मुक्तियज्ञ खंडकाव्य | Mukti Yagya Khandkavya Class 12

प्रश्न 1.
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु (कथानक) संक्षेप में लिखिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम की विशिष्ट (प्रमुख) घटनाओं का वर्णन कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वतन्त्रता-संग्राम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
“‘मुक्तियज्ञ’ सन् 1921 से लेकर सन् 1947 तक के स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी है। इस उक्ति पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के कथानक का सार प्रस्तुत कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर स्वाधीनता संग्राम की घटनाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में भारत के स्वतन्त्रता संग्राम की महान गाथा का अत्यन्त मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण किया गया है। यह खण्डकाव्य मूलतः सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है, जिसमें सन् 1921 से लेकर 1947 तक के राष्ट्रीय आन्दोलन का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है। इस काव्य में विशेष रूप से महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले आंदोलनों और भारतीय जनता के संघर्ष को प्रमुखता दी गई है।

इस खण्डकाव्य का आरम्भ गाँधी जी की ऐतिहासिक डांडी यात्रा से होता है। उन्होंने साबरमती आश्रम से यात्रा प्रारम्भ कर समुद्र तट पर पहुँचकर नमक बनाकर अंग्रेजों के नमक कानून का उल्लंघन किया। उनका उद्देश्य केवल कानून तोड़ना नहीं था, बल्कि पूरे देश में जागृति और स्वतंत्रता की भावना को प्रबल करना था। इस घटना ने समस्त भारतवासियों में नई चेतना का संचार किया और स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की।

गाँधी जी के इस कार्य से अंग्रेज सरकार घबरा गई और उसने दमनचक्र चलाना शुरू कर दिया। अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, किन्तु इससे आन्दोलन कमजोर नहीं पड़ा, बल्कि और अधिक तीव्र हो गया। गाँधी जी ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया, जिसका व्यापक प्रभाव पड़ा और समस्त देशवासी एकजुट होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। आगे चलकर इस खण्डकाव्य में साइमन कमीशन के विरोध का उल्लेख मिलता है, जिसे भारतीयों ने पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। इसके बाद मैक्डॉनल्ड एवार्ड द्वारा देश में साम्प्रदायिक विभाजन की नीति अपनाई गई, जिससे जनता में असन्तोष और बढ़ गया। इन परिस्थितियों में कांग्रेस ने विभिन्न प्रान्तों में मन्त्रिमण्डल बनाना स्वीकार किया, किन्तु शीघ्र ही द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया।

विश्वयुद्ध के समय भारत की स्थिति अत्यन्त जटिल हो गई। अंग्रेजों ने भारतीयों की समस्याओं के समाधान के लिए क्रिप्स मिशन भेजा, किन्तु यह मिशन असफल रहा। इसके परिणामस्वरूप सन् 1942 में गाँधी जी ने “अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नारा देकर एक व्यापक आन्दोलन प्रारम्भ किया। इस आन्दोलन ने पूरे देश में उथल-पुथल मचा दी। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए अत्यन्त कठोर उपाय अपनाए। गाँधी जी तथा अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और देशभर में अत्याचार किए गए। स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों तक को नहीं बख्शा गया। इससे भारतीय जनता में और अधिक आक्रोश उत्पन्न हुआ और आन्दोलन और अधिक उग्र हो गया। जगह-जगह हड़तालें और प्रदर्शन होने लगे, जिससे अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई।

इसी दौरान जेल में ही गाँधी जी की पत्नी कस्तूरबा गांधी का निधन हो गया, जिससे पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। दूसरी ओर, सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन कर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया और अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खोला। सन् 1945 में अंग्रेजों ने सभी बंदी नेताओं को रिहा कर दिया, जिससे जनता में पुनः उत्साह का संचार हुआ। इसी समय सुभाषचन्द्र बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, जो देश के लिए एक बड़ी क्षति थी।

अन्ततः 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, किन्तु इसके साथ ही देश का विभाजन भी हुआ, जिससे हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। इन दंगों से दुःखी होकर गाँधी जी ने शान्ति स्थापना के लिए आमरण अनशन किया। इस खण्डकाव्य का अन्त एक अत्यन्त दुःखद घटना के साथ होता है, जब 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया।

प्रश्न 2.
‘मुक्तियज्ञ’ के नायक (प्रमुख पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके किसी एक प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है।” स-तर्क प्रमाणित कीजिए।
या
राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गाँधी ही ‘मुक्तियज्ञ’ के पुरोधा हैं, खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए और उनका चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘मुक्तियज्ञ’ में कथित उन सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए जिनके आधार पर गाँधी जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया।

उत्तर

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में भारत के स्वतन्त्रता संग्राम का विस्तृत चित्रण किया गया है, जिसका मुख्य केन्द्र महात्मा गांधी का व्यक्तित्व है। इस काव्य के नायक गाँधी जी ही हैं, जिन्होंने अपने आदर्शों, त्याग और संघर्ष के बल पर सम्पूर्ण राष्ट्र को स्वतंत्रता की राह दिखाई। कवि ने उनके व्यक्तित्व के उसी पक्ष को उभारा है, जो भारतीय जनता को प्रेरणा और शक्ति प्रदान करता है।

1. प्रभावशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व – गाँधी जी का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था। उनकी वाणी में अद्भुत आकर्षण और प्रेरणादायक शक्ति थी, जिससे लाखों लोग स्वतः ही उनके पीछे चल पड़ते थे। डांडी यात्रा के प्रसंग में कवि ने उनके व्यक्तित्व की महानता को अत्यन्त सुन्दर रूप में व्यक्त किया है—

“वह प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा थी, जन के राम गये थे फिर वन।
सिन्धु तीर पर लक्ष्य विश्व का, डाण्डी ग्राम बना बलि प्रांगण ॥”

इस प्रकार गाँधी जी जन-जन के हृदय में बसने वाले लोकनायक के रूप में चित्रित होते हैं।

2. सत्य, अहिंसा और प्रेम के उपासक गाँधी जी के जीवन के मूल सिद्धान्त सत्य, अहिंसा और प्रेम थे। उन्होंने इन सिद्धान्तों को केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन में पूर्णतः अपनाया। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष भी अहिंसात्मक तरीके से किया और सिद्ध कर दिया कि बिना हिंसा के भी बड़े परिवर्तन सम्भव हैं।

3. दृढ़-प्रतिज्ञ एवं अटल संकल्प वाले नेता – गाँधी जी अत्यन्त दृढ़-निश्चयी व्यक्ति थे। वे जो भी संकल्प लेते थे, उसे पूरा करके ही दम लेते थे। नमक कानून तोड़ने का उनका निश्चय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है—

“प्राण त्याग दूँगा पथ पर ही, उठा सका मैं यदि न नमक-कर।
लौट न आश्रम में आऊँगा, जो स्वराज ला सका नहीं घर ॥”

4. जातिवाद और छुआछूत के विरोधी गाँधी जी समाज में व्याप्त जाति-पाँति और छुआछूत के कट्टर विरोधी थे। वे सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखते थे और हरिजन उत्थान के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे। उनका मानना था कि समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति है।

5. जन-जन के प्रिय नेता (जननायक) गाँधी जी सच्चे अर्थों में जननेता थे। उनके एक आह्वान पर लाखों लोग अपने घर-परिवार और सुख-सुविधाओं का त्याग कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ते थे—

“मुट्ठी-भर हड्डियाँ बुलातीं, छात्र निकल पड़ते सब बाहर।
लोग छोड़ घर-द्वार, मान, पद, हँस-हँस बन्दी-गृह देते भर ॥”

6. मानवता के पुजारी – गाँधी जी मानवता के सच्चे उपासक थे। वे घृणा और हिंसा को समाप्त कर प्रेम और भाईचारे की स्थापना करना चाहते थे। उनका विश्वास था कि घृणा को केवल प्रेम से ही समाप्त किया जा सकता है—

“घृणा, घृणा से नहीं मरेगी…”

7. लोक-पुरुष एवं युगनायक मुक्तियज्ञ’ में गाँधी जी को एक आदर्श लोक-पुरुष और युगनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे त्याग, सत्य और अहिंसा की मूर्ति हैं तथा निष्काम भाव से राष्ट्र की सेवा करते हैं—

“संस्कृति के नवीन त्याग की, मूर्ति, अहिंसा ज्योति, सत्यव्रत।
लोक-पुरुष स्थितप्रज्ञ, स्नेह-धन, युगनायक, निष्काम कर्मरत ॥”

8. साम्प्रदायिक एकता के समर्थक स्वतन्त्रता के समय जब देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, तब गाँधी जी अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने शान्ति स्थापना के लिए आमरण अनशन किया। इससे उनकी धार्मिक सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता के प्रति समर्पण स्पष्ट होता है।

9. समदर्शी और उदार विचारक – गाँधी जी सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखते थे। उनके लिए न कोई ऊँच-नीच था और न ही कोई भेदभाव। उन्होंने छुआछूत को समाज का कलंक मानते हुए इसे समाप्त करने के लिए आन्दोलन चलाया।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गांधी एक महान् लोकनायक, सत्य और अहिंसा के पुजारी, दृढ़-प्रतिज्ञ, मानवतावादी तथा राष्ट्र के सच्चे मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत होते हैं। उनका व्यक्तित्व भारतीय जनता के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत है। वास्तव में, वे ही इस खण्डकाव्य के केन्द्रबिन्दु और राष्ट्र की स्वतंत्रता के महान पुरोधा हैं।

प्रश्न 3.
‘मुक्तियज्ञ’ में निरूपित आजाद हिन्द सेना की भूमिका पर प्रकाश डालिए।

उत्तर

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए आजाद हिन्द सेना की स्थापना का उल्लेख मिलता है। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था और भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव किया जाता था। इसी परिस्थिति में रासबिहारी बोस ने जापान में भारतीय युद्धबन्दियों और प्रवासी भारतीयों को संगठित कर एक स्वतंत्र सेना बनाने का प्रयास किया।

1. आजाद हिन्द सेना की स्थापना और उद्देश्य – द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत की स्वतंत्रता के लिए एक सशस्त्र संगठन के रूप में आजाद हिन्द सेना का गठन हुआ। इसके निर्माण में प्रमुख भूमिका रासबिहारी बोस ने निभाई, जिन्होंने जापान में भारतीय युद्धबन्दियों और प्रवासी भारतीयों को संगठित किया।

बाद में इस सेना का नेतृत्व सुभाषचन्द्र बोस ने संभाला और इसे एक सशक्त तथा संगठित सैन्य शक्ति में परिवर्तित किया। उनका उद्देश्य था—सशस्त्र क्रान्ति के माध्यम से भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना।

2. सैनिकों में देशभक्ति और त्याग की भावना आजाद हिन्द सेना में वे भारतीय सैनिक भी शामिल थे, जो अंग्रेजी सेना में कार्यरत थे, किन्तु भेदभाव और अपमान से पीड़ित थे। इसके अतिरिक्त मलाया, बर्मा, जावा आदि स्थानों के प्रवासी भारतीय भी इसमें सम्मिलित हुए।

इन सैनिकों में देश के प्रति अपार प्रेम, त्याग और बलिदान की भावना थी। वे अपने प्राणों की परवाह किए बिना मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने को तैयार थे।

3. सुभाषचन्द्र बोस का नेतृत्व – आजाद हिन्द सेना को वास्तविक शक्ति और दिशा सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में प्राप्त हुई। उन्होंने सेना को संगठित किया, उसका मनोबल बढ़ाया और उसे एक स्पष्ट लक्ष्य प्रदान किया।

उन्होंने ‘आजाद हिन्द रेडियो’ के माध्यम से भारतवासियों को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह सेना किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं है, बल्कि यह भारत की स्वतंत्रता के लिए पूर्णतः सक्षम और समर्पित है।

4. स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव आजाद हिन्द सेना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। जहाँ एक ओर गाँधी जी का अहिंसात्मक आन्दोलन चल रहा था, वहीं यह सेना सशस्त्र संघर्ष का प्रतीक बनकर सामने आई।

इससे भारतीयों में क्रान्तिकारी भावना और भी प्रबल हुई तथा अंग्रेजी शासन के प्रति आक्रोश बढ़ गया। इससे यह सिद्ध हुआ कि भारत की स्वतंत्रता के लिए हर स्तर पर संघर्ष किया जा रहा था।

5. आजाद हिन्द सेना के मुकदमे और जनता की प्रतिक्रिया – द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेजों ने आजाद हिन्द सेना के सैनिकों और अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चलाया।

जब इन वीर सैनिकों की शौर्यगाथाएँ जनता के सामने आईं, तो पूरे देश में उनके प्रति सम्मान और सहानुभूति की लहर दौड़ गई। भारतीय जनता का समर्थन खुलकर उनके पक्ष में आ गया, जिससे स्वतंत्रता आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया।

6. सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु और उसका प्रभाव इसी समय सुभाषचन्द्र बोस की विमान दुर्घटना में मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे पूरे देश में शोक की लहर फैल गई।

किन्तु यह शोक शीघ्र ही क्रोध और संकल्प में बदल गया। जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना और अधिक प्रबल हो उठी, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा मिली।

7. क्रान्तिकारी चेतना का प्रसार – आजाद हिन्द सेना ने पूरे देश में क्रान्तिकारी चेतना का संचार किया। इसने यह सिद्ध कर दिया कि भारतवासी केवल अहिंसात्मक आन्दोलन ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र संघर्ष भी कर सकते हैं।

इससे अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई और भारत की स्वतंत्रता का मार्ग और अधिक प्रशस्त हुआ।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ में आजाद हिन्द सेना की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायक रूप में चित्रित की गई है। यह सेना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साहस, त्याग और बलिदान का प्रतीक बनकर उभरती है।

प्रश्न 4.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने जिन प्रमुख राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है, उनका संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

उत्तर

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के अन्तर्गत कवि ने निम्नलिखित राजनैतिक घटनाओं को स्थान दिया है—

  1. साइमन कमीशन का बहिष्कार,
  2. पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग,
  3. नमक आन्दोलन (डाण्डी यात्रा),
  4. शासन को आतंकित करने का आन्दोलन,
  5. देशभक्तों को फाँसी,
  6. मैक्डोनाल्ड पुरस्कार,
  7. काँग्रेस मन्त्रिमण्डलों की स्थापना,
  8. द्वितीय विश्व युद्ध,
  9. सविनय अवज्ञा आन्दोलन,
  10. सन् 1942 ई० की क्रान्ति (भारत छोड़ो आन्दोलन),
  11. आजाद हिन्द फौज की स्थापना,
  12. स्वतन्त्रता की प्राप्ति,
  13. देश का विभाजन तथा
  14. बापू का बलिदान।
Scroll to Top