भगवती चरण वर्मा का जीवन परिचय (Bhagwati Charan Verma Ka Jivan Parichay)

प्रस्तावना

भगवती चरण वर्मा हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कवि, कहानीकार और नाटककार थे। वे प्रेमचंदोत्तर युग के प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिन्दी उपन्यास को नई दिशा और गहराई प्रदान की। उनके उपन्यासों में समाज की वास्तविक समस्याओं, मानवीय स्वभाव और नैतिक प्रश्नों का गहरा चित्रण मिलता है। उनकी प्रसिद्ध कृति चित्रलेखा हिन्दी साहित्य की अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय रचना मानी जाती है।

जन्म

भगवती चरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के सफीपुर कस्बे में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवीचरण वर्मा था, जो पेशे से वकील थे। जब वे छोटे ही थे तब 1908 में प्लेग महामारी फैलने के कारण उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई और उनकी शिक्षा तथा जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

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शिक्षा

भगवती चरण वर्मा की प्रारंभिक शिक्षा सफीपुर में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे इलाहाबाद चले गए। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय  से हिन्दी, अंग्रेजी और इतिहास विषयों में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एल.एल.बी. की पढ़ाई भी पूरी की।

छात्र जीवन में ही उन्हें साहित्य से विशेष लगाव हो गया था। वे स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका में लिखते थे और उनकी रचनाएँ ‘प्रताप’ और ‘शारदा’ जैसी पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होने लगी थीं।

साहित्यिक जीवन

भगवती चरण वर्मा ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत एक कवि के रूप में की थी। उनकी प्रारंभिक कविताएँ छायावाद से प्रभावित थीं। धीरे-धीरे उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध के क्षेत्र में भी लेखन करना शुरू किया।

वे किशोरावस्था में ही कानपुर के साहित्यिक वातावरण से जुड़ गए थे और कई प्रसिद्ध साहित्यकारों के संपर्क में आए। साहित्य के प्रति अत्यधिक रुचि के कारण वे पढ़ाई पर पूरा ध्यान नहीं दे पाए और हाईस्कूल तथा इंटर की परीक्षाएँ उन्हें दूसरे प्रयास में पास करनी पड़ीं।

1928 में एल.एल.बी. करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, लेकिन उनकी वकालत अधिक सफल नहीं रही। इसी दौरान उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास “चित्रलेखा” का लेखन शुरू किया। इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद वे हिन्दी साहित्य के प्रमुख उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

पत्रकारिता और अन्य कार्य

भगवती चरण वर्मा कुछ समय तक पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। वे कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ कार्य करते रहे। बाद में वे फिल्म जगत से भी जुड़े और प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक Kedar Sharma के साथ ‘चित्रलेखा’ फिल्म के लिए सिनेरियो लेखक के रूप में कार्य किया।

वे कुछ समय तक All India Radio से भी जुड़े रहे। आगे चलकर वे पूर्णकालिक साहित्यकार बन गए और अपना पूरा समय साहित्य सृजन में लगाने लगे।

1978 में उन्हें भारत की संसद के उच्च सदन Rajya Sabha का सदस्य भी मनोनीत किया गया।

प्रमुख रचनाएँ

उपन्यास

भगवती चरण वर्मा के प्रमुख उपन्यास निम्नलिखित हैं —

  • पतन
  • चित्रलेखा
  • तीन वर्ष
  • टेढ़े-मेढ़े रास्ते
  • अपने खिलौने
  • भूले-बिसरे चित्र
  • सामर्थ्य और सीमा
  • थके पाँव
  • रेखा
  • सबहिं नचावत राम गोसाईं
  • प्रश्न और मरीचिका
  • धुप्पल
  • क्या निराश हुआ जाए

कहानी-संग्रह

  • दो बाँके
  • मोर्चाबंदी
  • राख और चिंगारी
  • इंस्टॉलमेंट

काव्य-संग्रह

  • मधुकण
  • प्रेम-संगीत
  • मानव

नाटक

  • वसीहत
  • रुपया तुम्हें खा गया
  • सबसे बड़ा आदमी

अन्य रचनाएँ

  • अतीत के गर्त से (संस्मरण)
  • साहित्य के सिद्धांत तथा रूप (साहित्यालोचना)

साहित्यिक विशेषताएँ

भगवती चरण वर्मा की रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय मनोविज्ञान और नैतिक प्रश्नों का गहरा चित्रण मिलता है। उनके उपन्यासों में समाज की समस्याएँ, मानव जीवन की जटिलताएँ और जीवन के दार्शनिक प्रश्न प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उनकी भाषा सरल, सरस और प्रभावशाली है।

उनकी प्रसिद्ध कृति “चित्रलेखा” में पाप और पुण्य जैसे गहरे दार्शनिक विषयों को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

पुरस्कार और सम्मान

भगवती चरण वर्मा को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए।

उनके प्रसिद्ध उपन्यास “भूले-बिसरे चित्र” के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण  से भी सम्मानित किया।

साहित्य में स्थान

भगवती चरण वर्मा हिन्दी साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से समाज के यथार्थ और मानवीय जीवन के गहरे प्रश्नों को प्रस्तुत किया। हिन्दी उपन्यास साहित्य में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानित है।

निधन

भगवती चरण वर्मा का निधन 5 अक्टूबर 1981 को उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके निधन से हिन्दी साहित्य को एक महान साहित्यकार की क्षति हुई।

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