मातृभूमि के लिए (खण्डकाव्य) | Matrabhoomi Ke Liye Khandkavya

प्रश्न 1
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का संकल्प उदाहरणसहित स्पष्ट कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के संकल्प (प्रथम) सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। 
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर ‘संकल्प’ (प्रथम) सर्ग का सारांश लिखिए। 
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर तत्कालीन भारत की स्थिति का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर सिद्ध कीजिए कि अंग्रेजों ने भारतवर्ष पर बहुत अत्याचार किये।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग का सारांश लिखिए। 

उत्तर

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य तीन सर्गों—संकल्प, संघर्ष और बलिदान—में विभक्त है। इसका प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ है, जिसमें चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की प्रारम्भिक घटनाओं तथा उनके दृढ़ निश्चय का वर्णन किया गया है।

इस सर्ग में उस समय की भारत की दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है। देश पर अंग्रेजों का शासन था और वे भारतीयों पर अत्यन्त अत्याचार कर रहे थे। रॉलेट एक्ट जैसे कड़े कानून बनाकर वे देशभक्तों को बिना कारण दण्डित करते थे। इसी अत्याचार के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग हत्याकांड में एक सभा आयोजित की गई थी, जहाँ जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलवा दीं। इस भयानक घटना में अनेक निर्दोष स्त्री-पुरुष और बच्चे मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया और अंग्रेजों की क्रूरता को स्पष्ट कर दिया।

इन घटनाओं का गहरा प्रभाव किशोर चन्द्रशेखर आजाद के मन पर पड़ा। जब उन्होंने इन अत्याचारों के बारे में पढ़ा, तो उनका हृदय क्रोध और करुणा से भर गया। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे केवल पढ़ाई में समय न लगाकर अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना जीवन समर्पित करेंगे। उनका यह दृढ़ संकल्प इन पंक्तियों में व्यक्त होता है—

“इस जन्मभूमि के लिए प्राण
मैं अपने अर्पित कर दूंगा,
आजाद न होगी जब तक यह
मैं कर्म अकल्पित कर दूंगा।”

उसी समय महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन का आह्वान किया। उनके आह्वान पर देश के अनेक छात्र और नागरिक स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। चन्द्रशेखर आजाद भी इस आन्दोलन में शामिल हो गए और अंग्रेजों का विरोध करने लगे। वे धरनों और प्रदर्शनों में भाग लेने लगे।

अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अदालत में पेश किया। जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने निर्भीक होकर कहा—“मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वाधीन है और मेरा घर जेलखाना है।” यह सुनकर मजिस्ट्रेट भी चकित रह गया और उसे उनके साहस पर आश्चर्य हुआ। उसने उन्हें 15 बेंतों की सजा दी।

सजा के समय भी चन्द्रशेखर आजाद ने अद्भुत साहस दिखाया। हर बेंत के प्रहार पर वे “भारत माता की जय” का नारा लगाते रहे। उनके इस अदम्य साहस को इन पंक्तियों में व्यक्त किया गया है—

“पर बालक वह अंगारा था,
आँखों में उग्र उजाला था,
भगता अँधियार गुलामी का,
देखता जिधर वह प्यारा था।”

जब वे जेल से मुक्त हुए, तो जनता ने उनका भव्य स्वागत किया और उनके साहस की प्रशंसा की। तभी से लोग उन्हें ‘आजाद’ के नाम से पुकारने लगे। इस प्रकार इस सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के दृढ़ संकल्प, देशप्रेम और वीरता का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

प्रश्न 2
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर द्वितीय सर्ग (संघर्ष सर्ग) का सारांश (कथावस्तु | या कथानक) लिखिए। 

उत्तर

‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग ‘संघर्ष’ में चन्द्रशेखर आजाद के क्रान्तिकारी जीवन और अंग्रेजों के विरुद्ध उनके संघर्ष का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में यह दिखाया गया है कि कैसे आजाद ने देश की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाया।

असहयोग आन्दोलन के मन्द पड़ जाने के बाद चन्द्रशेखर आजाद का झुकाव शस्त्र-क्रान्ति की ओर हो गया। उन्हें यह अनुभव हुआ कि केवल शांतिपूर्ण आन्दोलन से अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना कठिन है, इसलिए उन्होंने हथियारों के माध्यम से संघर्ष करने का निश्चय किया। इसके लिए धन की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने मोटर ड्राइविंग सीखी और एक मठ में शिष्य बनकर गुप्त रूप से कार्य करने लगे।

इसके बाद उन्होंने भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल आदि साथियों के साथ मिलकर एक मजबूत क्रान्तिकारी संगठन बनाया। योजना के अनुसार 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन के पास ट्रेन से सरकारी खजाना लूट लिया गया। इस घटना को काकोरी कांड कहा जाता है। इस कार्य में क्रान्तिकारियों को सफलता तो मिली, परन्तु बाद में कई साथी पकड़े गए। रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ को फाँसी दे दी गई, कुछ को आजीवन कारावास और कई लोगों को जेल की सजा हुई, जबकि चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह बच निकले।

सन् 1928 में साइमन कमीशन भारत आया। इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए पूरे देश में इसका विरोध हुआ। जगह-जगह प्रदर्शन हुए और लोगों ने काले झण्डे दिखाकर विरोध जताया। लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस अधिकारी स्कॉट ने लाठीचार्ज किया, जिससे कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना से देश में शोक और क्रोध की लहर फैल गई।

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए क्रान्तिकारियों ने ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ का गठन किया और आजाद को उसका कमाण्डर-इन-चीफ बनाया गया। आजाद ने भगत सिंह और राजगुरु के साथ मिलकर स्कॉट को मारने की योजना बनाई, लेकिन गलती से साण्डर्स मारा गया। इस घटना से अंग्रेज सरकार हिल गई और उसने क्रान्तिकारियों के दमन को और तेज कर दिया।

इसके बाद सरकार असेम्बली में एक कठोर कानून पास करना चाहती थी। इसके विरोध में 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंका। उन्होंने किसी को मारने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपनी आवाज बुलन्द करने के लिए यह कार्य किया और “भारत माता की जय” का नारा लगाते हुए स्वयं को गिरफ्तार करा दिया।

सरकार ने इन क्रान्तिकारियों पर कई आरोप लगाकर कठोर दण्ड दिए। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाई गई। इसके बाद पूरे संगठन का भार चन्द्रशेखर आजाद पर आ गया। वे अपने साथियों को बचाने और अंग्रेजों से बदला लेने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे। इस प्रकार इस सर्ग में आजाद के संघर्ष, साहस और क्रान्तिकारी गतिविधियों का विस्तृत चित्रण किया गया है।

प्रश्न 3
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर तृतीय सर्ग (बलिदान सर्ग) का सारांश लिखिए। 
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के तीसरे सर्ग के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के अन्तिम बलिदान के दृश्य का वर्णन कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य की किसी एक प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए। 
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के मार्मिक दृश्यों का अंकन कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर उस घटना का वर्णन कीजिए जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।
था
‘चन्द्रशेखर आजाद का जीवन विराट संघर्ष और राष्ट्रप्रेम के उदात्त पक्ष का प्रतीक था।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के त्याग और बलिदान का वर्णन कीजिए। 
[ संकेत-इस प्रश्न के उत्तर हेतु द्वितीय एवं तृतीय सर्ग के सारांश को संक्षिप्त रूप में लिखें।]
या
‘मातृभूमि के लिए’ में वर्णित आजाद के जीवन के प्रेरक प्रसंगों का वर्णन कीजिए। 
[ संकेत-इस प्रश्न के उत्तर हेतु आजाद के ‘विद्यार्थी जीवन’ की एवं ‘अल्फ्रेड पार्क’ के प्रसंग को संक्षेप में लिखें।

उत्तर

‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग ‘बलिदान’ में चन्द्रशेखर आजाद के जीवन के अन्तिम समय और उनके महान बलिदान का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया गया है। इस सर्ग में दिखाया गया है कि लगातार संघर्ष करते-करते जब आजाद थक जाते थे, तो वे प्रकृति की शान्त गोद में जाकर विश्राम करते थे। मध्य प्रदेश की सातार नदी के तट पर स्थित हनुमान जी का मन्दिर और पास की गुफा उनका प्रिय विश्राम-स्थल था, जहाँ वे अपने मित्र रुद्र के साथ बैठकर भविष्य की योजनाएँ बनाते थे। अपने शहीद साथियों को याद करके उनका हृदय क्रोध और वेदना से भर उठता था और वे बार-बार कहते थे कि अंग्रेजों ने भारतमाता के पुत्रों का रक्त बहाया है, इसलिए वे उन्हें कभी क्षमा नहीं करेंगे और अन्त तक संघर्ष करते रहेंगे। एक दिन वे एक सभा में पहुँचे, जहाँ सशस्त्र क्रान्ति के विरोध में भाषण हो रहा था, परन्तु गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें समझाकर शान्त कर दिया और आजाद ने संयम से काम लिया, क्योंकि वे अपनी योजनाओं को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाना चाहते थे। इसके बाद वे प्रयाग जाने की योजना बनाते हैं, जहाँ वे अपने साथियों से मिलकर आगे की रणनीति तय करना चाहते थे।

फरवरी 1931 में प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में वे अपने कुछ साथियों के साथ बैठे हुए थे कि तभी अचानक पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। इस संकटपूर्ण स्थिति में भी आजाद ने अद्भुत साहस का परिचय दिया और सबसे पहले अपने साथियों को सुरक्षित निकल जाने का आदेश दिया, ताकि वे पकड़े न जाएँ। इसके बाद उन्होंने अकेले ही पुलिस का सामना किया और अपनी पिस्तौल से गोलियाँ चलाकर कई अंग्रेज सिपाहियों को घायल कर दिया, यहाँ तक कि एक अधिकारी का जबड़ा उड़ा दिया और दूसरे की कलाई भी घायल कर दी। वे लगभग एक घण्टे तक अकेले ही विशाल पुलिस दल से लड़ते रहे और उनकी वीरता देखकर पुलिस भी भयभीत हो उठी।

अन्त में जब उनके पास केवल एक ही गोली बची, तो उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएँगे, क्योंकि उन्होंने पहले ही यह प्रण किया था कि वे कभी बन्दी नहीं बनेंगे। अतः उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को निभाते हुए उसी अंतिम गोली से स्वयं को गोली मार ली और वीरगति को प्राप्त हो गए। उनके इस अद्वितीय बलिदान से पूरा देश स्तब्ध रह गया और लोगों के हृदय में उनके प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न हो गई। जिस वृक्ष की आड़ लेकर उन्होंने संघर्ष किया था, वह स्थान जनता के लिए पूजनीय बन गया, यद्यपि अंग्रेजों ने बाद में उसे भी कटवा दिया। इस प्रकार इस सर्ग में चन्द्रशेखर आजाद के अदम्य साहस, देशप्रेम और सर्वोच्च बलिदान का अत्यन्त प्रेरणादायक चित्रण किया गया है, जो हमें अपने देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है।

प्रश्न 4
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य की कथावस्तु (कथानक या सारांश) संक्षेप में लिखिए।
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की प्रमुख घटनाओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का जीवन-चरित्र संक्षेप में लिखिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद की राष्ट्रनिष्ठा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर

जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य तीन सर्गों—संकल्प, संघर्ष और बलिदान—में विभक्त है, जिसमें चन्द्रशेखर आजाद के जीवन, उनके राष्ट्रप्रेम और बलिदान का क्रमबद्ध वर्णन किया गया है।

प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ में उनके छात्र-जीवन का चित्रण है। वे काशी में संस्कृत का अध्ययन कर रहे थे, उसी समय देश में अंग्रेजों के अत्याचार चरम पर थे। रॉलेट एक्ट जैसे कठोर कानून लागू थे और जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसी हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। इस घटना को पढ़कर किशोर चन्द्रशेखर का हृदय क्रोध और करुणा से भर गया और उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित करेंगे। महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया, जहाँ उन्होंने निर्भीक होकर अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर ‘जेलखाना’ बताया तथा बेंतों की सजा सहते हुए भी “भारत माता की जय” के नारे लगाते रहे, जिससे उनका अदम्य साहस प्रकट होता है।

द्वितीय सर्ग ‘संघर्ष’ में उनके क्रान्तिकारी जीवन का विस्तृत चित्रण मिलता है। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर उन्होंने शस्त्र-क्रान्ति का मार्ग अपनाया और भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल आदि साथियों के साथ मिलकर एक सशक्त संगठन बनाया। 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड के माध्यम से सरकारी खजाना लूटकर उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी। इस घटना के बाद कई क्रान्तिकारी पकड़े गए और उन्हें फाँसी या जेल की सजा मिली, किन्तु आजाद बच निकले। 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में मृत्यु हो गई, जिससे क्रान्तिकारियों में रोष फैल गया और बदले में साण्डर्स की हत्या की गई। इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने असेम्बली में बम फेंककर अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाई, जिसके कारण कई क्रान्तिकारियों को फाँसी की सजा मिली और आन्दोलन और तीव्र हो गया।

तृतीय सर्ग ‘बलिदान’ में आजाद के जीवन के अन्तिम समय का अत्यन्त मार्मिक चित्रण है। वे निरन्तर संघर्ष करते हुए भी अपने साथियों के साथ योजनाएँ बनाते रहते थे। फरवरी 1931 में प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में वे अपने साथियों के साथ बैठे थे कि अचानक पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इस संकट में उन्होंने अपने साथियों को सुरक्षित भेज दिया और स्वयं अकेले ही पुलिस से डटकर मुकाबला किया। उन्होंने बहादुरी से कई पुलिसकर्मियों को घायल किया और अन्त तक संघर्ष करते रहे। जब उनके पास केवल एक गोली बची, तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं पकड़े जाएँगे, उसी गोली से स्वयं को मारकर वीरगति प्राप्त कर ली। इस प्रकार इस खण्डकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद के संकल्प, संघर्ष और बलिदान के माध्यम से उनके महान राष्ट्रप्रेम, साहस और त्याग का अत्यन्त प्रेरणादायक चित्रण किया गया है, जो प्रत्येक व्यक्ति को देश के प्रति समर्पण की भावना सिखाता है।

प्रश्न 5
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के नायक चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के नायक आजाद के चरित्र-व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर नायक के चारित्रिक गुणों (विशेषताओं) का, वर्णन कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद के स्वदेश-प्रेम का वर्णन कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर उत्कट देशप्रेमी तथा दृढनिश्चयी के रूप में। आजाद का चरित्र-चित्रण कीजिए।
था
‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य में ‘सूत्रों का रटना छोड़ो, अब स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ो’ का उदघोष करने वाले की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
था
“चन्द्रशेखर आजाद उत्कृष्ट देशप्रेमी थे।” इस कथन की पुष्टि ‘मातृभूमि के लिए खण्डकाव्य के आधार पर कीजिए। 

उत्तर

डॉक्टर जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के नायक चन्द्रशेखर आजाद एक महान देशभक्त, अद्वितीय वीर, साहसी तथा आदर्श क्रान्तिकारी थे। कवि ने उनके चरित्र के माध्यम से राष्ट्रप्रेम, त्याग, बलिदान और आत्मसम्मान की महान भावना को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका सम्पूर्ण जीवन मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित रहा। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(1) उत्कट देशभक्ति—चन्द्रशेखर आजाद का हृदय देशप्रेम से ओत-प्रोत था। बचपन में ही जलियाँवाला बाग के नृशंस हत्याकाण्ड का समाचार पढ़कर उनका मन अत्यन्त व्यथित हो उठा और उन्होंने उसी समय यह संकल्प लिया कि वे अपना सम्पूर्ण जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर देंगे—

“इस जन्मभूमि के लिए प्राण, मैं अपने अर्पित कर दूंगा।
आजाद न होगी जब तक यह, मैं कर्म अकल्पित कर दूंगा।”

(2) वीरता और अद्भुत साहस—आजाद बचपन से ही अत्यन्त साहसी और निर्भीक थे। अंग्रेजों द्वारा दिये गये कठोर दण्ड (बेंतों की सजा) को उन्होंने हँसते-हँसते सहा और हर प्रहार के साथ ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया। इससे उनके अटूट साहस और देशभक्ति का परिचय मिलता है। अल्फ्रेड पार्क की घटना में भी उन्होंने अकेले ही पुलिस से मुकाबला करके अपनी वीरता सिद्ध की—
“पर बालक वह अंगारा था, आँखों में उग्र उजाला था।”

(3) प्रभावशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व—आजाद का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था। उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट, चेहरा तेजस्वी और वाणी ओजपूर्ण थी। वे अपने व्यक्तित्व से लोगों को प्रभावित कर लेते थे। उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक युवक उनके आदर्शों से प्रेरित होकर देशसेवा के लिए तैयार हो जाता था—
“आजाद चन्द्रशेखर ऐसा, जिस पर हरेक नवयुवक निछावर होता था।”

(4) कुशल संगठनकर्ता—आजाद में संगठन की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने देश के अनेक क्रान्तिकारियों को एक सूत्र में बाँधकर एक सशक्त संगठन का निर्माण किया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर स्वतंत्रता आन्दोलन को नई दिशा दी और उसे अधिक प्रभावशाली बनाया—

“संगठन शक्ति का, पैसे का, वे करते थे।
व्यक्तित्व खींचता था चुम्बक-सा, अमृत-सा।”

(5) प्रकृति-प्रेमी और विचारशील—आजाद केवल वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि प्रकृति-प्रेमी और गम्भीर चिन्तक भी थे। जब वे संघर्षों से थक जाते थे, तो प्रकृति की गोद में जाकर विश्राम करते और वहीं बैठकर भविष्य की योजनाएँ बनाते थे। यह उनके संतुलित और गम्भीर व्यक्तित्व को दर्शाता है—

“सातोर नदी के इस तट पर, जननी की मुक्ति सोचता है।
शासन की महाशक्ति से वह, लड़ने की युक्ति सोचता है।”

(6) महान क्रान्तिकारी भावना—आजाद एक महान क्रान्तिकारी थे। उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों का डटकर सामना किया और सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाया। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर देशभर में क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित की—
“आजाद क्रान्ति की आग जलाये जाते थे।”
उनका उद्देश्य केवल स्वतंत्रता प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि अन्याय और अत्याचार का अंत करना भी था।

(7) अपराजेय और आत्मसम्मानी सेनानी—आजाद कभी भी अंग्रेजों के सामने झुके नहीं। उन्होंने यह प्रण लिया था कि वे कभी भी जीवित पकड़े नहीं जाएँगे और उन्होंने अपने इस प्रण को अन्त तक निभाया। वे अत्यन्त आत्मसम्मानी और दृढ़निश्चयी थे।

(8) अमर शहीद और त्याग की मूर्ति—आजाद का जीवन त्याग और बलिदान की महान गाथा है। अल्फ्रेड पार्क में जब वे चारों ओर से घिर गये, तब उन्होंने वीरतापूर्वक लड़ते हुए अन्त में अपनी अन्तिम गोली स्वयं को मारकर शहीद होना स्वीकार किया, परन्तु अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया—

“गिर पड़ा वीर पर हिम्मत थी, आने की पास नहीं उनकी।
कहते थे जीवित होगा यह, क्या जाने गोली कब सनकी।”

इस प्रकार चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र साहस, देशभक्ति, त्याग, आत्मसम्मान, संगठन-शक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत संगम है। उनका जीवन भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का अमूल्य स्रोत है और वे सदैव राष्ट्रसेवा के आदर्श के रूप में स्मरण किये जाते रहेंगे।

Scroll to Top