कबीरदास का जीवन परिचय | Kabirdas Ka jivan Parichay

कबीरदास हिन्दी साहित्य के महान संत-कवि थे। वे निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके काव्य में ईश्वर-भक्ति, सामाजिक कुरीतियों का विरोध, मानवता, प्रेम और समन्वय की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया और पाखंड, जातिवाद तथा आडंबर का कठोर विरोध किया।

जन्म

कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) में माना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार उनका जन्म लहरतारा तालाब के समीप हुआ था। कहा जाता है कि नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपति ने उनका पालन-पोषण किया।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

वे जुलाहे (बुनकर) का कार्य करते थे और गृहस्थ जीवन जीते हुए ही भक्ति और साधना का प्रचार करते रहे। कबीरदास ने जीवनभर सादगी और परिश्रम को महत्व दिया।

शिक्षा

कबीरदास औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे, किंतु उन्हें साधु-संतों की संगति और जीवनानुभव से गहन ज्ञान प्राप्त हुआ। वे स्वामी रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। उनकी शिक्षा अनुभवजन्य और व्यावहारिक थी।

साहित्यिक जीवन

कबीरदास ने जनसाधारण की भाषा में काव्य रचना की। उनका साहित्य लोकजीवन से जुड़ा हुआ है। उनके दोहों और पदों में समाज की बुराइयों पर करारा प्रहार मिलता है। उन्होंने कर्मकांड, मूर्तिपूजा और बाह्य आडंबरों का विरोध किया तथा सच्चे गुरु और आंतरिक भक्ति पर बल दिया।

प्रमुख कृतियाँ

कबीरदास की रचनाएँ मुख्यतः साखी, सबद और रमैनी के रूप में मिलती हैं।
उनकी रचनाओं का संकलन “बीजक” नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें—

  • साखी
  • सबद
  • रमैनी

शामिल हैं।

भाषा-शैली

कबीरदास की भाषा सधुक्कड़ी (खिचड़ी भाषा) है, जिसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, खड़ी बोली और उर्दू का मिश्रण है। उनकी शैली सरल, व्यंग्यात्मक, ओजपूर्ण और प्रभावशाली है। वे प्रतीकों और उलटबांसियों का प्रभावी प्रयोग करते हैं।

दर्शन एवं विचारधारा

कबीरदास का दर्शन निर्गुण ब्रह्म पर आधारित है। वे ईश्वर को निराकार मानते थे। उनके विचारों में भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय मिलता है। उन्होंने मानवता को सर्वोपरि माना।

निधन

कबीरदास के निधन के संबंध में भी मतभेद है। सामान्यतः उनका निधन 1518 ई. में मगहर में माना जाता है। मान्यता है कि उनके निधन के समय हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय उनके प्रति समान श्रद्धा रखते थे।

Scroll to Top