जीवन परिचय
आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, साहित्येतिहासकार, पत्रकार, संपादक तथा शिक्षाविद् आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का जन्म 4 सितंबर 1906 को मगरायर (मगरैल) गाँव, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित गोवर्धनलाल वाजपेयी तथा माता का नाम जनकदुलारी देवी था। उनके परिवार में शिक्षा, संस्कृति और साहित्य का विशेष वातावरण था, जिसके कारण बचपन से ही उनकी रुचि अध्ययन और साहित्य की ओर हो गई।
बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी, गंभीर और अध्ययनशील थे। साहित्य, इतिहास और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने अपने परिश्रम, मौलिक चिंतन और विद्वता के बल पर हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना को नई दिशा देने वाले प्रमुख विद्वानों में उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे छायावादी कविता के समर्थक और उसके प्रमुख आलोचक माने जाते हैं। हिंदी साहित्य में उन्हें शुक्लोत्तर युग के प्रमुख समालोचक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है।
शिक्षा
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग में हुई। इसके बाद उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से हिंदी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे विश्वविद्यालय में सदैव मेधावी छात्र रहे और हिंदी साहित्य के महान विद्वान डॉ. श्यामसुन्दर दास के प्रिय शिष्यों में गिने जाते थे। उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने हिंदी साहित्य, संस्कृत, भारतीय संस्कृति तथा आलोचना का गहन अध्ययन किया। उनकी विद्वत्ता और शोधपरक दृष्टि ने उन्हें हिंदी के प्रमुख साहित्यकारों की श्रेणी में स्थापित किया।
साहित्यिक जीवन
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का साहित्यिक जीवन अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी रहा। उन्होंने साहित्यकार, पत्रकार, संपादक, आलोचक, शिक्षक और प्रशासक के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया। प्रारंभ में वे ‘भारत’ पत्र के संपादक रहे। इसके बाद उन्होंने काशी नागरी प्रचारिणी सभा में ‘सूरसागर’ के संपादन का कार्य किया तथा बाद में गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ‘रामचरितमानस’ के संपादन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सन् 1941 से 1947 तक वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्राध्यापक रहे। इसके बाद वे सागर विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष बने और लंबे समय तक वहाँ हिंदी साहित्य के विकास में योगदान दिया। बाद में उन्हें विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन का उपकुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने उच्च शिक्षा और हिंदी भाषा के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने हिंदी आलोचना को नई दृष्टि प्रदान की। जहाँ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य का मूल्यांकन लोकमंगल की दृष्टि से किया, वहीं नंददुलारे वाजपेयी ने आधुनिक साहित्य, विशेषकर छायावाद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूरदास और प्रेमचंद के साहित्य का गहन एवं निष्पक्ष विश्लेषण किया। उनकी आलोचना विद्वत्तापूर्ण होने के साथ-साथ संतुलित, तार्किक और संवेदनशील भी है।
उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का विषय नहीं माना, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और मानव जीवन से जोड़कर देखा। उनके आलोचनात्मक लेखन में मौलिक चिंतन, गहन अध्ययन और स्पष्ट तर्क दिखाई देते हैं। हिंदी आलोचना को आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
रचनाएँ
प्रमुख आलोचनात्मक ग्रंथ
- हिंदी साहित्य : बीसवीं शताब्दी
- आधुनिक साहित्य
- नया साहित्य : नए प्रश्न
- प्रेमचंद : एक साहित्यिक विवेचन
- जयशंकर प्रसाद
- महाकवि सूरदास
- कवि निराला
- कवि सुमित्रानंदन पंत
- राष्ट्रभाषा की कुछ समस्याएँ
- हिंदी साहित्य का आधुनिक युग
- आधुनिक साहित्य : सृजन और समीक्षा
- रीति और शैली
अन्य रचनाएँ
- भुलक्कड़ों का देश
- यादें बोल उठीं
भाषा-शैली
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी की भाषा सरल, साहित्यिक, परिमार्जित तथा प्रभावशाली खड़ी बोली हिंदी है। उन्होंने आवश्यकता के अनुसार संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे उनकी भाषा में गंभीरता और गरिमा आती है। उनकी शैली मुख्यतः आलोचनात्मक, विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक तथा शोधपरक है। उनके लेखन में तर्क, मौलिकता, संतुलित दृष्टिकोण और स्पष्ट अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय मिलता है। कठिन साहित्यिक विषयों को भी वे सरल और रोचक भाषा में प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता रखते थे।
साहित्य में स्थान
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी आधुनिक हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ आलोचक, निबंधकार, संपादक और शिक्षाविद् माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी आलोचना को नई दिशा प्रदान की तथा छायावादी साहित्य के समुचित मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना को समृद्ध बनाने वाले प्रमुख विद्वानों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य के इतिहास में वे शुक्लोत्तर युग के प्रमुख समालोचक के रूप में सदैव स्मरण किए जाते हैं।
निधन
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का निधन 21 अगस्त 1967 को उज्जैन (मध्य प्रदेश) में हुआ।
