प्रश्न 1
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य का सारांश लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ का कथा-सार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ के कथानक का सारांश लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य श्री रामबहोरी शुक्ल द्वारा रचित है। यह महाभारत और भागवत के प्रसंगों पर आधारित है। इस काव्य का मुख्य उद्देश्य पाण्डवों के धर्म, साहस और श्रीकृष्ण के पावन चरित्र को उजागर करना है। खण्डकाव्य का नाम ‘अग्रपूजा’ इसलिए रखा गया क्योंकि युधिष्ठिर ने अपने राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा की।
काव्य कुल छह सर्गों में विभक्त है और इसमें पाण्डवों और उनके चारित्रिक गुणों, उनके संघर्ष और युद्ध की तैयारी का सुंदर चित्रण किया गया है।
प्रथम सर्ग – पूर्वाभास
इस सर्ग की शुरुआत दुर्योधन द्वारा पाण्डवों को मारने के प्रयास से होती है। उसने लाक्षागृह में आग लगा दी, यह सोचकर कि पाण्डव जलकर मर गए। परंतु पाण्डव सुरक्षित बाहर निकल आए। वे वेश बदलकर द्रौपदी के स्वयंवर में पहुंचे। अर्जुन ने मत्स्य-वेध करके स्वयंवर की शर्त पूरी की। कुन्ती और व्यास जी की अनुमति से द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डवों से कर दिया गया।
दुर्योधन पाण्डवों को जीवित देखकर क्रोध और ईर्ष्या से जलने लगा। धृतराष्ट्र ने भीष्म, द्रोण और विदुर से सलाह लेकर पाण्डवों को आधा राज्य देने का निर्णय किया। परंतु दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन और शकुनि ने पाण्डवों से हमेशा के लिए छुटकारा पाने की योजना बनाई।
द्वितीय सर्ग – सभारम्भ
इस सर्ग में पाण्डव खाण्डव वन पहुंचे। यह वन घना और विकराल था। श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से पाण्डवों के लिए भव्य नगर बनवाया, जिसे इन्द्रप्रस्थ नाम दिया गया। हस्तिनापुर से कई नागरिक और व्यापारी यहाँ बस गए। युधिष्ठिर का राज्य धीरे-धीरे समृद्ध हुआ और उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई।
तृतीय सर्ग – आयोजन
पाण्डवों ने नारद जी की सलाह पर यह निर्णय लिया कि द्रौपदी को एक-एक वर्ष प्रत्येक भाई के साथ रखा जाएगा। यदि कोई भाई किसी समय उनके पास न पहुंचे और दूसरा भाई देख ले, तो उसे बारह वर्षों तक वन में रहना पड़े। इस नियम के कारण अर्जुन बारह वर्षों के लिए वन चले गए।
अर्जुन भ्रमण के दौरान द्वारका पहुँचे और श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया। फिर इन्द्रप्रस्थ लौटकर युधिष्ठिर का राज्य सुख और शांति से चला। देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर को बताया कि यदि वे राजसूय यज्ञ करेंगे तो उन्हें इन्द्रलोक में निवास मिलेगा। पर श्रीकृष्ण ने कहा कि पहले जरासन्ध को परास्त करना आवश्यक है। भीम ने मल्लयुद्ध में जरासन्ध को हराया और उसके पुत्र को राज्य दिया। चारों भाइयों को दिग्विजय के लिए भेजा गया और सम्पूर्ण भारत युधिष्ठिर के शासन में आ गया।
चतुर्थ सर्ग – प्रस्थान
इस सर्ग में राजसूय यज्ञ से पूर्व की तैयारियों का वर्णन है। चारों ओर से राजाओं का आगमन हुआ। अर्जुन द्वारका जाकर श्रीकृष्ण को बुलाए। श्रीकृष्ण विशाल सेना लेकर पहुँचे। उनका स्वागत देखकर रुक्मी और शिशुपाल ईर्ष्या से तिलमिला उठे।
पञ्चम सर्ग – राजसूय यज्ञ
यज्ञ प्रारम्भ होने से पहले सभी राजाओं ने अपना स्थान ग्रहण किया। युधिष्ठिर ने यज्ञ की व्यवस्था के लिए अपने सहायकों को काम बाँटे। श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों के चरण धोने का कार्य किया। भीष्म ने अग्रपूजा का अधिकारी पूछा, तो सहदेव ने श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ मान्यता दी। शिशुपाल ने विरोध किया और श्रीकृष्ण पर हमला किया। श्रीकृष्ण ने उन्हें चेतावनी दी, लेकिन शिशुपाल नहीं माने। अन्ततः श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का सिर काट दिया।
षष्ठ सर्ग – उपसंहार
शिशुपाल और श्रीकृष्ण का विवाद यज्ञ पर कोई असर नहीं डाल पाया। यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ। व्यास, धौम्य और अन्य ज्ञानी ऋषियों ने यज्ञ कार्य सम्पन्न किया। युधिष्ठिर ने उन्हें दान-दक्षिणा देकर सम्मानित किया और ऋषियों ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया।
प्रश्न 2:
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग ‘पूर्वाभास’ का सारांश लिखिए।
उत्तर:
प्रथम सर्ग ‘पूर्वाभास’ की कथा पाण्डवों और दुर्योधन के संघर्ष से शुरू होती है। दुर्योधन ने पाण्डवों का विनाश करने के लिए लाक्षागृह में आग लगा दी। उसे विश्वास था कि पाण्डव जलकर मर गए होंगे। लेकिन पाण्डव वहां से सुरक्षित बाहर निकल आए और दुर्योधन की चाल को विफल कर दिया। पाण्डवों ने वेश बदलकर यात्रा की और द्रौपदी के स्वयंवर-मण्डप में पहुँचे। अर्जुन ने अपनी वीरता और पराक्रम से मत्स्य-वेध करके स्वयंवर की शर्त पूरी की। राजाओं ने ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन पर आक्रमण किया, पर अर्जुन और भीम ने उन्हें आसानी से परास्त कर दिया। बलराम और श्रीकृष्ण भी स्वयंवर में उपस्थित थे। उन्होंने पाण्डवों को छिपे हुए वेश में भी पहचान लिया और रात में उनके निवास स्थान पर उनसे मिलने गए। जब राजा द्रुपद को पाण्डवों की वास्तविक स्थिति का पता चला, तो उन्होंने उन्हें राजभवन में आमंत्रित किया। कुन्ती की इच्छा और व्यास जी के अनुमोदन पर द्रौपदी का विवाह पाँचों भाइयों से कर दिया गया।
इसी बीच, दुर्योधन पाण्डवों को जीवित देखकर क्रोध और ईर्ष्या से जलने लगा। शकुनि ने उसे और भी उकसाया। दुर्योधन कर्ण को लेकर धृतराष्ट्र के पास पहुँचा और पाण्डवों को नष्ट करने की योजना बताई। धृतराष्ट्र ने उसे पाण्डवों के साथ प्रेमपूर्वक रहने की सलाह दी, लेकिन दुर्योधन नहीं माना। कर्ण ने उसे पाण्डवों से युद्ध करने और जीतने का सुझाव दिया, पर वह उसे भी नहीं माना। अंततः धृतराष्ट्र चिंतित होकर भीष्म, द्रोण और विदुर से परामर्श करके पाण्डवों को आधा राज्य देने के लिए सहमत हो गए। विदुर ने पाण्डवों को, कुन्ती और द्रौपदी सहित, हस्तिनापुर लाया। जनता ने उनका भव्य स्वागत किया। धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया और पाण्डवों को खाण्डव वन को बसाने के लिए अनुमति दी। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को आशीर्वाद दिया। दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन और शकुनि अब सोचने लगे कि पाण्डवों से हमेशा के लिए कैसे छुटकारा पाया जाए।
प्रश्न 3:
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के सभारम्भ सर्ग (द्वितीय सर्ग) का सारांश लिखिए।
उत्तर:
दूसरे सर्ग ‘सभारम्भ’ में पाण्डव खाण्डव वन पहुँचते हैं। यह वन बहुत ही विशाल और विकराल था। पाण्डवों के साथ श्रीकृष्ण भी थे। उन्होंने विश्वकर्मा से उस वन में पाण्डवों के लिए इन्द्रपुरी जैसा भव्य नगर बनवाया। नगर की सुरक्षा के लिए शस्त्रागार, सैनिक गृह और शतघ्नी शक्ति जैसी व्यवस्था की गई। नगर के चारों ओर सुंदर उद्यान और चौड़े-लंबे मार्ग बनाए गए। नदियाँ निर्मल जल से भरी थीं और सरोवर कमलों से सुशोभित थे। इस नगर का नाम इन्द्रप्रस्थ रखा गया। हस्तिनापुर से बहुत से नागरिक और व्यापारी यहाँ बस गए। व्यास जी भी नगर में आए। युधिष्ठिर को आदर्श राजा मानकर सभी ने सम्मान दिया। श्रीकृष्ण और व्यास जी का साथ पाकर पाण्डव अपने आप को धन्य मानते थे। युधिष्ठिर ने अपने राज्य में सत्य, न्याय और प्रेम के आधार पर शासन किया। उन्होंने रामराज्य को आदर्श मानकर प्रजा के लिए सुख-समृद्धि और शांति का वातावरण बनाया। उनके शासन की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई और उनके नाम की महिमा सुरलोक और पितृलोक तक पहुँची।
प्रश्न 4
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आयोजन सर्ग’ (तृतीय सर्ग) का कथासार (कथावस्तु, कथानक) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘अग्रपूजा के आधार पर जरासन्ध वध को वर्णन कीजिए।
उत्तर
संसार में धन, धरती और स्त्री के कारण संघर्ष होते रहे हैं। कौरव धन और भूमि के पीछे पागल थे, लेकिन पाण्डव अपने पारस्परिक संघर्ष से बचना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने नारद जी की सलाह से यह निश्चय किया कि द्रौपदी को एक-एक वर्ष के लिए अलग-अलग अपने साथ रखा जाएगा। साथ ही यह तय किया कि यदि द्रौपदी किसी एक पति के साथ हों और दूसरा भाई वहाँ पहुँचकर उन्हें देख ले, तो वह बारह वर्षों के लिए वन को चले जाएगा। एक दिन चोरों ने एक ब्राह्मण की गायें चुरा लीं। ब्राह्मण न्याय और सहायता के लिए राजभवन पहुँचा। अर्जुन ने शस्त्रागार से शस्त्र लेकर ब्राह्मण की रक्षा की और गायें वापस दिलाईं। इसी दौरान उन्होंने द्रौपदी को युधिष्ठिर के साथ देखा। नियम-भंग होने के कारण अर्जुन बारह वर्षों के लिए वन चले गये।
वन में भ्रमण करते हुए अर्जुन द्वारका पहुँचे। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया और इन्द्रप्रस्थ लौटे। श्रीकृष्ण भी बहन के साथ बहुत सारा दहेज लेकर इन्द्रप्रस्थ पहुँचे और कुछ समय वहीं रुके। अर्जुन और श्रीकृष्ण ने मिलकर खाण्डव वन का दाह किया। अग्निदेव प्रसन्न हुए और अर्जुन को कपिध्वज रथ, भीम को भारी गदा तथा युधिष्ठिर के लिए अलौकिक सभा-भवन प्रदान किया। श्रीकृष्ण को कौमोदकी गदा और सुदर्शन चक्र प्राप्त हुए। इसी समय मय नामक राक्षस ने सहायता के लिए पुकार की, जिसे अर्जुन ने बचाया। राक्षस ने कृतज्ञता स्वरूप अर्जुन और युधिष्ठिर के लिए उपहार दिये। युधिष्ठिर का राज्य सुख-शांति से चल रहा था। एक दिन देवर्षि नारद इन्द्रप्रस्थ आए और पाण्डु का सन्देश पहुँचाया कि यदि युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करें तो उन्हें इन्द्रलोक में निवास प्राप्त होगा। युधिष्ठिर ने इस विषय में श्रीकृष्ण से राय ली। श्रीकृष्ण ने कहा कि यज्ञ तभी संपन्न होगा जब जरासन्ध का वध हो। इसलिए उन्होंने अर्जुन और भीम को साथ लेकर मगध की राजधानी गिरिव्रज की ओर प्रस्थान किया।
जरासन्ध ने रुद्रयज्ञ में बलि देने के लिए दो हजार राजाओं को बंदी बना रखा था। श्रीकृष्ण ने उसे मल्लयुद्ध के लिए चुनौती दी। तेरह दिन के कठिन युद्ध के बाद भीम ने जरासन्ध की एक टाँग को पैर से दबाकर दूसरी टाँग ऊपर उठाई और उसे बीच से चीर दिया। इसके बाद सभी बंदी राजाओं को मुक्त कर दिया गया और जरासन्ध का पुत्र सहदेव वहाँ का राजा बनाया गया, जिसने युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार की। इन्द्रप्रस्थ लौटकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से विदा ली और द्वारका चले गए। युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को चारों दिशाओं में भेजकर दिग्विजय कराया। सभी भाइयों ने अपने-अपने क्षेत्र के राजाओं को जीतकर युधिष्ठिर के अधीन कर दिया। इसके बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की योजनाबद्ध तैयारी प्रारम्भ की। भव्य यज्ञशाला बनाई गई और सभी दिशाओं में निमन्त्रण-पत्र भेजे गए। कौरव और अनेक राजाओं सहित देव, मनुष्य और दानव सभी यज्ञ में भाग लेने इन्द्रप्रस्थ एकत्र हुए। सभी का सत्कार किया गया और उपयुक्त आवासों में रखा गया।
प्रश्न 5
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के प्रस्थान’ सर्ग (चतुर्थ सर्ग) का सारांश लिखिए।
उत्तर
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग ‘प्रस्थान’ में राजसूय यज्ञ की तैयारियों और श्रीकृष्ण के इन्द्रप्रस्थ आगमन का वर्णन किया गया है। युधिष्ठिर ने यज्ञ के लिए अनेक राजाओं को आमंत्रित किया और यज्ञ को सफल बनाने के लिए अर्जुन को द्वारका भेजकर श्रीकृष्ण को बुलवाया। अर्जुन के अनुरोध पर श्रीकृष्ण ने आने की स्वीकृति दी, किन्तु उन्होंने पहले बलराम और अन्य दरबारियों से विचार-विमर्श किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि कुछ राजा भीतर ही भीतर विरोधी हैं और वे बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए वे अपनी विशाल सेना के साथ इन्द्रप्रस्थ पहुँचे। युधिष्ठिर ने नगर के बाहर जाकर उनका अत्यन्त सम्मानपूर्वक स्वागत किया और स्वयं उनका रथ हाँककर उन्हें नगर में लाए। श्रीकृष्ण के भव्य स्वागत को देखकर नगरवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनका गुणगान करने लगे, परन्तु रुक्मी और शिशुपाल जैसे कुछ राजा ईर्ष्या और द्वेष से भर उठे और मन-ही-मन जलते रहे। इस प्रकार इस सर्ग में यज्ञ की तैयारी, श्रीकृष्ण का आगमन और विभिन्न राजाओं की भावनाओं का सुन्दर चित्रण किया गया है।
प्रश्न 6
‘अग्रपूजा’ के आधार पर शिशुपाल वध का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘राजसूय यज्ञ’ सर्ग (पञ्चम सर्ग) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
सभा में शिशुपाल से भीष्म ने क्या कहा, इस पर विशेष प्रकाश डालिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के पञ्चम सर्ग (राजसूय यज्ञ) का सारांश लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली घटना का सकारण उल्लेख कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर शिशुपाल वध के सन्दर्भ में श्रीकृष्ण की सहनशीलता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की सभी तैयारियाँ पहले से ही सुचारु रूप से कर रखी थीं और विभिन्न कार्य अपने स्वजनों में बाँट दिये थे। यज्ञ आरम्भ होने से पूर्व सभी राजा और सभासद अपने-अपने स्थान पर बैठ गये। श्रीकृष्ण ने अपनी महानता और विनम्रता का परिचय देते हुए स्वयं ब्राह्मणों के चरण धोने का कार्य अपने ऊपर लिया, जिससे उनके सरल और सेवाभावी स्वभाव का परिचय मिलता है। जब सभा में यह प्रश्न उठा कि सबसे पहले किसकी पूजा की जाए, अर्थात् अग्रपूजा का अधिकारी कौन है, तब सहदेव ने बिना किसी संकोच के श्रीकृष्ण को सर्वश्रेष्ठ और प्रथम पूज्य बताया। भीष्म ने सहदेव के मत का पूर्ण समर्थन किया और सभा में उपस्थित अधिकांश राजाओं ने भी इसे स्वीकार कर लिया।
किन्तु शिशुपाल, जो पहले से ही श्रीकृष्ण से द्वेष रखता था, इस निर्णय को सहन नहीं कर सका। उसने ईर्ष्या और अहंकार में भरकर श्रीकृष्ण के गुणों में दोष निकालना शुरू कर दिया और उनके प्रति अपशब्द कहने लगा। उसकी इस अनुचित बात पर भीष्म ने अत्यन्त शान्त और संयमित शब्दों में उसे समझाया कि ईर्ष्या के कारण मनुष्य सही और गलत का भेद भूल जाता है। उन्होंने श्रीकृष्ण के महान गुणों—उनकी दया, करुणा, धर्म-पालन, विनम्रता और परोपकारिता—का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि वे ही वास्तव में अग्रपूजा के अधिकारी हैं।
फिर भी शिशुपाल अपने क्रोध और द्वेष में अन्धा होकर लगातार श्रीकृष्ण का अपमान करता रहा। सहदेव ने दृढ़ता के साथ घोषणा की कि वे श्रीकृष्ण की ही अग्रपूजा करेंगे और जिसे रोकना हो, वह रोक ले। इसके बाद उन्होंने श्रीकृष्ण के चरण धोकर उनका सम्मान किया। यह देखकर शिशुपाल अत्यन्त क्रोधित हो उठा और श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए दौड़ पड़ा। वह उन्हें अपशब्द कहता हुआ इधर-उधर व्यर्थ प्रयास करता रहा, जबकि श्रीकृष्ण शांत भाव से मुस्कराते रहे। श्रीकृष्ण ने अपनी फूफी को दिए हुए वचन के कारण शिशुपाल के सौ अपराधों तक उसे क्षमा करने का निश्चय किया था, इसलिए वे बार-बार उसकी बातों को सहते रहे और उसे चेतावनी भी देते रहे। इससे उनकी अपार सहनशीलता और धैर्य का परिचय मिलता है। किन्तु जब शिशुपाल ने मर्यादा की सभी सीमाएँ पार कर दीं और लगातार अपमान करता रहा, तब श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया और उसका वध कर दिया।
इसके बाद सभा में शान्ति स्थापित हो गयी और राजसूय यज्ञ बिना किसी बाधा के सम्पन्न होता रहा। युधिष्ठिर ने उदारता दिखाते हुए शिशुपाल के पुत्र को चेदि राज्य का राजा बना दिया। इस प्रकार इस सर्ग में श्रीकृष्ण की सहनशीलता, महानता और धर्म-स्थापना का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया गया है, जो पाठकों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।
प्रश्न 7
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के ‘उपसंहार’ सर्ग (षष्ठ सर्ग) का सारांश (कथासार) अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर
पञ्चम सर्ग में शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच जो विवाद हुआ था, उसका यज्ञ पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा और यज्ञ निर्विघ्न रूप से चलता रहा। व्यास, धौम्य आदि अनेक विद्वान और तत्त्वज्ञानी ऋषियों ने विधिपूर्वक यज्ञ को सम्पन्न कराया। युधिष्ठिर ने सभी ऋषियों और अतिथियों का आदर-सत्कार किया तथा उन्हें उचित दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न किया। उन्होंने श्रीकृष्ण और बलराम के प्रति भी अपना हृदय से आभार प्रकट किया, जिनकी सहायता से यह महान कार्य सफल हो सका। यज्ञ में आए सभी राजा युधिष्ठिर के सौम्य स्वभाव, विनम्रता और उत्तम आतिथ्य से अत्यन्त संतुष्ट हुए और उन्होंने उन्हें अपना अधिपति स्वीकार करते हुए उनकी आज्ञा का पालन करने का वचन दिया। अंत में सभी ऋषियों ने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया, जिसे उन्होंने विनम्रता से स्वीकार किया।
प्रश्न 8
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर उसके नायक श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्यः का नायक कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के पात्रों में जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो अथवा सर्वश्रेष्ठ पात्र के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘अग्रपूजा के किसी प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के नायक के गुणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के प्रधान पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के नायक श्रीकृष्ण हैं, जो सम्पूर्ण काव्य में प्रमुख पात्र और सभी घटनाओं के सूत्रधार के रूप में दिखाई देते हैं। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अग्रपूजा के लिए उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जिससे उनकी महानता स्पष्ट होती है। श्रीकृष्ण का चरित्र अत्यन्त व्यापक और प्रभावशाली है। वे लीलाधारी तथा अलौकिक पुरुष हैं, क्योंकि वे खाण्डव वन को इन्द्रपुरी जैसे भव्य नगर में परिवर्तित करवाते हैं और शिशुपाल को अनेक रूपों में दिखाई देकर अपनी दिव्य शक्ति का परिचय देते हैं। वे अत्यन्त विनम्र और शिष्ट हैं; इतने महान होने पर भी वे राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों के चरण धोने का कार्य स्वयं करते हैं, जो उनके सेवाभाव को दर्शाता है।
श्रीकृष्ण पाण्डवों के परम हितैषी और सच्चे मार्गदर्शक हैं। वे हर कठिन परिस्थिति में उनका साथ देते हैं—द्रौपदी स्वयंवर में उन्हें पहचानकर सहयोग करना, इन्द्रप्रस्थ के निर्माण में सहायता देना तथा जरासन्ध वध की योजना बनाना—इन सब से उनका पाण्डवों के प्रति प्रेम और सहयोगभाव प्रकट होता है। वे अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं, जिनकी मधुर मुस्कान और रूप देखकर नगरवासी मोहित हो जाते हैं। उनके चरित्र में धैर्य और वीरता का अद्भुत संगम है। शिशुपाल के बार-बार अपमान करने पर भी वे धैर्यपूर्वक उसे सहन करते हैं और अपनी फूफी को दिए वचन के कारण उसे अनेक बार क्षमा करते हैं, परन्तु जब वह मर्यादा की सीमा पार कर देता है, तब वे सुदर्शन चक्र से उसका वध कर धर्म की रक्षा करते हैं।
वे धर्म और मर्यादा के सच्चे पालनकर्ता हैं, जो सदैव सत्य, न्याय और नीति के मार्ग पर चलते हैं और दूसरों को भी उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनके व्यक्तित्व में योग और भोग का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है; वे संसार में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते, इसलिए उन्हें अनासक्त योगी कहा जाता है। वे करुणा, दया, प्रेम और विनम्रता के भण्डार हैं तथा अनीति का नाश कर धर्म की स्थापना करते हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण एक आदर्श नायक हैं, जिनमें विनम्रता, साहस, धैर्य, बुद्धिमत्ता, करुणा और धर्मनिष्ठा जैसे अनेक महान गुण विद्यमान हैं। उनका चरित्र पाठकों को प्रेरणा देता है और उन्हें जीवन में सत्य, धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा प्रदान करता है।
प्रश्न 9
‘अग्रपूजा के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ के आधार पर युधिष्ठिर के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘अग्रपूजा’ में जिस पात्र के चारित्रिक गुणों ने आपको प्रभावित किया है, उस पर संक्षेप में – प्रकाश डालिए।
उत्तर
युधिष्ठिर का चरित्र अत्यन्त आदर्श और प्रेरणादायक दिखाई देता है। वे पाण्डवों में सबसे बड़े भाई थे और इन्द्रप्रस्थ में उनका ही राज्याभिषेक हुआ। सभी राजाओं ने उनकी अधीनता स्वीकार की और उनके नेतृत्व में राजसूय यज्ञ सम्पन्न हुआ। इस प्रकार युधिष्ठिर इस काव्य के प्रमुख पात्रों में से एक हैं। उनके चरित्र में अनेक महान गुण दिखाई देते हैं, जो उन्हें एक आदर्श राजा और श्रेष्ठ मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
(1) विनम्र और शिष्ट स्वभाव – युधिष्ठिर का स्वभाव अत्यन्त विनम्र और शिष्ट है। वे बड़ों का बहुत सम्मान करते हैं और सदैव नम्रता से व्यवहार करते हैं। इन्द्रप्रस्थ में जब गुरु द्रोणाचार्य आते हैं, तब युधिष्ठिर आदरपूर्वक उनके चरणों में झुक जाते हैं। इसी प्रकार जब राजसूय यज्ञ के अवसर पर श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ पहुँचते हैं, तो युधिष्ठिर स्वयं उनका रथ हाँककर उन्हें नगर में प्रवेश कराते हैं। यज्ञ के सम्पन्न होने पर वे ऋषियों और अतिथियों को दान-दक्षिणा देकर सम्मानित करते हैं और उनके आशीर्वाद को विनम्रता से स्वीकार करते हैं। इससे उनके नम्र और सभ्य स्वभाव का पता चलता है।
(2) आदर्श शासक – युधिष्ठिर एक आदर्श शासक हैं। वे अपनी प्रजा को सुखी और समृद्ध बनाने का प्रयास करते हैं और रामराज्य को अपना आदर्श मानते हैं। उनके शासन में प्रजा शान्ति और समृद्धि से रहती है। वे न्याय और नीति के अनुसार शासन करते हैं और सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करते हैं। उनका उद्देश्य केवल राज्य विस्तार नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना करना था।
(3) धार्मिक और सत्यप्रिय – युधिष्ठिर धार्मिक तथा सत्यप्रिय हैं। वे हर कार्य धर्म और न्याय के अनुसार करते हैं और सदैव सत्य के मार्ग पर चलते हैं। इसी कारण उन्हें ‘धर्मराज’ कहा जाता है। वे अपने पिता की इच्छा को पूर्ण करने के लिए राजसूय यज्ञ का आयोजन करते हैं और इसे पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ सम्पन्न करते हैं।
(4) उदार और दयालु हृदय – युधिष्ठिर अत्यन्त उदार और दयालु हैं। वे राज्य के लिए किसी से झगड़ा नहीं करते और खाण्डव वन के भाग को ही अपना राज्य मानकर संतोष कर लेते हैं। उन्होंने जरासन्ध और शिशुपाल के वध के बाद भी उनके राज्यों को अपने राज्य में नहीं मिलाया, बल्कि उनके पुत्रों को ही राजा बना दिया। राजसूय यज्ञ के समय उन्होंने ब्राह्मणों और अतिथियों को उदारता से दान-दक्षिणा दी और सभी का सम्मान किया।
इस प्रकार युधिष्ठिर का चरित्र विनम्रता, धर्मनिष्ठा, सत्यप्रेम, उदारता और आदर्श शासन जैसे गुणों से परिपूर्ण है। वे एक ऐसे आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत होते हैं, जो अपने आचरण और व्यवहार से समाज को सही मार्ग दिखाते हैं और मानव-जीवन के उच्च आदर्शों की स्थापना करते हैं।
प्रश्न 10
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर शिशुपाल का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर
‘अग्रपूजा’ खण्डकाव्य के आधार पर शिशुपाल का चरित्र एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह चेदि राज्य का राजा था, किन्तु उसके स्वभाव में अनेक अवगुण थे। वह ईर्ष्यालु, क्रोधी, अभिमानी और अशिष्ट व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है। उसके चरित्र के माध्यम से यह बताया गया है कि बुरे गुण मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं। शिशुपाल का चरित्र-चित्रण इस प्रकार है—
(1) श्रीकृष्ण का शत्रु – शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच पुरानी शत्रुता थी। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, परन्तु रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को पति के रूप में चुना। श्रीकृष्ण द्वारा रुक्मिणी के हरण और विवाह के कारण शिशुपाल उनके प्रति द्वेष रखने लगा और उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मानने लगा।
(2) अत्यन्त ईर्ष्यालु – शिशुपाल स्वभाव से बहुत ईर्ष्यालु था। इन्द्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ के समय जब श्रीकृष्ण का सम्मान हुआ और उन्हें अग्रपूजा का अधिकारी माना गया, तो वह इसे सहन नहीं कर सका। ईर्ष्या के कारण उसने सभा में ही श्रीकृष्ण के विरुद्ध अपशब्द कहे और उनके गुणों में दोष निकालने लगा।
(3) क्रोधी और अभिमानी – शिशुपाल में क्रोध और अभिमान भरा हुआ था। वह अपने आपको श्रेष्ठ समझता था और दूसरों का अपमान करने में उसे कोई संकोच नहीं होता था। सभा में वह क्रोध में भरकर श्रीकृष्ण को ललकारता है और उनसे लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। उसका यह अभिमान ही उसके पतन का मुख्य कारण बनता है।
(4) अशिष्ट और उद्दण्ड – शिशुपाल की वाणी बहुत अशिष्ट थी। वह न तो बड़ों का सम्मान करता था और न ही सभा की मर्यादा का ध्यान रखता था। उसने भीष्म जैसे महान और सम्मानित व्यक्ति तक के लिए अपमानजनक शब्द कहे। सहदेव के निर्णय का भी उसने मजाक उड़ाया। उसकी अशिष्टता उसके चरित्र का सबसे बड़ा दोष है।
(5) हठी और अविवेकी – शिशुपाल को कई बार समझाया गया, परन्तु उसने किसी की बात नहीं मानी। भीष्म ने उसे शान्त और तर्कपूर्ण ढंग से समझाया, फिर भी वह अपनी जिद पर अड़ा रहा और लगातार अपमान करता रहा। इससे स्पष्ट होता है कि वह अविवेकी और हठी स्वभाव का था।
(6) अपने दोषों के कारण विनाश – शिशुपाल ने अपनी सीमाएँ पार कर दीं और बार-बार श्रीकृष्ण का अपमान करता रहा। श्रीकृष्ण ने पहले उसे क्षमा किया, परन्तु जब उसने मर्यादा की सभी सीमाएँ तोड़ दीं, तब अंततः श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। इस प्रकार उसका अंत उसके ही दोषों के कारण हुआ।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शिशुपाल का चरित्र हमें यह शिक्षा देता है कि ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार जैसे दुर्गुण मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं।
