मुक्ति दूत खण्डकाव्य | Muktidoot Khandkavya Class 10

प्रश्न 1
डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का सारांश लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ की कथावस्तु या कथासार अपने शब्दों में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के प्रतिपाद्य विषय (उद्देश्य) को समझाइए।

उत्तर

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डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य महात्मा गाँधी के जीवन, उनके विचारों और भारत की स्वतंत्रता-यात्रा का अत्यन्त मार्मिक एवं प्रेरणादायक चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें भारत की दयनीय स्थिति से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक की घटनाओं को पाँच सर्गों में विस्तार से बताया गया है।

प्रथम सर्ग में कवि ने भारत की पराधीनता और दयनीय स्थिति का चित्रण किया है। अंग्रेजों के शासन में भारत आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से शोषित हो रहा था। जनता अत्याचारों से पीड़ित थी। कवि अवतारवाद की भावना के अनुसार बताता है कि जब संसार में अन्याय और अत्याचार बढ़ जाते हैं, तब ईश्वर किसी महान पुरुष के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे राम ने रावण का और कृष्ण ने कंस का अंत किया, उसी प्रकार भारत को मुक्त कराने के लिए पोरबन्दर में महात्मा गाँधी का जन्म हुआ। उनका शरीर साधारण था, परन्तु आत्मबल असाधारण था। उन्होंने देश को गुलामी से मुक्त कराने का निश्चय किया और अपने जीवन को राष्ट्र-सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

द्वितीय सर्ग में गाँधीजी के मनोभावों और उनके आन्तरिक संघर्ष का चित्रण है। वे देशवासियों की दयनीय दशा देखकर अत्यन्त दुःखी और चिन्तित होते हैं। उन्हें स्वप्न में अपनी माता के उपदेश याद आते हैं कि मनुष्य को दूसरों की सहायता करनी चाहिए, गिरते को उठाना चाहिए और सबके हित के लिए कार्य करना चाहिए। इससे प्रेरित होकर गाँधीजी यह निश्चय करते हैं कि वे मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराएंगे। इसी सर्ग में उन्हें गोखले जी का भी स्वप्न आता है, जो उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं—

“जो बिगुल बजाया है तुमने, दक्षिण अफ्रीका में प्रियवर,
देखो उसकी गति क्षीण न हो, भारतमाता के पुत्र-प्रवर।”

इन प्रेरणाओं से गाँधीजी का संकल्प और भी दृढ़ हो जाता है।

तृतीय सर्ग में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और गाँधीजी के संघर्ष का वर्णन है। अंग्रेजों ने भारतीयों पर अनेक अत्याचार किए और ‘रॉलेट एक्ट’ जैसा काला कानून लागू किया। जलियाँवाला बाग की भीषण घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना से गाँधीजी का हृदय अत्यन्त व्यथित हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि अब अंग्रेजों के अन्याय को सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने ‘सविनय सत्याग्रह’ का मार्ग अपनाया और देशवासियों को सत्य और अहिंसा के द्वारा संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। उनके साथ अनेक नेता भी इस आंदोलन में शामिल हुए।

चतुर्थ सर्ग में गाँधीजी के नेतृत्व में चले विभिन्न आंदोलनों का विस्तार से वर्णन है। जलियाँवाला बाग की घटना के बाद उन्होंने ‘असहयोग आन्दोलन’ प्रारम्भ किया, जिसमें लोगों ने सरकारी नौकरियाँ छोड़ दीं, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया और अंग्रेजों का विरोध किया। इसके बाद ‘साइमन कमीशन’ का देशभर में विरोध हुआ। लाला लाजपत राय पर हुए लाठी-प्रहार से देश में आक्रोश फैल गया। गाँधीजी ने लोगों को अहिंसा के मार्ग पर बनाए रखने का प्रयास किया। उन्होंने डांडी यात्रा करके नमक कानून तोड़ा, जिससे पूरे देश में स्वतंत्रता की भावना और भी प्रबल हो गई। बाद में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान देश के कोने-कोने में अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठी और अंग्रेजी शासन हिल गया।

पंचम सर्ग में भारत की स्वतंत्रता की अंतिम घटनाओं का वर्णन है। गाँधीजी को कई बार जेल में डाला गया, परन्तु नके विचारों को दबाया नहीं जा सका। अंततः अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का निर्णय लिया। सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हो गया। देश में हर्ष और उल्लास छा गया। विभाजन के कारण कुछ दुखद परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हुईं, परन्तु स्वतंत्रता का सपना पूरा हो गया। गाँधीजी ने अनुभव किया कि उनका उद्देश्य पूरा हो गया है, इसलिए वे राजनीति से अलग हो गए और देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना करने लगे।

इस प्रकार ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के महान व्यक्तित्व, उनके त्याग, संघर्ष और देशभक्ति का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया गया है। यह काव्य हमें सत्य, अहिंसा, त्याग और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा यह बताता है कि दृढ़ निश्चय और सही मार्ग से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 2
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ के प्रथम सर्ग के आधार पर गाँधीजी के लोकोत्तर गुणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग में कवि ने महात्मा गाँधी के अलौकिक तथा मानवीय स्वरूप का बहुत सुन्दर वर्णन किया है। इस सर्ग में उस समय के भारत की दयनीय स्थिति का चित्र भी प्रस्तुत किया गया है।

भारत उस समय अंग्रेजों के अधीन था और चारों ओर शोषण, अत्याचार और अन्याय फैला हुआ था। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हर क्षेत्र में भारत कमजोर हो गया था। जनता दुख और गरीबी से पीड़ित थी। ऐसे कठिन समय में कवि अवतारवाद की भावना को सामने रखते हुए कहता है कि जब-जब संसार में पाप और अत्याचार बढ़ते हैं, तब-तब ईश्वर किसी महापुरुष के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे भगवान राम ने रावण का अंत किया और श्रीकृष्ण ने कंस का वध करके अत्याचारियों से संसार को मुक्त किया, उसी प्रकार समय-समय पर गौतम बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह, हजरत मुहम्मद और गुरु गोविन्द सिंह जैसे महान पुरुष भी मानवता की रक्षा के लिए धरती पर आए। इसी परम्परा में भारत को गुलामी से मुक्त कराने के लिए काठियावाड़ के पोरबन्दर में मोहनदास करमचन्द गाँधी का जन्म हुआ।

गाँधीजी का शरीर भले ही साधारण और कमजोर था, लेकिन उनके भीतर अपार आत्मिक शक्ति थी। वे सच्चाई, अहिंसा और त्याग के प्रतीक थे। उन्होंने अपने जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में दक्षिण अफ्रीका में रहकर वहाँ के भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया। जब वे भारत लौटे, तो यहाँ के गरीब, दलित और शोषित लोगों की स्थिति देखकर उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्हें देश और देशवासियों से अत्यधिक प्रेम था। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना पूरा जीवन भारत की सेवा और स्वतंत्रता के लिए समर्पित करेंगे। उन्होंने लगभग तीस वर्षों तक देश का नेतृत्व किया और सत्य व अहिंसा के मार्ग पर चलकर लोगों को संगठित किया। उनके निरन्तर प्रयासों और त्याग के कारण ही भारत को अन्ततः स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

प्रश्न 3
‘मुक्ति-दूत’ के द्वितीय सर्ग का सारांश लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
“मैं घृणा-द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा न चलाऊँगा। या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा।।”
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य की उक्त पंक्तियों के आधार पर नायक की मनोदशा का वर्णन कीजिए। या । मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में किसकी मुक्ति का वर्णन है सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग में महात्मा गाँधी की मनोदशा, उनके विचारों और उनके भीतर उठ रहे संकल्प का मार्मिक चित्रण किया गया है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि किस प्रकार देश की दयनीय स्थिति देखकर गाँधीजी का हृदय व्यथित हो उठता है और वे देश व समाज के सुधार के लिए दृढ़ निश्चय करते हैं।

गाँधीजी जब भारतवासियों की गरीबी, दुःख, अपमान और छुआछूत जैसी बुरी प्रथाओं को देखते हैं, तो उनका मन बहुत दुखी हो जाता है। वे सोचते हैं कि जब तक देश का हर व्यक्ति सुखी नहीं होगा, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे। वे निश्चय करते हैं कि वे अपने देश को हर प्रकार की बुराइयों से मुक्त करेंगे। उनकी यही भावना इन पंक्तियों में प्रकट होती है—

“मैं घृणा-द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा न चलाऊँगा।
या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा।”

एक दिन गाँधीजी को स्वप्न में अपनी माता का स्मरण होता है। उनकी माता उन्हें सिखाती हैं कि मनुष्य को दूसरों का भला करना चाहिए, जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए और सबको समान समझना चाहिए। माँ की इन शिक्षाओं से गाँधीजी बहुत प्रभावित होते हैं और निश्चय करते हैं कि वे मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराएँगे तथा गरीब और दलित लोगों की रक्षा करेंगे।

गाँधीजी छुआछूत और ऊँच-नीच के भेदभाव के घोर विरोधी थे। वे मानते थे कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं और उनमें कोई भेद नहीं होना चाहिए। उन्होंने हरिजनों को अपने आश्रम में रहने के लिए आमंत्रित किया। इस पर कुछ लोग नाराज हो गए और आश्रम को मिलने वाला चन्दा भी रोक दिया।

जब आश्रम के प्रबंधक ने इस बात पर आपत्ति जताई, तब गाँधीजी ने दृढ़ता से कहा—

“असवर्णों की बस्ती में भी रह लूँगा उनके संग भले।
करके मजदूरी खा लूँगा, सो लूँगा सुख से वृक्ष तले।।
पर मगनलाल! मेरे जीते, अस्पृश्य न कोई हो सकता।
समता की उर्वर धरती में, कटुता के बीज न बो सकता।। ”

इन शब्दों से स्पष्ट होता है कि गाँधीजी समानता और मानवता के सच्चे उपासक थे और अपने सिद्धान्तों से कभी समझौता नहीं करते थे।

इसी सर्ग में गाँधीजी को स्वप्न में गोपाल कृष्ण गोखले भी दिखाई देते हैं, जो उन्हें स्वतंत्रता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और विश्वास व्यक्त करते हैं कि गाँधीजी ही भारत के “मुक्ति-दूत” बनेंगे—

“जो बिगुल बजाया है तुमने, दक्षिण अफ्रीका में प्रियवर।
देखो उसकी गति क्षीण न हो, भारतमाता के पुत्र-प्रवर॥”

प्रश्न 4
‘मुक्ति-दूत’ काव्य के तृतीय सर्ग की कथा का सार लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर जलियाँवाला बाग की घटना का वर्णन कीजिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के किस सर्ग ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया है और क्यों ? संक्षेप में अपने विचार व्यक्त कीजिए। 

उत्तर

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और उनके अत्याचारों के विरुद्ध महात्मा गाँधी के संघर्ष का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में भारत की दुखद स्थिति और स्वतंत्रता के लिए उठती आवाज को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था और वे भारतीयों पर अत्यधिक अत्याचार कर रहे थे। देश के लोग बेबसी और अपमान का जीवन जी रहे थे। केवल वही लोग सुखी थे, जो अंग्रेजों की चापलूसी करते थे। गाँधीजी इस स्थिति को भली-भाँति समझते थे। शुरुआत में गाँधीजी ने अंग्रेजों के प्रति नम्रता और शान्ति की नीति अपनाई। उन्होंने सोचा कि यदि अंग्रेजों को प्रेम और शान्ति से समझाया जाए, तो वे भारतीयों की पीड़ा को समझेंगे। इसी कारण उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के समय भारतीयों से अंग्रेजों की सहायता करने को भी कहा, ताकि अंग्रेजों का हृदय बदल सके।

लेकिन जब अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ कोई सहानुभूति नहीं दिखाई और ‘रॉलेट एक्ट’ जैसा काला कानून लागू कर दिया, तब गाँधीजी को बहुत दुःख हुआ। इस कानून के द्वारा अंग्रेजों ने भारतीयों की स्वतंत्रता को और अधिक सीमित कर दिया। गाँधीजी ने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई और ‘सविनय सत्याग्रह’ आन्दोलन शुरू किया। उनके साथ कई बड़े नेता भी इस संघर्ष में शामिल हो गए। इसी समय एक बहुत ही भयानक और दुखद घटना घटी, जिसे जलियाँवाला बाग हत्याकांड कहा जाता है। वैशाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बहुत से लोग एकत्र हुए थे। वे शान्तिपूर्वक सभा कर रहे थे, तभी जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलवा दीं।

इस हृदयविदारक घटना का वर्णन इन पंक्तियों में किया गया है—

“दस मिनट गोलियाँ लगातार, साढ़े सोलह सौ चक्र चलीं।
जल मरे सहस्राधिक प्राणी, लाशों से संकुल हुई गली।।
चंगेज, हलाकू, अब्दाली, नादिर, तैमूर सभी हारे।
जनरल डायर की पशुता से, पशुता भी रोई मन मारे।। ”

इस घटना में हजारों निर्दोष लोग मारे गए। चारों ओर लाशें बिछ गईं और पूरा वातावरण शोक से भर गया। यह दृश्य देखकर गाँधीजी का हृदय कांप उठा और वे अत्यन्त दुखी हो गए। लेकिन गाँधीजी ने क्रोध में आकर हिंसा का मार्ग नहीं अपनाया। उन्होंने अपने क्रोध को सहन किया और लोगों को शान्ति तथा अहिंसा का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने निश्चय किया कि अब अंग्रेजों को भारत में अधिक समय तक नहीं रहने दिया जाएगा और देश को हर हाल में स्वतंत्र कराया जाएगा।

प्रश्न 5
‘मुक्ति-दूत’ काव्य के चतुर्थ सर्ग की घटनाओं का सार अपने शब्दों में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का चौथा सर्ग गाँधीजी के कर्मयोग का प्रतीक है। सिद्ध कीजिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर चतुर्थ एवं पंचम सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग की कथावस्तु को लिखिए। 

उत्तर

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में महात्मा गाँधी द्वारा भारत की स्वतंत्रता के लिए चलाए गए विभिन्न आंदोलनों और उनके कर्मयोग का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस सर्ग में गाँधीजी के त्याग, साहस और नेतृत्व का प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

जलियाँवाला बाग की भयानक घटना के बाद गाँधीजी ने यह निश्चय कर लिया कि अब अंग्रेजों के अन्याय को सहन नहीं किया जाएगा। उन्होंने सन् 1920 में ‘असहयोग आन्दोलन’ शुरू किया और देशवासियों से इसमें भाग लेने का आह्वान किया। इस आन्दोलन का प्रभाव बहुत व्यापक हुआ। लोगों ने अंग्रेजों की दी हुई उपाधियाँ लौटा दीं, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया और सरकारी नौकरियाँ छोड़ दीं। छात्र स्कूल-कॉलेज छोड़ने लगे और वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया। इससे अंग्रेजी सरकार बहुत घबरा गई। इसके बाद अंग्रेजों ने ‘साइमन कमीशन’ भारत में भेजा, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। गाँधीजी के नेतृत्व में पूरे देश में इसका जोरदार विरोध हुआ। लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य नेताओं ने भी इस विरोध में भाग लिया। विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इससे देश में आक्रोश फैल गया, लेकिन गाँधीजी ने लोगों को अहिंसा का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी।

गाँधीजी ने नमक कानून का विरोध करने के लिए ‘डाण्डी यात्रा’ की। वे 79 साथियों के साथ पैदल चलते हुए डाण्डी पहुँचे और वहाँ नमक बनाकर अंग्रेजों के कानून को तोड़ा। यह घटना पूरे देश में स्वतंत्रता की लहर बनकर फैल गई। अंग्रेजों ने गाँधीजी को जेल में डाल दिया, लेकिन इससे आन्दोलन और भी तेज हो गया। इसके बाद ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ शुरू हुआ। गाँधीजी के एक आह्वान पर पूरा देश उठ खड़ा हुआ और हर जगह एक ही नारा गूंजने लगा—“अंग्रेजों भारत छोड़ो”। लोगों ने सभाएँ कीं, विदेशी वस्त्रों की होली जलाई, और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किए। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए, लेकिन जनता का उत्साह कम नहीं हुआ। इसी दौरान गाँधीजी ने 21 दिन का अनशन भी किया। जेल में रहते हुए उनकी पत्नी का देहांत हो गया, जिससे उन्हें बहुत दुःख हुआ। फिर भी उन्होंने अपने मनोबल को कमजोर नहीं होने दिया और देश की स्वतंत्रता के लिए अपने संघर्ष को जारी रखा। इस दुःखद स्थिति का चित्रण इन पंक्तियों में किया गया है—

“बूढ़े बापू की आहों से, कारा की गूँजी दीवारें।
बन अबाबील चीत्कार उठीं, थर्राई ऊँची मीनारें।”

प्रश्न 6
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग या अन्तिम सर्ग की कथा संक्षेप में लिखिए।

उत्तर

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग में बताया गया है कि जब गाँधीजी जेल में थे, तब उनकी तबीयत खराब हो गई। उनकी खराब सेहत को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। इसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व की राजनीति में बड़ा परिवर्तन होने लगा। इंग्लैंड में चुनाव हुए और वहाँ मजदूर दल की सरकार बनी, जो भारत को स्वतंत्रता देने के पक्ष में थी।

फरवरी 1947 में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री एटली ने यह घोषणा की कि जून 1947 से पहले अंग्रेज भारत छोड़ देंगे। यह सुनकर पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग स्वतंत्रता के सपने को साकार होते देख अत्यन्त प्रसन्न हुए। लेकिन इसी समय एक बड़ी समस्या सामने आई। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के रूप में एक अलग देश बनाने की माँग कर दी। इस कारण देश के कई हिस्सों में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, जैसे नोआखाली और बिहार में। इन दंगों को देखकर गाँधीजी बहुत दुःखी हुए। वे शान्ति स्थापित करने के लिए स्वयं उन स्थानों पर गए और लोगों को प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। गाँधीजी भारत के विभाजन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण देश का विभाजन हो गया। यह उनके लिए बहुत पीड़ादायक था।

अन्ततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया। देश की बागडोर पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथों में सौंपी गई। गाँधीजी को यह अनुभव हुआ कि उनका जीवन-लक्ष्य पूरा हो चुका है, इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया।

इस भाव को कवि ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है—

“लड़ाई मेरी हुई समाप्त, विदा ओ जीवन के जंजाल।
नया गाँधी बन तुम्हें स्वदेश करेगा प्यार जवाहरलाल॥”

अन्त में गाँधीजी देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। वे चाहते हैं कि भारत सदैव शान्ति, प्रेम और एकता के मार्ग पर चले। इसी के साथ खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 7
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर काव्य के नायक (प्रमुख पात्र) महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि गाँधीजी को मुक्ति-दूत क्यों कहा गया है ? उनके चारित्रिक गुणों पर प्रकाश डालिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ के आधार पर गाँधीजी के लोकोत्तर गुणों का वर्णन कीजिए।
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में मुक्ति-दूत कौन हैं ? उनके चरित्र की तीन विशेषताएँ बताइए।
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधी जी की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। 
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के पुरुष पात्र के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
या
‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के उस पात्र का चरित्र-चित्रण लिखिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है।

उत्तर

डॉ० राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी को नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस काव्य में उनके जीवन, आदर्शों, संघर्ष और महान् व्यक्तित्व का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण मिलता है। गाँधीजी केवल एक नेता ही नहीं, बल्कि मानवता के सच्चे सेवक और देश के मुक्तिदाता थे। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

(1) अलौकिक एवं दिव्य पुरुष – कवि के अनुसार जब संसार में अत्याचार बढ़ जाते हैं, तब ईश्वर किसी महापुरुष के रूप में जन्म लेते हैं। जैसे राम, कृष्ण, बुद्ध आदि ने मानवता का उद्धार किया, वैसे ही गाँधीजी ने भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए जन्म लिया। इस दृष्टि से वे एक दिव्य और असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे।

(2) महान् देशभक्त और त्यागी – गाँधीजी सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा में लगा दिया। उन्होंने कभी अपने सुख-सुविधाओं के बारे में नहीं सोचा, बल्कि हमेशा देश और जनता के हित को सर्वोपरि रखा। वे चाहते थे कि भारत स्वतंत्र और समृद्ध बने।

उनकी देशभक्ति इन पंक्तियों में स्पष्ट होती है—

“रहो खुश मेरे हिन्दुस्तान, तुम्हारा पथ हो मंगल-मूल।
सदा महके वन चन्दन चारु, तुम्हारी अँगनाई की धूल।। ”

(3) हरिजनों के सच्चे हितैषी – गाँधीजी ने समाज में फैली छुआछूत और भेदभाव का विरोध किया। वे हरिजनों को अपने समान मानते थे और उन्हें सम्मान दिलाने के लिए जीवनभर संघर्ष करते रहे। उन्होंने हरिजनों को अपने आश्रम में स्थान दिया और उनके साथ समान व्यवहार किया।

उन्होंने कहा—

“जिन हाथों ने संसार गढ़ा, क्या उसने हरिजन नहीं गढ़े।
तब फिर यह कैसा छुआछूत, किस गीता में पाठ पढ़े॥”

और अपने दृढ़ निश्चय को इस प्रकार व्यक्त किया—

“मैं घृणा-द्वेष की यह आँधी, न चलने दूंगा, न चलाऊँगा।
या तो खुद ही मर जाऊँगा, या इसको मार भगाऊँगा॥”

(4) अहिंसा और सत्य के उपासक – गाँधीजी का सबसे बड़ा सिद्धान्त अहिंसा और सत्य था। वे मानते थे कि किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं, बल्कि शान्ति और प्रेम से किया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध भी अहिंसात्मक आन्दोलन चलाए और पूरे देश को सत्याग्रह का मार्ग दिखाया।

(5) हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक – गाँधीजी सभी धर्मों को समान मानते थे। वे हिन्दू और मुस्लिम को एक ही परिवार के सदस्य समझते थे और दोनों के बीच प्रेम और भाईचारा बनाए रखना चाहते थे।

“मुझे लगते हिन्दू-मुस्लिम, एक ही डाली के दो फूल।
एक ही माटी के दो रूप, एक ही जननी के दो लाल॥”

(6) गरीबों और पीड़ितों के प्रति करुणा – गाँधीजी का हृदय गरीबों, दलितों और पीड़ितों के लिए करुणा से भरा हुआ था। वे चाहते थे कि देश का कोई भी व्यक्ति भूखा या नंगा न रहे।

“छोटा बच्चा भी भारत का, है एक अगर नंगा-भूखा।
गाँधी को चैन कहाँ होगा, वह भी सो जाएगा भूखा॥”

(7) कर्मयोगी और संघर्षशील नेता – गाँधीजी केवल उपदेश देने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि कर्म करने वाले महान् नेता थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आन्दोलन जैसे कई आन्दोलन चलाकर अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया। उनका जीवन निरन्तर संघर्ष और कर्म का उदाहरण है।

(8) मातृभक्त और संस्कारवान – गाँधीजी अपनी माता से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपने जीवन के उच्च आदर्श—सत्य, सेवा, दया और त्याग—अपनी माँ से ही सीखे। माँ की शिक्षा ने उनके जीवन को सही दिशा दी।

(9) ‘मुक्ति-दूत’ के रूप में महान् योगदान – गाँधीजी ने भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व और प्रयासों से भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली। इसलिए उन्हें ‘मुक्ति-दूत’ यानी मुक्ति का संदेश देने वाला कहा गया है।

(10) त्याग, सादगी और निर्लोभता – गाँधीजी का जीवन बहुत सादा था। उन्होंने कभी धन, पद या सम्मान की इच्छा नहीं की। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी उन्होंने सत्ता में भाग नहीं लिया और सादा जीवन जीते रहे।

(11) उच्च मानवीय गुणों का संगम – गाँधीजी के चरित्र में सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, परोपकार, समानता और सहिष्णुता जैसे अनेक गुण थे। वे विश्व-बंधुत्व की भावना रखते थे और सभी धर्मों का सम्मान करते थे।

इस प्रकार ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी का चरित्र अत्यन्त महान्, प्रेरणादायक और आदर्शपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे सच्चे अर्थों में मानवता के सेवक, देश के उद्धारक और भारत के “मुक्ति-दूत” थे। उनका जीवन हमें सत्य, अहिंसा और त्याग का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है।

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