पाण्डव सेना भयभीत हो जाती है। वह युद्धभूमि में अद्वितीय पराक्रम दिखाता है और अन्त तक अपने कर्तव्य का पालन करता है। उसकी वीरता को देखकर श्रीकृष्ण भी उसकी प्रशंसा करते हैं—

दाहक प्रचण्ड इसका बल है, यह मनुज नहीं कालानल है॥

यह उसकी युद्ध-कुशलता और पराक्रम को स्पष्ट करता है।

(7) जाति-प्रथा का विरोधी कर्ण को बार-बार जाति के कारण अपमान सहना पड़ा, जिससे उसके मन में समाज की इस कुरीति के प्रति विद्रोह उत्पन्न हुआ। वह मानता है कि मनुष्य का मूल्य उसके कर्म और गुणों से होना चाहिए, न कि जन्म और जाति से—

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत में, जाति पूछने वाले॥

(8) कृतज्ञता की भावना कर्ण अपने उपकारकर्ताओं के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ है। वह राधा, जिसने उसका पालन-पोषण किया, और दुर्योधन, जिसने उसे सम्मान दिया, दोनों के उपकारों को कभी नहीं भूलता। यही कृतज्ञता उसे अन्त तक दुर्योधन के साथ बनाए रखती है।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त व्यक्तित्व कर्ण का जीवन निरन्तर मानसिक संघर्ष से भरा हुआ है। वह बार-बार यह सोचने को विवश होता है कि उसे धर्म, मित्रता और कर्तव्य में से किसे चुनना चाहिए। श्रीकृष्ण और कुन्ती के सामने उसका यह अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट दिखाई देता है, किन्तु वह हर बार अपने वचन और कर्तव्य को प्राथमिकता देता है।

(10) उदार, संवेदनशील एवं महान् हृदय – कर्ण का हृदय अत्यन्त उदार, दयालु और संवेदनशील है। वह दूसरों के दुःख को समझता है और सदैव सहायता के लिए तत्पर रहता है। उसकी मृत्यु के बाद भी श्रीकृष्ण उसके महान् चरित्र की प्रशंसा करते हैं—

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक त्रिया का।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर! कर्ण का अद्भुत हृदय था॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कर्ण ‘रश्मिरथी’ का आदर्श नायक है, जिसमें शौर्य, त्याग, दान, मित्रता, कृतज्ञता और मानवता का अद्भुत समन्वय है। कवि ‘दिनकर’ ने कर्ण के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि सच्ची महानता व्यक्ति के कर्म, चरित्र और आदर्शों में होती है, न कि उसके जन्म या परिस्थितियों में। कर्ण का चरित्र हमें जीवन में सत्य, निष्ठा और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

प्रश्न 3.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कृष्ण के विराट् व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘कृष्ण’ की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण का चरित्र अत्यन्त प्रभावशाली, बहुआयामी और युगानुकूल रूप में प्रस्तुत हुआ है। कवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें केवल भगवान के रूप में ही नहीं, बल्कि एक महान् कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शी नेता, नीति-पुरुष और मानवता के रक्षक के रूप में चित्रित किया है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(1) युद्ध-विरोधी एवं शान्ति के समर्थक— श्रीकृष्ण मूलतः शान्ति-प्रिय हैं और वे युद्ध को टालने के लिए हर सम्भव प्रयास करते हैं। पाण्डवों के वनवास के बाद वे स्वयं हस्तिनापुर जाकर कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव रखते हैं। वे चाहते हैं कि युद्ध से होने वाले विनाश को रोका जाए और दोनों पक्ष आपसी समझ से समस्या का समाधान निकालें। वे दुर्योधन से विनती करते हैं कि वह पाण्डवों को उनका अधिकार दे दे और अनावश्यक रक्तपात से बचे। यहाँ तक कि वे कर्ण को भी समझाकर युद्ध रोकने का प्रयास करते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका उद्देश्य केवल विजय नहीं, बल्कि समस्त मानवता का कल्याण है।

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी— श्रीकृष्ण केवल विनम्रता से बात करने वाले नहीं हैं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर कठोर सत्य कहने में भी संकोच नहीं करते। जब दुर्योधन उनके शान्ति प्रस्ताव को ठुकरा देता है, तब वे उसे स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि अब युद्ध अवश्य होगा। उनकी वाणी में सत्य का साहस और न्याय की दृढ़ता स्पष्ट दिखाई देती है। वे अन्याय के सामने झुकने वाले नहीं हैं और खुलकर अधर्म का विरोध करते हैं।

(3) शीलवान एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण वाले— श्रीकृष्ण का चरित्र शील, मर्यादा और व्यवहारिक बुद्धि का अद्भुत संगम है। वे मानते हैं कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी जाति या जन्म से नहीं, बल्कि उसके शील और गुणों से होता है। वे समाज में नैतिकता, सदाचार और संतुलन स्थापित करना चाहते हैं। साथ ही वे जीवन की वास्तविकताओं को भी भली-भाँति समझते हैं और उसी के अनुसार निर्णय लेते हैं, जिससे उनका व्यक्तित्व अत्यन्त व्यावहारिक बन जाता है।

(4) गुणों के प्रशंसक— श्रीकृष्ण का हृदय अत्यन्त उदार है। वे अपने विरोधियों के गुणों की भी प्रशंसा करते हैं। कर्ण उनके शत्रु-पक्ष में होते हुए भी, वे उसकी वीरता, दानशीलता और मित्रता की भावना की खुलकर सराहना करते हैं। यह उनके निष्पक्ष और विशाल हृदय का परिचायक है। वे व्यक्ति को उसके कर्मों और गुणों के आधार पर आंकते हैं, न कि केवल पक्ष या संबंध के आधार पर।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ— श्रीकृष्ण की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी कूटनीति है। वे जानते हैं कि केवल शक्ति से युद्ध नहीं जीता जा सकता, बल्कि बुद्धि और रणनीति भी आवश्यक है। वे पाण्डवों की ओर से युद्ध की पूरी योजना बनाते हैं और हर परिस्थिति में सही निर्णय लेते हैं। कर्ण को अपने पक्ष में लाने का प्रयास, अर्जुन की रक्षा के लिए घटोत्कच को युद्ध में उतारना, तथा निर्णायक समय पर उचित सलाह देना—ये सभी उनकी अद्भुत कूटनीतिज्ञता के उदाहरण हैं।

(6) अलौकिक एवं विराट् व्यक्तित्व— यद्यपि श्रीकृष्ण मानव रूप में कार्य करते हैं, फिर भी उनके भीतर दिव्यता और अलौकिक शक्ति विद्यमान है। जब दुर्योधन उन्हें बन्दी बनाने का प्रयास करता है, तब वे अपना विराट रूप धारण कर अपनी दिव्यता का परिचय देते हैं। उनका यह रूप यह दर्शाता है कि वे केवल एक साधारण मानव नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के नियन्ता और धर्म के रक्षक हैं।

(7) धर्म और न्याय के संरक्षक— श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए समर्पित है। वे हर स्थिति में धर्म का साथ देते हैं और अन्याय का विरोध करते हैं। महाभारत के युद्ध में भी उनका उद्देश्य केवल पाण्डवों की विजय नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना है। वे अर्जुन को भी यही शिक्षा देते हैं कि युद्ध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए है।

प्रश्न 4.
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत कुन्ती के मन की घुटन का विवेचन कीजिए।

उत्तर

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कुन्ती का चरित्र अत्यन्त मार्मिक, भावनात्मक और अंतर्द्वन्द्व से भरा हुआ प्रस्तुत किया गया है। कवि रामधारी सिंह दिनकर ने उनके माध्यम से एक ऐसी माँ की पीड़ा को व्यक्त किया है, जो परिस्थितियों के कारण अपने ही पुत्र से दूर हो जाती है और जीवन भर उस पीड़ा को सहती रहती है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(1) वात्सल्यमयी माता— जब उसे यह ज्ञात होता है कि उसके पुत्र कर्ण और पाण्डवों के बीच युद्ध होने वाला है, तो वह अत्यन्त व्याकुल हो उठती है। वह कर्ण से मिलने जाती है और उसे समझाने का प्रयास करती है कि वह अपने भाइयों के विरुद्ध युद्ध न करे। कर्ण के तेजस्वी और वीर रूप को देखकर उसका हृदय गर्व और ममता से भर उठता है। जब कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र कहता है, तब वह अत्यन्त दुखी होकर कहती है—

“रे कर्ण! बेध मत मुझे निदारुण शर से।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है॥”

निराश होकर लौटते समय भी वह उसे गले लगाती है, जिससे उसके वात्सल्य का अद्भुत रूप प्रकट होता है।

(2) अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त— कुन्ती के जीवन में सबसे बड़ी पीड़ा उसका मानसिक संघर्ष है। एक ओर उसके पाँच पुत्र पाण्डव हैं और दूसरी ओर कर्ण, जो उसका ज्येष्ठ पुत्र है। ऐसी स्थिति में किसी एक की भी हानि उसे असहनीय है। वह अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहती है—

“दो में किसका उर फटे, फटूँगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही॥”

इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि कुन्ती का हृदय भीतर से कितना व्याकुल और टूट चुका है।

(3) समाज-भीरु नारी— कुन्ती भारतीय समाज की उस नारी का प्रतीक है, जो लोक-लाज और समाज के भय से अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग कर देती है। अविवाहित अवस्था में सूर्य से प्राप्त पुत्र कर्ण को वह समाज की निन्दा के भय से नदी में बहा देती है। यह निर्णय उसके जीवन का सबसे बड़ा दुःख बन जाता है। वह स्वयं स्वीकार करती है—

“मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को।”

वह आगे अपनी स्थिति बताते हुए कहती है—

“बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी।”

इससे उसकी सामाजिक विवशता और पीड़ा का गहरा चित्र सामने आता है।

(4) निष्कपट एवं ममतामयी— कुन्ती का हृदय पूर्णतः निष्कपट है। वह कर्ण के पास किसी स्वार्थ या छल से नहीं जाती, बल्कि केवल एक माँ के रूप में अपने पुत्र से मिलना चाहती है। वह उससे विनती करती है कि वह अपने भाइयों का साथ दे, किन्तु जब कर्ण मना कर देता है, तब भी उसके मन में कोई कटुता नहीं आती। वह उसे आशीर्वाद देती है और उसके प्रति अपना प्रेम बनाए रखती है। उसकी यह निष्कपटता उसके चरित्र को और भी महान बनाती है।

(5) बुद्धिमती एवं दूरदर्शी—कुन्ती केवल भावुक ही नहीं, बल्कि बुद्धिमती और दूरदर्शी भी है। वह जानती है कि यदि समय रहते उसने कोई कदम नहीं उठाया, तो भयंकर विनाश हो सकता है। इसी कारण वह उचित समय पर कर्ण से मिलने जाती है और उसे समझाने का प्रयास करती है। और कहती है—

“सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी,
भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।”

यह उसकी दूरदर्शिता और समझदारी को स्पष्ट करता है।

(6) मातृत्व की महानता का प्रतीक— कुन्ती का चरित्र मातृत्व की महानता का सर्वोत्तम उदाहरण है। वह अपने पुत्रों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती। कर्ण के प्रति भी उसका प्रेम उतना ही गहरा है जितना पाण्डवों के प्रति। वह कर्ण से यह नहीं कहती कि वह अपने भाइयों को मार दे, बल्कि उससे यह वचन लेती है कि वह अर्जुन को छोड़कर किसी अन्य पाण्डव का वध नहीं करेगा। इस प्रकार वह एक ओर अपने पुत्रों की रक्षा करना चाहती है, तो दूसरी ओर कर्ण के जीवन को भी सुरक्षित रखना चाहती है।

इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती का चरित्र ममता, त्याग, पीड़ा और अन्तर्द्वन्द्व का अद्भुत संगम है। वह एक ऐसी माँ के रूप में सामने आती है, जो परिस्थितियों के कारण विवश है, किन्तु उसके हृदय में अपने सभी पुत्रों के लिए असीम प्रेम और करुणा है। कवि ने उनके माध्यम से मातृत्व की महानता को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

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