मीरा बाई का जीवन परिचय | Meera Bai Ka Jivan Parichay

जीवन परिचय

भक्तिकाल की कृष्णभक्ति शाखा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री मीरा बाई का जन्म लगभग 1498 ई. में कुड़की (मेड़ता), जिला पाली, राजस्थान के एक राजपूत (राठौड़) परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रतन सिंह राठौड़ था, जो मेड़ता राज्य के सामंत थे। उनके दादा राव दूदा वैष्णव धर्म के अनुयायी तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। परिवार का धार्मिक वातावरण और श्रीकृष्ण के प्रति गहरी आस्था का प्रभाव मीरा के बाल मन पर बचपन से ही पड़ गया।

कहा जाता है कि जब मीरा लगभग पाँच वर्ष की थीं, तब उन्होंने एक विवाह समारोह देखा और अपनी माता से पूछा कि उनका दूल्हा कौन होगा। माता ने सहज भाव से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर संकेत करते हुए कहा कि यही तुम्हारे पति हैं। इस घटना का मीरा के मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व और जीवनसाथी मान लिया। बाल्यकाल से ही वे श्रीकृष्ण की पूजा, भजन और आराधना में लीन रहने लगीं।

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युवावस्था में उनका विवाह मेवाड़ (चित्तौड़) के राजकुमार भोजराज से हुआ, जो महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र थे। विवाह के बाद भी मीरा की श्रीकृष्ण भक्ति में कोई कमी नहीं आई। कुछ वर्षों बाद भोजराज का निधन हो गया। विधवा होने के बाद मीरा ने सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्ति ग्रहण कर ली और अपना जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति एवं भजन-कीर्तन को समर्पित कर दिया।

मीरा की भक्ति, साधु-संतों के साथ उनका संपर्क और मंदिरों में भजन-कीर्तन करना राजपरिवार को पसंद नहीं था। उन्हें अनेक प्रकार के विरोध, अपमान और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा। लोककथाओं के अनुसार उन्हें कई बार विष का प्याला और विषैले सर्प भी भेजे गए, किंतु श्रीकृष्ण की कृपा से उनका कोई अहित नहीं हुआ। अंततः उन्होंने चित्तौड़ छोड़ दिया और वृंदावन, मथुरा तथा द्वारका जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा करते हुए अपना जीवन भक्ति में व्यतीत किया।

मीरा बाई का संपूर्ण जीवन ईश्वर-प्रेम, त्याग, समर्पण और अटूट भक्ति का अनुपम उदाहरण है। उनकी रचनाओं में विरह, प्रेम, समर्पण और भक्ति की ऐसी मधुर अनुभूति मिलती है, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य की अमर कवयित्री बना दिया।

शिक्षा

मीरा बाई की औपचारिक शिक्षा के बारे में अधिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह निश्चित है कि उन्हें राजघराने के अनुरूप अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई थी। उन्होंने धर्म, संगीत, काव्य, संस्कृत तथा लोकभाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। बचपन से ही उन्हें संतों का सान्निध्य मिला, जिससे उनके भीतर आध्यात्मिक चेतना और कृष्णभक्ति का विकास हुआ। संगीत और भजन-गायन में भी उनकी विशेष रुचि थी, जिसका प्रभाव उनके पदों में स्पष्ट दिखाई देता है।

साहित्यिक जीवन

मीरा बाई ने अपने जीवन के अनुभवों और श्रीकृष्ण के प्रति अटूट प्रेम को पदों के रूप में अभिव्यक्त किया। उन्होंने किसी राजाश्रय या साहित्यिक प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए काव्य-रचना की। उनके पदों में श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह-वेदना, आत्मसमर्पण, वैराग्य तथा भक्ति का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है।

मीरा बाई माधुर्य भाव की कृष्णभक्ति की प्रमुख कवयित्री हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति, मित्र, प्रियतम और आराध्य मानकर उनकी उपासना की। उनके काव्य में सामाजिक बंधनों, जाति-पाँति, ऊँच-नीच और बाह्य आडंबरों का विरोध भी मिलता है। उनके पद आज भी मंदिरों, धार्मिक आयोजनों और संगीत सभाओं में बड़े श्रद्धा और प्रेम से गाए जाते हैं।

रचनाएँ

मीरा बाई की रचनाएँ मुख्यतः पदों के रूप में उपलब्ध हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—

  • मीरा के पद
  • नरसी जी का मायरा
  • गीत गोविंद टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ के पद

प्रसिद्ध पद

  • मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
  • पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। (यह पद परंपरागत रूप से मीरा से जोड़ा जाता है, हालांकि इसके संबंध में विद्वानों में मतभेद है।)
  • पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।
  • बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
  • जो तुम तोड़ो पिया, मैं नहीं तोड़ूँ।

भाषा-शैली

मीरा बाई की भाषा सरल, मधुर, भावपूर्ण और लोकजीवन के निकट है। उन्होंने मुख्यतः राजस्थानी, ब्रजभाषा तथा लोकभाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में कृत्रिमता नहीं, बल्कि सहज आत्माभिव्यक्ति मिलती है। उनकी शैली गीतात्मक, भावात्मक और भक्तिपूर्ण है। उनके पदों में माधुर्य, संगीतात्मकता, आत्मसमर्पण और विरह की गहन अनुभूति दिखाई देती है। उपमा, रूपक, अनुप्रास तथा मानवीकरण जैसे अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग उनकी रचनाओं को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।

साहित्य में स्थान

मीरा बाई हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृष्णभक्त कवयित्रियों में गिनी जाती हैं। भक्तिकाल की कृष्णभक्ति शाखा में उनका स्थान अत्यंत ऊँचा और सम्मानपूर्ण है। उन्होंने अपने पदों के माध्यम से भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया तथा ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण का आदर्श प्रस्तुत किया। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और संगीत की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आज भी उनके भजन भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ गाए जाते हैं।

निधन

मीरा बाई के निधन के संबंध में विद्वानों में मतभेद है, किंतु सामान्यतः माना जाता है कि उनका निधन लगभग 1546–1547 ई. के आसपास द्वारका (गुजरात) में हुआ। लोकमान्यता के अनुसार वे द्वारकाधीश मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में लीन हो गई थीं। यद्यपि यह एक धार्मिक मान्यता है, ऐतिहासिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं हुई है। अपने जीवन और काव्य के माध्यम से मीरा बाई ने भक्ति, प्रेम और समर्पण का जो अमर संदेश दिया, वह आज भी भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

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